Thursday, June 22, 2017

आते जाते पल

पंख लिए पल

जो पल आने वाला है और जो पल सामने खड़ा है दोनो बहुत छोटे छोटे है। जब ये दोनों ही गुजर जाएँगे तो बहुत बड़े हो जाएँगे। शायद इतने बड़े कि इनके बोझ तले जिन्दगी फिर अपने पैरों पर उस तरह खड़ी न होने पाए। शायद इसे तब बैसाखियों की जरूरत लगेगी। पता नहीं था कि गुलाब के वे सुर्ख फूल कुछ पल महक कर फिर सूख जाएँगे। इसीलए कि फूल असली थे। नकली होते तो नहीं सूखते। गोद में रखा सिर उस अहसास को पिंजरों में पाल कर देखता रहता है। गहराते कुंतलों में निरखते चाँद से अकसर खेलता रहता है। यादों के बिछौनो पर मन लोट लगाता है, करवटें लेता है। तपती धूप को भी दुशाला बना कर ओढ़ता है। आज भी बरगद के तले गहन शान्त खड़े शिवालय की उन घंटियों की ध्वनियाँ कैसे तैरती हुई आ जाती है। आम की घनी छाँव में अपने साए खो जाते है। कोयलें एक साथ कूक उठती हैं। इन अधरों पर पोरों की छुअन आज भी जिन्दा है। आज गुजिस्ता पलों की तरह छायाएँ भी बड़ी हो गई हैं। हम उसे भुला पाते नहीं क्योंकि इनके साये में याद के रुपहले पल सोए पड़े हैं। ये खड़े हो गए तो हम जी नहीं पाएँगे; हम, हम नहीं रह पाएँगे। हमें यकीन हो चला है कि अब इस जिन्दगी में फिर से फूल की महक नहीं मिल पाएगी। जिन्दगी चाहे हजार बरस की हो जाए पर शायद वे फूल फिर महक नहीं पाएँगे। हाथों में वह एक लकीर ऐसी भी है जो नदी की तरह खड़ी हो कर हमें अलग अलग किनारे पर खड़ा करके एक अट्टहास कर रही है। ये गंधर्व हैं। अभिशप्त गंधर्व। विशुद्ध, अविकारी, अमल, तरल, सरल। पर ध्रुवों की तरह इस पार, उस पार। क्या यह स्पन्दन अकेला इस पार ही है? क्या संदेशी कपोत नदी की धार में गिर कर कहीं बह गए हैं? सारे सवाल खुद से खुद के हैं।
अजीब हिसाब है किस्मत लिखने वाले का मछली को पानी से अलग कर क्या देखना चाहता है? उसका पानी से इतना प्रेम क्यों दे दिया। पानी उसकी प्यास बुझाने के लिए नहीं, उसकी जिन्दगी है।
हम जानते हैं कि पत्थर को पसीने नहीं आते पर उसके सामने अगर चीखे तो वह हमारी चीखें हमें वापस लौटा देगा। हम ऐसे ही शिलाखण्डों के बीच घिरे खड़े हैं, इस पार और उस पार। शब्दों की अनुगूँज जीवन को और अधिक संबल नहीं दे पाएगी। कोई यह नहीं चाहता कि धुँआ हो, बस आग हो, जलन हो। दीप को जलते ही देखना चाहते है। सब लोग?

👤

*कभी कभी प्रस्तर तोड़ कर
पीड़ा प्रकट हो जाती है
रोकते तो वृणों का जन्म हो जाता
इनमें विकल आँच होती है
पर गहरी एक साँच होती है

*🕊🐎🐬🛶🌌*

*पल आते पल जाते*

पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर  
बहुत सा छीन ले जाते पल
भर जाते गागर
पर खुद रीत जाते पल
नियति का चिराग,
जलता है अंधेरों में
जले नहीं अगर तो
खुद अंधेरे में खो जाएगा
जलता रहा तो कभी उन्हें
कभी खुद को दिख जाएगा

कभी नयन लजाते
कभी अकुलाते पल
सिमटते चले गए लकीर में
लकीर का नाम हो कोई भी
"लकीर" हृदय पर खींच गए पल
देखता हूँ कभी इस लकीर को,
कभी अपने ही अतिरेक को
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर  
बहुत सा छीन ले जाते पल

आशाएँ, निराशाएँ, हताशाएँ
तैरती झील में, कश्ती में
न मल्लाह न मस्तूल
डूबती, उतराती, गहराती
पूछती तारों से स्याह रात में
कहीं देखा है तुमने
उनको, उनकी गति रेख को
दिशाएँ, फिजाएँ, हवाएँ
चिर मौन हैं, स्तब्ध है
जाने कौन से अनुबन्ध हैं
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर  
बहुत सा छीन ले जाते पल*

रामनारायण सोनी

Tuesday, June 20, 2017

माण्डूक्य उपनिषद् ५

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवऽऽनन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः।।५।।

तीसरी अवस्था है सुषुप्ति— यह अवस्था अविवेकावस्था कहलाती है। इसमें बाहर का जगत भी खो जाता है। वस्तुओं का जगत भी अंधेरे में हो जाता है और प्रतिबिंब भी नहीं दिखाई पड़ते। स्‍वप्‍न भी तिरोहित हो जाता है। तब सब कुछ अस्तित्व में होते हुए भी विवेक से परे हो जाते हैं जैसे उन्हें एक सूक्ष्म बिन्दु में घनीभूत कर दिया हो। ऐसे में हम गहन अंधकार में पड़ जाते है। इसी को हम सुषुप्ति कहते हैं। सुषुप्ति में न तो बाहर का ज्ञान रहता है, न भीतर का। जाग्रत में बाहर का ज्ञान रहता है। और जाग्रत और सुषुप्ति के बीच की एक मध्य—कड़ी है; स्‍वप्‍न, जहां बाहर का ज्ञान तो नहीं होता, लेकिन बाहर की वस्तुओं से बने हुए प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क में तैरते है और उन्हीं का ज्ञान होता है। यहाँ मन को न तो सुख का, न ही दुःख का भान रहता है इसलिये यह आनन्द की स्थिति है। यह अवस्था चेतोमुख भी कहलाती है क्योंकि यह चित्त का द्वार है। चित्त भूत- भविष्य का तथा संपूर्ण विषयों का ज्ञाता है इसलिये इसे "प्राज्ञ" कहा गया है। यह ओंकार का तृतीय पाद है।

माण्डूक्य उपनिषद् ६

एष सर्वेश्वर सर्वज्ञ एषोन्तर्याम्येष:। 
योनि: सर्वस्य प्रभवाप्ययोहि भूतानाम्‌।। ।।

अर्थात्‌ :-यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है और समस्त जीवों की उत्पत्ति तथा लय का स्थान होने के कारण यह सबका कारण है। 

एक आदमी समुद्र किनारे पहुँचा। उसने एक ग्लास को समुद्र के पानी से भर लिया। किसी ने पूछा यह क्या कर रहे हो? उसने कहा मैंने ग्लास में समुद्र भर लिया। लोग हँसने लगे, मै वहाँ होता तो मैं भी हँसी नहीं रोक पाता। फिर वह कहने लगा उसने समुद्र अर्थात् बहुत से पानी में से थोड़ा पानी ग्लास में भर लिया। पानी ही तो समुद्र है। बड़े समुद्र में से एक अंश निकाला तो ग्लास में भी छोटा ही सही पर है तो समुद्र ही। उसका ग्लास बड़ा करामाती लगा। शायद उसमें इसी तरह कुआ, नदी, तालाब भर लेने की क्षमता होगी। उसने कहा मैं इसमें कहीं से भी भरूँ हर बार पानी ही भरूंगा। फिर उसने कहा पानी कोई सा भी है आया उस समुद्र से ही है। स्थान बदलने से उसकी संज्ञा बदलती गई है। ये उसी असीम सागर की विभिन्न अवस्था जन्य संज्ञाएँ हैं। समुद्र, नदी, तालाब, झरने जो भी हो; पर हैं सब जल ही। तात्विक रूप से सब जगह वही "जल" है। अलग अलग जगह से भरा हुआ जल तो जल ही है।

ॐ उस असीम परमात्मा का वाचक नाम है। जो अनाम है, अरूप है, अनन्त है उसकी बात करने के लिए वाचक "ॐ" उपयोग किया गया है। वही ब्रह्म है। माण्डूक्य उपनिषद् की कारिका का प्रथम मन्त्र इस प्रकार है:-

बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः। घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः।।१।।

विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ ( प्रज्ञानघन ) है। इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है। आत्मा तीनो स्थानों में अवस्थानुरूप अलग अलग, तत्व रूप से एक ही और स्थान अलग अलग होने से असंग कहलाता है।
जिस प्रकार भेद रूप से समुद्र का जल अलग अलग अवस्था में अर्थात् असंग है पर है तो वह तात्विक रूप से जल ही। उसी प्रकार विश्व, तैजस और प्राज्ञ भी भेद रूप से भिन्न परन्तु है वह उस ओंकार के पाद ही।

Monday, June 19, 2017

*चलो आनन्द की ओर*

*चलो आनन्द की ओर*
दस लोग तुम्हारे साथ है और तुम एक बगीचे में घूमते हो, कैसा लगा? अब वही बगीचा है अौर फिर अकेले घूमते हो, कैसा लगा? पहले बगीचा ग्यारहवें स्थान पर था। बाद में वह दूसरे स्थान पर आ गया। बगीचे के फूलों का सौंदर्य, उनकी सुगन्ध और एक नैसर्गिक समग्रता उन दस आदमियों के पीछे छिप गई थी और उनके जाते ही प्रकट हो गई। भीड़ के साथ तुम परमात्मा से मिलने चले हो तो भीड़ ही देख पाओगे। हो सकता है तुम खुद उन दस आदमियों के लिए दर्शनीय बन जाओ। अकेले चलोगे तो ही उसका सौंदर्य पा सकोगे। यह यात्रा केवल और केवल तुम्हारी होनी चाहिए। बगीचे में उसकी समग्रता उपलब्ध है, उसमें सुगन्ध किसी ने छिड़क नहीं दी है, फूलों-पत्तियों को किसी माली ने नहीं बना दिया है, वह पूरा का पूरा नैसर्गिक है। उसका आनन्द लेना है तो बस बगीचा और तुम आमने-सामने हो जाओ। इस यात्रा में उस ओर चलोगे तो लगेगा कि बगीचा केवल तुम्हारे लिए है, तुम्हारे आनन्द के लिए है। हर फूल-पत्ती- पौधा अपना सौंदर्य और सुगन्ध लिये तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा है। वह पहले भी था पर तुम स्वयं तुम्हारे साथ नहीं थे उन दसियों के साथ चल रहे थे। आँख, नाक, कान सभी उन दस आदमियों के में व्यस्त थी तो खुशबू और सुन्दरता आई और तुमसे बिना मिले गुजर गई। परमात्मा ने तुम पर अनगिनत कृपा की वृष्टि की पर तुम उससे परिचित नहीं हो पाए। और पता चला भी तो वृष्टि हुई यह पता चला कहाँ से आई पता नहीं चला। जैसे बगीचे का समग्र सौंदर्य तुम्हें माली का लगा; यह नहीं लगा कि पत्तों को किसने तराशा है, फूल में खुशबू किसने भरी है। इस सृष्टि का कारण कौन है। तुम इस सौंदर्य के आकर्षण में मत उलझ जाना; पर इसको देखे बिना भी यह नहीं जान पाओगे कि यह किसका उपकरण है। कौन है जो बिना दिखाई दिये कर रहा है। यह देखना है तो तुम्हें दसियों को छोड़ अकेला होना पड़ेगा, एकान्त को उपलब्ध होना पड़ेगा। अन्तर्मुखी होना पड़ेगा। यह बिन्दु वह स्थान है जहाँ तुम ही तुम से मिल रहे हो। बाहर तुम किन्हीं और के साथ थे यहाँ तुम अपने साथ हो। धारणा भी यहीं तक साथ चली है। यहाँ तक तुम लक्षित हो। इससे आगे अलक्षित हो। यहाँ से आगे चलोगे, चलते चलोगे तो तुम भी अशेष हो जाओगे। न लक्ष्य रहेगा न लक्ष्य का बोध। न बगीचा रहेगा न उसका सौंदर्य। यह अनुभूति शेष रहेगी कि यह समस्त उपक्रम का कारक वही है। बगीचे का सौंदर्य उस परमात्मा के अप्रतिम सौंदर्य का मात्र बाहरी परिचय है। चलो उस ओर। आनन्द परमात्मा का दूसरा नाम है।

रामनारायण सोनी

Monday, June 12, 2017

"मानव मूल्यों से ही नैतिकता आवेगी"

"मानव मूल्यों से ही नैतिकता आवेगी"

ये विचार मेरे अपने विचार हैं और मेरी भावनाओँ से उपजे हैं। जरूरी नहीं कि ये नैतिक मूल्यों पर फिट हों पर ये मानव मूल्यों के आधारगत तो हैं ही। मैं यह भी मानता हूँ कि मानव मूल्यों की राह चल कर नैतिक मूल्यों को प्राप्त किया जाना चाहिए। मानव मूल्य हमारी सांस्कृतिक अवचेतना के मुख्य सिद्धान्त "वसुधैव कुटुम्बकम्" की नींव पर रखे होने चाहिए तो फिर नैतिक मूल्य परिशुद्ध होंगे ही। आज स्वतंत्रता के मायने निरंकुशता की कडुआहट से क्यों भर गए हैं? ट्रेन के टॉयलट में आइने पर लिखा था " रेलवे आपकी संपत्ति है, इसका ध्यान रखें।" इस तरह के एक स्वतंत्र व्यक्ति ने उसे उखाड़ लिया और घर ले गया; कहने लगा कि मैंने अपने नैतिक मूल्य का ख्याल रखा है, "मेरा था इसे मेरे घर ले आया अब मैं इसका ख़्याल रखूँगा।" शायद बहुतेरे लोग अपने नैतिक मूल्यों का निर्वहन ऐसे ही कर रहे हैं। मानवीय मूल्यों की लाश पर पैर रख कर लोक कल्याण की डगर पर जाना एक दिन विध्वंस ही लाएगा।

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गुजिश्ता हफ्ते में हुई घटनाओं से क्या हमें यह नहीं लगता कि शायद कुछ तो गड़बड़ है।
एक खुले मस्तिष्क में जो बेबाक चिन्तन आया है वह...
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हमें सामाजिक सुरक्षा, अपने हितों पर अतिक्रमण और सामाजिक शांति के प्रति जागृत रहना होगा। कभी कभी हमारी आँखों पर नीले काले पीले चश्मे चढ़ा दिए जाते हैं। सूखी घास हमें हरी लगती है, बवंडर भरा आसमान नीला लगता है, दूध काला लगने लगता है। मीडिया की परोसगारी पर कई प्रश्न चिन्ह लगे हैं। हम वह खाते हैं जो हमें परोस दिया जाता है। अब हमारी डाइनिंग टेबल पर खाना रसोई से कम फास्ट फूट के पैकेटों के माध्यम से अधिक आता है। असलियत पर इतने मुलम्मे चढ़कर आते हैं कि कद्दू का केचप टमाटर का बता कर खिलाते हैं और तब भी हम चटकारे ले कर खाते हैं। कहीं शेर की खाल में भेडिये डराते हैं तो कहीं शेर भेड़िये की खाल ओढ़ कर कन्फ्यूज कर रहे है।

हमें रंगमंच पर चल रहे दृष्य तो दिखाई देते हैं पर नेपथ्य में उसकी तैयारी, बाजीगरी, सूत्रधार अौर बिना मुखौटे-मेकअप के वे असली लोग नहीं दिखाई देते हैं। ये मुखौटे अौर सूत्रधार भी किसी और की कहानी को पर्दे पर जीते है या कहें कि उसे रूपायित करते है। दर्शक की पहुँच नेपथ्य की उस पार नहीं है। दर्शक तो भाव विभोर हो कर साथ साथ गाने लगता है...नंद घर आनन्द भयो जै कन्हैया लाल की। परीक्षा में बैठे पप्पू को लिखी लिखाई कॉपी कहीं से मिल गई, परीक्षक ने जाँची तो कहना उसे यही पड़ेगा कि पप्पू पास हो गया।

कुछ चतुर लोग यह देखते ही रहते हैं कि चूल्हा कहाँ जल रहा है वहाँ अपना आटा लेकर रोटी सेंक लाते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि आपके गरम दूध में पड़ी मलाई लेकर भाग जाते हैं।

सिक्के को दोनो तरफ से देखना जरूरी है। आइने के सामने खड़े हो कर देखो दाहिनी तरफ की गई माँग बाईं ओर दिखेगी। यह भी सच है अौर वह भी सच है। क्या हम अपनी आँख से धोखा नहीं खाते।
स्वतंत्रता हमें मिली पर हमें स्वाधीन भी होना जरूरी है। स्वतंत्रता की मशीन के सब पुर्जे हमारे हैं पर इसकी मोटर की पावर अौर मशीन का रिमोट किनके हाथों में है इस बात से बेखबर नहीं रहना चाहिए।
उस रोशनी की हमें जरूरत नहीं जो हमारे बसेरों का जला कर मिले। जलती बसों के उजाले में हम क्या देखना चाहते हैं? ऐसे सिग्नल मेन की हमें जरूरत नहीं जो दौड़ती ट्रेन को डेड एण्ड की ओर मोड़ दे। एक ट्रक में भरे केलों को बर्बाद करने के लिये सौ ग्राम इलायची काफी है। कौन है वो जो हमारे शांतिवन में दावानल लेकर आ गए हैं। शायद वे भी मानव बम बन कर खड़े हो गए हैं। जो भी हो; शान्ति वन को शान्ति घाट होने से बचाना चाहिए।

🙏🙏🙏
निवेदक
रामनारायण सोनी

Sunday, June 4, 2017

स्वप्न अौर जाग्रत के मन अौर चित्त वही है

स्वप्न अौर जाग्रत के मन अौर चित्त वही है।

यथा स्वप्ने द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः । 
तथा जाग्रद्द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ॥ ३/२९ ॥
जिस प्रकार स्वप्नकाल में मन माया से ही द्वैताभास रूप से स्फुरित होता है उसी प्रकार जाग्रत काल में भी वह माया से ही द्वैताभास रूप से स्फुरित होता है।

अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः । 
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३/३० ॥
इसमें संदेह नहीं कि स्वप्नावस्था में अद्वय मन ही द्वैत रूप से भासने वाला है इसी प्रकार जागृत काल में भी निःसंदेह अद्वय मन ही द्वैत रुप से भासता है।

हम सोते हैं तो हमें सपने आते हैं। कभी सपने याद रहते हैं कभी याद नहीं रहते। कभी सपने आधे अधूरे याद रहते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें सपने आते ही नहीं है। कुछ बातें स्वप्न के विषय में जिज्ञासा पूर्ण हैं-
१, जब हम जाग रहे होते है उस समय हम सपने नहीं देखते। हमारा मन अपने आस पास की बातों में या कल्पना करने में व्यस्त रहता है।
२, जब हम सोते हैं तब या तो स्वप्न देखते हैं या स्वप्न रहित निद्रा में रहते हैं। स्वप्न मन देखता है और ठीक वैसा अनुभव करता है जैसा वह जागते वक्त स्थिति का अनुभव करता है।
जब जागते हैं तब स्वप्न नहीं आते। नींद अथात् निद्रा में ही स्वप्न आते हैं। प्रश्न उठता है कि जब हम सो जाते है तब हमारी इन्द्रियाँ और मन सभी निश्चेष्ट रहते हैं फिर कौन है जो स्वप्न देखता भी है और याद रखता भी है। जागने पर हमें वापस कौन बताता है? और किसको बताता है। जब हम सोये अौर मन भी सोया लग रहा है ऐसे में क्या कोई दूस्सा मन उसे देखता है क्योंकि जागते में जिस मन से सब कुछ अनुभूत हो रहा था वह तो सोया हुआ जान पड़ता है। हमें निश्चित ही यह लगता है कि सोते समय का और जागते समय का मन अलग अलग है लेकिन यह मात्र आभास है। मन ने स्वप्न में कुछ देखा और फिर जब जागे तो सोते हुए में सपने में देखने वाले मन ने जागते समय वह जो कुछ देखा वह बताने लगता है। हमें इस स्थिति में फिर लगता है कि सोते समय वाला मन अलग था। अर्थात् सोते समय और जागते समय, दोनों बार, हमें मन अलग अलग प्रतीत होता है। वास्तविकता यह है अन्तःकरण का यह प्रभाग मन केवल एक है पर माया के प्रभाव से दो अलग अलग प्रतीत होता है। वास्तव में सपने में कार्यशील और जागते में कार्यशील मन एक ही है।
निद्रा के समय भी वह शक्ति विद्यमान रहती है जिसे सोने का अनुभव होता है, वह शक्ति ही दृष्टा की दृष्टि है जिसका कभी नाश नहीं होता। इस तथ्य को बृहदारण्यक श्रुति४/३/२३-३० तक के मंत्रों द्वारा स्पष्ट किया गया है —पश्यन् वै तत्र न पश्यति, जिघ्रन्, रसयन्, वदन्, श्रण्वन्, मन्वन्, स्पर्शन् विजानन् — वै न पश्यति, न जिघ्रति, न रसयते,न वदति, न श्रृणोति, न मनुते, न स्पृशति, न विजानाति नहि दृषटिविलेपे भवति अविनाशित्वात् – न तद्द्वितीयमस्तिततोsन्यत्विभक्त यत् पश्येत् –इत्यादि–
अर्थात् उस निद्रावस्था में अन्य कोई न विद्यमान न रहने से प्राणी देखता हुवा, सूंघता हुवा, चखता हुवा, बोलता  हुवा, सुनता हुवा, मनन करता हुवा, स्पर्श करता हुवा और जानता हुवा भी नहीं देखता, नहीं सूँघता, नहीं चखता, नहीं बोलता, नहीं सुनता, नहीं स्पर्श करता, तथा नहीं जानता है।
तात्पर्य यह है कि नींद में यद्यपि चैतन्यता बनी रहने के कारण इन्द्रियों व मन की समस्त क्रियाओं की वास्तव में विद्यमानता रहते हुवे भी बाहरी उपकरणों (इन्द्रियों) की क्रिया न होने के कारण चैतन्यता विलुप्त हुई सी जान पङती है परन्तु वास्तव में वह दृष्टा की दृष्टि हमेशा बनी रहती है; उसका कभी लोप नहीं होता है।
जिस प्रकार जलते हुए दीपक से उसकी नैसर्गिक उष्णता अलग नहीं की जा सकती, उसी प्रकार चेतन दृष्टा स्वयम् ज्योति होने से उसकी चैतन्य दृष्टि उससे अभिन्न है तथा आत्मा चैतन्य नित्य होने से उसकी दृष्टि भी नित्य रहती है। यही प्रतीत सत्य जान पड़ती है ठीक वैसी ही जैसी जाग्रत में लगती है।

इसी प्रकार चित्त की भी स्थिति है। हम स्वप्न में अनेक प्रकार के दृश्य, देखते है, अनेक लोगों से मिलते है व स्वप्न में ही कई प्रकार की कल्पनाएँ भी करता है। यहाँ-वहाँ घूमता है परन्तु न तो उस समय उसके देखे दृश्य ही वास्तविक होते है और न ही उसके स्वयं के सिवाय अन्य कोई व्यक्ति ही होता है, न ही विचरण किये स्थान ही सत्य होते हैं। उस समय केवल मात्र उसका चित्त व चित्त की स्पन्दना ही नाना रूपों में भासती है। अर्थात् उसकी चित्त की स्फुरणा एकमात्र होते हुवे भी कोई और चित्त की उपलब्धता भासती है जो जागने पर मिथ्या मालूम सिद्ध हो जाती है। जाग्रत अवस्था में भी मानव चित्त से ही अनेक दृश्य देखता है, संवाद करता है। यहाँ वहाँ जाकर कई स्थान देखता है। इस जाग्रत अवस्था में भी वही चित्त व वही चित्त की स्फुरण के माध्यम से ही सब अनुभव प्राप्त करता है। स्वप्न तथा जाग्रत; दोनों अवस्थाओं में अनुभव करने वाला चित्त एक ही होता है।

रामनारायण सोनी

Friday, June 2, 2017

विषय

चिन्तन के अस्पष्ट आयाम--
जीव क्या है, कौन है। कारिका ३/११
(तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्लयाम्, तेषां कोशानामात्मा येनात्मना पञ्चापि कोशा आत्मवन्तोऽन्तरतमेन। स हि सर्वेषां जीवननिमित्तत्वाज्जीवः। )

रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके । 
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ३/११ ॥

...आकाशवद् परमात्मा ही उनके आत्मा जीव रूप से प्रकाशित किया गया है।
👍

यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च । 
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४/६८ ॥
जिस प्रकार स्वप्नमय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।

(क्या स्वप्नमय जीव ३/११ में कहे जीव से भिन्न है? उसका आगम और पर्यवसान है? )
(भाष्य----चित्र)
👍
यथा मायामयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च । 
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४ /६९ ॥
जिस प्रकार मायामय जीव उत्पन्न होता भी है और मरता भी है उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
( क्या मायामय जीव उपरोक्त के अतिरिक्त प्रकार का है? उसका आगम और पर्यवसान है? )
👍
न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते । 
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥ ७१ ॥

कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्म की संभावना ही नहीं है। उत्तम सत्य तो यही है कि यहाँ किसी वस्तु की उत्पत्ति ही नहीं होती।

(यदि उत्पन्न और पर्यवसान नहीं है तो क्या उक्त सभी जीव की विभिन्न दशाएँ हैं?  क्या ये सब अद्वैत का प्रतिषेध है ?)

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संघर्ष अौर कर्म सापेक्ष नहीं है"


संघर्ष अौर कर्म सापेक्ष नहीं है"

🐝एक सकारात्मक दृष्टिकोण🐜

याद रखो नाव बहुत छोटी होती है और तूफान बहुत बड़ा। अंधेरा बहुत बड़ा होता है दीप बहुत छोटा। आसमान बहुत बड़ा होता है परिन्दे बहुत छोटे। इन बड़ों से छोटों का संघर्ष नया नहीं है। बड़ों पर छोटों की विजय गाथा चाहे कोई कहे नहीं पर यह कहानी अस्तित्व की है। तूफान कुछ देर का है इसलिए संघर्ष भी कुछ ही देर का है। तूफान में मस्तूल को समेट लो। तूफान चले जाने पर नाव फिर तैरेगी, दीप जलता रहेगा तो अंधेरा दूर खड़ा रहेगा, पूरा आसमान परिन्दे नाप नहीं सकते पर जितना नापा है उन्हीं ने नापा है। चाणक्य ने कहा था जब नदी में बाढ़ आती है तब तट पर खड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं पर बेंत का वृक्ष नहीं क्योंकि वह बाढ़ की दिशा में झुक जाता है और बाढ़ के जाते ही फिर खड़ा हो जाता है।
तुम्हारी अस्मिता अक्षुण्ण है फिर अस्तित्व से क्यों डरते हो। अस्मिता नैसर्गिक है पर अस्तित्व के लिए कर्म करना पड़ेगा। तूफान में नाव उलट पलट हो सकती है बस उसे बिखरने मत देना, दीप में तेल बना रहे यह ध्यान रखना। आकाश हमारे तुम्हारे लिए नहीं बना है वह परिन्दों की दुनिया है। आकाश अस्मिता का पोषण करेगा अस्तित्व उड़ने से कायम रहेगा। जीवन अस्मिता का दूसरा नाम है। कर्म के बिना अस्तित्व कायम रखना असंभव है। संघर्ष का मतलब लड़ाई कतई नहीं है। गीता कहती है-संघर्ष का आध्यात्मिक नाम कर्म ही है। इसलिए कर्म से अस्तित्व और अस्तित्व से अस्मिता क्रमिक अवधारणा ही है। तुम्हारी अस्मिता अक्षुण्ण है। तुम्हारा संघर्ष ही कर्म है। तुम कर्म के बिना जीवन में रह नहीं सकते। इसलिये जो "करना ही है" उसे कर्तव्य समझ कर करोगे तो जीवन बोझ नहीं होगा। जीवन में रसात्मकता तो दौड़ कर आवेगी।

रामनारायण सोनी

लघु चिन्तन

लघु चिन्तन

सौंदर्य प्राप्ति की अभिलाषा है तो पहले भीतर का सौंदर्य प्राप्त करो। अन्यथा सौंदर्य सामने खड़ा होगा अौर आप प्यासे खड़े रह जाओगे।

भीतर तो सौंदर्य ही सौंदर्य है परन्तु वह बाहर के अनावश्यक कूड़े करकट से आच्छादित है। इसे हटा कर अथवा इससे हट कर उस अप्रतिम सौंदर्य की अरुणिमा की अनुभूति कर सकोगे। यहाँ आनन्द का निखिल संसार आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। आओ तो सही।

निवेदक
रामनारायण सोनी

जिजीविषा

     "जिजीविषा"

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥

तात्पर्य यह कि प्रत्येक व्यक्ति को सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिये। कोई नैराश्य में कब तक जिएगा। अगर वह इस तरह श्वाँस लेता भी है तो लुहार की 'चमड़े की धौकनी' की तरह ही है। प्रत्येक स्वाँस जीवन की पोषक है और परमात्मा का वरद है। इसे गवाँना परमात्मा की प्रसाद की अवमानना है। जितनी स्वाँसें चलनी है वे चल कर रहेगी। नियति के नियमों में व्यवधान क्यों करें। जीवन में रसात्मकता बनी रहे। विज्ञान सिद्ध करता है कि बहती नदी में अपावन जल भी शुद्ध हो जाता है। उसका बहना और बहते रहना धर्म है। क्या आप जानते नहीं कि नदी का जल प्रति क्षण बदल रहा है। वह प्रति पल नूतन हो रही है क्योंकि वह बह रही है, चल रही है। यही जिजीविषा का सिद्धान्त है। चरैवेति, चरैवेति, चरैवेति। जो दीपक की ओर पीठ करके चला उसके मार्ग में सिर्फ अन्धकार ही होगा और जो प्रकाश की ओर उन्मुख है अन्धाकार भले ही पीछे चलता रहे उसकी परवाह न करे क्योंकि प्रकाश का स्रोत चाहे जितना बड़ा हो वह अन्धकार से सदैव आच्छादित रहेगा। सिर्फ सुख मिले, ऐसी कल्पना नहीं कर सकते लेकिन प्रकाश की जिजीविषा संग है तो अन्धकार दूर ही खड़ा तकता रहेगा। जिस दिन जीवन का उद्गम हुआ उसी क्षण से वह मृत्यु की ओर दौड़ रहा है। जन्म और मृत्यु जीवन के दो चरम बिन्दु हैं और दोनों नियती के आधीन है। इसके बीच का काल खण्ड ही जीवन है। इसे जीना हमारे हाथ है। स्वाँस का चलना जीवन नहीं है अपितु जीवन को उत्साह से भर कर जीना वास्तव में जीवन है। यही जिजीविषा है।
आपका अतीत ठीक वैसा ही नहीं रहा है जैसा आपने सोचा था, जैसी आपने कल्पना की थी, जैसी आपने अपेक्षा की थी। इसका यह अर्थ यह कदापि नहीं है कि आपका भविष्य अतीत से बेहतर नहीं होगा या जिस तरह के सपने आप आज देख रहे हैं वैसा नहीं हो सकेगा। जीवन में आशा कभी और कभी नहीं छोड़ना चाहिए। आशा और स्वप्न एक ही खूँटे से बन्धे हैं वह खूँटा है 'जिजीविषा'। जिजीविषा का सीधा सा मतलब है जीने की चाह, जीने की ललक। जो जीना ही नहीं चाहता वह जीवन का मूल्य ही नहीं समझता और अक्सर जब तक उसे समझ में आता है तब तक उसका अमूल्य वर्तमान अतीत बन चुका होता है। जो अतीत बन गया उसे स्वयं ब्रह्मा भी नहीं लौटा सकते और न ही पलट सकते। यह अतीत कभी न कभी आपका वर्तमान ही था जो बीतता चला गया और आज आपका इतिहास बन गया है। उस क्षण आपने जो जो आशाएँ की थी, जो स्वप्न देखे थे, जिस भविष्य की कल्पना की थी वह आज आपके सामने वर्तमान बन कर खड़ा है और आपकी जिजीविषा को परखने को तत्पर है।

किसी कवि ने कहा है:-
आशा की अँगड़ाई, फैली दिग्दिगन्त है ।
बीत गये दुख-पतझड़, जीवन में बसन्त है ।।  
पथ पर पग दो चार बढ़े, हो मन उमंग में उत्साहित ।
भावनायें उन्मुक्त और मैं लक्ष्य-प्राप्ति को आशान्वित ।
रुक जाने का समय नहीं, घट भर लेने हैं अनुभव के,
कर्म बसी भरपूर ऊर्जा, सुखद मनोहर पथ लक्षित ।।१।।

बीच राह, सब ओर स्याह, पुरजोर हवायें बहती थीं ।
काल करे भीषण ताण्डव, चुप रहे जीवनी सहती थी ।
दुख आते, मन अकुलाते, कुछ और स्वप्न ढल जाते हैं ।
अनचाही पर उस पीड़ा को, हम सहते हैं, बल पाते हैं ।
कुछ और अभी पल आयेंगे, कष्टों का बेड़ा लायेंगे,
फिर भी आशा है, जीवन है, हम भूधर से डट जाते हैं ।।३।।
फिर भी आशा है, जीवन है, हम भूधर से डट जाते हैं ।।

क्या आप अपने पुरुषार्थ से इस क्षण को अपनी आशाओं के साँचे में ढालना नहीं चाहेंगे? यदि नहीं तो आप इसे भाग्य के मत्थे मढ़ कर अपनी अकर्मण्यता को छिपाना चाहते हैं। आपकी आशाऍ मर चुकी है। क्या आपको विश्वास नहीं है कि कल सुबह होगी, क्या विश्वास नहीं है कि अब मौसम भी बदलेंगे, क्या संसार का क्रम अब समाप्त हो जावेगा? स्पष्ट है जीव, जगत और जगदीश; सभी मौजूद होंगे फिर आपने यह क्यों समझ लिया कि आप इन सबसे अलग हैं, निराशी हैं।
इसलिए उपनिषद् कहता है:-
उत्तिष्ठ जाग्र वरान्निबोधत।

निवेदक
रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...