वो स्टेशन की लड़की
उम्र करीब बारह-तेरह साल
भूखी-भटकती
कभी अपनी ही शर्ट से झाड़ू लगाती
और भीख मांग कर खाना खाती
पर उसके साथ भूखा कोई और भी है
क्या?
पेट में बच्चा
उसकी उम्र भी करीबन चार माह
ये क्या किसकी ज्यादती का शिकार?
वो स्टेशन की लड़की.....
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रुचिवर्धन मिश्न
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मेरी नजर में
यह समझ नहीं आ रहा है कि मैं कविता का सृजक के बारे में लिखूँ या उस काविता में वर्णित दास्तान के बारे में लिखूँ? पर लगता है दोनों पक्षों पर चर्चा करना उचित होगा।
नारियल एक ऐसा फल है जिसके कठोरतम शल्क के भीतर मृदु जल भरा होता है, एक श्वेत गीरी होती है जो (स्नेह) तैल युक्त होती है। आज "सृजन" में साप्ताहिक संगोष्ठी में हू ब हू ऐसा ही एक दृश्य उपस्थित हुआ। अत्यन्त कठोर दिखाई देने वाले पुलिस विभाग की शीर्षस्थ पदासीन अधिकारी श्रीमति रुचिवर्धन अपनी स्वरचित कविता "वो स्टेशन की लड़की" पढ़ रही थी। देखा जाय तो पुलिस विभाग दुनिया के चाहे किसी भी देश का हो उसका पाला समाज के काले पक्ष से ही ज्यादा पड़ता है परन्तु वे केवल अन्वेषण और गवेष्णा का अधिकार ही रखते हैं इनकी दण्ड अथवा न्याय प्रक्रिया कहीं और ही होती है। ये घटना के पूर्वाभास में कुछ खास नहीं कर पाते पर अपराध अन्वेषण में किसी रास्ते से गुजरे साँप की छूटी लकीर के सहारे दौड़ते भागते नजर आते हैं। अपराधी साँप कहीं ऐसी बाँबियों में जा कर छिप जाते हैं जो या तो क्षत्रपों की तैयार की गई होती है या अँधेरी कोठरी में लुप्त हो जाते हैं और पकड़े ही नहीं जाते। यह कविता ऐसे एक सत्य परिदृश्य पर आधारित वृत्तान्त है। यह कहानी बाल उत्पीड़न की है, विक्षिप्तों की है, अनजान कुछ दरिन्दों की है और इन लावारिस लोगों के प्रति समाज में व्याप्त उदासीनता की है। "वो स्टेशन की लड़की" एक संकेत करती है इस पूरी उपेक्षित बिरादरी की ओर। कविता के अन्त में अंकित प्रश्न है "और हम???" यह जलता हुआ प्रश्न हमारे पूरे के पूरे समाज को, सामाजिक व्यवस्था को, न्याय व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर जाता है। साथ ही इन उपेक्षितों के प्रति हमारी मरी हुई संवेदनाओं को झिंझोड़ कर जगाने का प्रयास करता है। परन्तु "वो लड़की" कवि के अन्तर्मन को उद्वेलित कर देती है। उस विक्षिप्ता के साथ की गई घृणित बर्बरता को बड़ी संवेदनशीलता से महसूस करती है और उस काले सच को उजागर करती है। अपनी कविता पढ़ते पढ़ते इस साफगोई और महसूसियत में उसकी आँखे नम हो जाती है।
अक्सर देखने में आता है कि रेलवे स्टेशन, बसस्टेण्ड, धार्मिक स्थल के आस पास रास्तों गलियारों फुटपाथों पर ऐसी कई लोग पड़े रहते हैं जो भिक्षावृत्ति में लगे रहते है। कारण जो भी हो पर हकीकत में देखा जाय तो ये भी जिन्दगियाँ ही हैं हमारी तरह।
बचपन में ही पढ़ा था "साहित्य समाज का दर्पण होता है।" यह कविता बिना किसी लाग लपेट के हमें आईना दिखाती है। वस्तुतः कवयित्री को करुणा और जुगुप्सा से परिचय कराने और समाज के अभिजात्य वर्ग को आत्मबोध कराने के लिये हम साधुवाद कहते है।
रामनारायण सोनी
२६.०२.२२