Wednesday, October 18, 2017

वर्ण और जाति व्यवस्था

*मेरा मन्तव्य....*

वर्णव्यवस्था तो पढ़ने में आई है परन्तु जाति व्यवस्था का उल्लेख पौराणिक अथवा वैदिक काल में कहीं आया हो तो बताएँ।

एक विसंगति अौर है- वन्य अौर गिरिजनों का उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों कालों में आता है जबकि वे चार में से किस  वर्ण में गिने गए है? इसका कोई पता नहीं। इन्हें भील, कोल, किरात आदि वर्ग से इंगित किए गए हैं।  शोध कर्ताओं ने समग्र संस्कृति को पाञ्चजन्य के रूप में उल्लिखित किया है। वस्तुतः ये वे लोग है जिन्हें जाति के रूप में नहीं अपितु स्थानीयता/क्षेत्रीयता में संज्ञित किए गए हैं।
वर्ण व्यवस्था में दोष महाभारत काल की देन है जहाँ कुलगुरू कृपाचार्य और गुरू द्रोणाचार्य जैसे ब्राह्मण हो कर क्षत्रियों के कर्म में उतरने के बावजूद अपने ब्राह्मणत्व के चोले से बाहर नहीं निकल पाए। यदि यह कहा जाए कि स्वयं परशुराम को क्यों ब्राह्मण कहा जा रहा है जबकि वे  संपूर्ण जीवनकाल में क्षात्रधर्म से चिपके रहे। इस बात के लिए मेरे इस मन्तव्य का घोर विरोध किया जाएगा। द्रोण अौर कृप जैसे चरित्रों ने जाति व्यवस्था की नींव रखी है। संभवतः वे उनके काल में समाज में श्रद्धेय अौर पूज्य माने गए थे। इनके विसंगति पूर्ण कृत्यों का विरोध समाज नहीं कर पाया क्यों वे राज्याश्रय प्राप्त और राज्य सभा के प्रतिनिधि सदस्य भी थे। वहीं विदुर को आजीवन शूद्र माना गया, कर्ण को सूतपुत्र माना गया, घटोत्कच भीमसेन का पुत्र होने के बावजूद वन प्रान्तरों से बाहर नहीं निकल पाया और किस वर्ण में उनको सम्मिलित किया गया इसके संकेत नहीं मिलते। इसी तरह कुल और वंश के अनुगतों को कर्म के वर्गीकरण से अलग रख कर वर्ण व्यवस्था को विच्छिन्न करने के मूल कारण बने हैं। वंशानुगत होना ही जाति व्यवस्था का स्तंभ है।
एक बात अौर है; शूद्र को हमने अपने ढंग से परिभाषित कर लिया है। अन्यथा शूद्र वे हैं जो तीन अन्य वर्णों की सेवा का कार्य करते थे, उनके नियत कर्मों में सेवा के माध्यम से सहायक होते थे। गीता में इस आशय का स्पष्ट उल्लेख है। अब यदि कर्मों के आधार पर सेवा का निष्पादन करने वालों को वर्ण व्यवस्था के ढाँचे में फिट किया जाए तो कोहराम मच जाएगा।
अस्तु। जाति व्यवस्था को वर्ण व्यस्था में मर्ज (merge) नहीं किया जा सकता है। जाति व्यवस्था के इस परवर्ती स्वरूप को स्पष्ट रूप से देखें तो अब कर्मों से इसका कोई लेना देना नहीं है।
.....क्रमशः

रामनारायण सोनी

Sunday, October 8, 2017

सम्पादकीय

सम्पादकीय

श्री स्वर्णकार सोशल ग्रुप (समिति), इन्दौर की स्मारिका आप तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास किया गया है। इस गुलदस्ते में भाँति भाँति इन्द्रधनुषी सुन्दर सुगन्धित फूल मिलेंगे। अपने लोगों के अपनों से अनूठे संवाद मिलेंगे। एक झरोखा ऐसा है जिसमें ऐतिहासिक स्मृतियाँ संजोई गई है। ग्रुप की स्थापना सन १९९५ में हुई तब से अभी तक की प्रतिवर्ष की चुनिन्दा तस्वीरें यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। ग्रुप के समर्पित उन मील के पत्थरों का उल्लेख है जो इसके प्रचालन-संचालन के अधिष्टाता रहे हैं। ऐसे उन लोगों का प्रारंभ से अब तक की समस्त कार्यकारिणियों का क्रमवार सूचिबद्ध विवरण है। आप देख पाएँगे कि हमारा यह अपना ग्रुप एक समूह तो है ही पर उससे अधिक यह एक आत्मीय परिवार भी है। ग्रुप में सम्मिलित प्रत्येक मुखिया के चित्र और परिवार की संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है। परिवार का स्नेहिल स्वरूप हमारे तीन प्रमुख कार्यक्रमों में दिखाई देता है। इन कार्यक्रमों को जिन्होंने भी देखा है; मुक्त कंठ से सराहा है। यह स्मारिका सबको उन अतीत के स्वर्णिम क्षणों को स्मृत कराने और गुदगदाने का काम करेगी। बीस वर्षों में एक चालीस वर्ष का जवान प्रौढ़ हो जाता है। आज के कई प्रौढ़ो को अपनी जवानी के छायाचित्र समूह में देख कर हम सब आश्चर्य चकित और प्रमुदित होंगे। आप यहाँ बच्चों की प्यारी कविता से लेकर कानून और जीवन से संबद्ध विद्वत्ता पूर्ण आलेख आप पाएँगे। ग्रुप के नियत कार्यक्रमों के पीछे नेपथ्य में परिवार के ही उन निष्ठावान यूथ द्वारा आंतरिक संयोजन और सृजन कहाँ और कैसे होता है इसका आपको दर्शन भी होगा एक आलेख में। इस मंच का नाम है "सर्जना मंच" यहाँ किसी के पास कोई पद नहीं है केवल उनका अपना स्वीकार किया हुअा दायित्व ही है, यहाँ सब स्वयंसेवक ही हैं। सन २०१५ में एक पॉवर पॉइन्ट प्रेजेन्टेशन सर्जना मंच ने तैयार कर सोशल ग्रुप की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का प्रदर्शन किया गया था। इसकी सफलता को देखते हुए इस बार अत्याधुनिक इलेक्ट्रानिक मीडिया का उपयोग कर एक फिल्म बनाई जा रही है। इसके अनुसार स्मारिका का अधिकतर भाग आप फिल्म के रूप में देख पाएँगे। यह फिल्म यू ट्यूब पर भी उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अतिरिक्त एक प्रयास और किया जा रहा है कि स्मारिका पी डी एफ फार्म में आपके मोबाइल, कंप्यूटर और इन्टरनेट पर भी उपलब्ध हो सके। स्मारिका संपादक मण्डल के सामूहिक योगदान का प्रतिफल है।
हमारा प्रयास सार्थक सेवा है। संपूर्ण परिवार का इसमें अतुलनीय सहयोग है।

सदाशयता के साथ!
रामनारायण सोनी

Sunday, October 1, 2017

आलोचना

वनान्चल मेरी पाठशाला है, वर्कशाप है।
मैं हमेशा की तरह इसे स्वीकार करता हूँ।
सबका स्नेह प्राप्त होता है इसके लिये - आभार

अपना निवेदन लिखने के पूर्व मैंने आलोचना से संबंधित नोट्स तैयार किए थे उनको दृष्टिगत रखते हुए एक प्रयास भर किया है। 
मेरा प्रयास एक अभ्यास ही है।

🙏🙏🙏🙏

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी-

*प्रगीत और प्रबंध की तुलना करते हुए  ‘प्रगीत’ को ऐसा शिल्‍प माना, जिसमें कवि की भावना की पूर्ण अभिव्‍यक्ति संभव है ।

*काव्‍य में मूलत: सौन्‍दर्यानुसन्‍धान को जीवन-चेतना से जोड़ा।

*शुद्ध कविता की खोज करना चाहा, तथा आलोचना में सिद्धांत विहीनता का पक्ष लिया ।

आलोचना में सात प्रतिमानों को वरीयता क्रम दिया, जिसमें *"कवि की अंर्तवृत्ति"* को सर्वोपरि माना, तथा अंत में कवि के सामाजिक संदेश को रखा।

द्विवेदी युग में सैद्धांतिक और परिचयात्मक आलोचना के साथ-साथ  *"तुलनात्मक, मूल्यांकनपरक, अन्वेषण और व्याख्यात्मक" आलोचना की भी शुरुआत हुई।*

*शुक्ल युग*

‘कवि की अंतर्वृति का सूक्ष्म व्यवच्छेद’, ह्रदय की मुक्तावस्था, ‘आनंद की साधनावस्था’, ‘आनंद की सिद्धावस्था’, ‘लोक-सामान्य’, ‘साधारणीकरण’, *‘लोकमंगल’* आदि प्रतिमानों की स्थापना साहित्यिक समीक्षाओं के आधार पर करते है |

परमानन्द श्रीवास्तव मुख्यतः नई कविता के आलोचक है और वे कविता में *सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों और संरचना के स्तर पर आए बदलाव को सजगता से परखते हैं |*

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल के शब्दों में आलोचक में ‘कवि की अंतर्वृतियों के सुक्ष्म व्यवच्छेद की क्षमता होनी चाहिए | चुकि किसी भी रचना की तरह आलोचना भी पुनर्रचना होती है | अतः *जिस भाव-भंगिमा, मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की है,* उसमें उतनी ही संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ प्रवेश कर जाने वाला पाठक ही होता है।

*मिथकीय आलोचना-* मिथकों के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन किया जाता है। इस आलोचना में मनोविज्ञान का प्रभाव लक्षित होता है। इसके अंतर्गत साहित्य का मूल मानव वृतियों के साथ सहजात संबंध स्थापित करके उसे एक व्यापक पीठिका पर प्रतिष्ठित किया जाता है |

*तुलनात्मक आलोचना-* जब किसी रचनाकार या रचना की तुलना किसी अन्य रचनाकार  या रचना या किसी दूसरी भाषा के साहित्य से की जाए तो तुलनात्मक आलोचना होती है।

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इसलिये मैथिलीशरण गुप्त के काव्यमयी आधार को उपमेय की तरह उपयोग किया गया है।

🙏🙏
विनीत
रामनारायण सोनी

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मेरी दृष्टि में
🙏🙏🙏

यहाँ उपस्थित संदर्भ को एक अलग थलग रचना मान कर चर्चा करना संपूर्ण न्याय नहीं होगा। इस संदर्भ का राष्ट्र कवि मैथिलिशरण। गुप्त के काव्य को एक बारगी देखना उचित होगा।

राष्ट्रकवि की द्रौपदी, उर्मिला, कैकेयी, यशोधरा, विष्णुप्रिया, सत्यभामा आदि स्त्रियाँ परंपरा से आगत हैं परंतु नई दृष्टि से पुनर्सृजित नारी चरित्र हैं। कवि ने आँख मूँदकर उक्त नारी पात्रों की पुनरावृत्ति नहीं की है। कवि के रचनाकाल में भारतीय नारी की शोचनीय दशा थी। उसकी असहनीय दुरवस्था से कवि प्राण व्यथित हो उठता है। सवाल यह उठता है कि नारी की ऐसी दशा का उत्तरदायित्व किस पर है? कवि ने इस पर विचार करते हुए कहा है :

"ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे,
अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे।" (भारत-भारती)

'भारत-भारती' में इस बात का भी जिक्र है कि पुरुषों ने नारियों की उपेक्षा ही नहीं की बल्कि नारियों को अशिक्षित, अपाहिज एवं पंगु बनाने में भी बड़ी भूमिका अदा की - 'हा! क्या करें वे, जबकि उनको मूर्ख रखते हैं हमीं।' नारी के प्रति समाज की दृष्टि में गुप्तजी की रचना के साथ परिवर्तन दिखाई पड़ता है। अन्यथा एतद्पूर्व नारी केवल कामिनी की मांसलता अौर रूप में चित्रित थी। वह पुरुष की काम-पिपासा को तृप्त करने वाली साधन मात्र थी।
गुप्तजी अपने विचारों से हटे नहीं। नए विचारों एवं परिवर्तनों से वे सदा असंपृक्त रहे। परंतु ऐसा न समझा जाए कि गुप्तजी इन साहित्यिक एवं सामाजिक परिवर्तनों से अनभिज्ञ थे। वे अपने चुने हुए मार्ग पर अचल रहे। यदा-कदा समकालीन विचारधारा से संबंधित रचनाएँ मिल जाती हैं।

यदि इस प्रवर्तन को एक उपमेय समझा जाए तो 'डॉ जय वैरागी' का अदम्य साहस है कि एक ऐसा लोक नायक जो जन जन का पूज्य, श्रद्धेय अौर आदर्श हो उनके सम्बद्ध काव्य में दर्शित पात्रों अौर चरित्रों को उन्होंने अपनी कथावस्तु में आश्रय दिया है। लेकिन संवेदी कवि का पारंपरिक साहित्य के साथ वर्तमान परिदृष्य का समन्वय स्थापित किया जाना उतना ही सहज है जितना बर्फबारी में आदमी का टिठुरना। लेकिन उसे अभिव्यक्त कर पाना शौर्य पूर्ण है।

( यह कैसा राजधर्म है राम !
जो अपराध बिना ही त्याग देता है कुल स्त्री को
एक पति के रूप में)
एक अंगार की तरह जलता प्रश्न जो आज के सामाजिक परिवेश में दग्ध नारी का दर्द उजागर करता है।
लेकिन कहीं कहीं शब्द और संबोधन भद्रता को लांघते नजर आ रहे हैं। जिस राम को सभी महाकाव्यों ने "मर्यादा पुरुषोत्तम" के रूप में स्थापित कर अपने सृजन के केन्द्र में रखा है यह मिथक यहाँ टूटता सा लगता है। हम यह भूल नहीं सकते कि राम राष्ट्रनायक और लोकनायक के समन्वयक के रूप में संस्थित रहे हैं।

लेकिन
"उन अपरिचित राहों पर उस क्षण
चौदह वर्ष के लिए
आप के साथ खड़ी थी वैदेही !"
नारी के समर्पण का चर्मोत्कर्ष है
वहीं-
"यह कैसा राजधर्म है राम !
जो अपराध बिना ही
त्याग देता है कुल स्त्री को"
एक ऐसा प्रश्न खड़ा करता है कि जो सामाजिक मूल्यों का हो कर मानवीय मूल्यों पर भारी है। आज वर्तमान समाज में इन मानवीय मूल्यों की धाज्जियाँ उड़ रही है। अतः कवि के हृदय में इनका प्रतिबिम्बित होना प्रशंसनीय है।

साधुवाद!

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...