Saturday, January 18, 2025
जिजीविषा और कर्मठता
Wednesday, January 15, 2025
आदमी के भीतर के आदमी
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[13/07, 10:38] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का प्रथम भाग पढा, अलौकिक आनन्द की अनुभूति हुई।
संस्कृत, हिन्दी, मुस्लिम, एवं पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को उद्धृत करते हुए प्रेम अतुल्य है, निर्विकल्प है, तथा उसकी अनिर्वचनीयता का विस्तार से वर्णन किया है।प्रेम के प्रादुर्भाव, उसके विविध सोपान, और प्रेम की परिपक्व अवस्था में उसकी भावदशा,भावधाराओं तथा पूर्वराग,मिलन और विरह की स्थितियों का विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण किया है।
शबरी,भरत,सुतीक्ष्णजी आदि भक्तों की प्रेम भावना काम अच्छा चित्रण किया किन्तु प्रेम की पराकाष्ठा व्रज की गोपिकाओं में मिलती है उनका उल्लेख कैसे छूट गया? गोपियों के प्रेम के आगे उद्धवजी का ब्रह्मज्ञान तिरोहित हो गया और वे स्वयं प्रेम के सरोवर में डुबकी लगाने लगे।इसका वर्णन श्रीमद्भागवत में, सूरदास जी के भ्रमरगीत में, तथा जगन्नाथ दास रत्नाकर के उद्धवशतक में बहुत सुन्दर है।
ध्वनि सिद्धांत का भी आपने उपनिषदों के आधार पर, एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छा विवेचन किया है।
यह पुस्तक आपके गहन अध्ययन एवं चिंतन की परिचायक है।
हिन्दी साहित्य भण्डार में आपकी यह रचना एक अमूल्य, अद्वितीय, एवं अनुपम रत्न है।
सधन्यवाद।
भवदीय
गौरीशंकर दुबे।
[17/07, 06:41] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का द्वितीय भाग पढ़ने पर सुखद अनुभूति हुई। देवनागरी लिपि और वर्णमाला के संबंध में अच्छी जानकारी दी। हिन्दी के स्वर एवं व्यंजन वर्णों का चौदह मन्वंतर,द्वादश आदित्य,एकादश रुद्र, आदि से संबंधित तालिका में शोधपूर्ण नवीन जानकारी मिली। उपनिषद् के अनुसार वाणी की महत्ता तथा वैदिक मन्त्रों के उच्चारण की शुद्धता आदि पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है।
दृष्टि और दृष्टा में आपने दृश्येन्द्रिय की संरचना और कार्यप्रणाली का शरीरविज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए स्पष्ट किया है कि भिन्न-भिन्न विचारों,भावों, अवधारणाओं के अनुसार एक ही दृश्य पर अलग अलग व्यक्तियों का अलग-अलग दृष्टिकोण होता है तदनुसार अनुभूति होती है। अतः आध्यात्मिक चिंतन से ही हमारा दृष्टिकोण शुभ हो सकता है।इस विषय पर मानस और गीता को उद्धृत करते हुए दार्शनिक विचार व्यक्त किए गए हैं।
भगवद्भक्ति, पूजा, स्तुति को भी संवाद माना है। संवाद के माध्यम से ही गीता और मानस का ज्ञान नि:सृत हुआ है।वादे वादे जायते तत्त्वबोध:। अतः आत्मोद्धार के लिए संवाद की आवश्यकता को प्रतिपादित किया है।।
जन्म, मृत्यु,जरा,व्याधि ये चारों ही दोष है।एक चेतन आत्मा को छोड़कर संसार की ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें ये चारों दोष न हो। अतः अध्यात्म ज्ञान होने पर ही जीव का कल्याण है।
इस मिथ्या जगत् में रहते हुए ही हमें परम सत्य को जानना है। इसके लिए हमारी धारणाएँ , विचार शुभ हो।शुभ सुने,शुभ सोचे।जीवन में सकारात्मकता लाएँ।
बहुत दिनों बाद श्रेष्ठ रचना पढ़ने को मिली इसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।
Monday, January 13, 2025
साहित्यकार
क्यों लिखे जा रहा हूँ मैं?
जब कोई पढ़ने वाला ही नहीं है
क्यों पढ़े जा रहा हूँ मैं?
जब कोई सुनने वाला ही नहीं है
क्यों लिखें ? क्यों पढ़े?, इन प्रश्नों के सागर में भी खड़े ये जिद्दी लोग मान क्यों नहीं रहे?
आखिर ये कौन लोग हैं जो उनसे नाता जोड़ रखे हैं जो वास्तव में उनके सगे हैं ही नहीं। क्यों उनका दुःख अपना समझ कर भारित हो रहे हैं? दु:खी हो रहे हैं? अच्छे को कोई भी अच्छा कह देगा पर इन्हें देखो तो सही, ये मरखने बैंलों के सींगों से डरे बगैर उन्हें लाल कपड़ा दिखाने से डरते नहीं। बड़े अजीब लोग हैं ये जो अपना धन, अपना तन और अपने चैन का अधिकृत समय जनता में लुटाये जा रहे हैं। क्या यह इनका पागलपन नहीं है? समाज में कोई जहर फैलाता है तो ये उसे पी कर नीलकंठ होना चाहते हैं, और उस जहर से बचने के नुस्खों की पुड़िया लिये फिरते हैं। अजीब से दरबान हैं ये जो खुद तो उनींदे खड़े हैं पर पौ फटते ही तुम्हें जगाने आ जाते हैं। न जाने क्यों इन्हें झोंपड़ियाँ, झुग्गियाँ, अन्धी गहरी गलियाँ, पसीने में लथपथ, बदबू और सीलन भरी बस्तियाँ पसन्द हैं जहाँ लोग जाना पसन्द नहीं करते। ये सनकी लोग वहाँ भी अपने कागज कलम ले कर खड़े हो जाते हैं। इन्हें कभी कभी अपच की बीमारी हो जाती है जो झूँठ को पचाने में असफल हो जाते हैं।
कौन से हैं ये खनिक लोग जो इतिहास, पुराण, शास्त्र को खोद/ शोध कर हीरे, माणिक लोगों के बीच बिखेर रहे हैं। शौकीन हैं ये लोग; इनके पास तलवार से तेज कलमें हैं जिसमें सिकलीगरों की तरह धार लगाते ही रहते हैं, मरहम सी मुलायम शाई है जिससे दुःख दर्दों पर पट्टियाँ बाँधने को तैयार हो जाते हैं।
ये वे ड्रोन हैं जो अपनी बैटरी खर्च कर के समाज के उत्सवों त्यौहारों, शोक सभाओं यहाँ तक कि मरघटों के सन्नाटों में वीडियोग्राफी करने पहुँच जाते हैं। इनके मस्तिष्क में कई तरह के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं जो इन्हें चैन से बैठने ही नहीं देते।
हाँ ये सारस्वत पुत्र हैं ये, विरागी हैं ये, सन्यासी हैं ये, साधक हैं पुजारी हैं। समाज के लिये दर्पण बनाते हैं, सही रास्तों के संकेतक बनाते हैं, संहिताएँ रचते हैं जो जीवन की संचेतना हो सकती है। अपनी वेदी में, अपनी समिधा से, अपने घृत और अपनी आहुतियों से समाज के मंगल हेतु दिन रात हवन करते हैं।
रामनारायण सोनी
संक्रान्ति महापर्व दिनांक १४.१.२५
Friday, January 10, 2025
हाँ यह बनारस है
डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला
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