किसी ने पूछा कि क्या जिन्दगी में तुमने कभी इश्क किया है? मैं समझ नहीं पाया कि उन्हें क्या जवाब दूँ? मैंने कहा कि यार मेरे तुम्हारा सवाल गलत जगह से शुरू हुआ है। तुम्हें पहले पूछना चाहिये था कि क्या मैं आदमी हूँ? तो तुम्हारे गौण प्रश्न का उत्तर है हाँ मैं आदमी हूँ। मुझमें भावनाएँ और सम्भावनाएँ एक साथ रहती है, जोड़े से रहती है। ईश्वर ने यह सृष्टि बनाई तो स्वयं को प्रेम स्वरूप में ओत प्रोत कर दिया। उसकी त्रिगुणमयी सत्ता में प्रेम हर कहीं विद्यमान है। तुमने इस सत्य को कभी करीब से नहीं देखा। यह सम्पूर्ण जगत प्रेम के कारण बँधा बैठा है, प्रेम के कारण अनगिनत सृजन चल रहे हैं। संसार की सारी क्रिया अभिक्रिया के मूल में प्रेम ही है। यहाँ तक कि डॉक्टर हाथ में चाकू ले कर जो हिंसा करने जा रहा है उस के मूल में उसके मरीज के जीवन से प्रेम है। सीमा पर बन्दूक ताने खड़े सैनिक के मन में मातृभूमि का प्रेम हैI इस जगत में चारों ओर विध्वंस चल रहे हैं फिर भी जगत चल रहा है क्योंकि प्रेम अभी चुक नहीं गया है। देखा जाय तो तुम मेरे पास और मैं तुम्हारे पास इसलिये बैठा हूँ कि प्रेम की सत्ता हमारे बीच अप्रकट रूप में क्रियाशील हो रही है। गहराई से सोचो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तुम्हारे भीतर मौजूद है कि केवल तुम ही नहीं जगत के सम्पूर्ण जीव, चाहे तुम इसे लौकिक देह आकर्षण अथवा नैसर्गिक प्रक्रिया कहो, सब प्रेम के अलक्षित प्रभाव से ही है। प्रेम से परमात्मा भी प्रगट हो सकते हैं।
"हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना।।"
रामनारायण सोनी
२६.०८.२२