Saturday, August 19, 2017

*मन का विखण्डन*

🤔आज का काल चिन्तन😰

◀ *मन का विखण्डन*▶

*⁠⁠गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।*
*न च शक्नोम्यवस्थ तुं भ्रमतीव च मे मनः॥३०*

भावार्थ:- अर्जुन कह रहे हैं, की हे माघव!  मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, और मेरी त्वचा जल रही है। मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ, मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है।

वह बहुत कमजोर दिखाई पड़ रहा है और कहता है कि मैं रथ पर बैठ भी सकूंगा या नहीं, मुझमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं है।
गहरे में मन में जो घटित होता है, वह शरीर के रोएं-रोएं तक फलित हो जाता है। अर्जुन इतना बलशाली होते हुए भी अचानक ऐसा बलहीन हो गया कि रथ पर बैठना उसे कठिन लगने लगा, वह क्षणभर पहले ऐसा नहीं था। इस क्षणभर में वह अशक्त हो गया। इस क्षण भर में ऐसा क्या हो गया है?

इस क्षण में एक ही घटना घटी है। अभी - अभी उसका मन युद्ध के लिए तैयार था लेकिन अचानक उसका मन दुर्बल हो गया। 'मन' स्व-विरोधी हो गया। जैसे ही  मन विरोधी खंडों में विभाजित होता है, तत्काल शरीर रुग्ण, दीन हो जाता है। उसके धनुष का गिर जाना, उसके हाथ-पैर का कंपना, उसके रोओं का खड़ा हो जाना इसी बात का सूचक है। शरीर हमारे मन की छाया से ज्यादा नहीं है और उसकी शक्ति से ही वह शासित है। यह जो अर्जुन के साथ हुआ वह उसके मन में पैदा हुए चक्रवात के शरीर तक पहुंचने का परिणाम है। हमारे जीवन में शरीर से बहुत कम चक्रवात मन तक पहुंचते हैं। परन्तु प्रायः वे मन से ही शरीर तक पहुंचते ही हैं।
जगत में दो प्रकार प्रक्रियाओं की संभावनाएँ हैं- या शरीर की प्रक्रिया और या कि चेतना की प्रक्रिया।  विज्ञान शरीर की प्रक्रिया पर ध्यान देता है, धर्म मनुष्य की चेतना की प्रक्रिया पर ध्यान देता है।

किसी पेड़ की डाली पर यदि चोट करें तो आवश्यक नहीं है कि जड़ों तक पहुंचे। परन्तु जड़ों को पहुंचाई गयी चोट पत्तों तक अवश्य पहुंच जाती है। इसलिए श्री कृष्ण अर्जुन की उस स्थिति की चिंता करते हैं कि उसकी चेतना को क्या हो रहा है, उसके शरीर पर भी जिस कारण से वे परिणाम दिखाई दे रहे हैं।
परन्तु हम लोग जो उपाय करते हैं वे शरीर से शुरू होने वाले होते हैं पर रूग्णता मिटती ही नहीं। क्योंकि हमारा उपाय मन से शुरू नहीं होता, चेतना से शुरू नहीं होता है।
यह प्रत्येक मनुष्य की स्थिति है। गीता मनुष्य जाति का सटीक मनोविज्ञान है। हमारा जीवन भी अन्तर और बाह्य प्रक्रियाओं का मिला जुला प्रभाव है इसलिए जिंदगी में क्रांति नहीं हो पाती है। लेकिन अर्जुन के जीवन  में क्रांति निश्चित है।
अर्जुन संन्यासी हो नहीं सकता क्योंकि जो संसारी होने की भी हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है, उसके संन्यासी होने का कोई उपाय नहीं है। वास्तव में संन्यास संसार से भागने का नाम नहीं है, संसार को पार कर जाने का नाम है।
संन्यास, संसार की जलन और आग का अतिक्रमण है। और जो उसे पूरा पार कर लेता है, वही अधिकारी हो पाता है। संन्यास संसार से विरोध नहीं, संन्यास संसार की संपूर्ण समझ और संघर्ष का फल है। जो संन्यास की स्थिति में आ गया है।  वह पलायनवादी हो तब तो अभी रास्ता है उसके सामने। यदि  संघर्ष में जाए, तो कठिनाई है।
यहाँ ऐसा लगता है कि गीता अर्जुन के संपूर्ण शरीर की शिथिलता को मिटाने के लिए है। यह सब उसके मन के भीतर समा गए विक्षेप के कारण है। श्री कृष्ण उसे वापस आत्मवान् , संकल्पवान व्यक्तित्व  बनाने का उपाय करते है।

निवेदन
रामनारायण सोनी

अन्तर्द्वन्द्व की अमोघ ओषधी

*"अन्तर्द्वन्द्व की अमोघ ओषधी"*

प्रकृति निष्पक्ष है। बाग में टहलने वाले सभी व्यक्तियों को फूलों की सुगंध समान रूप से पहुंचती है। कोई सुगंध महसूस करे न करे।
बहुत कुछ है एक ही दृष्य में पर हम वही देखते हैं जो हम चाहते हैं, आवाजें बहुत सी हैं चारों ओर पर हम उनमें से सुनते वही है जो हम सुनना चाहते हैं।
एक पेड़ में माली उस पेड़ की सेहत देखता है, पर्यावरण प्रेमी उसकी पत्तियाँ देख कर प्रसन्न होता है, लकड़ी का व्यापारी उसकी लकड़ियों में धन देख लेता है, धूप में तपा आदमी उसकी छाया देखता है। *पेड़ की समग्रता को देखने के बजाए हर देखने वाला उसे खण्ड खण्ड कर के देखता हैं।* पर देखता वही है जो उसके मन की आँख देखना चाहती है। कक्षा में बैठा विद्यार्थी गुरू के द्वारा पढ़ाया जा रहा पाठ नहीं सुनता है तब उस समय वह बाहर कहीं से आ रही कोयल की कूक सुनता है। वह वही कर रहा है जो वह चाहता है। यह संसार मनोमय है। इसका प्रतिबिम्ब भी मनोमय है। वह समानान्तर क्रम जो बाहर भीतर चल रहा होता है वह सब सब अलग अलग चलता है। बहुत बाद में पता चलता है कि किसने क्या पाया। एक जगत बाहर से दिखता है पर जगत का कोई खण्ड भीतर ही भीतर दिखता है। बाहर उसकी मर्जी से और भीतर अपनी मर्जी से। बाहर भीतर अलग अलग देखने पर समन्वय न होने पर अन्तर्द्वन्द्व खड़ा हो जाता है। और अन्तर्द्वन्द्व तो मन में अनुकूल और प्रतिकूल की चल रही आपसी लड़ाई है। बाहर चल रहे घटनाक्रम को आँख मूँद कर अनदेखा किया जा सकता है पर भीतर मन को कौन मना करेगा। वहाँ वह अकेला नहीं बुद्धी से संयुक्त है इसलिए यह भीतर की लड़ाई बाहर की लड़ाई से कई गुना भारी है। मन भीतर की लड़ाई में व्यस्त है तो इन्द्रियाँ भी शिथिल हो जाती है, शरीर भी शिथिल हो जाता है। इन्द्रियाँ अन्तःकरण से कट जाती है। परिणामत: व्यक्ति विमूढ़ हो जाता है।
अर्जुन महाभारत में खड़े हैं, बाहर धर्मक्षेत्र और कर्मक्षेत्र खड़ा है। उनका 'भीतर' कुछ और ही देख रहा है। भीतर जो देख रहा है वह है रिश्तों की दुर्दम घाटियाँ, मोह की बन्धनाएँ, ग्लानि की धधकती भट्टियाँ और अज्ञान का अजेय शत्रु। अर्जुन का यही अन्तर्द्वन्द्व उन्हें विमूढ़ बना देता है। उनका शरीर जैसे पक्षाघात से ग्रसित हो जाता है। उनके तूणीर में अपार क्षमता वाले दिव्यास्त्र भरे पड़े हैं पर उनको गाण्डीव तक पहुँचाने वाले हाथ शिथिल हो गए हैं। अन्तर्द्वन्द्व में पड़े अर्जुन को यह भान भी नहीं रहा कि उनके पीछे उत्सर्ग का संकल्प लिए विशाल सेना खड़ी है। जिनके सारथि स्वयं वासुदेव कृष्ण हैं।
इस अन्तर्द्वन्द्व को मिटाने वाली श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता सुनने के पश्चात् अर्जुन कहते हैं; हे अच्युत! मेरा अज्ञानजन्य मोह जो कि समस्त संसाररूप अनर्थ का कारण था और समुद्रकी भाँति दुस्तर था, नष्ट हो गया है। और हे अच्युत आपकी कृपा के आश्रित होकर मेरे संशय विच्छिन्न हो गए हैं। इस अज्ञान जनित मोह का नाश और आत्मविषयक स्मृति का लाभ हो गया है तथा मन की विषमता विच्छिन्न हो गई है। इसमें एकत्व का अनुभव करने से मोह और शोक इत्यादि नष्ट हो गए हैं। अब मैं संशय रहित हुआ आपकी आज्ञा के अधीन खड़ा हूँ। मैं आपका कहना करूँगा। अभिप्राय यह है कि मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ। मुझमें अब अन्तर्द्वन्द्व  शेष नहीं है।

निवेदक
रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...