Monday, April 18, 2022

२स्वच्छन्द

भूमिका
"जीवन के परिशिष्ठों से उभरी है कृति "स्व-च्छन्द"।
प्रस्तुत पुस्तक "स्व-च्छन्द" की काव्यमयी यात्रा को प्रारम्भ करने के पूर्व इसके सृजक के व्यक्तित्व को जान लेना जरूरी है। कृतिकार लेफ़्टिनेंट कर्नल डॉक्टर प्रमोद देवगिरिकर सहज, सरल, सौम्य, शौर्यपूर्ण, संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी हैं। इंजीनियर-फौज़ी-अफसर-मैनेजर-सी. इ.ओ.- प्रोफेसर और अब लेखक, प्रमोद देवगिरिकर एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। वे अपने जीवन के सबसे सुखद दिन भारतीय स्टेशन दक्षिण गंगोत्री, अंटार्कटिका, में बिताये सोलह महीने मानते हैं। वे अब तक तीन अँग्रेजी किताबें लिख चुके हैं। पहली छात्रों के लिये व्यक्तित्व विकास पर, दूसरी उनके फौज़ी दिनों में सच्ची घटना पर आधारित और तीसरी विशुद्ध फिक्शन। वे एम. टेक, एम. बी. ए., और पीएच. डी. जैसी शिक्षा से शिक्षित दीक्षित हैं और फौज में लेफ्टिनेन्ट कर्नल के पद पर कार्य कर चुके हैं। अब यहाँ से उनकी काव्य-यात्रा भी शुरू हो रही है।
कहते हैं लेखन वही होता है जो लेखक से स्वयं लिखवा ले। काव्य की विधा चाहे जो हो लेखक के भीतर रचना एक अकुलाहट सी भरी रहती है और बाहर आने को छटपटाती रहती है। वह व्यक्ति सफल लेखक होता है इन रचनाओं को लिपिबद्ध करता है और समाज को ऋण अदायगी के रूप में सहेजता है। जो व्यक्ति सहज नहीं है और चिन्तन में स्पष्ट नहीं है उससे कोई सार्थक सृजन नहीं हो सकता। वस्तुतः प्रस्तुत कविताएँ एक ऐसे ही परिवेश और परिदृष्य में काव्य के सामान्य धरातल पर उतरी है। लगभग सभी रचनाएँ व्याकरण, शब्द विन्यास, आलंकारिकता और शास्त्रीय परम्पराओं की सीमाओं से कुछ बाहर निकल कर आम आदमी की भाषा में पाठक से सीधा संवाद करने में सक्षम है।
आज के परिवर्तनशील और प्रगतिशील समाज में मानव समयागत प्रक्रिया एवं इनसे उत्पन्न प्रभावों के कारण परिवर्तन के तरह तरह के स्वाभाविक दबाव महसूस करता है जिसके परिणाम भी स्पष्ट देखे जा सकते हैं। लेखक उन परिस्थितियों की अनुभूति करता है जो इन कविताओं में साफ-साफ देखा जा सकता है। हर जीवन यात्रा विमिन्न घटनाओं, सन्दर्भों और परिस्थितियों से भरी होती है इन्ही में से कुछ पल निकल कर बहुत खास बन जाते हैं जो व्यक्ति अथवा समाज के लिये मानक सिद्ध हो जाते हैं। प्रस्तुत रचनाएँ वास्ताविक जीवन में सामाजिक और व्यक्तिगत प्रक्रियाओं, संवेदनाओं, अवधारणाओं और व्यवहार से जुड़ी बातों को बड़ी बेबाकी से बताती हैं। हर व्यक्ति में एक बाहरी विध्वंस के चलते भीतर एक सृजन का अध्याय सतत चलता रहता है जो उसका अस्तित्व बनाए रखने में समर्थ होता है। यहाँ एक बात बड़ी खास है कि समग्र रचनाओं में संवेदनशीलता और चिन्तन दोनों में बेहतरीन सन्तुलन बरकरार रखा है। वर्तमान में देश की विकास-यात्रा के चलते राजनैतिक मूल्यों में निरन्तर गिरावट आई है। समूचा सत्तातन्त्र, लोकतन्त्र और इनके गलियारे जनहित के बजाय स्वनिष्ठ होते दिखाई दे रहे हैं। कुछ रचनाएँ इन संघटनोओं को बहुत बारीकी से देखने में कामयाब हुई हैं। कृति में समाविष्ट कविताएँ आकार में छोटी-छोटी हैं परन्तु उनके प्रायोगिक कैनवास बहुत बड़े हैं क्योंकि उनमें अनुभूत पल और अनुभव के अर्क शामिल हैं।
यहाँ पुस्तक के विस्तृत संदर्भों को इसलिये नहीं लिखा जा रहा है कि मैं कृति और पाठक के बीच आना नहीं चाहता। वे स्वयं पढ़ कर लाभान्वित होवें।
मैं आशा करता हूँ कि यह बहुआयामी सम्पूर्ण कृति सुधि पाठकों के लिये अन्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी।

शुभेच्छु
रामनारायण सोनी
25ए, ब्रजेश्वरी मेन
इन्दौर 452013
मो. नं. 9340761477



डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...