Saturday, January 18, 2025

जिजीविषा और कर्मठता

इशावास्योपनिषद्
अनुक्रम-२

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम् समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।।
भावार्थ:-
इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें। इस प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं है, जिससे तुझे कर्म फल का लेप ना हो ।।

पंछी सुबह-सुबह पेड़ पर इसलिए चहचहाते हैं कि उनमें जागते ही एक उल्लास होता है। आज उन्हें जी-भर जीने के लिए उड़ना है। 
इनकी इस क्रिया-प्रकिया में भी संदेश हैं। जीवन जीने की उत्कट अभिलाषा यानी जिजीविषा है। कर्मनिष्ठा है इसलिये अपने कर्म के लिये उद्यत हैं। आशा और विश्वास से भरे भरे से हैं कि वे अपने कर्मक्षेत्र की ओर निकल पड़े हैं और उन्हें अपने जीने के लिये जरूरी आहार अवश्य मिलेगा। चाहे आँधियाँ चले, बारिश हो, सर्दी हो गर्मी हो, मौसम चाहे कैसा भी हो वे गन्तव्य तक पहुंचेंगे ही। वे आश्वस्त हैं कि उनके पंखों में इतनी ऊर्जा है कि वे जावेंगे भी और जा कर वापस लौटेंगे भी। वे प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितना उन्हें जीवन जीने के लिये जरूरी है। प्रकृति भी उन्हें अपना ही हिस्सा मानती है इसलिये दाना पानी ले कर बैठी है। 
उनकी चहचहाट का स्वर समवेत होता है। यह उनका पारम्परिक सहगान है। इस गान में सामूहिक उत्सव प्रियता है, सामाजिक समरसता है, सह-अस्तित्व का संकल्प है, और जीवन के किसी भी खालीपन को उत्साह से भरने का उपक्रम है। किसने किससे से कहा कि चलो चहको! अर्थात् यह समवेत एक उपदेश नहीं संस्कार है, वृत्ति है, स्वभाव है और सांकेतिक आमन्त्रण है। शायद उनमें से ही कोई पंछी है जो इस गान को उकेरता है, याने प्रारम्भ करता है और सभी अपना स्वर मिलाते हैं। 
लगता है स्वर उनके अपने शब्दकोष और कण्ठ से निकले वे आराधना-अर्चना के स्वर हैं जो उषा और संध्या का वन्दन-अभिनन्दन करते हैं। ये गान अपना स्वर, लय, ताल, स्पन्दन और नाद ले कर निकलते हैं। हर एक स्वर की और समवेत गान की अपनी नैसर्गिक पहिचान है। कोई पंछी यदि गा नहीं पाता है तो लगता है उसके लिये सब गा रहे है। 
वे शाम को लौट कर इसलिए चहचहाते हैं कि उन्होंने आज जी भर कर जिया है। उनके इन समवेत स्वरों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव है, रात्रि का स्वागत है और शान्ति का आह्वान भी है। उनमें से अगर कोई उदास भी रह गया है तो उल्लास का समवेत स्वर उसमे रही कमी को भर देगा। घर वापसी में उनके अपने लिये चोंच में कोई दाना संग्रहण के लिये नहीं होता है लेकिन अगर कोई दाना है भी तो घोसले में बैठे चूजों के लिए होता है जो अभी आश्रित हैं; तब तक जब तक कि वे स्वयं उड़ नहीं लेते। वे भी तो कल उड़ेंगे और उड़ कर पा लेंगें। ये जानते हैं कि कभी वे भी चूजे थे। इस उपक्रम में अपरिग्रह के जीवित संदेश हैं।
ये पंछी योगी है, कर्मयोगी हैं। इनके अपने यम, नियम हैं, प्रकृति के प्रदत्त प्राण-आयाम हैं। अपने स्वकर्मों में निरत हैं। शायद जानते हैं कि योग: कर्मसु कौशलं। ये जानते होंगे कि 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।।
और
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।श्रीमद्भगवद्गीता 2/47।।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2/48।।
हे धनञ्जय ! तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

रामनारायण सोनी
१८.१.२५

Wednesday, January 15, 2025

आदमी के भीतर के आदमी

आदमी के भीतर के आदमी

तुम में एक आदमी ऐसा है जो ओरीजनल है,  जो बचपन में अकेला था। वह बाहर आता था  जस का तस ही। जो सोचता था वही बोलता था, जो करता था वह भी अपनी विशुद्ध सोच के अनुसार। उस आदमी की अपनी खिंची सरल रेखा थी, वैसी ही राह बनाता था और अपनी उसी राह पर चलता था।
पर बाद में इसके अलावा कई और आदमी भी उस आदमी में घुस गये, कहना चाहिये एक भीड़ की भीड़ उसमें घुस गई। ये सब अपने अपने विचार और समझ ले कर घुसे। इनमें शामिल थे एक प्रोफेशनल, एक रिश्तेदार, एक दो मुहा, एक अतिवादी, एक प्रेमी, एक नायक, एक खलनायक आदि आदि। अब मूल आदमी वयस्क हो कर तरह तरह के आदमियों से भरा तेतरी चिड़ियाखाना हो गया। सब के सब रंगमंच के पर्दे के पीछे बैठे रहते हैं। एक एक करके आते हैं, अपनी कला-कौशल दिखाते हैं और फिर नेपथ्य में चले जाते हैं। इस रंगमंच का सूत्रधार मूल आदमी ही है। सामने प्रेयसी हो तो प्रेमी निकलता है, ग्राहक खड़ा हो तो व्यापारी निकलता है। जब जो जरूरत पड़ जाय वैसा आदमी निकलता है। 
यहाँ तक तो लगभग ठीक ही है पर कभी कभी निकले इस एक आदमी के पीछे दुबक कर पीछे दूसरा आदमी खड़ा हो जाता है; शायद इनके लिये ही कहावत बनी है "मुह में राम, बगल में छुरी"। ऐसे में दिखता कोई और है, करता कोई और है। दिखने वाला मुखौटा है, करने वाला वह पीछेवाला है। 
वो परमहंस है जो अपने भीतर एक ही आदमी रखता है। वह दानी है जो सिर्फ बाँटता है, प्रतिफल नहीं चाहता। वह गुरू है जो तारता है। प्रकृति ने मौलिक रचनाएँ की है। सूरज में केवल सूरज, चाँद में केवल चाँद, आग में केवल आग बनाई। वहाँ वही है जिसके लिये मौलिक सृजन हुआ है। हम में भी मौलिक एक आदमी ही आया था। हमने कॉपी पेस्ट करके कई बिम्ब खड़े कर लिये, आदमियों की एक भीड़ खड़ी कर ली। भीड़ है तो भगदड़ मचेगी, भीड़ है तो कोलाहल होगा, भीड़ है तो अनियन्त्रित रेला होगा। भीड़-भाड़ में भीड़ के साथ प्रयुक्त भाड़ से शायद तात्पर्य यह है कि कहीं तो आग जल रही है जिसकी तपिश से सारे दानों में विस्फोट होता है। सारे दाने एक साथ आवाजें करते हैं। कई कई आवाजें। ये दाने बाद में दाने नहीं होते पॉप कॉर्न हो जाते हैं। भाड़ में स्वयं दानों की भीड़ ही है। 
जीवन स्वयं एक रंगमंच है, मन सूत्रधार है, बुद्धि अनुशासक हो और यह समग्र तुम हो, मैं हूँ, सब है। यह मैं नहीं, कठोपनिषद कहता है। 
इसमें अपने रथ के स्वामी आप स्वयं हैं। जैसा चाहो वैसा हाँको। अपने भीतर थोड़ा झाँको।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।

रामनारायण सोनी
१५.१.२५

मित्रों!
हमारे वेदान्त जीवन के व्यवहार में उतरें तो हम सनातन की ओर लौट सकते हैं।

Message from whatsapp

[13/07, 10:38] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
         सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का प्रथम भाग पढा, अलौकिक आनन्द की अनुभूति हुई।
संस्कृत, हिन्दी, मुस्लिम, एवं पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को उद्धृत करते हुए प्रेम अतुल्य है, निर्विकल्प है, तथा उसकी अनिर्वचनीयता का विस्तार से वर्णन किया है।प्रेम के प्रादुर्भाव, उसके विविध सोपान, और प्रेम की परिपक्व अवस्था में उसकी भावदशा,भावधाराओं तथा पूर्वराग,मिलन और विरह की स्थितियों का विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण किया है।
शबरी,भरत,सुतीक्ष्णजी आदि भक्तों की प्रेम भावना काम अच्छा चित्रण किया किन्तु प्रेम की पराकाष्ठा व्रज की गोपिकाओं में मिलती है उनका उल्लेख कैसे छूट गया? गोपियों के प्रेम के आगे उद्धवजी का ब्रह्मज्ञान तिरोहित हो गया और वे स्वयं प्रेम के सरोवर में डुबकी लगाने लगे।इसका वर्णन श्रीमद्भागवत में, सूरदास जी के भ्रमरगीत में, तथा जगन्नाथ दास रत्नाकर के उद्धवशतक में बहुत सुन्दर है।
ध्वनि सिद्धांत का भी आपने उपनिषदों के आधार पर, एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छा विवेचन किया है।
यह पुस्तक आपके गहन अध्ययन एवं चिंतन की परिचायक है।
हिन्दी साहित्य भण्डार में आपकी यह रचना एक अमूल्य, अद्वितीय, एवं अनुपम रत्न है।
                   सधन्यवाद।
                             भवदीय
                        गौरीशंकर दुबे।
[17/07, 06:41] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
             सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का द्वितीय भाग पढ़ने पर सुखद अनुभूति हुई। देवनागरी लिपि और वर्णमाला के संबंध में अच्छी जानकारी दी। हिन्दी के स्वर एवं व्यंजन वर्णों का चौदह मन्वंतर,द्वादश आदित्य,एकादश रुद्र, आदि से संबंधित तालिका में शोधपूर्ण नवीन जानकारी मिली। उपनिषद् के अनुसार वाणी की महत्ता तथा वैदिक मन्त्रों के उच्चारण की शुद्धता आदि पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है।
दृष्टि और दृष्टा में आपने दृश्येन्द्रिय की संरचना और कार्यप्रणाली का शरीरविज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए स्पष्ट किया है कि भिन्न-भिन्न विचारों,भावों, अवधारणाओं के अनुसार एक ही दृश्य पर अलग अलग व्यक्तियों का अलग-अलग दृष्टिकोण होता है तदनुसार अनुभूति होती है। अतः आध्यात्मिक चिंतन से ही हमारा दृष्टिकोण शुभ हो सकता है।इस विषय पर मानस और गीता को उद्धृत करते हुए दार्शनिक विचार व्यक्त किए गए हैं।
भगवद्भक्ति, पूजा, स्तुति को भी संवाद माना है। संवाद के माध्यम से ही गीता और मानस का ज्ञान नि:सृत हुआ है।वादे वादे जायते तत्त्वबोध:। अतः आत्मोद्धार के लिए संवाद की आवश्यकता को प्रतिपादित किया है।।
जन्म, मृत्यु,जरा,व्याधि ये चारों ही दोष है।एक चेतन आत्मा को छोड़कर संसार की ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें ये चारों दोष न हो। अतः अध्यात्म ज्ञान होने पर ही जीव का कल्याण है।
इस मिथ्या जगत् में रहते हुए ही हमें परम सत्य को जानना है। इसके लिए हमारी धारणाएँ , विचार शुभ हो।शुभ सुने,शुभ सोचे।जीवन में सकारात्मकता लाएँ।
बहुत दिनों बाद श्रेष्ठ रचना पढ़ने को मिली इसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।

Monday, January 13, 2025

साहित्यकार

क्यों लिखे जा रहा हूँ मैं?
    जब कोई पढ़ने वाला ही नहीं है
क्यों पढ़े जा रहा हूँ मैं?
    जब कोई सुनने वाला ही नहीं है
क्यों लिखें ? क्यों पढ़े?, इन प्रश्नों के सागर में भी खड़े ये जिद्दी लोग मान क्यों नहीं रहे?

आखिर ये कौन लोग हैं जो उनसे नाता जोड़ रखे हैं जो वास्तव में उनके सगे हैं ही नहीं। क्यों उनका दुःख अपना समझ कर भारित हो रहे हैं? दु:खी हो रहे हैं? अच्छे को कोई भी अच्छा कह देगा पर इन्हें देखो तो सही, ये मरखने बैंलों के सींगों से डरे बगैर उन्हें लाल कपड़ा दिखाने से डरते नहीं। बड़े अजीब लोग हैं ये जो अपना धन, अपना तन और अपने चैन का अधिकृत समय जनता में लुटाये जा रहे हैं। क्या यह इनका पागलपन नहीं है? समाज में कोई जहर फैलाता है तो ये उसे पी कर नीलकंठ होना चाहते हैं, और उस जहर से बचने के नुस्खों की पुड़िया लिये फिरते हैं। अजीब से दरबान हैं ये जो खुद तो उनींदे खड़े हैं पर पौ फटते ही तुम्हें जगाने आ जाते हैं। न जाने क्यों इन्हें झोंपड़ियाँ, झुग्गियाँ, अन्धी गहरी गलियाँ, पसीने में लथपथ, बदबू और सीलन भरी बस्तियाँ पसन्द हैं जहाँ लोग जाना पसन्द नहीं करते। ये सनकी लोग वहाँ भी अपने कागज कलम ले कर खड़े हो जाते हैं। इन्हें कभी कभी अपच की बीमारी हो जाती है जो झूँठ को पचाने में असफल हो जाते हैं।
कौन से हैं ये खनिक लोग जो इतिहास, पुराण, शास्त्र को खोद/ शोध कर हीरे, माणिक लोगों के बीच बिखेर रहे हैं। शौकीन हैं ये लोग; इनके पास तलवार से तेज कलमें हैं जिसमें सिकलीगरों की तरह धार लगाते ही रहते हैं, मरहम सी मुलायम शाई है जिससे दुःख दर्दों पर पट्टियाँ बाँधने को तैयार हो जाते हैं।
ये वे ड्रोन हैं जो अपनी बैटरी खर्च कर के समाज के उत्सवों त्यौहारों, शोक सभाओं यहाँ तक कि मरघटों के सन्नाटों में वीडियोग्राफी करने पहुँच जाते हैं। इनके मस्तिष्क में कई तरह के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं जो इन्हें चैन से बैठने ही नहीं देते।
हाँ ये सारस्वत पुत्र हैं ये, विरागी हैं ये, सन्यासी हैं ये, साधक हैं पुजारी हैं। समाज के लिये दर्पण बनाते हैं, सही रास्तों के संकेतक बनाते हैं, संहिताएँ रचते हैं जो जीवन की संचेतना हो सकती है। अपनी वेदी में, अपनी समिधा से, अपने घृत और अपनी आहुतियों से समाज के मंगल हेतु दिन रात हवन करते हैं।

रामनारायण सोनी

संक्रान्ति महापर्व दिनांक १४.१.२५

Friday, January 10, 2025

हाँ यह बनारस है

हाँ, यह बनारस है

इसे वाराणसी भी कहते हैं। वाराण याने जो वरेण्य है, श्रेष्ठ है। असी यानी वह स्थानीय नदी जो पतित पावनी गंगा में आ कर मिलती है। असी वह नदी है जिसके घाट पर बैठ कर रागी से विरागी हो कर बाबा तुलसी ने रामचरितमानस रची थी। रामचरितमानस वह नाम है जिसका नामकरण संस्कार कैलाश पर स्थित हो कर बाबा भोलेनाथ ने किया। कैलाश भी एक घाट है जहाँ बैठ कर जगदम्बा पार्वती ने बाबा के श्रीमुख से रामचरितमानस सुनी।
चलो फिर वाराणसी लौटते हैं। यहाँ सुरसरि गंगा प्रवाहित है। 
असी को ले कर चली ही थी कि एक और घाट आ गया। यह घाट मरघट है। वह मरघट जिसमें अमर-सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने चाण्डाल बन कर सेवाएँ दी। वह हरिश्चन्द्र जो अपने बेटे को खो कर आया था और तारा की साड़ी का आधा भाग मरघट के कर स्वरूप पाया था। इसी घाट पर तारा ने और हरिश्चन्द्र ने एक साथ अग्नि परीक्षाएँ दी थी, जहाँ रोहित तिरोहित हुआ था। सत्य और सत्यवादी दोनों तपे थे यहाँ फिर दोनों ही कुन्दन बने थे यहाँ। यही वह मरघट है जिसकी ज्वाला कभी नहीं बुझी। ये ज्वालाएँ साक्षी रही है मनुष्य के मर्त्य होने की, इतिहास की, भूगोल की, काल के चलते चक्र की और शेष अवशेष की।
यहाँ एक बार बाबा भोलेनाथ भी चाण्डाल बन कर आये और आचार्य शंकर को ब्रह्म का स्वरूप दर्शन करा गये। यह घाट तपे हुए जीव को तपाता है। मरे हुए को जलाता है। इन घाटों के पत्थर कभी मानस का अवतरण देखते हैं, कभी सन्त देखते है, कभी हरिश्चन्द्र देखते हैं तो कभी पार्थिव शरीर देखते हैं, इन शरीरों में से बची हुई राख देखते हैं। यह राख भी भागीरथी ही ढोती है, समुन्दर तक ले जाती है। 
यह वही बनारस है, वही गंगा है जिनके इन घाटों पर कभी कबीर उतरे, जिनकी धुनकी ने धुन धुन कर आदमी की खोट निकाल दी। चादर बुनते बुनते जो ब्रह्मानन्द को अपने कवित्त में बुन गया। उपनिषदों का अक्षुण्ण सत्य शब्दों के महीन, अटपटे-लटपटे सूत के धागों में पिरो गया। वह कबीर, वह तुलसी, वह रहीम जिनकी शब्दसरिता के धारे ऐसे बहे कि सारे जगत में वे भक्ति और ज्ञान के तीर्थ बन गये।
चलो उस पार जहाँ राजा रहीम रहता है। वह रहीम जो हमारे बीच जीवन के, ज्ञान के, व्यवहार के और भक्ति के रूप में बँटा। आज सामाजिक समरसता के लिये फिर प्रासंगिक हो गया है।
अजीब घाट हैं ये जिन पर जीवन के घट में भरने का अमृत भी मिलता है, सत्य का संधान करने के लिये कर्मयोगी भी मिलता है, मृत्यु के उपरान्त मनुष्य के पार्थिवत्व के दर्शन भी कराता है। यहाँ से थोड़ा सा ऊपर चढ़ें तो हमें वेद की पावन ऋचाओं की गूँज रही ध्वनियाँ सुनाई देंगी। यहाँ से संस्कृत, संस्कृति, संस्कार के अमरकोष निसृत होते हैं। यहाँ वाद के संवाद भी ज्ञानसागर का अमृतमंथन करते हैं, उनसे नवनीत निकालते हैं। यहाँ संघर्ष भी है, विमर्ष भी हैं अमर्ष भी हैं लेकिन इन सब से ऊपर संस्कृति का समग्र उत्कर्ष भी है। इसकी भूमि के कण कण ने भारत के जन जन में जागरण फूँका है। 
चलो वाराणसी की इस भूमि को, घाटों को, सन्तों को, विद्वज्जनों को, इसके पोषण करने वाले नगर वासियों को, पतित पावनी माँ गंगा को और विश्वनाथ को प्रणाम करते हैं। बनारस में रस बना रहे। वाराणसी श्रेष्ठ और विशिष्ठ बनी रहे। काशी तो मुक्ति का द्वार है। तीनों नाम जैसे अलकनन्दा, भागीरथी और गंगा है। वह भी त्रिपथगा है यह भी त्रिपथगा है। 

रामनारायण सोनी
११.१.२५

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...