समग्र उपनिषद
ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
बिजली के बल्ब में काँच है, फिलामेंट है। छत पर टँगा है। वह लगा इसलिए है कि जब भी हमें जरूरत हो तब बिजली की बटन दबाएं और हमें रोशनी मिल जाए। यह रोशनी मात्र बटन और बल्ब के कारण से नहीं है अपितु उसमें बहने वाली अद्दष्य विद्युत धारा से है। विद्युत धारा नहीं तो बल्ब में कोई चमक नहीं।
इसकी रोशनी में हम वह देख पाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। लेकिन कमरे में कुछ नहीं दिखने के कारण ये हैं :-
१, चीजें है ही नहीं
२, चीजें हैं देखने वाली आँखें नहीं है
३, चीजें भी हैं, आँखे भी हैं पर अंधेरा है।
४, चीजें हैं, आँखें है, वातावरण में उजेला भी है लेकिन आँखों में देख पाने की क्षमता नहीं है।
मतलब यह कि जिस कमरे में देखना है वहाँ चीजें हों, देखने वाली आँखें हों, प्रकाश हो और देखने वाली आँखों में देखने की क्षमता हो। इस सबसे ऊपर एक और विचित्र बात वह है जिसे 'दर्शन' ही समझा सकता है। वह यह कि सम्पूर्ण परिदृष्य में से सब कुछ मौजूद होने के बावजूद यदि चीजें दिखाई नहीं देती है तो उसका कारण है "मन" केवल मन।
दो ढाई साल का बच्चा चलते-चलते जमीन पर गिर जाता है घुटनों से खून बहने लगता है। जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगता है। माँ जमीन ठोंक कर कहती है, देख! चींटी मर गई। असल में तो वहाँ चींटी है ही नहीं, केवल मन की दिशा का परिवर्तन है। कभी चिड़िया दिखाने लगती है" देख! चिड़िया उड़ गई। बालक का मन चींटी और चिड़िया में रम जाता है। रोना रुक जाता है चाहे खून बहता रहे। मन घुटने से छूट कर चिड़िया चींटी को देखने में टिक जाता है। त्वचा की संवेदना पीछे छूट जाती है क्योंकि मन अब कुछ और देख रहा है। मन उस संवेदना को प्रकाशित नहीं कर रहा। सूरदास कहते हैं- "ऊधो मन न भए दस-बीस।" मन तो एक ही है, इधर लगा लो चाहे उधर और एक बार में एक तरफ ही जाता है।
यहाँ ठीक वैसा ही कुछ घट जाता है जैसे अन्धेरे में कुछ घट जाए और पता ही न चले। इससे यह भी स्पष्ट है कि मन के प्रकाश में ही समस्त जगत प्रकाशित होता है। मन के इस गुण के अभाव में समस्त जगत अप्रकाशित, अनजान और अज्ञान के अन्धकार से आवृत्त रह जावेगा। जिस प्रकार चीजें वहीं थीं, आँखें वही थी, आँखे सक्षम भी थी, देखने वाला व्यक्ति भी वही था पर मन ने नहीं देखा तो कुछ नहीं दिखा। मन ने संवेदना ग्रहण नहीं की लगा कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। मन ने देखा तो सब दिखा। आँखें मात्र इक्विपमेंट हैं, खिड़कियाँ हैं जहाँ से दृष्य भीतर प्रवेश कर रहे है। आँखे ही नहीं समस्त इन्द्रियाँ भी मन के अनुशासन में हरकत करती हैं। जहाँ मन का प्रकाश होगा वही प्रकाशित होगा। मन के द्वारा सभी इन्द्रियां अपने अपने विषय का ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद जीभ नहीं अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को भाते हैं। मन उद्विग्न हो तो चंद्रकिरणें भी चुभन लगती हैं । विषयों की अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता ।
"मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं।"
इसका अर्थ यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ ही कृत कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीवात्मा का दिव्य माध्यम है।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)
इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी, समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथी, रथ हांकने वाला, और मन को लगाम समझो।
इंद्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ४)
इन्द्रिय रूपी अश्व उसी के अनुशासन में रहते हैं। उसी से उनके विषयों को जानने की क्षमता पाते है। इसलिए श्रुति ने मन को इन्द्रियोँ की लगाम कहा है। सामान्य अर्थों में मन ही इन्द्रियों और शरीर से सब कुछ करवाता है लेकिन स्पष्ट है लगाम कोई और धारण करता है वह है "जीवात्मा"। श्रुति मन को जड़ परिभाषित करती है। परन्तु बिना लगाम के रथ और घोड़े नहीं चल पाएंगे। इससे मन की महत्ता भी सिद्ध होती है। लेकिन यह भी स्वयंसिद्ध है कि ज्योतियाँ अर्थात् इन्द्रियाँ उस परमचेतना से ही अनुप्राणित हैं अर्थात् "ज्योतिषां ज्योतिरेकम्।"
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु
सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव
तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ३. १३. ७ ॥
इस विश्व लोक के ऊपर जो द्युलोक है, उसके भी ऊपर परब्रह्म की अलौकिक तथा परमदिव्य ज्योति विद्यमान है। उसी परमात्मा के प्रकाश से यह सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित है। इसी ज्योति स्वरुप के अंश से जीव के ह्रदय में जीवात्मा प्रकाशित होता है।
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विक्षिप्त अथवा मुक्त
उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः । सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ 3-42 ॥
लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ।। 3-44 ।।
यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः । अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ 3-46 ॥
काम्य विषय और भोगों में विक्षिप्त हुए चित्त का उपाय पूर्वक निग्रह करे तथा (सुषुप्ति में) लयावस्था में अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुए चित्त का संयम करे, क्योंकि जैसा अनर्थ कारक काम है वैसा ही लय है।
चित्त अथवा मन की विक्षिप्तता का प्रथम कारण है- काम्य विषय तथा भोग और दूसरा कारण है- सुषुप्ति अवस्था में लय होना। इन दोनो के बीच में प्रसन्नता रूपी शिखर है। शिखर की दोनों ओर जबर्जस्त खाइयाँ जो विक्षिप्तता के स्थल हैं। काम्य विषय जगत की ओर आमुख है और लय अन्तर्जतग की ओर, परम चेतना की ओर। शिखर पर चढ़ना सरल नहीं है केवल ईमानदार साधना ही जाग्रत और स्वप्न के परे ले जा सकती है। यहाँ पहुँच कर चित्त और मन शक्तिसम्पन्न हो जाते है तथा जरा सी असावधानी वे त्वरा से नीचे फिसल सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो एक मदमत्त हाथी दूसरों के साथ स्वयं भी संकट में पड़ जाता है। साधक इस शिखर पर मन और चित्त के पैरों पर चल कर आता है इसलिए इन पर अंकुश बुद्धि, जो इनके ठीक बीच में बैठी है, ही सक्षम है कि इन्हें शिखर पर रोक ले।
स्पष्ट है कि गर्त में गिरना चित्त की कमजोरी जरूर है लेकिन यहाँ महत्ता बुद्धि की है जो उन्हें संयमित रख सकती है। जिस प्रयास से मन, चित्त यहाँ तक पहुँचा है यह उसी की उपलब्धि है पर हम मन को ही दोष देते रहते हैं। इस शिखर पर चित्त इसलिए भी प्रसन्न होता है कि वह जाग्रत और स्वप्न की सुख-दुःखानुभूति से परे निकल गया है और प्रज्ञावान हो चुका है। दूसरे वह तुरीय के सबसे निकट है। इस स्थिति में यदि वह उस परम चेतना को आमुख होने की प्रगाढ़ अनुभूति में स्थित हो जावे तो विक्षिप्तता कैसे निकट आ सकती है। बुद्धि इसे संयम देकर विलग हो जावे अन्यथा दुष्परिणाम अवश्यंभावी है। उसका अतिरेक मन और चित्त को वापस जगत में ढकेल कर बवंडर खड़ा कर देगी। यह ठीक उस तरह का होगा जैसे युद्ध में हारा सैनिक जगत में भी ठीक से नहीं रहता है और पागल होकर बार बार युद्ध भूमि की ओर देखता रहता है। विक्षिप्तता यही है।
माण्डूक्य उपनिषद् कहता है कि यही वह शिखर है जहाँ से सीधे परम चेतना में कूदा जा सकता है। यह विलक्षण प्रतिभा केवल मेंढक में है। छ्लाँग सधी हुई हो कि लय को लाँघ सके। मेंढक चलना कम पसंद करता है पर हर छलाँग के पूर्व स्वयं को तैयार करता है और परिगणित मात्रा में ही छ्लाँग लगाता है। माण्डूक्य उपनिषद् के महीन सूत्र मोक्ष के द्वार तक ले जाने वाले हैं न कि विक्षिप्तता की ओर। अधीरता नहीं धृति का संबल पकड़ो।
परमात्मा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
यही मोक्ष है। तुम मुमुक्षु हो या मात्र साधक, उस परम सत्ता के पाद हो या कि भटकते यात्री। नहीं, तुम मुमुक्षु हो।
।।ॐ तत्सत।।
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अद्वैताभास
सागर शान्त था, बल्कि कहें कि सागर प्रशान्त था। सतह को छूती हुई तेज हवा चली और एक लहर खड़ी हो गई, यह लहर चल भी पड़ी क्योंकि अगर खड़ी रह गई तो लहर तुरन्त मर भी जाएगी। लहर के खड़े होते ही एक अहंकार खड़ा हो गया कि मैं लहर हूँ। लहर कहती है कि मैं सागर नहीं हूँ और उसका अहंकार उसे यह मानने नहीं देता कि वह असल में पानी है। अहंकार खड़ा होते ही रिश्ते खड़े हो गये। रिश्ता सागर से, रिश्ता दूसरी लहर से, रिश्ता बहते हुए पवन से, रिश्ता गति से, रिश्ता अपनी स्थिति से। और भी कई जाने अनजाने बेनामी रिश्ते खड़े हो गये लहर के चारों ओर। रिश्तों की इस भीड़ में उसे अपनी एक पहिचान याद नहीं रही कि लहर केवल एक अनित्य आकार है। असल में वह पानी ही है और लहर में से लहर हटा लिया तो जो बचेगा वह पानी ही होगा। लेकिन लहर में से पानी हटा लिया तो कुछ भी नहीं बचेगा। पास खड़ी लहर भी पानी है, सागर भी पानी है सब ओर पानी ही पानी है। यही पानी कभी सागर है, कभी एक लहर है, कभी एक और लहर है, कभी यह पानी बूँद है, कभी वाष्प है, कभी बर्फ है, कभी बादल है, कभी नदी है, झील है, सरोवर है तो कभी नदी नाले की धार है। ये सब के सब एक अहंकार ले कर बैठे हैं, एक 'मैं' ले कर बैठे हैं। ये जितने भी नाम हैं सब अनित्य है। ये नाम अस्थाई रूप से मिले हैं। ये आकार के, प्रकार के, स्थिति के, अवस्था के कारण हैं और परिवर्तन होते ही वे नाम खो जाते हैं। नदी जब बहती है तो नदी है, पानी की नदी। सागर में जा कर मिली तो नाम खो गया पर पानी नहीं खोया। नदी ने स्वीकार किया अपने मैं के खोने का तो बस वह पानी हो गई। एक अकेले 'मैं' के मिटते ही पानी का आभास प्रकट हो जाता है। रिश्ते गल जाते हैं, न तू 'तू' है न मैं 'मैं' रह पाता हूँ। सब तरफ, सब में, मुझ में केवल वह एक अद्वैत है। जैसे पानी की व्यापकता का बोध प्रकट हो जाता है तो द्वैत का बोध चला जाता है। वह जो 'वह' है वह भी मैं ही हूँ। यही ब्रह्मत्व है।
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचिद्जगात्यां जगत।
तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।। ईशावास्योपनिषद्।।१।।
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शब्द ब्रह्म
मैं शब्द हूँ
मैं उस अनन्त अक्षर से मण्डित हूँ
मैं अमर हूँ, मैं समर हूँ
मैं सुधा हूँ, मैं गरल हूँ
गूँज हूँ, अनुगूँज हूँ, स्पन्द हूँ
मैं वज्र भी हूँ, पुष्पों सा कोमल भी हूँ
नेपथ्य में बोये गए कुछ शब्द बीज
उगते, विकसते हैं जगत के रंगमंच पर
अपने अर्थ, भाव, संदेश और कथ्य ले कर
मेरी बिखरन होती है सतरंगी
रक्त सी लाल, सत्य सी श्वेत
निस्सीम व्योम सी नील,
पाण्डु सी पीत, राम-कृष्ण सी श्याम
वसन्त सी अभिराम,
लता सी हरित ललाम
जब जब मैं उतरता हूँ कोरे कागज पर
किसी के अन्तस से निकल कर
बाहर बिखरता हूँ साकार हो कर
बनाता हूँ चित्र, धँसता हूँ तुम्हारे भीतर
बैठ जाता हूँ शूल लेकर मन की कोंख में
चुभता हूँ, सालता हूँ कभी जीवन भर
लेप हूँ, मरहम हूँ, तसल्ली भी मैं ही तो हूँ।
मैं ओज का उद्घोष हूँ
शान्ति का दूत हूँ, स्मृतियों का महाकोष हूँ
प्रणय का गीत हूँ, प्रिय का मन मीत हूँ
पावन ऋचा हूँ, जीवन का उद्गीत हूँ
मैं नाद हूँ, मैं गीत हूँ, मैं प्रगीत हूँ
मैं माँ की ममता हूँ, पिता की गोद हूँ
आर्त की पुकार और वीरों में क्रोध हूँ
तुम्हारे मन में हूँ, आकाश में भी हूँ
चलता हूँ विद्युत की तरंगों पर
कभी हवा के परों पर बैठ कर
वहाँ सें यहाँ, यहाँ से वहाँ,
जाने कहाँ कहाँ
मैं बीज हूँ
सृजन भी मैं, जीवन भी मैं, ध्वंस भी हूँ मैं
मैं ब्रह्म हूँ। शब्द ब्रह्म।।
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जड़ में चेतन और परमात्मा की चेतना का दर्शन
क्या तुमने कभी धरती को, आकाश को , अग्नि को, वायु को और जल को हँसते हुए, आनन्द मनाते और रोमांचित होते देखा है? तुम ही नहीं सब लोग शायद यही कहेंगे कि नहीं ऐसा भछ भी हो नहीं सकता। ये सभी जड तत्व हैं इसलिये यह कदापि सम्भव नहीं है। हो सकता है कि मेरी यह बात किसी पागलपन से कम नहीं है।
मैं कहता हूँ कि मैंने यह सब स्वयं अपनी आँखों से देखा है और महसूस भी किया है। मैंने पाँचों स्थूल तत्वों को आनन्द मनाते देखा है। आप भी देखें यह किस तरह घटा?
*धरती--*
धरती ने जब हरियाली ओढी, पेड़ों-पौधों में जब फूल खिले तो यह सब धरती के आनन्द का उद्घोष था। हरी घास के रूप में धरती रोमांचित हो रही हो। मेरे लिये माँ हो कर तरह तरह के आहार तथा व्यंजन लेकर खड़ी है और मन्द मन्द मुस्कुरा रही है।
*आकाश तत्व--*
आकाश में जब चाँदनी लेकर जगमगाता चाँद उतरा तो लगा आकाश ने चाँदी का वरक पहन लिया हो। बादलों के बीच बिजली अपनी चमक लेकर मेघना की माँग भर रही हो और मेघ गर्जना करने लगे हों तब तब लगा कि जैसे आकाश ने अपना श्रृंगार किया है और बादलों की ओट से खुद आकाश मुस्कुरा रहा है।
*अग्नि तत्व ..*
अग्नि जब अपनी प्रज्ज्वलित हुई वे ज्वालाएँ लेकर यज्ञशाला की वेदियों में बिराजी आहुतियाँ देवों को जाने लगी। फिर दीपक की लौ बन कर सब ओर फैले अंधकार को दूर करने के लिये दीपशिखा में समाई तब तब उस वेला में लगा अग्नि लोककल्याण का मन्त्र ले कर प्रफुल्लित हो उठी है। दीपों की लौ में समाहित हो कर अग्नि जैसे मुस्कुरा रही हो।
*वायु तत्व--*
हवा जब फूलों के बगीचों से उनकी सुगन्ध लेकर चली, फिर पेड़ों की पत्तियों से अठखेलियाँ करती हुई आगे बढ़ी तो लगा पवन अपने चिरन्तन स्वरूप में चेतना और प्राण ले कर चल रही है। उसने जब सूखे पत्तों के बीच सरसराहट की आवाज पैदा की तो लगा कि जैसे ब्रह्मनाद गूँज उठा हो और पवन इसकी लय में नृत्य कर रही हो।
*जल तत्व ..*
नदी, नद, झरने जब कल-कल, छल-छल कर बहने लगे तब लगा ये सब मिल कर जलतरंग, पणवा, गोमुख, मृदंग, पखावज और वीणा बजा रहे हैं। और फिर लगा कि सम्पूर्ण जगत जल की शीतलता से तृप्त हो रहा हो।
इस समग्र दृश्य को देख कर ऐसा लगा लगा कि सारी दिशाएँ रोमांचित हो उठी है। तब यह लगा कि परमात्मा कण कण में समाया हुआ इन पाँचों तत्वों और समग्र समष्टि में आनन्द बिखेर रहा है। तब यह महसूस हुआ कि वही तो है जो इन विभिन्न रूपों में दिखाई दे रहा है।*
*तुमने यदि यह सब इसी दृष्टिकोण से सृष्टि को नहीं देखा तो समझो तुम उस परमात्मा की अनुपम कृति के सौंदर्य से परिचत ही नहीं हो पाये हो।*
*तो आओ अभी चलें! आज से फिर इस अचेतन में परमात्मा की संचेतना का सौंदर्य अनुभव करें।*
*दोहा*...
जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।
अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ।।११९ ख/बालकाण्ड ।।
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"समस्त तेजोमयं विश्वम्"
तुम्हारे घर के दरवाजे में आग है, जो कपड़े पहन कर बैठे हो उसमें आग है, किताबों में आग है, तेल में आग है, एल.पी.जी. में आग है। यह आग तुम्हे दिखाई नहीं देती अर्थात् अप्रकट है जैसे ही उपयुक्त घर्षण अथवा जब दूसरी आग आ कर मिलती है यह प्रकट हो जाती है। आई हुई आग लौट भी जाए तो यह आग अपने आश्रय को जलाती रहती है। तात्विक रूप से यह आग ही पंचतत्वो में से एक 'अग्नि' तत्व है। आपको आश्चर्य होगा कि संसार के हर पदार्थ में आग है। विज्ञान अर्थात् पदार्थ विज्ञान ने इसे सिद्ध किया है। आग की उपस्थिति को ताप के रूप में थर्मामीटर से नापा जा सकता है जिसे तापक्रम या टेम्प्रेचर कहते हैं। एन टी पी याने नार्मल टेम्प्रेचर एण्ड प्रेशर। नार्मल टेम्प्रेचर मतलब वातावरण का तापक्रम। जितना अधिक ताप उतनी अधिक मात्रा में आग। फ्रिज इसी तरह की आग को उस वस्तु से बाहर निकाल कर फेंकता है। परमताप -273 डिग्री होता है। फिर भी परमाणु की ऊर्जा विद्यमान रहती ही है। हमारे शरीर के कण कण में भी यही आग है जो अग्नि तत्व है।
खैर, अध्यात्म में इस 'अग्नि' को देव कहते हैं। इस देवता में ज्वलन क्षमता भी स्वयं की नहीं है। वह ब्रह्म ही है। उक्त रूपकों के माध्यम से स्पष्ट है कि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'। मैं ही नहीं संपूर्ण जगत में ब्रह्म व्याप्त है। तो मैं भी कहूँ कि "अहं ब्रह्मास्मि"। तुम भी यही कहो। अपने आत्मदीप की परमज्योति का आभास करो।
'ईशावास्यमिदं सर्वम्"
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यह संसार कैसा संसार है? यह सब कुछ भाग रहा है, सब ओर परिवर्तन है, यहाँ ठहराव कुछ नहीं है। सुबह हुई, थोड़ी देर में बदल गई। बरसात आई बरस कर चली गई, बचपन आया चला गया। जो हमेशा से है और रहेगा वह है 'परिवर्तन'। यह नैसर्गिक नियम है। यहाँ सब दौड़ रहे हैं कोई तेज तो कोई धीरे। कोई जीवन ले कर अभी अभी आया है, वह आते ही चल पड़ा है। याने जीवन चल पड़ा। कोई अभी अभी गया वह भी चलते चलते ही गया। ऐसा लगता है कि 'जन्म' स्वयं मृत्यु ले कर पैदा हुआ है। गिन कर सांसें लाया है, रोज उन्हीं में से कुछ खर्च कर रहा है। हम रोज नई माँग लेकर सोते हैं और जब अगली सुबह जागते हैं तो उसकी आपूर्ति में दौड़ने लगते है। पेट की आग, शरीर की माँग, और कभी कभी मन में घुली भाँग हमें बैठने नहीं देती। यह माँग भी परिवर्तनशील है जब एक पूरी होती है तो यात्रा के मील का पत्थर बन कर पीछे छूट जाती है और लगता है कि वह हमसे पीछे दूर भाग रही है। हम आगे भाग रहे हैं। फिर कुछ दूसरी माँगें सामने मुँह बाये खड़ी हैं। "बेहिसाब हसरतें न पालिए, जो मिला है पहले उसे सम्भालिए।"
समस्त चर अचर और ब्रह्माण्ड का कण कण चलायमान है। किसी ने कहा यह पहाड़ तो अचल है, पर अन्तरिक्ष में जा कर देखो यह धरती पर सवार हो कर सूर्य के चारों तरफ परिक्रमा में लगा है।
तो स्थिर क्या है? कौन है? नित्य कौन है? अपरिवर्तनीय कौन है? कौन है जो काल अर्थात् समय की सीमाओं से परे है? जो सब बदलता है पर खुद नित्य एक रस है। जो अपरिमेय है। जो निर्माण में भी है और ध्वंस में भी है। जो अनन्त है।
जो कभी खाली नहीं होता ऐसा पूर्ण, जिसमे कुछ भरा नहीं जा सकता ऐसा पूर्ण, जो वहाँ भी है, यहाँ भी है। जिसमें सब है, जो सब में है। बनता भी है, बनाता भी है। इस सृष्टि के लय प्रलय के पहले भी था, है भी, रहेगा भी।
"चलो उस 'कौन' को जानने का प्रयास करें।"
उपनिषद् कहता है..
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
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परिपूर्ण ब्रह्म
क्या मैं
एक देह रूपी मंदिर हूँ ?
जिस में पवित्र आत्मा निवास करती है?
क्या मैं आत्मा हूँ ?
जो इस देह रूपी मंदिर में निवास करती है?
क्या मैं सम्पूर्ण हूँ?
जिसमें यह सम्पूर्ण ही निवास करता है?
हाँ! मैं सर्व व्यापक, परिपूर्ण ब्रह्म ही हूँ !!
अयमात्मा ब्रह्म
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आत्म प्रबोधिनी
कौन है वह जो न हो कर भी होता है? जिसका ना होना तो सब को लगता है पर फिर भी वो होता ही है। वह जो अहसास में है, वह जो सामने नहीं है, वह जो पास भी है, वह जो दूर भी है। वह न तो वह आता है न ही वह जाता है। जो सब के अस्तित्व में आने के पहले से है, जो सब के न रहने के बाद भी रहेगा वही ब्रह्म है। खुद बना भी वही है और रहता भी इस में है। जिसे हम अन्तिम कहते है उस एक क्षण में यह सब वह मकड़ी के जाले की तरह लील जावेगा। ब्रह्माण्ड जा कर ब्रह्म के आत्मसात् हो जावेगा। उस प्रारंभ और अन्त के बीच वह परमात्मा हमारा अस्तित्व और जीवन ले कर विद्यमान है।
संदर्भ पुरुषसूक्त(ऋग्वेद सूक्त ९०),
ईशावाश्योपनिषद्
न सत् था, न था कोई असत्
न धरती थी, न कोई गगन
था और न इनसे कोई परे
न आश्रय था न अवलम्बन
बिन आश्रय के कैसे होता
यह महाउदधि गम्भीर गहन
यह मृत्यु न थी, न अमृतत्व
निशि-दिन का था नहीं सृजन
बहती थी ना पवन तनु
था स्वधा गर्भ में एक अणु
न ही कोई था भिन्न भिन्न
केवल वह था अविच्छिन्न
घिरा हुआ था तम से तम ही
अनहद नाद ढँका था तब ही
तप के महाप्रबल उस बल से
प्रकट हुआ उसके अन्तर से
पुण्य अभीप्सा उपजी ऋषि के
पावन अन्तस्तल में
जैसे अंकुर झाँक रहा हो
बीच बीज के मृदुअंचल में
विद्यमान थी ज्योति अकेली
रश्मिपुञ्ज बिखरा सर्वत्र
जीवन के तब स्वप्न बुने जब
याचक स्वधा उचारे मंत्र
केवल सृजक बता सकता है
निखिल सृष्टि का परमसत्य
कैसे, क्यों फिर और कहाँ से
आया जीवन, जग के कृत्य
देव हुए थे सृष्ट अनन्तर
लोक बने फिर पीछे उनके
कैसे वह अभिव्यक्त हुआ है
सब रहस्य हैं उस महान के
कौन जानता सृष्टि कहाँ से
प्रकट हुई है धारक कौन
इसका स्वामी परमव्योम में
है विद्यमान पर रहता मौन
ज्ञान नही है जग का जग को
फिर उसको है जाने कौन?
ज्ञान सभी का है उसको ही
इस रहस्य को जाने कौन?
रामनारायण सोनी
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"खाली हो कर तो देखो"
बाँस के जंगल में हिंसक शेर नहीं ठहरता है। कहा जाता है कि बाँस जब उगता है तो जमीन से विस्फ़ोट की तरह फूटता है। हो सकता है यह केवल मिथक हो पर बाँस बदनाम है अपनी इस छबि के कारण मायूस तो वह होगा ही।
द्वापर में श्रीकृष्ण आये और इसी बाँस को रस माधुर्य का पर्याय बना दिया। बाँस छिदने के लिये राजी हो गया, खाली होने के लिये राजी हो गया, हाथ भर का छोटा होने के लिये राजी हो गया। जहाँ हवा प्रेवश भी नहीं कर सकती थी वहाँ अब आर पार जाने का सुगम मार्ग देने के लिये राजी हो गया। उसने अपने ब्रह्म रंध्र को खोल दिया ताकि कान्हा की फूँक उसमें प्रवेश करे और ब्रह्मनाद बज उठे। ऐसा नाद जो अपने तन के छिद्रों से स्वरों की बारिश कर सके। जो भीतर तो सिर्फ हवा हो पर बाहर आ कर स्वरों का मधुर संसार रच सके। हलका इतना हो कि किसी के हाथों में थम जाए। अब बाँस में इतनी सारी अनुकूलताएँ उपलब्ध हो गई।
तुम भी भरे भरे से हो, अपारदर्शी चरित्र के कारण अनजाने में ही कुछ ग्रहण करने योग्य नहीं हो, तुम्हारे मस्तिष्क के रन्ध्र में वह आनन्द का रस प्रवेश हो सके उसके लिये उसे खोल दो। यह नाद तुम्हारा नहीं ब्रह्मरन्ध्र से आई जीवनी से है। उसे अपने भीतर बिखरने दो। महसूस करो उस अनहद (अनाहत) नाद को।
यह तुम्हें अपने भीतर उपलब्ध शाश्वत आनन्द से साक्षात्कार करवाएगा। चलो खाली हो कर उस ओर।
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कौन है वो?
कौन है इस जग का चितेरा?
किसने सृजन किया है इसका ?
कौन इसे पाल रहा है?
सब की सब ये परिवर्तनशील वस्तुएं और जीव कहाँ से आ रहे हैं और वे कहाँ जा रहे हैं? सब आश्चर्य ही है परन्तु यही है ही।
इनमें से मुझे बहुत कुछ समझ में नहीं आया लेकिन इतना सा सहज में समझ में आया कि मैं उस ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, पुरुषोत्तम आदि जिस नाम से भी अपना संपूर्ण दे कर पुकारूँ वह पुकार उस *"एक"*, अद्वैत के पास पहुंचेगी ही।
लेकिन यह क्या अजीब हालात है कि जब तुम नहीं मिलते हो तो मैं तुम्हे खोजता फिरता हूँ और जब तुम मिल जाते हो तो मैं खुद ही खो जाता हूँ।
हाँ, जब तक नहीं मिलते हो मेरे पास अनगिनत सवाल और बेहिसाब शिकवे-शिकायत होते हैं लेकिन जैसे ही तुम्हे महसूस करता हूँ तो वे सब हवा में कपूर की तरह उड़ जाते हैं। पूछने वाला 'मैं' ही मिट जाता है। क्या तुम जादूगर हो जो मेरी हस्ती ही मिटा देते हो। आखिर कौन हो तुम?
कोई कहता है तुम मूरत में हो, दूसरा कहता है तुम निराकार हो तो कोई कुछ और कहता है। मैं इनसे संशययुक्त हो जाता हूँ।
ईश्वर को जिस-जिस रूप में जिस-जिस ने जाना या माना वे उस-उस रूप में उसे अपने भीतर स्थिर किये हुए है। वे सभी आस्तिक हैं। गीता कहती है कि जो नास्तिक है उसमें भी तो परमात्मा है। किसी के न मानने से सत्य में कोई परिवर्तन नहीं होता।
यह सब सोच-सोच कर अब मेरा मोह भंग हो गया है और मैं एक विश्वास से भर गया हूँ। मेरी अपनी ही मधुर स्मृतियाँ फिर लौट आई है। यह उस परमात्मा का ही प्रसाद है। बिना उत्तर मिले सब प्रश्न खो गए हैं पर वे मुझे शरणागति में छोड़ गए हैं।
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। श्रीमद्भगवद्गीता 18.73।।
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"तुम, मैं और सब"
बीज से वृक्ष बनने की प्रक्रिया के बीच अंकुरण खड़ा है। अंकुरण एक संभावना का अमलीजामा है। संभावना स्वयं एक परिकल्पना पर आधारित होती है। फिर बीज के लिये उपयुक्त वातावरण और संसाधनों के सम्यक् संयोजन का आधान करना है। अंकुरण सिर्फ एक बार की ही संभावना है, एक बार प्रस्फुटित अंकुर टूट गया तो न बीज बचेगा न वृक्ष मिलेगा इसलिये अंकुरण इस पूरी प्रकिया में सब से नाजुक अवस्था है। यह बीज की प्रसवपीड़ा और पौधे का अति लघु शैशव काल है। किसी ने नहीं देखा कि साल छह महिने बाद जो एक पौधा तैयार हुआ उसका बीज कहाँ गया। स्पष्ट है कि बीज जो वृक्ष के अस्तित्व में आने का कारण है वह नष्ट हो गया लेकिन वृक्ष इसके भौतिक स्वरूप का आधिभौतिक रूपान्तरण है। अंकुरण मध्यान्तर है लेकिन यह एक जड़ पदार्थ का जैविक रूपान्तरण है, चेतना का प्रादुर्भाव है। बीज से कोंपलों का प्रस्फुटन अंकुर के नाम का वृक्ष के नाम में नामान्तरण है। तना, शाखाएँ, पल्लव, पादप, फल पौधे का विकास और वृक्ष का पूर्ण विकास है। फलों में बीजों का जन्म प्रकृति का वैभव है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह मिटे हुए बीज का पुनर्निमाण है, बहुगुणन है। सृष्टिकर्ता का सर्वप्रथम संकल्प भी यही "एकोऽहं बहुश्यामः" है। इसलिये तुम, मैं और यह समस्त जगत, व्यष्टि से समष्टि तक ब्रह्म ही का निज स्वरूप है। "सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"
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आओ सभी आईना पहन लें
मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को
है सारा नगर देखता दूसरों को
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।
कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।
अब हर गले में, टँगा आईना हो
नकली मुखौटे चलो सब उतारें
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।
है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों
कभी सामने, कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।
जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा
पहचाने मिथ्या ओ निज रूप अपना
ना तो ये सच है और ना वो सच है
चर में अचर में जो मौजूद रहता
सृष्टि के पहले, प्रलय के भी आगे
वही ब्रह्म था और वही शेष रहता
चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ
जगें नीद से और सब को जगाएँ
छह शत्रु खुद में छिपे हैं जो बैठे
खुद के ही पौरुष से उनको हराएँ
ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन
ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें
सब की है और है ये सब के लिये
चलो आज मिल के हम सब सुधारें
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उद्गीत और उद्गात
स्वर नहीं है तार में
उसकी झंकार में है
जोश लहरों में नहीं
सागर के ज्वार में है,
रोशनी दीपक में नहीं
सुलगी ज्वाल में है
ध्वनि केवल वैखरी नहीं
इसका उद्गम प्राण है।
वह श्वांस में प्रश्वास में
आभास में प्रतिभास में
वह व्यष्टि में, समष्टि में
अणु अणु में, सृष्टि में,
सर्वव्यापी, सर्वहारा
सर्वज्ञाता, सर्वत्राता
उद्गीत भी वह प्राण भी वह
प्राण का अमुप्राण भी वह।
रामनारायण सोनी
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
प्रश्नोपनिषद्
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"अभ्यास कैसे करोगे?"
जो भी तुम स्वयं में स्थित होने के लिए करते हो, वही अभ्यास है। मन इसी वर्तमान पल में आ जाए हाँ इसी क्षण में तब वह अभ्यास है। भूतकाल की स्मृतियाँ छोड़ कर मन को वर्तमान क्षण में लाने के लिए जो प्रयास है, वही अभ्यास है। तो करना सिर्फ यह है कि इस अभी मन में कहीं कोई तर्क वितर्क तो नहीं, संकल्प-विकल्प की उठापटक में तो नहीं लगा है। यह निश्चय करो कि मन की कोई रूचि न हो।
पूर्ण सजगता से मन सब ओर से सिमट कर इसी पल से जुड़ जाए लेकिन ध्यान रखो कि मन कुछ देखने, सुनने, सूंघने, स्पर्श करने और कुछ समझने के लिए उदासीन हो जाए। जैसे ही इस वर्तमान क्षण में पहुँचे, समझो यही 'अभ्यास' है। परन्तु अपने अभीष्ट के प्रति जाग्रति रखे बगैर अभ्यास का कोई लाभ नहीं होगा।
मन जब अन्त:करण में उतर जाता है तब वह मन नहीं रहता। मन अपने अन्तःकरण की ऊपरी परत है। जैसे जैसे अपनी जागरूकता बढ़ती है वैसे वैसे अभ्यास बेहतर होता चला जाता है। वर्तमान क्षण में स्थिर होने के लिए, प्रयास अभ्यास है। हो सकता है इस प्रक्रिया में समय लगे। हम अक्सर कुछ थोड़ा सा सीखते हैं और छोड़ देते हैं, फिर कुछ समय बाद शुरू करते हैं।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
वह परब्रह्म ज्योतियों की भी ज्योति एवं माया से परे कहा जाता है । वह परमात्मा बोधस्वरुप, जानने के योग्य एवं तत्त्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सब के हृदय में विशेष रुप से स्थित है ।
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"कौन हूँ मैं"
दर्जी के पास कपड़ा सिलवाने जाते हैं। कपड़ा सलंग वन पीस होता है। वह पहले उसे काटता है गला, कॉलर, जेब, कफ आदि उसी एक पीस से ही। फिर कटे हुए टुकड़ो को योजना बद्ध तरीके से सिलता है। जब यह फिर एक यूनिट बनता है तो वह कपड़ा नहीं रहा कमीज, पैजामा आदि में से कुछ और नाम हो गया। यह नाम हमने दिया है अन्यथा तो वह सदा कपड़ा ही बना रहता। ध्यान से देखो यह कपड़ा भी एक नाम है वह मूल रूप से धागा है। यहाँ नामान्तरण और रूपान्तरण एक साथ घटित हुआ। यह धागा बुनने पर कपड़ा फिर सिलने पर कमीज कहलाने लगा। धागा इसमें पहले भी था और अब भी है।
धागे की तरह मैं भी अमर आत्मा हूँ। मैं शरीर में व्यक्त हुआ तो बालक आदमी इत्यादि के जाति रूप में जाना जाने लगा। फिर मेरा नामकरण हो गया। कपड़े को धागे के नाम से कोई नहीं बुलाता इसी तरह मुझे भी आत्मा के नाम से कोई नहीं बुलाता। असल में तो मैं वही अमर आत्मा हूँ। जगत के लिये मेरी आयडेन्टिटी मेरा नाम है। आज की उम्र तक मुझे सदैव इसी किसी नाम से पुकारा गया है इसीलिये तो मैं भूल ही गया है कि मैं अनाम, चिन्मय, शाश्वत आत्मा ही हूँ। किसी और कपड़े से बनी कोई और वस्तु में भी धागा रूप में अर्थात् आत्मस्वरूप में मैं ही हूँ। तात्विक रूप से मैं क्या हूँ? यह ब्रह्मवाक्य है। "तत्वमसि"।।
"मैं कौन हूँ?" जैसे प्रश्न तिरोहित हो गये और "मैं क्या हूँ?" की सीमा में आबद्ध हो गए हैं हम सभी। कमीज़ को कमीज़ भले ही कह लें पर उसके मूल में मौजूद धागे की तरह आत्मस्वरूप की अपरोक्षानुभूति गायब न हो जाय। गीता सुनने के बाद अन्त में अर्जुन की स्वीकारोक्ति यही थी "स्मृति लब्ध्वा" मतलब मेरी स्मृति लौट आई है।
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सर्वं खलु इदं ब्रह्म
क्या इतना जान लेना पर्याप्त नहीं है कि जब मैं जगत में जागता रहता हूँ तो "वैश्वानर" मौजूद है। सोता हूँ तो "तैजस" उपलब्ध है। जब जागने और सोने से परे सुषुप्ति में हूँ तो बस सामने साक्ष्य है तब "प्राज्ञ" उपस्थित है ही।
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ १ ॥“
विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है। इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है।
शांकरभाष्य के अनुसार "पर्यायेण त्रिस्थानत्वात्सोऽहमिति" अर्थात् इन तीनो स्थानों पर "मैं वही हूँ"।
बिजली के ट्रान्सफार्मर में एक तरफ हाई वोल्टेज और दूसरी तरफ लो वोल्टेज रहता है। दोनों तरफ वही की वही विद्युत प्रवाहित होती है। वोल्टेज का नामकरण अलग अलग है पर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा वही की वही है। दोनो तरफ अपने आप में वोल्टेज शुद्ध है। हिन्दी में इसे विभव कहते हैं। दोनों तरफ अलग अलग वोल्टेज एक ही संयंत्र में कैसे रहता है यह सिद्धान्त "गेल्वेनिक आइसोलेशन" कहलाता है। यह एकत्व भी है, प्रथकत्व भी है और शुद्धत्व भी है। कारिका यही कहती है।
क्या स्वयं से साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार नही है?
तो अवस्था कोई सी भी हो; ब्रह्म का होना निश्चित है। डंके की चोंट पर कहा जा सकता है कि सर्वत्र वही है। वह बहुरूपिया नहीं है बस फंक्शनालिटी में परिर्वतन है। जैसे एक बालक का पिता घर से दुकान पर जा कर सेठ हो जाता है। शाम को थिएटर में सिनेमा देखता है तो दर्शक हो जाता है। घर लौटने पर पिता लौट आता है। पर सब जगह वह आदमी तो है ही। अंतर समझा जा रहा है केवल फंक्शनालिटी के कारण।
मछली सागर को नहीं जानती क्योंकि सदैव उसके भीतर ही रहती है। बाहर निकलेगी तो जान जाएगी कि जहाँ वह रहती है वह सागर है। अगर सागर के बगैर जी पाती तो भी उसे ध्यान नहीं हो पाता कि सागर क्या होता है? पर सागर में लौट जाए तो जानती रहेगी कि वह सागर में है।
मैं ब्रह्म में ही हूँ इसलिए जान नहीं पाया कि मैं किस में हूँ। लेकिन ब्रह्म में से बाहर मैं कभी निकल नहीं सकता अन्यथा मछली की तरह मैं भी जान पाता कि ब्रह्म क्या है। मेरी आँख मुझे नहीं दिखती। यह सेल्फी कैमरे की तरह पलट कर देख नहीं सकती। बस छूने के अहसास से, प्रज्ञा के आभास से ही पता है कि यहाँ मेरी आँख है। जैसे प्रकाश भी दिखाता ही है वह स्वयं को कैसे देखे? व्यष्टि और समष्टि से बाहर हमारी कल्पना नहीं दौड़ सकती। इसका हम भाग हैं। पर यह भी ब्रह्म में प्रस्थित है। फिर कैसे जान पाएँ कि हम किस में है, यह सब किस में है? "तद्दूरे तद्वन्तिके।"
भेद स्वयं अभेद है। जब उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं तो द्वैत कैसा। उसमें मैं हूँ और मुझमें वह है तो अभेद है। जो मैं हूँ वही वह है यह कथ्य भी भेदपूर्ण है। ग्लास की काँच की दीवार के बीच में पानी भरा हो तो भेद है पर काँच की दीवार अगर पानी ही की हो और उसमें पानी भरा हो तो अभेद है।
*ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।*
*ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना* *॥ ४/२४ ॥*
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परात्मा जीव रूप में प्रकाशित होता है
माण्डूक्य उपनिषद् कारिका अद्वैत खण्ड मन्त्र ११:-
रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ३/११ ॥
आकाशवद् परमात्मा ही उनके आत्मा जीव रूप से प्रकाशित किया गया है।
वहीं कारिका के ४/६८ से कुछ और लगता है।
यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४/६८ ॥
जिस प्रकार स्वप्नमय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
एक जिज्ञासा है कि - क्या स्वप्नमय जीव ३/११ में कहे जीव से भिन्न है? उसका आगम और पर्यवसान है?
आगे चतुर्थ खण्ड में यह भी कहा गया है:-
यथा मायामयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४ /६९ ॥
अर्थात् जिस प्रकार मायामय जीव उत्पन्न होता भी है, वैसे ही वह मरता भी है। उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
तैत्तरीय उपनिषद् २/१ कहता है-
ब्रम्ह सत्य ज्ञान स्वरूप और अनन्त है। जो परम विशुद्ध आकाश में ही रहते हुए भी प्राणियों के हृदय रूप गुफा में छिपे हुए ब्रह्म हैं उसको जो जानता है वह विज्ञान स्वरूप ब्रह्म के साथ समस्त भोगों का अनुभव करता है। और आगे आता है-
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: शंभूतः।
निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मा से सर्व प्रथम आकाश तत्व उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल तत्व से पृथ्वी तत्व उत्पन्न हुआ। पृथ्वी से समस्त औषधियां, औषधियों से अन्न, अन्न से ही यह मनुष्य शरीर उत्पन्न हुआ। इसलिए यह शरीर अन्न रस मय है।
इससे स्पष्ट है कि तैत्तरीय श्रुति में जिन रसादि कोषों की व्याख्या की गई है आकाशवत् परमात्मा ही उनकी आत्मा जीवन रुप से प्रकाशित हुआ है।
इसे कुछ इस तरह समझें। बीज में एक पूरा का पूरा वृक्ष जड़, तना, शाखा, पत्तियों फूलों- फलों सहित छुपा हुआ है। ऐसा परोक्ष रूप से सही है। बीज की यात्रा वृक्ष की ओर होती है तब एक अव्यक्त, (प्रकृति) जिसे माया भी कहा गया है, उसके साथ चलती है जो उसे बीज से वृक्ष के रुप में रूपायित करती है। यदि बीज अपने आप में सक्षम होता तो वह स्वयं अपने आपको वृक्ष बना लेता लेकिन उस निर्जीव से जीवित वृक्ष के रुपायतन में सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो जन्म होना वृक्ष का लग रहा है परन्तु वह जो अव्यक्त वहाँ पहले से ही मौजूद थी और तब अव्यक्त वह जीव वृक्ष के साथ व्यक्त हुअा है और हम कह बैठते हैं कि वृक्ष उत्पन्न हुआ है। वस्तुतः तो जो अजन्मा था वह अजन्मा ही रहा। जिस बीज रूपी भौतिक पदार्थ में जीवन संचरित हुआ वह वृक्ष की उम्र पूरी होने पर उसमें जो व्यक्त हुआ था वह पुनः अव्यक्त हो गया। इसका अर्थ लगता यही है कि वृक्ष पैदा हुआ फिर मर गया हमने उसी के साथ यह भी समझ लिया कि जो व्यक्त था वह मर गया। अपितु वृक्ष जीवन के साथ जो जीव चला वह तो अजन्मा ही था। इसलिये प्रकट में कहा यह जाता है कि उसमें जो जीव था वह मर गया।
यहाँ तीन चीजें महत्वपूर्ण है एक तो यह कि जो उत्पन्न हुआ वह विकार है याने परिवर्तन के दौर से गुजरा है इसलिए जन्म और मृत्यु का घटित होना जान पड़ा। विकार केवल अनित्य में ही होता है। दूसरा यह कि वह जो अजन्मा वृक्ष के सम्पूर्ण जीवन में व्यक्त होता हुआ साथ प्रतीत होता रहा। वह भी वृक्ष के संग जीवित था। लेकिन कारिका का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:-
यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४/६८ ॥
स्वप्नमय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
उपरोक्त उदाहरण में हमें समझ में आ सकता है कि वृक्ष जो जीवित लगता है वह अनित्य है, या कहें कि वह स्वप्न है, इसमें जीव जन्मता और मरता लगता है पर वैसा नहीं है। वास्तव में वह तो जन्मा ही नहीं था। इसलिए हमें तो वृक्ष का जीना - मरना, जीव का जीना- मरना लगा।
अगले मन्त्र में यह दुविधा समाप्त हो जाती है।
न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥ ४/७१ ॥
तात्पर्य यह है कि कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्म की संभावना ही नहीं है। उत्तम सत्य तो यही है कि यहाँ किसी जीव की उत्पत्ति ही नहीं होती।
उक्त रूपक से (तीसरा) यह साफ लगता है कि अव्यक्त को व्यक्त होने का जो आश्रय वृक्ष है उसकी आवश्यकता हुई। चूँकि हमें तो आश्रय ही दिखाई दिया तो हमने समस्त घटना क्रम को जैसे तो तैसा समझ लिया कि वृक्ष जो जीव था वह उत्पन्न हुआ और मर गया। परन्तु जीव न तो मरता है अौर न जन्म ही लेता है।
गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि-
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।२/२८।।
हे भारत समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है।
अव्यक्त यानी न दीखना पर दिखाई देना ही जिनकी आदि है अर्थात् जन्मसे पहले भी ये थे पर सब अदृश्य थे। उत्पन्न होकर मरण से पहले तक; बीच में व्यक्त हैं, दृश्य हैं। और पुनः अव्यक्तनिधन हैं अदृश्य होना ही जिनका निधन यानी मरण है उनको अव्यक्तनिधन कहते हैं अभिप्राय यह कि मरनेके बाद भी ये सब अदृश्य हो ही जाते हैं। वस्तुतः "ममैवांशो जीव लोके" यह जीव वास्तव में न तो पैदा होता है और न ही इसका पर्यवसान है, यही परम सत्य है।
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*सबका सिरजन हारा*
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
चौदह भुवन अकासे तारे
अण्ड कटाहे टाँगे
माया जीव जगत जोड़े तब
शुन पर पेर पसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
घट घट भीतर घट के बाहर
कन कन दिया सँवारा
अलख निरंजन रूप अरूपा
नेति नेति सब बेद उचारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु
तू सबका सिरजन हारा।।
कुल प्रपञ्च की पाँत सवाँरी
पिंजर प्राण पिरोई माला
कैसी अदभुत धमन फुलाई
हिरदै सांस सकारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
ईड़ा पिंगला और सुसमना
ताँत बनी तंबूरा
कुंडल से ले सहस कँवल तक
चक्कर सात सिंगारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
पाँच अगन की जोत जलाई
तिनमें आप समाना
रग रग में तू रमता रहता
बन कर पालनहारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
उन्निस मुख से खावै पीवै
निस दिन भरे उसासा
जीव जतग में पचि पचि मरि है
धापै नहीं बिचारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
जागे सोते सपना देखे
नींद लगी अति भारी
बिना सपन की नीद सिरानी
आणंद का झनकारा
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
माया बैठी इन्द्रजाल बुन
चहुँ दिसि दिखे कुहासा
छिन छिन नटी नचावै सिगरे
कैसा अजब नजारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
चार चतुर चौपाल बिठाए
इक ते इक्क जुड़ाने
मैं मैं करता जीव पुरातन
जीते जी क्यूँ हारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
भूला तन और भूला मन भी
अकल अबोली साधी
चेतन चित प्रभु लागी तो फिर
जीव लखा भिनुसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु
तू सबका सिरजन हारा।।
लगन लगी जब जीव पिछाणा
कर अरदास पुकारा जी
अनहद नाद बजी तूरा की
अन्तरि फफक उजारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
माया छूटै बन्धन टूटै
टूटै जम की फाँसी
तीन छलाँगा दूर तुरीया
पूरण ब्रह्म प्रसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
रामनारायण सोनी
जीवनं सर्व भूतेषु। तेजश्चास्मि विभावसौ गीता९/७
अण्ड कटाह=ब्रह्माण्ड
रामचरित चरित मानस बाल काण्ड
तूरा= तुरीय
चार चतुर=अन्तःकरण चतुष्टय
नटी माया के लिये प्रयुक्त--रामचरित मानस
उन्नीस मुख = १० इन्दियाँ, ५ प्राण, ४ अन्तःकरण
पाँच अगन= ५ अग्नियाँ (शरीर में स्थित)
अहं वैश्वानरो भूत्वा...पचति = मैं अग्नि में हो कर अन्न को पचाता हूँ। गीता।
ज्योतिषां अपि तज्ज्योति इंद्रियों में उनकी सामर्थ का कारण (कठोपनिषद्)
प्रपञ्च= पंचमहाभूत
जागे सोते सपना देखे
नींद लगी अति भारी
बिना सपन की नीद सिरानी
आणंद का झनकारा
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति, समाधि
क्रमिक अवस्था(माण्डूक्योपनिषद्)
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क्षर और अक्षर में उतना ही भेद है जितना इंजिन और वाष्प में रेडियो और विद्युत् में। संक्षेप में सम्पूर्ण दृश्यमान जड़ जगत् क्षर अधिभूत है। अध्यात्म दृष्टि से क्षर उपाधियाँ हैं शरीर इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। पुरुष अधिदैव है। पुरुष का अर्थ है पुरी में शयन करने वाला अर्थात् देह में वास करने वाला। वेदान्तशास्त्र के अनुसार प्रत्येक इन्द्रिय मन और बुद्धि का अधिष्ठाता देवता है उनमें इन उपाधियों के स्वविषय ग्रहण करने की सार्मथ्य है। समष्टि की दृष्टि से शास्त्रीय भाषा में इसे हिरण्यगर्भ कहते हैं।इस देह में अधियज्ञ मैं हूँ वेदों के अनुसार देवताओं के उद्देश्य से अग्नि में आहुति दी जाने की क्रिया यज्ञ कहलाती है। अध्यात्म (व्यक्ति) की दृष्टि से यज्ञ का अर्थ है विषय भावनाएं एवं विचारों का ग्रहण। बाह्य यज्ञ के समान यहाँ भी जब विषय रूपी आहुतियाँ इन्द्रियरूपी अग्नि में अर्पण की जाती हैं तब इन्द्रियों का अधिष्ठाता देवता (ग्रहण सार्मथ्य) प्रसन्न होता है जिसके अनुग्रह स्वरूप हमें फल प्राप्त होकर अर्थात् तत्सम्बन्धित विषय का ज्ञान होता है। इस यज्ञ का सम्पादन चैतन्य आत्मा की उपस्थिति के बिना नहीं हो सकता। अत वही देह में अधियज्ञ कहलाता है।भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा यहाँ दी गयी परिभाषाओं का सूक्ष्म अभिप्राय या लक्ष्यार्थ यह है कि ब्रह्म ही एकमात्र पारमार्थिक सत्य है और शेष सब कुछ उस पर भ्रान्तिजन्य अध्यास है।
हजारों नहीं असख्य प्रश्नों का एक मात्र उत्तर वह परमात्मा सर्वस्व का कारण, नियन्ता, कर्ता, भर्ता, हर्ता है।
"तुम माँ के पेट में थे नौ महीने तक, कोई दुकान तो चलाते नहीं थे, फिर भी जिए। हाथ—पैर भी न थे कि भोजन कर लो, फिर भी जिए। श्वास लेने का भी उपाय न था, फिर भी जिए। नौ महीने माँ के पेट में तुम थे, कैसे जिए?
तुम्हारी मर्जी क्या थी?
किसकी मर्जी से जिए?
फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ, जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया, किसकी मर्जी से?
अभी दूध को पीनेवाला आने ही वाला है कि दूध तैयार है, किसकी मर्जी से?
गर्भ से बाहर होते ही तुमने कभी इसके पहले साँस नहीं ली थी माँ के पेट में तो माँ की साँस से ही काम चलता था—लेकिन जैसे ही तुम्हें माँ से बाहर होने का अवसर आया, तत्क्षण तुमने साँस ली, किसने सिखाया?
पहले कभी साँस ली नहीं थी, किसी पाठशाला में गए नहीं थे, किसने सिखाया कैसे साँस लो? किसकी मर्जी से?
फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को जो तुम पीते हो, और तुम्हारे भोजन को?
कौन उसे हड्डी—मांस—मज्जा में बदलता है?
किसने तुम्हें जीवन की सारी प्रक्रियाएँ दी हैं?
कौन जब तुम थक जाते हो तुम्हें सुला देता है?
और कौन जब तुम्हारी नींद पूरी हो जाती है तुम्हें उठा देता है?
कौन चलाता है इन चाँद—सूर्यों को?
कौन इन वृक्षों को हरा रखता है?
कौन खिलाता है फूल अनंत—अनंत रंगों के और गंधों के?
इतने विराट ब्रह्माण्ड का आयोजन जिस स्रोत से चल रहा है, एक तुम्हारी छोटी—सी जिंदगी उसके सहारे न चल सकेगी?
थोड़ा सोचो, थोड़ा ध्यान करो। अगर इस विराट के आयोजन को तुम चलते हुए देख रहे हो, कहीं तो कोई व्यवधान नहीं है, सब सुंदर चल रहा है, सुंदरतम चल रहा है; सब बेझिझक चल रहा है। उसके कारण चल रहा है।
तुम छोटे से अंश हो इस जगत के, तुम्हें यह भ्रांति कब से आ गयी कि मुझे स्वयं को अलग से चलाना पड़ेगा। मुझे अपना जिम्मा अपने ऊपर लेना पड़ेगा।
इसी भ्रांति में तुमने अपने जीवन के सारे कष्ट, असफलताएँ और विषाद पैदा कर लिए हैं।
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"समस्त तेजोमयं विश्वम्"
तुम्हारे घर के दरवाजे में आग है, जो कपड़े पहन कर बैठे हो उसमें आग है, किताबों में आग है, तेल में आग है, एल.पी.जी. में आग है। यह आग तुम्हे दिखाई नहीं देती अर्थात् अप्रकट है जैसे ही उपयुक्त घर्षण अथवा जब दूसरी आग आ कर मिलती है यह प्रकट हो जाती है। आई हुई आग लौट भी जाए तो यह आग अपने आश्रय को जलाती रहती है। तात्विक रूप से यह आग ही पंचतत्वो में से एक 'अग्नि' तत्व है। आपको आश्चर्य होगा कि संसार के हर पदार्थ में आग है। विज्ञान अर्थात् पदार्थ विज्ञान ने इसे सिद्ध किया है। आग की उपस्थिति को ताप के रूप में थर्मामीटर से नापा जा सकता है जिसे तापक्रम या टेम्प्रेचर कहते हैं। एन टी पी याने नार्मल टेम्प्रेचर एण्ड प्रेशर। नार्मल टेम्प्रेचर मतलब वातावरण का तापक्रम। जितना अधिक ताप उतनी अधिक मात्रा में आग। फ्रिज इसी तरह की आग को उस वस्तु से बाहर निकाल कर फेंकता है। परमताप -273 डिग्री होता है। फिर भी परमाणु की ऊर्जा विद्यमान रहती ही है। हमारे शरीर के कण कण में भी यही आग है जो अग्नि तत्व है।
खैर, अध्यात्म में इस 'अग्नि' को देव कहते हैं। इस देवता में ज्वलन क्षमता भी स्वयं की नहीं है। वह ब्रह्म ही है। उक्त रूपकों के माध्यम से स्पष्ट है कि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'। मैं ही नहीं संपूर्ण जगत में ब्रह्म व्याप्त है। तो मैं भी कहूँ कि "अहं ब्रह्मास्मि"। तुम भी यही कहो। अपने आत्मदीप की परमज्योति का आभास करो।
'ईशावास्यमिदं सर्वम्"
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माण्डूक्योपनिषद्
"ओमित्येतदक्षरमिद्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकारईव ॥ 1 ॥"
"मैं" को आधार ले कर एक रूपक देखें। समझने के किए "मैं" की जगह आप स्वयं हो कर देखें। फिर इसी मैं को ब्रह्म जाने। वह कैसे ?
एक बन्द कमरे में दीवार पर लगे आइने के सामने मैं खड़ा था। मुझे आभास होने लगा कि जैसे इस कमरे में "मैं" तो हूँ ही परन्तु मैं "एक और" हूँ। मैंने सुन रखा था कि मेरे जैसा इस जगत में केवल मैं ही हूँ कोई दूसरा नहीं पर यहाँ बहुत बड़ा कन्फ्यूजन है कि हूबहू मेरे जैसा यहाँ कोई और भी है। वैसे ही हाथ पैर, वैसे ही कपड़े वैसे ही सांस लेता हुआ वह बिम्ब दिखाई दे रहा है। मैंने अपना एक हाथ पानी में भिंगो लिया बिम्ब में भी एक हाथ गीला ही दिखाई पड़ रहा था। मैंने दूसरे हाथ से आईने के बिम्ब के गीले हाथ का गीलापन छुआ पर आईना तो सूखा ही था। वहाँ गीलापन नहीं गीलेपन का आभास था।
मैं हैरान था कि कर मैं रहा हूँ और हो वहाँ रहा है। मैंने दूसरा हाथ उठाया बिम्ब में भी वही हो रहा है। थोड़ी देर मैनें रुक कर देखा कि अगर मैं कुछ नहीं करता हूँ; शायद बिम्ब अपने आप कुछ करे। पर कुछ नहीं हुआ। बड़ी अजीब बात है सारी मेहनत मेरी पर आइने के भीतर खड़ा वह बिम्ब शायद यही समझ रहा है कि सब वही कर रहा है।
यह आईना तो माया का इन्द्रजाल है जो मेरे एक और होने का आभास करा रही है। आईना हटते ही बिम्ब चला जावेगा अर्थात् मायाजाल के हटते ही केवल "मैं" रहूँगा आभास भी समाप्त हो जावेगा।
दूसरी स्थिति
अचानक से आइने चार टुकड़े हो जाते हैं। मैं कमरे में अकेला था अब आईने के चारों टुकडों में फिर एक एक कर के चार और हो गया। हैरानगी और बड़ी हो गई। सभी टुकडों में "मैं" ही भास रहा हूँ। हर टुकड़े का बिम्ब अपने आपको अलग समझ रहा है पर उन सभी में समरूप से ही भास रहा हूँ। मैं वास्तव में दूसरा नहीं हूँ इसलिए मैं *अद्वैत* हूँ। यह कमरा मैंने ही बनाया है। आईना भी तो मैने ही लगाया है। यहाँ चेतना केवल मैं हूँ शेष सभी अचेतन है, जड़ है। मेरे लगाए आइने से ही वहाँ बिम्ब है, आभास है, चिदाभास है।
मानस कहती है- अखिल बिस्व यह मोर उपाया।..
जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोर सहाया।
जितने बिम्ब हैं सबके सब सत्य लग रहे हैं पर वास्तव में "सत्य" वे नहीं मैं हूँ। मेरे होने से ही वे सब हैं।
यह रूपक मैंन केवल समझने के लिए गढ़ा है। अब बुधि जन इस "मैं" में उस अनन्त, अव्यक्त अनादि "आत्मा" को आरोपित कर के देखें।
यह स्पष्ट हो गया कि मैं "सत्य" हूँ और बिम्ब "आभास" है। यह करामात आईने का है कि वहाँ मैं ही भास रहा हूँ। यह चिदाभास है। आईने के हटने पर एक केवल एक इतिहास शेष होगा, मैं फिर भी उसका साक्षी बना रहूँगा। यह *काल* का प्रथम स्वरूप है "भूत"। मैं देख रहा हूँ- यह काल का दूसरा स्वरूप है "भव" अर्थात् वर्तमान। यहाँ मैं भी हूँ और बिम्ब भी है, आभास भी है। और काल का तीसरा स्वरूप है "भविष्यद्" अर्थात् वह जिसे मैं देखने वाला "नित्य" रहूँगा ही।
कमरा ही जगत है। इसमें मैं भी हूँ और यह आभास भी है। मैं ही यहाँ कारण हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका विपर्यय केवल "मैं" ही हूँ। त्रिकाल भी मैं ही हूँ जिसको मैं ही जानता हूँ। त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ। इस कमरे के, आईने के और आभास के पूर्व मैं ही था। इन सबके न होने पर भी मैं रहूँगा। इस लिए त्रिकालातीत भी मैं ही हूँ।
कहने का तात्पर्य है, मैं ही आत्मा हूँ, आत्मैव ब्रह्म।
मेरा वाचक "प्रणव" है। मैं ही आत्मा हूँ।
ब्रह्म मैं ही हूँ। तत्व मैं ही हूँ। शिव मैं ही हूँ।
मैं ब्रह्म हूँ, मैं तत्व हूँ, मैं शिव हूँ..
"सर्वं खलु इदं ब्रह्म।"
।।हरिः ॐ तत्सत्।।
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*अमृतस्य पुत्रा वयं, सबलं सदयं नो हृदयम् l*
*गतमितिहासं पुनरुन्नेतुं, युवसङ्घटनं नवमिह कर्तुम् ॥*
*“वयम् अमृतस्य पुत्राः”*
यह श्वेताश्वर उपनिषद में आता है। तात्पर्य यह कि हम अमृत-पुत्र हैं। मृत्यु से रहित अविनाशी ईश्वर की संतान हैं। संतान में पिता के गुण होना स्वाभाविक है इसलिए हम मृत्यु से रहित हैं। फिर मनुज मरता क्यूँ है?
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या हम सच में ही ऐसा महसूस करते हैं ? यदि हम अच्छी तरह समझ लें कि हम अमृत-पुत्र हैं तो हमें मृत्यु से भय क्यों लगता है?
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं : जातस्य हि ध्रुवं मृत्यु। जो जन्मा है उसकी मृत्यु अवश्य है। लेकिन जिस को हम मरना मानते हैं वह जीवन अर्थात् शरीर तो प्राकृतिक रूप से भौतिक माता पिता के द्वारा पैदा होता है। जो पैदा नहीं हुआ वह कभी मर नहीं सकता वह अविनश्वर है। इसलिये
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2.20।।
जो भौतिक शरीर है वह मरणधर्मा भौतिक माता पिता की संतान है इसमें जो अमृत पुत्र है वह है
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
आत्मा जन्म मरण से रहित है।
वेद का यह महामंत्र - 'वयम् अमृतस्य पुत्राः' शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा को सम्बोधित करते हुए कहा गया है। अष्टावक्र गीता में महाराज जनक से अष्टावक्र कहते हैं :
यदि देहं पृथक्कृत्य - चिति विश्राम्य तिष्ठसि
धुनैव सुखी शांत: - बन्धमुक्तो भविष्यसि
अर्थात यदि स्वयं को देह से अलग कर के देखोगे और चित को स्थिर करके आत्मा में स्थित हो जाओगे तो अभी सुखी और शांत हो जाओगे और बंधन मुक्त हो कर मोक्ष को प्राप्त कर लोगे। बंधन रहित होना ‘’निर्बन्ध है, निर्बन्ध मुक्ति है और मुक्ति अमृतत्व है।
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"बूँद की रग रग में पानी ही पानी है" इस बात को समझना आसान है बनिस्बत इसके कि पानी ही से बूँद बनी है या यहाँ पानी का वर्तमान नाम ही बूँद है। पानी से निकली बूँद जब पानी में मिल जाती है तो सबसे पहले उसकी संज्ञा "बूँद" ही समाप्त होती है पर तात्विक रूप से बूँद जो पानी पहले भी था अौर बाद में पानी नहीं बना रहा बल्कि पानी का मूल स्वरूप अपरिवर्तनीय है, वह केवल अभिव्यक्ति और बदली हुई संज्ञा पा गया था। बूँद खुद अपने आप को बूँद समझले तो भी वह पानी ही है। न माने तो भी पानी ही है। बूँद सदा नहीं है पर पानी सदा है। सागर भी हम ही कह रहे है परन्तु सागर भी बिना पानी कहाँ हो सकता है। वस्तुतः बूँद भी पानी है, सागर भी पानी है पानी में बूँद है, पानी में सागर है। पानी बिना न सागर है न बूँद है। बस यहाँ वहाँ पानी ही पानी है। पानी में ही बूँद भी है सागर भी है। सब ओत प्रोत है। अस्मिता पानी है अस्तित्व बूँद है, सागर है। अस्तित्व अवस्था है, अस्मिता आधार है अौर मूल है, मौलिक है। हमें दिखाई देने वाली वस्तु अस्तित्व है। अनस्मिता जो हम जाने नहीं है, तत्व वही है। बाजार में खरीदी हुई अंगूठी आभूषण है, हम उसे सोना समझ कर घर नहीं लाऐ हैं उसका वर्त्तमान "अँगूठी" के रूप में अस्तित्व बोध है। जब इसे तोड़ कर कोई अन्य आभूषण बनाया जावेगा तब अस्तित्व बोध ही रूपान्तरित होगा पर अस्मिता तो सोने की सदा रहेगी।
यही तुरीय अवस्था है। जब मैं का चिदाभास भी समाप्त हो जाता है। वास्तव में तो तुरीय शरीर की अक्स्था नहीं है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों का आभास जाग्रत अौर स्वप्न तक ही रहता है जैसे बूँद का अौर सागर का आभास होता है। इनकी विस्मृति वास्तव में तो उनका तात्विक रुप से घनीभूत होना है। इस अवस्था के आगे मन अमन हो जाता है और साक्षी वहाँ उपस्थित रहता है। उसे सुषुप्ति की अवस्था के रूप में जानते हैं। जैसे जल वाष्पीभूत हो कर अस्मिता खोता है वैसे ही जीवात्मा का मैं खो जाता है। फिर न तो स्थूल और सूक्ष्म शरीर रहता है और न अन्तःकरण के चारों वर्ग का ही बोध रहता है। माडूक्यू उपनिषद् में इसे तीसरी छलाँग बताया गया। यह ओंकार का चतुर्थ पाद है।
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अन्तर्यात्रा -
माण्डूक्य उपनिषद् की दृष्टि में
हमें लोग अक्सर उपदेश करते रहते हैं कि बाहर नहीं भीतर की ओर भी देखो। बड़ा अचरज लगता है कि क्या आँख भीतर की तरफ पलट सकती है? भीतर तो हाड़, मांस, खून और भी न जाने क्या क्या भरा है। एक सर्जन इसे काट पीट कर देखता है तो यही सब दिखता है। फिर वे लोग भीतर क्या देखने के लिए कहते हैं। यहाँ पूर्व संकेत किया जाता है कि ऐसा कुछ भीतर भरा पड़ा है जिसके बगैर हम एक क्षण मात्र भी जी नहीं सकते पर उनके बारे में हमने कभी भी व्यवस्थित रूप से जाना ही नहीं। वेदों उपनिषदों, रामायण, गीता आदि में इनका विस्तार मिलता है। आज की चर्चा माण्डूक्य उपनिषद् पर आधारित है।
समग्रता से देखें तो शरीर की दो अवस्थाएँ हैं। पहली जागना और दूसरी सोना। इसमें और आगे देखें तो सोने की दो अवस्थाएँ है सोते में स्वप्न देखना और दूसरी बिना स्वप्न की नींद होना। इसे उपनिषद में क्रमशः जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति कहा है।
यहाँ जाग्रत का तात्पर्य जागने से ही नहीं है इसका तात्पर्य यह है कि जागते हुए हम दुनिया में चर, अचर, पेड़, पहाड़, धरती, आकाश, सूरज चाँद- तारे आदि आदि देखते हैं और इनके विषय में अनुभव करते है। यह सब जागते हुए में अपनी पाँचों इन्द्रियों के माध्यम से होता है। पाँच कर्मेन्द्रियों से संसार में अपना अपना कर्म करते हैं। कोई भी प्राणी कर्म किये बगैर नहीं रह सकता। प्रत्येक कर्म का कोई न कोइ फल प्राप्त होता ही है। इन्द्रियो के माध्यम से हम उन उनके विषयों का भोग करते हैं, जैसे जीभ से हम स्वाद लेते हैं, आँख से देखते हैं आदि आदि।
स्वप्न से तात्पर्य यह है कि जब हम सो जाते है तब उसकी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती है, बाहर की दुनिया से वे कट सी जाती है दूसरे शब्दों में कहें तो वे अक्रियाशील हो जाती हैं लेकिन वे बिल्कुल निष्क्रिय नहीं होती। अतः सो जाने पर आदमी स्वप्न देख सकता है और उसे उस समय सम्पूर्ण शरीर का कोई भान नहीं होता।
उपनिषद् कहता है स्वप्नावस्था में इन्द्रियाँ बाहर का जगत अनुभव नहीं करती अर्थात् वे बहिर्मुखी नहीं रह जाती परन्तु स्वप्न में अपने भीतर ही भीतर वैसा ही अनुभव करती कराती है जैसा वह जागते हुए बाहर से अनुभव लेती है। जैसे स्वप्न में सिर कटने पर वैसा ही कष्ट अनुभव होता है जैसे जागते में होता है।
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वैदिक मनोविज्ञान
यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति |दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१
भावार्थ:
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर जाने वाला प्रकाशों का भी प्रकाश , वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।
१.जाग्रत अवस्था में.....
घोड़े को चरागाह में चरने के लिए छोड़ा जाता है तब जमीन में एक खूँटा गाड़ कर लम्बी सी रस्सी से एक पाँव से बाँध दी जाती है। रस्सी चाहे जितनी लम्बी हो खूँटे से बँधी रहती है। रस्सी एक परिधि का निर्माण करती है जिसके बाहर घोड़ा नहीं जा सकता। घोड़ा दिशा-दिशा में विचरण करता हुआ चरता रहता है। जहाँ हरी-भरी घास उसे भाती है, बस वहीं चरने लगता है लेकिन खूँटे से बँधे रह कर ही। कभी वह इस इच्छा में दौड़ता है कि यहाँ से अच्छी घास कहीं और है और वह उसकी तृष्णा बन जाती है। बस दौड़ना शुरू। एक दौड़ और फिर कई दौड़। लेकिन यह भी विचित्रता है कि वह थकता ही नहीं। यह सच है कि जहाँ जहाँ वह जाता है अपने संकल्प से ही जाता है। पूरा घास का मैदान उसका अपना क्षेत्र है वह वहाँ जावेगा ही। यही उसकी नियति है। बिना चरे वह रह नहीं सकता। बिना चले भी वह नहीं रह सकता।
हमारा मन भी इसी तरह हमारे शरीर से ऐसा ही बँधा रहता है। इसकी रस्सी असीमित है, इसलिए दौड़ भी असीमित है। लेकिन दो बातें तो तयशुदा हैं। एक तो यह कि शरीर रूपी खूँटे से यह बँधा है दूसरा यह कि चाहे जितनी बड़ी परिधि हो अपने संकल्प से नियंत्रण में रह सकता है। सारे फसाद की जड़ है- "तृष्णा" जिसके कारण यहाँ से बेहतर के लिए यह अन्य जगह के लिए दौड़ता है। यही विकल्प भी है।
वस्तुतः मन के प्रधान गुण संकल्प-विकल्प ही है। संकल्प "इच्छाशक्ति" है तो विकल्प श्रेष्ठ की "खोज" है। अब यह समझ में आ गया होगा कि आज जहाँ हम हैं वहाँ अपने मन के कारण, जो वर्तमान में घट रहा है वह अपने मन के कारण और जहाँ हम पहुँचना चाहेंगे वह अपने मन के कारण अर्थात् विकल्प से ही अपवर्तित होगा। कई विकल्पों में से एक या कुछेक विकल्प आपके संकल्प बन जाते हैं और आपके समूचे व्यक्तित्व का निर्माण कर डालते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपके किन किन संकल्पों से आप अपनी जीवन यात्रा में यहाँ तक आ पहुंचे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम कोई वाहन चलाते हैं तब स्टीयरिंग के हजारों विकल्पों में से चुन चुन कर अपने निर्दिष्ट रास्ते पर गमन कर पाते हो।
किसी शायर ने कह दिया है "तोरा मन दर्पण कहलाए"। सच ही है- जो आज आप दीख रहे है वह अपने मन के दर्पण में से ही तो प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अपने मन के शुभ संकल्प के बिना उत्तम चरित्र का निर्माण कर पाया हो। इसलिए वैदिक-प्रार्थना में आता है-"तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"
सोता हुआ आदमी मन पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। हालांकि सोता हुआ आदमी सपने देख सकता है। आदमी तो सोता है पर उसका मन दूर दूर तक घूम आता है। लौट कर फिर शरीर से बँध जाता है।
"जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक जाता है उसी प्रकार सोते हुए मनुष्य का मन भी दूर-दूर तक जाता है।"
सामान्य अर्थों के प्रकाश में तो यह इस तरह समझा जा सकता है लेकिन मांडूक्य उपनिषद् के प्रकाश में इसे दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
छान्दोग्य उपनिषद् ६/८/१-२
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हम सब कौन हैं?
हमारी जीवन यात्रा देह से शुरू होती है और देह पर ही समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि एक फुट भर का आदमी; पाँच सात पौंड का आदमी अपने शरीर को पालते - पोसते जीवन भर उसके लिये करता ही रहता है और पार्थिव से चल कर वापस पार्थिव तक पहुँच जाता है। यदि यह केवल ऐसा ही होता तो सब के सब एक से ही होते। हम सब एक दूसरे से नितान्त अलग क्यों हैं? हम सब में कुछ कुछ मिलता जुलता है और कुछ कुछ एक दम अलग। जो मिलता जुलता है वह है- शरीर सप्त धातुओं से मिल कर बना है। सामान्यतः शरीर के अवयव जो दिखाई देते हैं; जैसे आँख, नाक, कान, हाथ,पैर आदि सबके हैं। सब में काम करने खाने पीने सोने जागने की, व्यवहार करने की क्षमता होती है। अन्तर केवल मात्रा, गुणवत्ता, शक्ति आदि का होता है।
वेदान्त इसे व्यवस्थित रूप से पारिभाषित करता है। सबमें स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर आदि; ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि तात्विक रूप से मौजूद है। सभी जन्मते हैं और अन्त में अवसान को उपलब्ध हो जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे २४ तत्व जड़ अर्थात् बेजान बताए हैं। ! ये सभी एक कम्पलीट मशीन की तरह असेम्बल्ड हैं और बस पाॅवर मिलते ही यह मशीन अपने कार्य करने में सक्षम हो जाएगी। अभी यह असेम्बली पार्थिव ही है। जन्मते समय छोटी थी और क्रमशः कम ज्यादा होती रहती है। केवल एक तत्व चेतन है जिससे यह जीवित है। पार्थिव में यही संयुक्त होता है और अन्त में जीवात्मा विलग हो जाता है। शरीर अवस्थाओं से गुजरता है लेकिन चेतन अविच्छिन्न है, अपरिवर्तनीय है, अखण्ड है, अतुल्य है, उसके जैसा केवल वही है। चेतना उसका ही प्रभाव है, चेतना उसके कारण ही है, हम उसे ही जीवन तत्व कहते हैं। वही परमात्म सत्ता मुझमें है, तुम में है, उन में है, सब में हैं। सब के सब अपने आप में अलग भले ही दीख रहे हो पर अगर सब में तात्विक रूप से कॉमन कुछ है तो केवल वह आत्मा है। आत्मा ही ब्रह्म है। ब्रह्म है वही सत्य है, वही नित्य है।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥२२॥
इस देह में स्थित आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है । वही साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण पोषण करनेवाला होने से भर्ता, जीव रुप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा कहा गया है ।
जगत अथात् इस सृष्टि के पू;र्व भी वही था, अभी वर्तमान है, सदैव वही रहेगा भी। वह इन तीनों कालों के परे भी है। काल से अबाधित है।
ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १॥
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ माण्डूक्य उपनिषद्/२॥
“अहम आत्मा गुडाकेश सर्व भूताशय स्थितः ” अर्थात् ; हे अर्जुन ! मैं सभी प्राणियों में स्थित आत्मा हूँ। आत्मा ही परमात्मा है ,यह भगवान का उपदेश है। आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग सत्ता नहीं है। यदि तुम “आत्मस्मरण ” रखते हैं ,तो सभी के अंदर “एक” परमात्मा की अनुभूति होगी ।एकत्व की अनुभूति होगी।
वास्तव में तो तुम ही ब्रह्म हो। तुम्हारा जो नाम है वह इस शरीर की संज्ञा है। जो तुम असल में हो वह अनाम ही हो। आत्मा अमूर्त है। आत्मा ब्रह्म है। अद्वैत है। इसलिये तात्विक रूप से सब के सब अभिन्न है।
“अयं आत्मा ब्रह्म ” -यह आत्मा ही परमात्मा है।।उपनिषद्।।
"ज्ञानात् एव तू कैवल्यं" इस बात को समझ लेना कैवल्य का जान लेना है और
ही तुरीय है, यही परमात्म सत्ता का बोध है।
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"स्वप्न और उसकी प्रतीति"
'स्वप्न' हम सभी का अनुभव है। यह मानव जीवन की एक विलक्षण और अजीब घटना है जो सबके लिए जिज्ञासा और कौतूहल का विषय रहा है। हम सो जाते हैं, तब हमें नाम रूप आदि का भान नहीं रहता। ऐसे में ' स्वप्न' आता है और वह जागने पर हमें यथा रूप स्मरण हो आता है। कभी-कभी स्वप्न आधे अधूरे ही याद रह पाते हैं। वहाँ कौन था जो जाग रहा था, जो स्वप्न देख रहा था? मेरा शरीर तो निश्चेष्ट था। मेरी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट थी लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि वे स्वप्न में भी जाग्रत अवस्था की तरह ही आभास कर रही थी। कोई शस्त्र से प्रहार करता है तो आघात का अहसास होता है लेकिन अचकचा कर नींद टूटने पर ऐसा कुछ नहीं पाते हैं। कभी-कभी स्वप्न की घटना की प्रतिक्रिया में आदमी नींद में ही बड़बड़ाने लगता है लेकिन जागने पर उसे यह बड़बड़ाना याद नहीं रहता।
स्वप्न ऋषि मुनियों की जिज्ञासा का भी विषय रहा है। इच्छाएं अनंत है, उनमें से कुछ की पूर्ति हो जाती हैं और कुछ की नहीं भी। जिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती या जिन इच्छाओं की पूर्ति व्यवहार में नहीं हो पाती, वे हमारे अचेतन मन में एकत्र होती हैं तथा वहाँ सक्रिय रहती हैं। सुप्तावस्था में जब हमारा शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, तब वे प्रायः स्वप्न जगत में तिरोहित होने लगती हैं। कदाचित् यही स्वप्न हैं। जाग्रत अवस्था में हमारी चेतना पुन: उन स्वप्नों का स्मरण कराती है। स्वप्न प्रत्येक की नितांत व्यक्तिगत घटना है जिसे किसी के समक्ष प्रदर्शित नहीं किया जा सकता। ऐसा भी कहा गया है कि स्वप्न हमारे भूत ही नहीं अपितु भविष्य के भी सूचक होते हैं। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।
उपनिषदों में जीवात्मा की जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय -चार अवस्थाएं बताई हैं। जीवात्मा ही स्वप्न का अनुभव स्मरण करता है। उसे स्वप्न में दृष्ट-अदृष्ट , श्रुत-अश्रुत , असत्-सत् , सबका अनुभव होता है।
भारतीय चिंतन में आत्मा को दृष्टा कहा गया है। स्वप्नादि सभी अवस्थाओं में यह आत्मा मात्र साक्षी है। जाग्रत अवस्था में वही स्वप्न का स्मरण करती है। कभी-कभी ऐसे स्वप्न भी होते हैं जिनका संबंध हमारे भूत या वर्तमान से नहीं होता। 'मैं' तो सोया हुआ था किंतु इन स्वप्नों को देखने और जानने वाला 'मैं' कौन था ? वास्तव में यह स्वयं आत्मा ही है। स्वप्न के रहस्य को समझने में हमें हमारी आंतरिक यात्रा का महत्व स्वीकार करना होगा।
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