Wednesday, January 24, 2018

विक्षिप्त अथवा मुक्त

।। विक्षिप्त अथवा मुक्त ।।
उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः । सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ 3-42 ॥

लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ।। 3-44 ।।

यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः । अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ 3-46 ॥

काम्य विषय और भोगों में विक्षिप्त हुए चित्त का उपाय पूर्वक निग्रह करे तथा (सुषुप्ति में) लयावस्था में अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुए चित्त का संयम करे, क्योंकि जैसा अनर्थ कारक काम है वैसा ही लय है।

चित्त अथवा मन की विक्षिप्तता का प्रथम कारण है- काम्य विषय तथा भोग और दूसरा कारण है- सुषुप्ति अवस्था में लय होना। इन दोनो के बीच में प्रसन्नता रूपी शिखर है। शिखर की दोनों ओर जबर्जस्त खाइयाँ जो विक्षिप्तता के स्थल हैं। काम्य  विषय जगत की ओर आमुख है और लय अन्तर्जतग की ओर, परम चेतना की ओर। शिखर पर चढ़ना सरल नहीं है केवल ईमानदार साधना ही जाग्रत और स्वप्न के परे ले जा सकती है। यहाँ पहुँच कर चित्त और मन शक्तिसम्पन्न हो जाते है तथा जरा सी असावधानी वे त्वरा से नीचे फिसल सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो एक मदमत्त हाथी दूसरों के साथ स्वयं भी संकट में पड़ जाता है। साधक इस शिखर पर मन और चित्त के पैरों पर चल कर आता है इसलिए इन पर अंकुश बुद्धि, जो इनके ठीक बीच में बैठी है, ही सक्षम है कि इन्हें शिखर पर रोक ले।
स्पष्ट है कि गर्त में गिरना चित्त की कमजोरी जरूर है लेकिन यहाँ महत्ता बुद्धि की है जो उन्हें संयमित रख सकती है। जिस प्रयास से मन, चित्त यहाँ तक पहुँचा है यह उसी की उपलब्धि है पर हम मन को ही दोष देते रहते हैं। इस शिखर पर चित्त इसलिए भी प्रसन्न होता है कि वह जाग्रत और स्वप्न की सुख-दुःखानुभूति से परे निकल गया है और प्रज्ञावान हो चुका है।  दूसरे वह तुरीय के सबसे निकट है। इस स्थिति में यदि वह उस परम चेतना को आमुख होने की प्रगाढ़ अनुभूति में स्थित हो जावे तो विक्षिप्तता कैसे निकट आ सकती है। बुद्धि इसे संयम देकर विलग हो जावे अन्यथा दुष्परिणाम अवश्यंभावी है। उसका अतिरेक मन और चित्त को वापस जगत में ढकेल कर बवंडर खड़ा कर देगी। यह ठीक उस तरह का होगा जैसे युद्ध में हारा सैनिक जगत में भी ठीक से  नहीं रहता है और पागल होकर बार बार युद्ध भूमि की ओर देखता रहता है। विक्षिप्तता यही है।
माण्डूक्य उपनिषद् कहता है कि यही वह शिखर है जहाँ से सीधे परम चेतना में कूदा जा  सकता है। यह विलक्षण प्रतिभा केवल मेंढक में है। छ्लाँग सधी हुई हो कि लय को लाँघ सके। मेंढक चलना कम पसंद करता है पर हर छलाँग के पूर्व स्वयं को तैयार करता है और परिगणित मात्रा में ही छ्लाँग लगाता है। माण्डूक्य उपनिषद् के महीन सूत्र मोक्ष के द्वार तक ले जाने वाले हैं न कि विक्षिप्तता की ओर। अधीरता नहीं धृति का संबल पकड़ो।
परमात्मा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
यही मोक्ष है। तुम मुमुक्षु हो या मात्र साधक, उस परम सत्ता के पाद हो या कि भटकते यात्री। नहीं, तुम मुमुक्षु हो।
।।ॐ तत्सत।।

संगीत का आध्यात्मिक स्वरूप

🎼संगीत का आध्यात्मिक स्वरूप✊

संदर्भ: बाँसुरी

१. बाँसुरी एक उपकरण है, शरीर की तरह

२. छह स्वरों के छह छिद्र है, सातवाँ स्वर तो सब छिद्रों का बन्द होना ही है। छहों स्वर क्रिया पूर्ण हैं पर सातवाँ स्वर अक्रिया है। सारी उँगलियाँ बन्द और ठहरी हैं। अक्रिय होना निर्विचारिता का प्रतीक है। योगी इस दशा को ध्यान की मुद्रा कहते हैं।

३. एक छिद्र वह रंध्र है जहाँ से फूँक रूपी प्राण प्रवेश करता है। यह नहीं तो बंसी मात्र बाँस ही है। इसे ब्रह्म रंध्र कहा जाना चाहिए। जीव का प्राण इसी ब्रह्मरंध्र से ही प्रविष्ट होता हैं और सदाशिव यहीं प्राणिक ऊर्जा के साथ प्रस्थित हैं। योगी इसे सहस्रार चक्र कहते हैं। प्राण नहीं तो जीव पार्थिव उपकरण ही है।

४. बिना फूँक के बाँसुरी नहीं बजेगी। फूँकने वाला आत्मा इसी तरह प्राण फूँकने वाला परमात्मा है। हमें फूँक नहीं दिखाई देती उसी तरह प्राण फूँकने वाला भी नहीं दिखता।

५. सात स्वर शरीर के सप्त धातु, सप्त चक्र, सप्त ऊर्ध्व लोक है, सप्त द्वीप, सप्त सागर, सप्त पुरियाँ हैं।

इसमें संगीत कैसे उपजा

आवश्यक हैं:- बाँस, उससे बाँसुरी बनना, फूँकने वाला, फूँक, उँगलियों की क्रिया।

अगर लय नहीं है तो शोर है, शोर से कई उत्पात है। लय है तो संगीत है। लय है तो बाँसुरी का जीवन सार्थक है। लय है तो जीवन में आनन्द है। लय है तो आत्मा का परमात्मा में विलय है। संगीत एक लय है। लय प्रलय से आपको अलग रखेगा। संगीत सृजन है। सृजन केवल लय से ही है। लय नहीं तो व्यर्थ का ऊर्जा विसर्जन है। लय में आरोह है अवरोह है। स्वरों की जमावट ही तो कृति है, सृजन है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- सृजन निर्माण नहीं वह केवल जमावट है। यही जमावट लय है। स्वर बनाए नहीं जाते जमाए जाते हैं अतः संगीत निर्माण नहीं लयात्मक स्वरों का समूह है। संगीतकार विश्वकर्मा नहीं लयकर्ता है। मैं तो कहता हूँ कि संगीत का सृजन ईश्वर का अनुसंधान है और लयात्मकता उसकी साधना है। साधक अपनी उँगलियाँ चलाने वाला वह संगीत कार हो जो अपने हृदय को लयात्मक बना कर स्वरों से एकाकार कर दे। परमात्मा की प्राण रूपी फूँक वहाँ पहले ही मौजूद है। स्वयं को खोना तो श्रेष्ठ योग है।

"जीवन स्वयं उस सृष्टिकर्ता का लयात्मक संगीत है।"

निवेदक
रामनारायण सोनी

Tuesday, January 16, 2018

सज्जन दुर्जन

*मौलिक लघु चिन्तन*

ठंडा चूना जब ठण्डे पानी से मिलता है तो चूना ऐसा क्या कर डालता है कि पानी खौलने लगता है। पानी तो गर्मी को शान्त करता है पर यह क्या हुअा।
यह उन दुर्जनों की तरह है जो सामान्य घटना को भी विस्फोटक बना डालते हैं।
दूसरी ओर देखें
गरम पानी में नौसादर डाल दें तो पानी ठण्डा हो जाता है। कहाँ चली जाती है ऊष्मा। यह क्या हुआ।
यह उन सज्जनों की तरह है जो विप्लवकारी ऊर्जा को सोंख लेते हैं अौर वातावरण को सामान्य कर देते हैं।

रामनारायण सोनी

Monday, January 15, 2018

*विराट शून्य*- *एक आत्मबोध*

मौलिक कालचिन्तन
*विराट शून्य*- *एक आत्मबोध*

सारे अंक अपूर्ण हैं केवल शून्य ही पूर्ण है इसलिए हम समझ लें कि शून्य ही विराट है। शून्य न घटता है न बढ़ता है। अंक घटते बढ़ते हैं। हम शून्य को "कुछ नहीं" कहते हैं। परन्तु जिसे हम "कुछ नहीं" कहते हैं वही सब कुछ है। यह जो "कुछ नहीं" है वही शून्य है। अंकों के प्रारंभ होने के पहले शून्य अवस्थित है और नौ के परे होते ही फिर स्पष्ट शून्य है।
गौर से देखो शून्य अदृष्य रूप से सब के साथ जुड़ा है। जेसे एक धन शून्य बराबर एक। इस एक के हट जाने पर यह शेष शून्य ही रहता है यह भी शीघ्र ही समझ जाओगे। यह अंक मैं हूँ और मेरे साथ सदैव शून्य है। वह विराट सदैव अप्रकट रूप से मेरे साथ जुड़ा है। जब जब मैंने स्वयं को केवल अंक समझा तो शून्य को अलग समझा। यह मेरी समझ है पर यदि न भी समझूँ तो भी वह विराट बिना भेद भाव के नित्य मुझ से जुड़ा ही है। वस्तुतः आत्मबोध होना जरूरी है। जब मैंने अपनी हस्ती मिटा कर देखी तो विराट शून्य प्रकट आभास हो गया। अपूर्ण का आभास अदृष्य हो गया।
शून्य ही पूर्ण है। अंको के पहले भी, साथ भी, बाद भी; सर्वत्र शून्य ही शून्य है। यह अकाल ही शून्य है, यह शून्य ही विराट है। विराट ही पूर्ण है; पूर्ण ही विराट है, अनन्त है। कोई इसे विराग नहीं समझ ले पर यह मेरा अनुराग है। जब मैं उसके बगैर कभी हूँ ही नहीं हूँ तो निर्द्वन्द्व ही हूँ इसलिए खुद की क्या पर्वाह।

*मैं तो फक्कड़ कबीर की मानस संतान हूँ। उस परमपूर्ण परमात्मा ने सिर पर हाथ रख रक्खा है, उँगली पकड़ कर चला भी रहा है। मुझे जब नींद आवेगी तो उसकी गोद में चैन से सो जाऊँगा। तो भय की चर्चा कैसी।*

रामनारायण सोनी

कणिका

*क्षणिका*

सूरजमुखी उस चातक से बड़ा प्रेमी, साधक और तपस्वी है। चातक स्निग्ध चॉदनी का झरझर करता अमृत पीता है। रात गई तो सुख गया, आनन्द गया। फिर रात की तलाश होगी। आधी रातें तो काली होंगी, वे निखालिस होंगी। जानते हो सुख कब बीत गया? पता नहीं चलता। विरह एक वेदना है।
देखो! सूरजमुखी सूरज से आँख मिलाता है, खुद का सृजन भी करता है विकास भी करता है। सूरज रोज आता है बिना नागा किये। सूरजमुखी की सामर्थ्य समझो; फिर वह जब पक कर धरती पर झड़ेगा तो सैकड़ों नए तपस्वी खड़े करेगा। इसलिये तुम तपस्वी हो जाओ। तुम्हें तपन में जीवन ढूँढना है। सूरजमुखी बनना है।

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...