Thursday, August 25, 2022

प्रेम का प्रताप

किसी ने पूछा कि क्या जिन्दगी में तुमने कभी इश्क किया है? मैं समझ नहीं पाया कि उन्हें क्या जवाब दूँ? मैंने कहा कि यार मेरे तुम्हारा सवाल गलत जगह से शुरू हुआ है। तुम्हें पहले पूछना चाहिये था कि क्या मैं आदमी हूँ? तो तुम्हारे गौण प्रश्न का उत्तर है हाँ मैं आदमी हूँ। मुझमें भावनाएँ और सम्भावनाएँ एक साथ रहती है, जोड़े से रहती है। ईश्वर ने यह सृष्टि बनाई तो स्वयं को प्रेम स्वरूप में ओत प्रोत कर दिया। उसकी त्रिगुणमयी सत्ता में प्रेम हर कहीं विद्यमान है। तुमने इस सत्य को कभी करीब से नहीं देखा। यह सम्पूर्ण जगत प्रेम के कारण बँधा बैठा है, प्रेम के कारण अनगिनत सृजन चल रहे हैं। संसार की सारी क्रिया अभिक्रिया के मूल में प्रेम ही है। यहाँ तक कि डॉक्टर हाथ में चाकू ले कर जो हिंसा करने जा रहा है उस के मूल में उसके मरीज के जीवन से प्रेम है। सीमा पर बन्दूक ताने खड़े सैनिक के मन में मातृभूमि का प्रेम हैI इस जगत में चारों ओर विध्वंस चल रहे हैं फिर भी जगत चल रहा है क्योंकि प्रेम अभी चुक नहीं गया है। देखा जाय तो तुम मेरे पास और मैं तुम्हारे पास इसलिये बैठा हूँ कि प्रेम की सत्ता हमारे बीच अप्रकट रूप में क्रियाशील हो रही है। गहराई से सोचो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तुम्हारे भीतर मौजूद है कि केवल तुम ही नहीं जगत के सम्पूर्ण जीव, चाहे तुम इसे लौकिक देह आकर्षण अथवा नैसर्गिक प्रक्रिया कहो, सब प्रेम के अलक्षित प्रभाव से ही है। प्रेम से परमात्मा भी प्रगट हो सकते हैं।

"हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना।।"

रामनारायण सोनी
२६.०८.२२

Tuesday, August 23, 2022

आत्मा का सौंदर्य

ये जो बार बार कोई कहता है न कि तुम्हारी सुन्दरता भीतर की होनी चाहिये। बाहर की सुन्दरता चाहे प्रकृति की हो चाहे आदमी की वह परिवर्तनशील है। यह बाहर भीतर आखिर है क्या? क्या कोई पैमाना है जो कुछ तुलना कर के बताया जा सके ? कई जगह पूछा तो कई तरह के उत्तर मिले।

एक दिन एक सहजी से पूछा उसने उत्तर तो नहीं दिया पर एक सरल सी बात कही। जो भीतर बाहर एक सा है वह सुन्दर है, जो व्यक्ति चीजों को अथवा जीवों को जैसा है उसको वैसा ही देखता है तो वह प्रकृति और परमात्मा का सौंदर्य ही देखता है। उसे अकेले फूल का सौंदर्य नहीं दिखाई देता अपितु उसे फूल और पत्थर दोनो में ही एक समान सौंदर्य दिखाई पड़ता है। उसे काँटे और गुलाब जैसे हैं वैसे ही एक बार में एक साथ सौंदर्य पूर्ण दिखाई देते हैं। बच्चा जब छोटा होता है तो वह भीतर बाहर एक सा होता है तो भीतर का अर्थात् आत्मा का सौंदर्य दिखाई पड़ता है। सूर्य का बाहर दिखाई देने वाला प्रकाश उसके भीतर से आता है। गुलाब की खुशबू उसके भीतर से आती है। वस्तुतः तुम्हारी आत्मा का सौंदर्य उसकी चेतना का विकीरण है।

रामनारायण सोनी
२३०८.२२

Thursday, August 18, 2022

जरूरी क्या है?

क्या जरूरी है?
यह प्रश्न जीवन का विस्तार के लिये जरूरी है पर 'क्या क्या जरूरी है?' यह एक बड़ी वितृष्णा को जन्म देने वाला है। क्या जरूरी है? यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल भागते हुए उस हिरन की तरह है जिसके नसीब में सिर्फ दौड़ है। वह दौड़ जो सिद्ध कर देगी कि तुमने प्यास बढ़ाई है, बुझाई नहीं। इस से तो अच्छा था तुम आवशयकता की उस परिधि के भीतर ही खड़े रहते। मरेरियलिज्म अर्थात् दुनिया का बाजार यह कहता है कि यह विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय के सिद्धान्त को कहाँ मना करता है अतः आवश्यकता की आपूर्ति के लिये मनाही नहीं है। जब हमें पता है कि लास्ट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात। एक पेड़ न कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। पवन कहती है खुशबुओं से चलो संसार को और सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े है अपने अपने संयम से। कोई अतिक्रमण नहीं करता। पंछी आज सुबह उड़ेगा और उस के अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। अपनी भूख के अनुसार अपना पेट भरेगा।
हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु की आवृत्तियाँ ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोश नही उल्टे हमें तेज और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो बेहतर होगा।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16/13।। श्रीमद्भगवद्गीता।।
रामनारायण सोनी
१९.०८.२२

लौट आओ चाँद मेरे!

लौट आओ चाँद मेरे! सुनो तुम भी ! मेरा चाँद अब नक्षत्र हो गया है। वह पहले भी मेरी धरती की रात में दिखता था और अब भी।  चाँद शायद यह सोचता होगा ...