Wednesday, May 31, 2017

।। विक्षिप्त अथवा मुक्त ।।

।। विक्षिप्त अथवा मुक्त ।।
उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः । सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ 3-42 ॥

लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ।। 3-44 ।।

यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः । अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ 3-46 ॥

काम्य विषय और भोगों में विक्षिप्त हुए चित्त का उपाय पूर्वक निग्रह करे तथा (सुषुप्ति में) लयावस्था में अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुए चित्त का संयम करे, क्योंकि जैसा अनर्थ कारक काम है वैसा ही लय है।

चित्त अथवा मन की विक्षिप्तता का प्रथम कारण है- काम्य विषय तथा भोग और दूसरा कारण है- सुषुप्ति अवस्था में लय होना। इन दोनो के बीच में प्रसन्नता रूपी शिखर है। शिखर की दोनों ओर जबर्जस्त खाइयाँ जो विक्षिप्तता के स्थल हैं। काम्य  विषय जगत की ओर आमुख है और लय अन्तर्जतग की ओर, परम चेतना की ओर। शिखर पर चढ़ना सरल नहीं है केवल ईमानदार साधना ही जाग्रत और स्वप्न के परे ले जा सकती है। यहाँ पहुँच कर चित्त और मन शक्तिसम्पन्न हो जाते है तथा जरा सी असावधानी वे त्वरा से नीचे फिसल सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो एक मदमत्त हाथी दूसरों के साथ स्वयं भी संकट में पड़ जाता है। साधक इस शिखर पर मन और चित्त के पैरों पर चल कर आता है इसलिए इन पर अंकुश बुद्धि, जो इनके ठीक बीच में बैठी है, ही सक्षम है कि इन्हें शिखर पर रोक ले।
स्पष्ट है कि गर्त में गिरना चित्त की कमजोरी जरूर है लेकिन यहाँ महत्ता बुद्धि की है जो उन्हें संयमित रख सकती है। जिस प्रयास से मन, चित्त यहाँ तक पहुँचा है यह उसी की उपलब्धि है पर हम मन को ही दोष देते रहते हैं। इस शिखर पर चित्त इसलिए भी प्रसन्न होता है कि वह जाग्रत और स्वप्न की सुख-दुःखानुभूति से परे निकल गया है और प्रज्ञावान हो चुका है।  दूसरे वह तुरीय के सबसे निकट है। इस स्थिति में यदि वह उस परम चेतना को आमुख होने की प्रगाढ़ अनुभूति में स्थित हो जावे तो विक्षिप्तता कैसे निकट आ सकती है। बुद्धि इसे संयम देकर विलग हो जावे अन्यथा दुष्परिणाम अवश्यंभावी है। उसका अतिरेक मन और चित्त को वापस जगत में ढकेल कर बवंडर खड़ा कर देगी। यह ठीक उस तरह का होगा जैसे युद्ध में हारा सैनिक जगत में भी ठीक से  नहीं रहता है और पागल होकर बार बार युद्ध भूमि की ओर देखता रहता है। विक्षिप्तता यही है।
माण्डूक्य उपनिषद् कहता है कि यही वह शिखर है जहाँ से सीधे परम चेतना में कूदा जा  सकता है। यह विलक्षण प्रतिभा केवल मेंढक में है। छ्लाँग सधी हुई हो कि लय को लाँघ सके। मेंढक चलना कम पसंद करता है पर हर छलाँग के पूर्व स्वयं को तैयार करता है और परिगणित मात्रा में ही छ्लाँग लगाता है। माण्डूक्य उपनिषद् के महीन सूत्र मोक्ष के द्वार तक ले जाने वाले हैं न कि विक्षिप्तता की ओर। अधीरता नहीं धृति का संबल पकड़ो।
परमात्मा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
यही मोक्ष है। तुम मुमुक्षु हो या मात्र साधक, उस परम सत्ता के पाद हो या कि भटकते यात्री। नहीं, तुम मुमुक्षु हो।
।।ॐ तत्सत।।

Tuesday, May 30, 2017

बीज में वृक्ष होना एक संभावना है

क्या तुम दो दो कदम भर कर चलते हो? मैं तो पूरी यात्रा एक एक कदम चल कर ही तय करता हूँ।
एक काम होता है वह तुम नहीं करते क्योंकि वह तो होता है। अगर तुम करते हो तो उसे होना नहीं, करना कहते हैं, कर्म कहते हैं।

बीज में वृक्ष होना एक संभावना है जरूरी नहीं कि वह वृक्ष हो ही जाए। इस संभावना का घटित होना एक निश्चित प्रक्रिया का परिणाम है। क्रिया की सिद्धि के बिना बीज से वृक्ष होने की कल्पना व्यर्थ है।

जुगनू के टिमटिमाती चमक में कुछ पढ़ नहीं पाओगे इसके लिये प्रकाश को जरुरत होगी।

सपना देखना नींद में होता है पर तुम्हारी पर पसन्द का हो ही नहीं सकता। जो देखते हो सेंट परसेंट सच लगता है पर नींद टूटते ही एक दम झूँठा। होश में कुछ देखते हो तो जस का तस समझते हो सच-सच और बेहोशी में देखते हो वह सच तुम्हारे भीतर उतरने के पहले बदल जाता है और तुम्हें या तो लगता है कि तुमने कुछ देखा ही नहीं और तुम एक सच से से अनभिज्ञ रह जाते हो। सपने में जो देखा झूँठ था और बेहोशी में सच देखा वह तुम्हारे क्या काम का यह भी झूँठ का ही एक प्रकार है। इसलिए पूर्ण तया जागते हुए ही तुम सत्य देख सकते हो।

अगर तुम शीर्षासन कर रहे हो तो तुम्हें यह लगेगा कि दुनिया उल्टी हो गई है, तालाब के किनारे तो यह भी लगने लगेगा कि तालाब का पानी अब गिरने ही वाला है।

परम चेतना

उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः । सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ 3-42 ॥

लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ।। 3-44 ।।

यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः । अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ 3-46 ॥

काम्य विषय और भोगों में विक्षिप्त हुए चित्त का उपाय पूर्वक निग्रह करे तथा (सुषुप्ति में) लयावस्था में अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुए चित्त का संयम करे, क्योंकि जैसा अनर्थ कारक काम है वैसा ही लय है।

चित्त अथवा मन की विक्षिप्तता का प्रथम कारण है- काम्य विषय तथा भोग और दूसरा कारण है- सुषुप्ति अवस्था में लय होना। इन दोनो के बीच में प्रसन्नता रूपी शिखर है। शिखर की दोनों ओर जबर्जस्त खाइयाँ जो विक्षिप्तता के स्थल हैं। काम्य  विषय जगत की ओर आमुख है और लय अन्तर्जतग की ओर, परम चेतना की ओर। शिखर पर चढ़ना सरल नहीं है केवल ईमानदार साधना ही जाग्रत और स्वप्न के परे ले जा सकती है। यहाँ पहुँच कर चित्त और मन शक्तिसम्पन्न हो जाते है तथा जरा सी असावधानी वे त्वरा से नीचे फिसल सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो एक मदमत्त हाथी दूसरों के साथ स्वयं भी संकट में पड़ जाता है। साधक इस शिखर पर मन और चित्त के पैरों पर चल कर आता है इसलिए इन पर अंकुश बुद्धि, जो इनके ठीक बीच में बैठी है, ही सक्षम है कि इन्हें शिखर पर रोक ले।
स्पष्ट है कि गर्त में गिरना चित्त की कमजोरी जरूर है लेकिन यहाँ महत्ता बुद्धि की है जो उन्हें संयमित रख सकती है। जिस प्रयास से मन, चित्त यहाँ तक पहुँचा है यह उसी की उपलब्धि है पर हम मन को ही दोष देते रहते हैं। इस शिखर पर चित्त इसलिए भी प्रसन्न होता है कि वह जाग्रत और स्वप्न की सुख-दुःखानुभूति से परे निकल गया है और प्रज्ञावान हो चुका है।  दूसरे वह तुरीय के सबसे निकट है। इस स्थिति में यदि वह उस परम चेतना को आमुख होने की प्रगाढ़ अनुभूति में स्थित हो जावे तो विक्षिप्तता कैसे निकट आ सकती है। बुद्धि इसे संयम देकर विलग हो जावे अन्यथा दुष्परिणाम अवश्यंभावी है। उसका अतिरेक मन और चित्त को वापस जगत में ढकेल कर बवंडर खड़ा कर देगी। यह ठीक उस तरह का होगा जैसे युद्ध में हारा सैनिक जगत में भी ठीक से  नहीं रहता है और पागल होकर बार बार युद्ध भूमि की ओर देखता रहता है। विक्षिप्तता यही है।
माण्डूक्य उपनिषद् कहता है कि यही वह शिखर है जहाँ से सीधे परम चेतना में कूदा जा  सकता है। यह विलक्षण प्रतिभा केवल मेंढक में है। छ्लाँग सधी हुई हो कि लय को लाँघ सके। मेंढक चलना कम पसंद करता है पर हर छलाँग के पूर्व स्वयं को तैयार करता है और परिगणित मात्रा में ही छ्लाँग लगाता है। माण्डूक्य उपनिषद् के महीन सूत्र मोक्ष के द्वार तक ले जाने वाले हैं न कि विक्षिप्तता की ओर। अधीरता नहीं धृति का संबल पकड़ो। परमात्मा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। यही मोक्ष है। तुम मुमुक्षु हो या साधक, उस परम सत्ता के पाद हो या कि भटकते यात्री। नहीं तुम मुमुक्षु हो।
ॐ तत्सत

अनुवाद

A.P.J. Abdul Kalam
(अबूल पाकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम)
उद्धृत कविता के अंश जिसका मैंने यथा संभव भावार्थ हिंदी में किया है ।

The "Song Of Youth"

(यौवन का गीत )

As a young citizen of India,
armed with technology,
knowledge and love for my nation,
I realize, small aim is a crime.

भारत के एक युवा नागरिक के नाते
टेक्नोलॉजी से लैस
ज्ञान और मेरे  देश के प्रेम से सराबोर
मुझे यकीन है, छोटा ध्येय बनाना एक अपराध है

I will work and sweat for a great vision,
the vision of transforming India into a developed nation,
powered by economic strength with value system

मै एक महान दृष्टिकोण के लिए कर्म करूंगा और पसीना बहाऊंगा,
ऐसा दृष्टिकोण जो भारत को विकसित देश में परिणित कर सके,
मूल्यांकन प्रणाली के आधार पर  आर्थिक-शक्ति से संचालित हो


I am one of the citizens of the billion;
Only the vision will ignite the billion souls.

मैं (देश के) अरबों नागरिकों में से एक हूँ ;
केवल दृष्टिकोण ही अरबों आत्माओं को आहूत करेगा

It has entered into me ;
The ignited soul compared to any resource is the most powerful resource on the earth,
above the earth and under the earth.

यह (विचार) मुझ में घर कर गया है,
एक आहूत-आत्मा किसी भी संसाधन से तुलनीय होकर, धरा पर सबसे शक्तिशाली है   

I will keep the lamp of knowledge burning to achieve the vision - Developed India

मै यह दृष्टिकोण प्राप्त करने को ज्ञान का दीप जला कर रखूँगा

If we work and sweat for the great vision with ignited minds,
the transformation leading to the birth of vibrant developed India will happen.

यदि दृष्टिकोण के लिए आलोकित मस्तिष्क से कर्म युक्त हो पसीना बहाएं,
यह परिणति गतिमान विकसित देश को जन्म देगा

I pray the Almighty:
"May the divine peace with beauty enter into our people;
Happiness and good health blossom in our bodies, minds and souls".

मई उस सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ ;
"सौंदर्य के साथ दैवीय शांति जन-गण में उतरे "
स्वास्थ्य और प्रसन्नता देह, मस्तिष्क और आत्मा में खिल उठे,

A.P.J. Abdul Kalam
(अबूल पाकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम)
Xxxxxxxxxcxxxxxxxxxxxxxcccc

अनूदित

रामनारायण सोनी

दृष्य और दृष्टा

खुद को देखने के दो तरीके हैं- 1खुली आँख से दर्पण में अौर  2. आँख मूँद कर अपने भीतर में देख कर। मजे की बात यह है कि तुम भीतर और बाहर अलग अलग दिखाई देते हो, भीतर कुछ और, बाहर कुछ अौर। जितने अलग अलग उतने अशान्त, असहज, कृत्रिम अौर परेशान। भीतर जैसे हो वह मौलिक हो लेकिन बाहर एक मुखौटा लगाए हो। झ्स मुखौटे  तुम भी अवास्तविक हो गए हो। हाँ, इसीलिये तुम दोहरा जीवन जी रहे हो। सब के सामने मुखौटे वाला और अपने लिए अधूरा-अधूरा सा। इस गफलत में तुम अपने खुद के मूल को भूल कर बाहर-बाहर ही जिये जा रहे हो। तुम सागर हो लहरों से उफनता अशान्त बाहरी स्वरूप तुम्हारा मूल स्वरूप नहीं है वह बाहर दिखाई देने वाला मुखौटा है। इन लहरों के तले के सागर, असीम सागर, शान्त सागर, गहन-गंभीर सागर तुम हो। बाहर लहरों का, थपेड़ों का आवरण तुम्हें अपने भीतर नहीं देखने दे रहा है। थोड़ा भीतर उतरो। सच मानो बाहर का शोर थमा नहीं है, थपेड़े बन्द नहीं हुए हैं, वे वहीं के वहीं है, सिर्फ तुम भीतर को उन्मुख हो गए हो और एक अद्भुत शान्ति, नीरवता, एकात्मकता को प्राप्त हो गए हो। मुखौटे वहीं पड़े रह गए हैं और तुम स्वयं से मिल गए हो।

बीज का उत्सर्गत

अनाज का दाना मात्र एक दाना है पर जब उगाने के लिए तैयार किया जाए तब वह बीज कहलाता है। दाने की यात्रा वृक्ष तक की तब तक असम्भव है जब तक वह बीज होने की प्रक्रिया से न गुजरे। दाने को शीत, आतप और अंकुरण की प्रसव वेदना से गुजरना होगा। और उससे भी अधिक होगा उत्सर्ग के लिये उद्यत होना। वृक्ष की तैयारी के लिये उसे दोनो दिशाएँ ढूँढनी होगी एक धरती की कोख और दूसरी आकाश की विस्तीर्ण विधा। एक दिशा अन्धकार की एक प्रकाश की। एक से स्थायित्व मिलेगा दूसरे से विकास। उसे धरती के गुरुत्वाकर्षण से लड़ना होगा तब जल प्रसेचन संभव होगा। उत्सर्ग इसलिये कहा जा रहा है कि आम का वृक्ष तैयार हो जाने पर न बीज शेष होगा न उस बीज का नाम। अपने शरीर अौर नाम दोनों का त्याग अपने आप हो जायगा। अब वह दोनों से मुक्त है। जिस वृक्ष से वह बीज आया था आज फिर वही हो गया है। आम से चल कर आम होना कितना खास है। तुम अगर बीज हो तो रूपान्तरित हो कर आम हो सकते हो क्योंकि बीज होना आम का सूक्ष्म स्वरूप में स्थित होना ही तो है। तो समझ लो बीज हो आत्मा हो। मुक्त होना है तो उत्सर्ग की तैयारी करो। उत्सर्ग स्व का, संज्ञा का, नाम का। संकल्प मुक्त होने का, दिशाएँ पाने का, अपने मूल को प्राप्त होने का। .....







नज़र क्या? नज़रिया क्या?

नज़र क्या? नज़रिया क्या?

जितनी आखें तुम्हें देख रही हैं उनकी पुतलियों में तुम भी दिख रहे हो वहीं जितने लोगों को तुम एक साथ देख रहे हो वे तुम्हारी पुतली मे मौजूद हैं। शायद यह तुम जानते भी नहीं हो। वस्तुतः तुम हँसोगे तो देखने वाली सभी आँखो की पुतलियाँ भी हसते हुए प्रतिबिम्बों से भर जाएँगी और रोओगे तो वहाँ भी वही होगा। तो फिर उनकी आँखों को क्यों अपनी रुलाई से भरते हो। अपने दुखों और पीड़ाओं को उनके मनों में क्यूँ ठूँसना चाहते हो। जरा सोचो, क्या फैलाना चाहते हो। कीचड़ उठा कर किसी पर फेंकोगे तो हाथों को गन्दा होने से नहीं बचा पाओगे। अरे, हाथों में पुष्प धरोगे तो खुशबू हाथ में रह जावेगी ही।
बड़ी अजीब बात है; कहीं से तुम्हे विष मिला तो शंकर ढूँढते हो कि उसे पिला दो और रस मलाई  मिल जाए तो किसी को भनक भी नहीं लगती। अपने रोने के बारी आई तो रुदाली ढूँढते हो क्योंकि तुम्हारी रही सही संवेदनाएँँ भी मर चुकी है। रिवाजों और परम्पराओं को निभाना जीवन के वास्तविक मूल्यों से बड़ा नहीं है। याद रखो कि हर समय अनुकूलता नहीं मिलेगी। इसलिए, "जमाने वालों किताबे गम में कोई तराना ढूँढो।" गुलमोहर को देखो पतझड़ में भी रंगों से लकदक है। सारे पात झड़ने पर भी टेसू के फूल पलाश को अकेला नहीं रहने देते। पतझड़ नही होगा तो बसन्त भी नही होगा।
अपने घर आए मित्र से अरूण ने पूछा यार! आज तुम बहुत गन्दे लग रहे हो। मित्र ने अरुण का चश्मा उतारा और साफ करके वापस पहना दिया। मित्र की छबि साफ़ दिखाई देने लगी। समझ में आते देर नहीं लगी कि खराबी वहाँ नहीं अपने पास ही थी। नजर खराब नहीं थी, बीच में कुछ अनचीता-अनजान सा अनचाहा सा आन पड़ा था। समय रहते चश्मे को साफ न किया होता तो और बहुत से बाय-प्रोडक्ट समझो तैयार ही थे। उपयुक्त समय में उपयुक्त समाधान नही किये जाएँ तो दिल की जमीन भी दलदली हो जाती है। रिश्तों की फसल बोई है और उस खेत से खरपतवार उचित समय पर साफ नहीं किए गए तो वे मुख्य फसल को खा जाऍगे। बारिश आने के पहले छाता ढूँढ कर रख लो। अन्धेरा होने से पहले चिरागों को रोशन करलो वरना अंधेरे में न दीपक ढूँढ पाओगे न ही दियासलाई । अंधेरे में न खुद को खुद दिखोगे और न किसी अौर को। दीपक जलाओ; उसकी रोशनी देख कर अंधेरे में से निकल कर कुछ और लोग भी आ कर तुम्हारे संग होंगे। तुम्हे साथ मिलेगा और उन्हें  "तमसो मा ज्योतिर्गमय।"
*"पुरुषार्थ, प्रेम और प्रिय प्रसंग तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"*
थोड़ा रुको, सुनो! खुशबू लेकर चलोगे तो और भी हमसफर हो जाएँगे।
तो आओ! चलोगे न?

सुख, दुःख और आनन्द

सुख, दुःख और आनन्द
हमारा प्रत्येक का अपना अपना स्वभाव है, अपनी अपनी आदतें हैं और आपसी व्यवहार के अपने अपने तरीके हैं। यह जरूरी नहीं कि जो एक को अच्छा लगे वह अन्य को भी अच्छा लगे। किन्तु यह बात तो तय है कि व्यक्ति वही चाहता है जो उसको अच्छा लगे यह भी उतना ही सच है कि जरूरी नहीं; उसे वही मिलता रहेगा जो वह चाहता है। मोटे तौर से देखा जाए तो वह वही चाहता है जो उसके अनुकूल है। अच्छा वही लगता है जो अनुकूल है। इस अनुकूलता को आभास करने वाला अंतिम छोर है मन। एक प्रेमी अपने प्रिय की प्रतीक्षा में चिलचिलाती धूप में खड़ा है जो शरीर को कष्टप्रद हो सकता है पर मन को प्रतिकूल नहीं लगता। अर्थात् अनुकूलता और प्रतिकूलता का आभास मन करता है।
मन की अनुकूलता ही सुख है और प्रतिकूलता ही दुःख है। इन दोनों के बीच तटस्थ खड़ा होना विराग है और बीच में खड़े हो कर  स्वात्मभाव को प्राप्त हो जाना ही आनन्द को प्राप्त हो जाना है।
हमें तीन प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। दुख की, सुख की और आनंद की। सुख की और दुख की अनुभूतियां बाहर से होती हैं। बाहर हम कुछ चाहते हैं, मिल जाए, सुख होता है। बाहर हम कुछ चाहते हैं, न मिल पाए, दुख होता है। बाहर प्रिय को निकट रखना चाहते हैं, सुख होता है; प्रिय से विछोह हो, दुख होता है। अप्रिय से मिलना हो जाए, दुख होता है; प्रिय से बिछुड़ना हो जाए, तो दुख होता है। बाहर जो जगत है उसके संबंध में हमें दो तरह की अनुभूतियां होती हैं–या तो दुख की, या सुख की।
आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती। आनंद को सुख समझना बहुत बड़ी भूल होगी। आनंद और सुख में जमीन आसमान का अंतर है। दुख और सुख दोनों का अभाव आनन्द है; जहां दुख और सुख दोनों नहीं हैं, वैसी चित्तकी परिपूर्ण शांत स्थिति आनंद की स्थिति है।
आनंद की स्थिति में बाहर से कोई भी उद्वेलन भीतर प्रभावित नहीं करता–न दुख का और न सुख का।
सुख दुख दोनों संवेदनाएँ हैं। दोनों अशांतियाँ हैं। अशान्ति अर्थात् चित्त की विचलित अवस्था। दुख की अशांति अप्रीतिकर है, सुख की अशांति प्रीतिकर है। लेकिन दोनों उद्विग्नताएं हैं, दोनों चित्त की उद्विग्न, उत्तेजित अवस्थाएं हैं। सुख में भी आप उत्तेजित हो जाते हैं। अगर बहुत सुख हो जाए तो मृत्यु तक हो सकती है। अगर आकस्मिक सुख हो जाए तो मृत्यु हो सकती है, इतनी उत्तेजना सुख दे सकता है। दुख भी उत्तेजना है, सुख भी उत्तेजना है। अनुत्तेजना आनंद है। जहां कोई उत्तेजना नहीं, जहां चित्त पर बाहर का कोई प्रभाव नहीं वहाँ आनन्द है। अपने से बाहर संबंधित होना आनन्द की स्थिति निर्मित नहीं होने देगा।
एक सरोवर में लहरों के उठने का अर्थ है हवा के बाहरी थपेड़े बाहर से उसको प्रभावित कर रहे हैं। सरोवर बाहर की किसी चीज से प्रभावित न हो तो वह शांत होगा वैसे ही हमारा चित्त बाहर से प्रभावित होता है तो उत्तेजना की तरंगें उठती हैं सुख की, और दुख की। परन्तु जब हमारा चित्त बाहर से अप्रभावित होता है तब उस स्थिति का नाम आनंद है। आनंद बाहर का अनुभव न होकर अपना स्वयं का अनुभव है। सुख और दुख छीने जा सकते हैं, क्योंकि वे बाहर से प्रभावित हैं वहीं आनंद निःकारण है इसलिए आनंद को छीना नहीं जा सकता।  आनंद आपके अंतर में नित्य विद्यमान है। दुख भी बंधन है, सुख भी बंधन है, आनंद मुक्ति है।
तो आनंद मनुष्य का बाहर से सिमट कर अपने स्व में स्थित होना है। सुख-दुख मिलता है, आनंद मिलता नहीं है। आनंद मौजूद है, केवल जानना होता है। आनंद को पाना नहीं होता, वह केवल अनुसंधान से ज्ञात होता है। स्मरण रहे जो चीज पाई जा सकती है वह खो भी सकती है। आनंद खो नहीं सकता पर जाने बिना खोया हुआ समझते हो। एक दम स्पष्ट है कि आनंद की दो स्थितियां हैं – आनंद के प्रति अज्ञान और आनंद के प्रति ज्ञान। आनंद का ज्ञान न होना निरानंद की स्थिति नहीं हैं। जैसे कि जब हम सोते हैं तब हमें हमारे होने का ज्ञान नहीं होता है पर हम होते हैं और जागते ही होने का भान हो जाता है। यह अन्तर स्टेट ऑफ बीइंग का नहीं है, स्टेट ऑफ नोइंग का है। जो स्टेट आफ बीइंग में उलझा है वह बाहर उलझा है, उसको अपने भीतर जाने की उसे फुर्सत नहीं है। इसलिए आनन्द के लिए अन्तर्यात्रा करनी होगी।
स्मरणीय है कि न दुःख परमानेन्ट है न सुख।
दुख कोई नहीं चाहता है,  हर कोई सुख चाहता है। इस चाह के हटते ही आनन्द का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। कहना बहुत सरल है पर चाह को हटाना दुष्कर है। लेकिन इसका पुख्ता इलाज गीता में है। गीता में इसे समत्व योग कहा है।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण-सुख-दुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६/७॥
जिस ने अपने को जीत लिया है और शांति पा ली है, वह परमात्मा मेँ समा गया है. वह सर्दी गरमी, सुख दुःख और मान अपमान आदि द्वंद्वोँ मेँ शांत रहता है।
जो सुख दुःख की चाह से मुक्त हुआ समझो मुक्त हो गया। जो मुक्त हो गया वह आनन्द को प्राप्त हो गया। जो भीतर से कनेक्टेड है जैसे सन्यासी के साथ सफिक्स रूप में आनन्द जुड़ा होता ही है। यह परम्परा से अधिक कॉन्सेप्ट है।

कर्म में प्रवृत्ति


पानी का उद्गम स्थल है समुद्र, ऊष्मा का सूर्य, वायु का आकाश इसलिए जल का स्वभाव समुद्र की और बहना, जलती हुई अग्नि का ऊपर की ओर उठना। हवा को गुब्बारे अथवा कंप्रेस्सर में भर तो देते हैं पर छूटते ही वह आकाश की और भागती है। बीज बोते समय जमीन पर सीधा गिरे या उल्टा अंकुर जमीन की और भागता है और विकास पाकर तना आकाश की ओर जो उनका नैसर्गिक स्वभाव है। जंगलों में बसने वाले जानवर पकड़ कर बस्ती में लाए जावें तो बंधन खोलते ही वे पुनः जंगल की और भाग जाते हैं। पक्षी बहुत दूर तक पाँवों से चल नहीं सकता, कुछ दूर चल कर वह उड़ेगा ही। ये नैसर्गिक गुण ही उनके अपने अपने स्वभाव हैं।
धनुष की प्रत्यंचा पर तीर रख कर खींचा जाता है वह बाहरी बल के कारण खिंचा रह सकता है लेकिन अंततः धनुष अपने मूल (स्थिति) स्वभाव पर लौटता ही है। वस्तुतः जब बाहरी प्रभावों से स्वभाव के विपरीत रोकने का प्रयास होता है तो बंधन के हटते ही स्वभाव उन्हें अपनी नैसर्गिक स्थिति में धकेल देता है। यही सिद्धांत मानव की आंतरिक संवेदनाओं और मनःस्थिति पर भी लागू होता है। गुस्सा करना, अट्ठहास करना, रुदन करना आदि आदमी की सामान्य अवस्था नहीं है इसलिए कुछ समय बाद उसे सामान्य होना ही है क्योंकि मूल अवस्था की ओर लौटना उसका नैसर्गिक गुण है।
जीव जब जगत में आता है तो उसके प्रारब्ध उसके संग आते हैं। प्रारब्ध से तात्पर्य है इस जन्म के पूर्व के जन्मों तक जो-जो अच्छे-बुरे कार्य किये गए हों और उनमें से जिनका जितना भोग कर लिया गया हो तब शेष रहे फलों का वर्तमान जीवन तक पहुँच जाना ही प्रारब्ध है।
इनके मिले-जुले प्रभाव से ही चित्त की वृत्ति निश्चित होती है। इनके आनुपातिक मिश्रण से स्वभाव का निर्माण होना तय है। गुरु द्रोण के छह शिष्य एक ही राज परिवार के थे, गुरु ने उन्हें एक ही प्रकार की शिक्षा दी लेकिन अपने स्वभाव और क्षमता के अनुसार अलग अलग प्रकार से ग्रहण की गई। मधुमक्खी को गंदगी में छोड़ दो वह उड़ कर फूलों की ओर उड़ेगी ही, गधे को गंगा नहलाओ उसे धूल में लेटना ही सुहाता है।
गीता कहती है:- विभिन्न वर्णों में उत्पन्न मनुष्यों के आचरण और व्यव्हार उनके मूल स्वभाव के अनुसार ही होंगे। कर्म भी वे वैसे ही करेंगे जो उसके मूल स्वभाव के अनुरूप होंगे। जो-जो जिस-जिस वर्ण का व्यक्ति होगा उसे उस-उस प्रकार से कर्म करना ही पड़ेगा। बहुत रोकने पर भी वह अपने कर्म में प्रवृत्त होगा ही।

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...