Tuesday, May 15, 2018

चेतना, ऊर्जा अौर परमसत्ता


हमारे जन्म का आध्यात्मिक अर्थ जड़ तत्वों में चेतना का संयोजन होना मात्र है। इसी चेतना से जड़ तत्वों का विकास होता है। अंग्रेजी में कहें तो सारे तत्व किसी न किसी तरह मॉडरेट होते हैं। ये चाहे जितने माडरेट हो जाएँ अन्त तक जड़ ही रहते हैं। चेतना ही ऊर्जा के रुप में रूपान्तरित होती है। ऊर्जा से सभी कार्य होते हैं।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।। गीता 2.28।।
हे भारत समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है।
स्रोत है जन्म, बहना है जीवन, विसर्जन है मृत्यु। नदी का ऊर्जामय प्रवाह है चेतना की अभिव्यक्ति। और चेतना परमात्मा की परा शक्ति का गुण है। महसूस करो कि वह परमात्मा हमारे इस शरीर रूपी उपकरण से अभिव्यक्त हो रहा है।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29।।
कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है। वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है और इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता।
तत्वों का जड़त्व भी चेतन होने का आभास देता है। जैसे दौड़ती भागती कठपुतलियाँ हमें स्वयं चलती हुई लगती है। महीन धागे और चलाने वाले हमारी दृष्टि से ओझल है। चलाने वाला चेतन है और धागे ऊर्जा कन्वेयर। हमारा जन्म चेतना का सूत्रपात है, ऊर्जा का अवतरण है और मृत्यु इसकी अल्टीमेट प्रोसेस है।
जितने भी कर्म है वे वास्तव में किसी कामना के उद्यम हैं। बगैर कामना के उद्यम नहीं किया जा सकता। उद्यम ऊर्जा के बगैर हो नहीं सकता।ऊर्जा चेतना के बगैर संभव नहीं। वस्तुतः यह ऊर्जा का भीतर से बाहर का प्रवाह है। स्पष्ट है कि यह चेतना ही पहले हम में और कर्मों में अभिव्यक्त हो रही है। मृत्यु के साथ ही चेतना अनभिव्यक्त हो जाती है। बहती हुई नदी का शीर्ष है स्रोत यानी उद्गम, विसर्जन है सागर में।

रामनारायण सोनी

Sunday, May 13, 2018

ॐ मृत्योर्मामृतं गमय

मृत्योर्मामृतं गमय

😞आज का मौलिक लघु चिन्तन🤔

*मुझे अब भीख नहीं चाहिये*

तुम्हारी, मेरी, सबकी देह मिट्टी की है इसीलिए समझदार इसे "पार्थिव" ही कहते हैं। भीतर क्या है? शायद नहीं जानते।
एक भिखारी था। एक जगह मिट्टी का ढेर चबूतरे जैसा बना कर उस पर बैठ कर भीख माँगा करता था। पूरी उम्र भर उस पर ही जमा रहा। कभी नहाया धोया नहीं इसलिये वहाँ दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध थी। वह अक्सर कहा करता था कि मैं इस मिट्टी का मालिक हूँ। जब मैं मरूँ तो मुझे मेरी इसी मिट्टी के नीचे दफना देना।
और एक दिन वह मर गया। लोगों ने उस जगह गड्ढा खोदा ताकि उसे दफना सके। खोदते खोदते लोग भौंचक्के रह गए। जमीन के भीतर छिपे एक संदूक में अनमोल खजाना भरा हुआ था। इसी गड़े खजाने पर बैठ कर वह जीवन भर भीख माँगता रहा।

देखो! हमारी इस पार्थिव देह के भीतर भी इसी तरह का अनमोल आध्यात्मिक खजाना भरा पड़ा है।  इसे पहचान लोगे तो खुद कहोगे कि अब और भीख नहीं चाहिए।
चलो अपने भीतर चलें। अकेले अकेले। वहाँ पैदल ही जाना है। अपना नाम, यश, असबाब, रिश्ते, सवारी सब कुछ मिट्टी के द्वार पर रख दो। परमात्मा बाहें फैलाए तुम्हारी, हमारी प्रतीक्षा पर रहा है।

रामनारायण सोनी

Thursday, May 3, 2018

संन्न्यास

संन्यास क्या है?

क्या जगत को छोड़ना ही संन्यास है?

क्या विरागी होना संन्यास है?

क्या संन्यास होना आदमी की कोई अवस्था है?

ये वे प्रश्न हैं जो हमें एक दृष्टि का बोध कराएँगे।

यह एक तटस्थ चर्चा है। विश्व भर में ऐसा कोई प्रश्न नहीं जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष उत्तर गीता में न हो।
*ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।*
*निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।गीता, 5.3।।*

जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि हे महाबाहो द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्ध से मुक्त हो जाता है।।

वास्तव में, संन्यास का सही भाव है तटस्थता, निवृत्ति, निस्संगता, निर्लिप्तता। गीता में जो संन्यास संबंधी दर्शन दिया गया है, वह इन दो विपरीत धारणाओं के बीच उपयोगी सामंजस्य स्थापित करता है। 
संन्यास का व्यावहारिक पक्ष यह है कि वह इष्ट से अभीष्ट, द्वन्द्व से निर्द्वन्द्व और विकल्प से निर्विकल्प का यात्री होता है। ऐसे में वह अचीवर नहीं है। अर्थात् संन्यास एक मार्ग है व्यक्ति का गुण नहीं। जैसे दो पृथक् किनारों के बीच सरिता अपने मार्ग में अपने मूल स्वभाव में निश्चल बहती है।
संसार में विपरीत दिशाएँ नहीं होती तो यह संसार होता ही नहीं। हम इसमें एक समन्वय स्थापित कर के चलते हैं तो यह समन्वय योग हुआ। प्रेम योगी इस द्विविधा से अक्सर गुजरता है पर उसका प्रेम उदात्त हुआ तो अपने विस्तार से सबको आच्छादित करता है।
शायद यही कारण है कि संन्यास अौर प्रेम के बीच दुविधा का स्थान नहीं है। प्रेम या संन्यास अथवा संन्यास या प्रेम वैकल्पिक अवधारणा के मार्ग नहीं है अपितु वे परस्पर संपूरक हैं। प्रेम करो तो विशुद्ध हो, अलिप्त हो, निराकांक्षी हो। बंधन से मुक्त हो कर प्रेम करोगे तो प्रेम अपने आप उदात्त हो जावेगा। उसके विस्तार की चिन्ता आप को नहीं करनी है। आप इसे प्रेम की कोई नई परिभाषा मत समझ लेना। यह प्रेम का अपना ही गुण है। जहाँ प्रकाश है वहाँ से अंधकार स्वयं विदा हो जाता है उसी तरह जहाँ प्रेम है वहाँ विद्वेष का कोई स्थान नहीं। न्यास का अर्थ है ट्रष्ट, विश्वास। विश्वास के बिना न तो संन्यास है और न ही प्रेम। जगत में लोगों ने इस असीम प्रेम को प्रकारों में विभक्त कर दिया। बड़ा अजीब लगता है जब कोई कहता है यहाँ प्रेम करो वहाँ न करो। इससे करो तो उससे न करो। जिसके हृदय में प्रेम के बीज पड़े हैं वहाँ उसका प्रस्फुटन तय है। लेकिन जब किसी पात्र तक पहुँच जाए तो फिर कोई विक्षेप न हो। ऐसा प्रेम अजस्र स्रोत हो। अंग्रेजी में इसे कहते हैं 'पेरेनियल'। धार चाहे पतली हो पर निरन्तर हो। चाहे गंगा यमुना की तरह दृष्ट हो सरस्वती की तरह अद्दष्ट पर हो वह निरन्तर।

रामनारायण सोनी

Wednesday, May 2, 2018

बौद्ध धर्म __ प्रतिमानों के संदर्भ में

*विनम्र निवेदन है कि बौद्ध धर्म  को इन प्रतिमानों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।*

सम्राट अशोक अखण्ड भारत का अन्तिम चक्रवर्ती सम्राट रहा है। कितने ग्रह कलह से जूझते हुए उसने सिंहासन पाया था, इसका गवाह इतिहास है। उसके संक्षिप्त शासन काल में देश की सीमाएँ विस्तृत हो कर संपूर्ण उप महाद्वीप में फैल गई। इसका सूत्रधार अपने आश्रम में निर्लिप्त, चाणक्य अपने वैदिक अौर सांस्कृतिक विरासत लिए बैठा था। अशोक ने  विदेशी आक्रान्ताओं से भी राष्ट्र को सुरक्षित किया था। यह उसके जीवन का पूर्वार्ध काल था। भारत के इतिहास का यह चरम बिन्दु था।
उसके जीवन काल के उत्तरार्ध में इस राष्ट्र की पतन के बीज डले जिससे हम आज तक अभिशप्त हैं। इसके कुछ मुख्य कारण थे।
पहला कारण था अशोक का बौद्ध धर्म अपनाना और उसे राजनैतिक संरक्षण प्रदान करना। बौद्धों ने अशोक के मन में युद्ध के प्रति घ्रणा भर दी और देखते ही देखते देश की रक्षा के लिए उठी तलवारों में जंग लग गई। इसके कारण सीमाएँ सिकुड़ती गई और हम क्रूर विदेशी आततायियों के आक्रमणों से टूटते पिटते रहे।
दूसरा कारण यह रहा कि भारत भर में बौद्ध भिक्षुओं की बाढ़ आगई जो स्वयं के लिए केवल तपस्या करता था और समाज उसका भरण पोषण करता था। इस तरह समाज का एक अच्छा खासा वर्ग श्रमविहीन हो गया। इसके पूर्व सनातन धर्म का ऋषि समाज में शस्त्र अौर शास्त्र की शिक्षा के गुरुकुलों से संपन्न था। ये गुरूकुल रीति-नीतियाँ और राष्ट्रधर्म प्रदान करने का दायित्व अपने ऊपर लिए हुए थे। बौद्ध धर्म के विस्तार से वे सभी विच्छिन्न हो गए। जिससे हम आज तक उबर नहीं पाए।
तीसरा कारण था अनीश्वरवाद का। यह कारण इतना संहारक सिद्ध हुआ कि इसने राष्ट्र का आधार भूत वैदिक धर्म तहस नहस कर दिया अौर वैदिक शिक्षा आदि ग्रन्थालयों में सिमट कर रह गई। तब से आज तक हम हमारे वेद से पुनः नहीं जुड़ पाए। शंकराचार्य न हुए होते तो "वेद" इतिहास का एक शब्द मात्र रह जाता।

भगवान(!) बुद्ध राजकुमार सिद्धार्थ का रूपान्तरण है। जो राजकुमार दुःख, मृत्यु, जरा, व्याधि के कारण राजपाट अौर पत्नी-बेटे को छोड़ कर वन को चला गया उसने घोर तप किया परन्तु सिद्धार्थ के बुद्धत्व प्राप्त होने के पश्चात् इन चारों कारणों में से किसका कितना हल दे पाए; कोई यह बताए।
जिस राष्ट्र में पहले से दिव्य धर्म-संस्कृति मौजूद थी वहाँ आंधी तूफान की तरह बौद्ध धर्म आया पर टिक नहीं सका परन्तु जो बुरी तरह डेमेज हो चुका था उस स्वर्णिम राष्ट्र को हमें कौन लौटायगा?
बौद्ध धर्म भारत छोड़ कर वहाँ चला गया जहाँ पर पहले धर्म का कोई स्पष्ट स्वरूप था ही नहीं।
हम इतने सहिष्णु हैं कि हम उनकी भी जैजैकार करते हैं जो घूँस की तरह हमारी राष्ट्र की अस्मिता के भवन को नीचे से खोखला कर रही है। बस भीड़ में से एक जय का नारा बोला और चल पड़ी जयकारे की लहर।

Disclaimer:
यह आलेख स्वयं के चिंतन पर आधारित है और किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त अभिव्यक्ति है। किसी बहस को आमंत्रण देना इसका उद्देष्य नहीं है।

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...