Wednesday, January 11, 2023

वही तुम-वही मैं

वही तुम!

क्यों भाषा दी मौन की?

जब प्यार पहला कदम रखता है तो लौटने के सारे रास्ते खुद बन्द कर देता है। इसे नापने में एवरेस्ट छोटा पड़ जाता है, सागर उथला सिद्ध होता है, सितारों की दूरी छोटी पड़ जाती है। तुम्हें गलत फहमी है कि तुमने प्यार को स्लेट पर कलम से लिखी गई इबारत की तरह मिटा दिया है। यदि ऐसा हो पाया हो तो पूछ लो खुद से। 
प्यार क्षितिज की सीमा रेखा नहीं मानता वह जानता है कि जैसे ही वहाँ पहुँचोगे क्षितिज आगे सरक जावेगा। अगर तुम्हें मैं दिखाई नहीं देता हूँ तो तुम धुन्ध में खड़े हो पर इसका यह अर्थ नहीं कि वहाँ मैं नहीं हूँ, वहाँ तुम नहीं हो। पर इस धुन्ध में तुम तो तुम्हें पूरी तरह दिखाई दे रहे हो। तुम्हें शायद पता नहीं कि तुम्हारी बनाई इस धुन्ध में हमारी आवाज सफर कर सकती है। पुकारो मुझे कुछ भी संज्ञा दे कर पुकारो।
 पुकारो मुझे नाम ले कर पुकारो मुझे तुम से अपनी खबर मिल रही है। मेरी अस्मिता को पहचान देने वाले हो कर तुमने अपनी सुधियाँ खुद कहीं रख दी हैं। क्या इतना साध्य है प्नकृति के नैसर्गिक गुणों के पार निकल जाना। भूलने का प्रयास स्मृतियों को और अधिक प्रबल बना देता है। "जग से चाहे भाग ले कोई मन से भाग न पाये।" मन जो तन के पार है, विशुद्ध है, कमल के पत्ते पर ठहरे बिन्दु की तरह निर्लेप है, जिसे हवा नहीं सुखा सकती अशुद्धियाँ कभी छू नहीं पाई। कितना प्योर है यह। प्यार जो निर्लेप है, अक्षत है, अखण्ड है वही सत्य है। और सत्य स्वयं सिद्ध होता है उसे सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं। 
जानते हो? मैं बोलचाल की भाषा तो पहले से ही जानता था पर तुमने मुझे मौन की भाषा पढ़ाई। वह भाषा हाथ से उँगलियों से, भौंहों से नयनों से और चेहरे पर चढ़ते उतरते रंगों की "मननागारी लिपि" में लिखी जाती है और केवल सच्चे मन से ही पढ़ी जाती है। 
पर मुझ से मुझे मिलवा कर कहाँ चले गये हो? कोई पूछता है, कैसे हो? मैं पुराने जमाने की चिट्ठी में लिखे जुमले की तरह कहता हूँ-मैं यहाँ पर ठीक हूँ पर मैं जानता हूँ कि मैं झूँठ बोलता हूँ। बहुत ऊँची पहाड़ी पर एक मंदिर बना। उसमें देवी प्रतिमा स्थापित हुई अब पुरानी तलहटी में खड़े हो कर दर्शन केैसे करूँ मैं।
मैं कहता हूँ कि 'मैं तुम्हें रोज भूलता हूँ' तो मैं फिर से झूँठ बोलता हूँ। पर जिस अलाव में २६ बरसों में आग नहीं बुझी, जिस चौपाल में यह अलाव बसता है और जिस बरगद की छाँह रंगमंच बनी हो उस को भूल पाना असंभव है। 
माना कि मुझे चुप रहना अच्छा लगता है, पर सन्नाटे मुझे अच्छे नहीं लगते क्योंकि सन्नाटों का शोर कान सह नहीं पाते। जब मैं कई टुकड़ों में बँटता हूँ तो कोई कनी वहाँ भी नजर आई होगी। 
मेरे मन मस्तिष्क के इस बड़े से घर में एक सीलन भरा बन्द कमरा है इसकी पुरानी पड़ गई हैं। दीवार में कुछ दरारें पड़ गई हैं इन दरारों के बीच से अतीत झाँकता है। उसकी कुछ किरणों को मैं पकड़ने की कोशिश करता हूँ तो वे बस उँगलियों को उजली कर देती हैं और जब मैं उसे चूमने के लिये उठाता हूँ तो ये उँगलियाँ फिर काली पड़ जाती है। मैं अपने इस बचपने पर अफसोस करता हूँ। सुना तो यह भी है कि परछाईं अकेली नहीं होती पर मैं इसे अकेली क्यों देखता हूँ अपने चारों ओर? 
प्यार को जमीन चाहिये इसीलिये मैं जमीन पर खड़ा हूँ। यहाँ से गिरने का कोई डर नहीं होता। प्यार वाले जमीन नहीं छोड़ सकते फिर अगर धरातलों का अन्तर हो जावे तो प्यार हमारे तुम्हारे खड़े होने के धरातलों का अन्तर सहन नहीं करता। एक बात और; में अपने प्यार के गधेपन से खुश हूँ क्योंकि मैंने विवेक को दुलत्ती मार कर कहीं खाई में फेंक दिया है। प्यार में जीवन का नहीं मेरा और मेरी "स्वयं मैं" का समर्पण है।

                                  वही मैं…
रामनारायण सोनी
०९.०१.२३

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...