Tuesday, May 2, 2023

3 किश्तें

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अंकुरण से ले कर विशाल वृक्ष होने तक की यात्रा में सब से महत्वपूर्ण समय है- प्रथम अंकुरण से उस नन्हे पौधे तक का विकास। अंकुरण के भी दो प्रभाग है- पौधे का ऊपरी भाग आकाश और निचला भाग पाताल की ओर चल पड़ता है। जन्मते ही उसकी जड़ें धरती में अपना जमाव और नमी खोजने निकल पड़ती है और ऊपरी भाग हवा और प्रकाश ढूँढने चल पड़ता है। जडें मजबूत हों, वृक्ष का जब तना पुष्ट हों और शाखाओं, फूलो, फलों से वह लदा हो तब वह वृक्ष स्वयं को सर्वाइव कर लेता है। नन्हे पौधे को संरक्षण, संस्कार और अत्यधिक संभालने की जरूरत होती है। ठीक इसी तरह मनुष्य को बचपन में यह सब आवश्यक होता है। इसलिये प्राथमिक स्तर और आयु में ही सम्यक शिक्षा की जरूरत है। मैं इन्हें गुरुजी मानता हूँ। मैं यह इसलिये भी कह रहा हूँ कि जब मैं अपने गांव जाता था तो अपने शिक्षकों के प्रति मेरा सम्बोधन होता था गुरूजी प्रणाम! और मैं उनके चरण स्पर्श करता था उस समय उनके चेहरे पर नितान्त सौम्य और आशीष के भाव आते थे, उसमें मुझे अलौकिक दिव्यता दिखाई देती थी। इन महत्वपूर्ण घटनाओं को मैं जीवन भर कभी यह नहीं भूला। बाद की शिक्षा में जो शिक्षक रहे वे सभी आदरणीय हैं पर वे गुरूजी सदैव मेरे लिये पूज्यनीय रहे हैं। मैं उन्हें प्रणत भाव से नमन करता हूँ। 
मुझे अच्छी तरह याद है उस बाँस की जाफरी वाली उस पाठशाला का वह पहला दिन। जूट की टाटपट्टी पर माँ ने ले जा कर बैठा दिया था। हाथ के बने सूत के कसीदे वाले झोले में थी बस एक स्लेट और खड़िया की कलम। फिर माँ उँगली छुड़ा कर चली गई एक पूर्ण आश्वस्ती से पाठशाला को और मेरे पूज्य गुरू को सौंप कर।
माँ के कहे अनुसार मैने अपने प्रथम गुरुदेव पूज्यपाद श्री मदनलाल जी वर्मा के श्रीचरणों में षाष्टांग प्रणाम किया। वह एक रोमांच भरा क्षण था। मैं आज भी अपने भाल पर उन पावन चरणों का स्पर्श महसूस करता हूँ और मैं श्रृद्धा भाव से लबालब भर जाता हूँ। इस तरह से मैं अपने कुल से गुरुकुल में प्रविष्ट हो गया। 
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ और धन्यवाद करता हूँ कि मैं शिक्षा के उस मन्दिर में प्रतिष्ठित हुई उन प्रथम जड़ों और गुरू के उस प्रथम आशीष को कभी नहीं भूलूँ।

रामनारायण सोनी
५.०९ .२२

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जरूरी क्या है?
यह प्रश्न जीवन का विस्तार के लिये जरूरी है पर 'क्या क्या जरूरी है?' यह एक बड़ी वितृष्णा को जन्म देने वाला है। क्या जरूरी है? यह जीवन की आवश्यकता है पर आवश्यकता की परिधि को पार कर जाना मरुस्थल भागते हुए उस हिरन की तरह है जिसके नसीब में सिर्फ दौड़ है। वह दौड़ जो सिद्ध कर देगी कि तुमने प्यास बढ़ाई है, बुझाई नहीं। इस से तो अच्छा था तुम आवशयकता की उस परिधि के भीतर ही खड़े रहते। मरेरियलिज्म अर्थात् दुनिया का बाजार यह कहता है कि यह विचार तो मानव जाति का विकास रोकता है पर यह डिमान्ड एण्ड सप्लाय के सिद्धान्त को कहाँ मना करता है अतः आवश्यकता की आपूर्ति के लिये मनाही नहीं है। जब हमें पता है कि लास्ट रिक्वायरमेन्ट दो गज जमीन है तो फिर अन्धी दौड़ में हर कोई क्यों लगा है? प्रकृति का हर अंग न तो प्रतिस्पर्धा करता है न प्रतिघात। एक पेड़ न कभी नहीं चाहा कि बगल का पेड़ उससे ऊँचा न हो। बड़ी नदियाँ छोटी नदियों से कहती हैं आओ हम साथ मिल कर चलते हैं अपने उस गन्तव्य सागर की ओर। j mnपवन कहती है खुशबुओं से चलो संसार को और सुगन्धमय बनाते हैं। सारे ग्रह उपग्रह अपने सूरज के परिवार में जुड़े है अपने अपने संयम से। कोई अतिक्रमण नहीं करता। पंछी आज सुबह उड़ेगा और उस के अपने संग कोई संग्रह नहीं होगा। अपनी भूख के अनुसार अपना पेट भरेगा।
हम न वक्त की चाल रोक सकते है, न शरीर की यात्रा और न ही जन्म और मृत्यु की आवृत्तियाँ ही। विज्ञान ने हमें सुख तो कई दिये हैं पर संतोश नही उल्टे हमें तेज और तेज दौड़ना सिखा दिया। जीवन तमाम आवश्यकताओं से भरा पड़ा है पर इसकी आपूर्ति के बीच संतोष तक सीमित रहे तो बेहतर होगा।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16/13।। श्रीमद्भगवद्गीता।।
रामनारायण सोनी
१९.०८.२२

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पतझर आया और सूख कर जर्द हुए पात सब झर गये। फिर बिसर गई टहनी भी। यह करुणा की कथा अब जग से क्यों कहनी?

करुणा के प्रस्फुटित बीजों में विगत का विरह और आगत का अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट देखा जा सकता है। नियति की तीक्ष्ण तलवार इन सूखे पत्तों पर कच्चे धागे से लटकी दिखाई देती है। कोपलें पत्तों की वंशज है। संसृति के पोषण हेतु सृष्टि का यह अनवरत क्रम है। सब के सब उसमें बह रहे हैं। सब के सब इस रंगमंच के कोई न कोई पात्र हैं। कबीर कह गया -"आया है तो जायगा राजा, रंक, फ़कीर।" एक उजागर सत्य है कि नव पल्लव एक दिन पुराना पड़ेगा और वही का वही इतिहास फिर फिर दोहराया जावेगा। अगर ऐसा है ही तो फिर इसे बार बार क्यों याद दिलाया जावे?  जो अवश्यंभावी है उसका प्रतिरोध कैसा?

तो फिर इस कल कल करती जीवन सरिता में स्वच्छन्द बहने का आनन्द क्यों न लें। चलो! मिल कर बहें! खुल कर बहें! धारा के संग बहें! रास्ते में कई खूबसूरत मोड़ होंगे, सुन्दर झरने होंगे, कल कल करते प्रपात होंगे, धीर गंभीर मन्थर गतियाँ होंगी। हम अगर नाव की तरह नहीं बन पावे तो एक अदने से तिनके की तरह सहज बहें! विश्वास करो कि इस जीवन का वह प्रदाता अतुल्य है, वैभवशाली है तो उसकी बनाई यह जीवन सरिता भी भव्य ही होगी। हमे स्वयं ही यह बोध होना चाहिये। हम से बेहतर हमें कोई और नहीं जानता। एक आनन्द से परिपूर्ण अन्तर्प्रवाह हमारे भीतर ही भीतर अनवरत चल रहा है। जो पल बीत गये सो बीत गए। जो कल होना है वह कल का सूरज ही बताएगा। याद रहे कि समय ही सब लाएगा और समेट कर फिर समय ही ले जाएगा। कल कोई सा भी हो चिन्ता कैसी?

"हमारा वर्तमान हमारी मुट्ठी में है। जियें जी भर कर। आज में जिएं। अभी में जिएं।"


रामनारायण सोनी


डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...