Thursday, August 9, 2018

चलो आनन्द की ओर

*चलो आनन्द की ओर*
जिस जीवन में आप चलते चले जा रहे हैं और आनन्द के क्षण उपलब्ध नही हुए हैं तो यह तय समझो कि आप एक बीहड़ जंगल में भटके यात्री हो। आपके पास कुछ कदम पर ही "आनन्द" मौजूद था पर उसे आप पा नहीं सके। "सुख" पा कर यह मत समझ लेना कि आपको आनन्द मिल गया। दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। सुख नदी का कोई घाट हो सकता है जो बहने वाले प्रवाह का वर्तमान होता है।
आप जानते हो; तीनों कालों में वर्तमान सब से छोटा होता है। अतीत जगत में सब से बड़ा है जो आपका पिछला पूरा जीवन  ही समेट कर बैठा है। निराश मत हो जाना; यदि उस कालखण्ड में आनन्द को उपलब्ध न हो सके हो तो अभी अवसर है।
महमहाती कस्तूरी का अधिष्ठान तो मृग ही है। आप वही मृग हो। काल के आखेट बन जाने के पहले ही उसकी सुवास ले लो।
चलो अपने भीतर के उस महासागर में। अभी चलो आनन्द की ओर। "आनन्द अनन्त है, अखूट है, अक्षुण्ण है।" यह महासागर आपके अन्तस में सदैव से उपलब्ध है। आनन्द का यह महासागर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

अनन्त की ओर


     *अनन्त की ओर*
अगर तुम रोज थोड़ा थोड़ा घट रहे हो तो यह शुभ संकेत है। थोड़ा अहं घटे, थोड़ा शरीर घटे, थोड़ा लोभ मोह आदि घटे यहाँ तक कि थोड़ी तुम्हारी प्रशंसा भी घटे ताकि तुम्हारे भुट्टे जैसी अकड़न कम हो सके। प्रशंसा तुम्हे बाहर ले जाती है; भीतर देखने का अवसर ही नही देती। सहजता तुम्हें भीतर ले जाती है। सहजता का एक अर्थ है समत्व की प्रतिबद्धता।
"गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया।"
छिन छिन घटना शून्य की ओर ले जाएगा। शून्य ही पूर्ण है अर्थात् घटना तो यात्रा पूर्ण की ओर की यात्रा है।
कोई शायर कहता है..
"बर्बाद हो के यार के दिल में मिली जगह।"
तो ऐसे ही चलते रहो। अनन्त को पा नहीं सकते तो अनन्त की ओर जा तो सकते हैं।
मंजिल मिले कि ना मिले, रस्ता हसीन है
इतना सा जो समझ ले कितना ज़हीन है।

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...