Tuesday, January 28, 2020

समीक्षा १२


क्या कानून केवल साक्ष्य ही के नेत्रों से देखता है? ऐसा हो न हो लेकिन लॉ ग्रेज्युएट, खण्डवा निवासी कवि अरुण सातले जी ने अपनी रचना के माध्यम से पीड़ित मानवता में मौजूद विद्रूप विषमताओं और संवेदनाओं को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।
एक कविता
"सब दिन अच्छे बीते हैं"
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किसे कहें, कैसे जीते हैं
कुर्ता नहीं, ज़ख़्म सीते हैं

घर, टीन कनस्तर बजते
बाहर सब घट रीते हैं

अमृत देवों के हिस्से,
हम ज़हर छान पीते हैं

मौसम की क्या बात करें
दिन सब अच्छे बीते हैं

चल कबीर बजार चलें
घर में हिंसक चीते हैं 
        ०००       अरुण सातले

(उनकी गरिमामय फेसबुक वॉल से साभार)
(https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=955678644788096&id=100010379071458)
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मेरी नजर में..

कवि की एक अन्य प्रसिद्ध रचना की कुछ पंक्तियाँ हैं....

जब हवाएँ तेज चलती है
तो दीवार पर टँगे
केलेंडर के बारह महीने की 
सभी तारीखें एक साथ
फड़फड़ाने लगती है 
लगता है पूरा साल
ऐसे ही जायगा....
           .. असमय"

यह समय उड़ता रहेगा श्वेत काले पंख ले कर।
ऐसा कोई पिंजरा बना ही नहीं जो इस पंछी को अपने भीतर रोकने का सोच भी ले। यह काल है। इसने सबको देखा है। कविता का सृजक भी इस आलंबन को ले कर सब को देखता है। उसे मानव पर बड़ा वैषम्य और दैन्य दिखाई देता हैं। अभावों में पलता जीवन खाली खाली सा लगता है। इन अभावों को भरते भरते उम्र रीत गई पर वह ऐसे ही बीत गई। कविता इस संधि पर एक पल असमंजस में खड़ी हो जाती है। दिन अच्छी तरह बीत कर अच्छे हो गये या फिर अच्छा हुआ कि आज का यह दिन बीत गया परन्तु अगले ही पग पर उसे अपने दर्द की तुरपाई करता आदमी दिखाई देता है। समय आदमी को काट गया या कि आदमी समय काट रहा है। परन्तु थोड़ा आगे चलते हैं तो कुहासा छँटता है। इसलिये यह कहा जाना कि अच्छा हुआ यह दिन जैसे तैसे गुजर ही गया, सच लगता है। घर में खाली खाली बरतनों का शोर है। असल में बरतन तो खाली ही बजते है। इनका खालीपन जीवन के खालीपन को उजागर करता है।
एक हतभागी मानव का श्रम और कर्मफल कोई और ही उड़ा रहा है। मन्थन तो अनवरत चल रहा है पर अमृत कहीं और ही बँट रहा है। यहाँ तक तो ठीक था पर विडम्बना यह है कि जहर इस निरीह को पीना पड़ रहा है। 
प्रत्यक्ष-दर्शी के रूप में कवि भी यह सब देख रहा है। यहाँ भितर-घात लगाए दिखते हैं लोग। जहाँ उसका दम घुटता है। यहाँ जहर घट-घट में घुला है। जाए तो जाए कहाँ।
अगली पक्तियाँ क्रान्त दर्शी कवि की है। वह पराये दर्द को अपने भीतर जीने लगता है फिर तो उसकी बात  एक यथार्थ को उघाड़ती देती है। यह कविता पीड़ित मानवता की टीस को महसूस कराती है। यह वैषम्य केवल आज ही नही है, आज से भी नहीं है परन्तु कोई तो हो जो इस सत्य का समाज में रखने का साहस करे। सातले जी की लेखनी ने यह जोखिम उठाई है।
सादर

रामनारायण सोनी
28.01.2020

Sunday, January 26, 2020

समीक्षा ११

श्री धैर्यशील येवले जी पुलिस विभाग में निरीक्षक हैं। इनकी काव्य साधना उत्तम कोटि की है तथा जीवन के यथार्थ और जीवन्त-दर्शन से ओतप्रोत होती है। इनकी एक कविता .....

*मंगलमय*
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तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है ,
आकाश ,वायु ,जल
पृथ्वी ,अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है ।

मोल तेरा कुछ भी नही
परन्तु तू है अनमोल
बिखरा दे हवा में
अपनी सुगंध
तेरी आत्मा
परमात्मा का ही हिस्सा है ।

आदित्य रश्मियों का
कर स्वागत
अंतस के तमस को
बाहर कर
तू अखंड ज्योति का
ही हिस्सा है ।

ज्ञान के भवसागर से
हो कर जाते है  मार्ग
उन्नति के ,
नव वर्ष की शुभघड़ी
लिख रही तेरा ही
मंगलमय किस्सा है।

धैर्यशील येवले इंदौर

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*मेरी नजर में*.......

"तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनन्त का हिस्सा है,
आकाश, वायु, जल
पृथ्वी, अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है।"
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।7.9।।
क्योंकि इन सब में पस्मात्मा का निवास है।
 
"तेरी आत्मा
परमात्मा का ही हिस्सा है ।"
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

"आदित्य रश्मियों
कर स्वागत
अंतस के तमस को
बाहर कर"
असुर्याः नाम ते लोकाः अन्धेन तमसा आवृताः  सन्ति । ये के च जनाः आत्महनः सन्ति ते प्रेत्य तान् अभिगच्छति ।।3/ईशावास्योपनिषद्।।
वे लोक सूर्य से रहित हैं और गाढ़े अन्धकार से आच्छादित हैं। उन लोकों को वे सभी लोग यहां से प्रयाण करने पर पहुंचते हैं जो कोई भी अपनी आत्मा का हनन करते हैं।
इसलिये तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
तू अखंड ज्योति का
ही हिस्सा है ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि  सर्वस्य विष्ठितम्।।गीता 15/18।।
समस्त ज्योतियों में स्थित स्थूल ज्योति में उसी ज्योति को श्रेष्ठ कहा गया है, जो सबके हृदय में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानगम्य तीनों रूपों में प्रविष्ट है।
तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है ,
ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानंभूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एवयच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव।।माण्डूक्योपनिषद्।।
'ॐ' अक्षर अविनाशी 'ब्रह्म' का प्रतीक है। उसकी महिमा प्रकट ब्रह्माण्ड से होती है। भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों वाला यह संसार 'ॐकार' ही है। यह सम्पूर्ण जगत् 'ब्रह्म-रूप' है। 'आत्मा' भी ब्रह्म का ही स्वरूप है। 'ब्रह्म' और 'आत्मा' चार चरण वाला स्थूल या प्रत्यक्ष, सूक्ष्म, कारण तथा अव्यक्त रूपों में प्रभाव डालने वाला है।
"आकाश, वायु, जल
पृथ्वी, अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है।"
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।गीता।।7/4।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।
धैर्यशील येवले जी ने आज जो अपनी कविता में सहज रूप में जो जो लिख डाला वह मुझे गीतात्मक और औपनिषदेय चिन्तन लगा।
समस्त व्यष्टि और समष्टि में ब्रह्म को समझना श्रेष्ठ चिन्तन है।

रामनारायण सोनी

Saturday, January 25, 2020

समीक्षा ९

एक कविता भारती सोनी की उनकी पुस्तक "आलापिनी"   से। श्रीमति भारती सोनी झाबुआ वनाञ्चल की प्रसिद्ध समाज सेविका, कवियित्री और शास्त्रीय संगीत की प्रशिक्षक हैं। उनके सेवा कार्य संस्कृति साहित्य और शिक्षा को जोड़ते हैं।

प्रस्तुत है कविता "बचपन"

"मेरा बचपन जिया है मैने
आजादी को पिया है मैने"
  अभी चन्नी साल सतोली
  पव्वा-पाँचे गुड़िया मेरी
माँ की डाँट पिता की झिड़की
बहन हठीली भाई झक्की
  चुपके-चुपके चोरी-चोरी
  चाराने की बरफ की चुस्की
पकड़म-पाटी लंगड़ी-ताली
दिन भर खेल की खीचा तानी
  संजा की वो शाम सुहानी
  गोबर के हाथों से क्यारी
फूल पत्तियाँ कला कोट में
हाथी घोड़ा और पालकी
  भाई के संग जिद क्रिकेट की
  गुल्ली डंडा, दड़ी कबड्डी
पर पिंजरे से पिंजरा प्यारा
रूप था न्यारा परिसर न्यारा
  लुप्त हो गए वे सजीव पल
  अब तो जीवन, हाँ बस जीवन

                      भारती सोनी
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मेरी नजर में

"मेरा बचपन जिया है मैने
आजादी को पिया है मैने"
पंक्तियाँ अतीत की उन वादियों में शब्द-मञ्च के जरिये खड़ी कर देती है जो हर सक्ष के जीवन का स्वर्णिम काल होता है। जो लौट कर तो नहीं आता है पर वे स्मृतियाँ इतनी प्रगाढ़ हो उठती हैं कि भीतर ही एक उच्छृंखल बच्चा जीवन्त हो उठता है। तो चलो चलें, जरा कवि की इस कृति के साथ थोड़ा बच्चा हो लें। जहाँ न पाने की चिन्ता है न खोने का डर है/सारा गाँव अपना घर है। शहर के खेलों में और गाँव के खेलों में थोड़ा अन्तर रहा है। यहाँ संकेत गाँव कस्बों के खेलों का है। जो भाषा और शब्द उपयोग किये गये हैं वह ग्रामीण अंचल में प्रयुक्त होते रहे हैं। इसलिये यह कविता "बचपन की मस्ती", "उस काल के "खेलों के प्रकार" और विशेष संबोधनों" की जानकारी की त्रिवेणी बहाती है। आप अच्छी तरह समझ सकते है कि साहित्य से ऐसे शब्दों का विलोप हो जाना एक युगीन-संस्कृति का विलुप्त हो जाना ही है। 
स्कूल में पढ़ा था साहित्य समाज का दर्पण है। जिस साहित्य रूपी दर्पण में समाज दिखाई दे वह कालजयी हो जाता है। साहित्य संस्कृति और संस्कार का संवाहक है। लोकसंस्कृति, लोकमंगल और लोकरंजन का संरक्षण केवल साहित्य ही से संभव है चाहे वह पुस्तकीय हो, चाहे दृष्य हो जा वह चाहे श्रव्य हो। जिन रचनाकारों ने यह काम किया है वे धन्यवाद के पात्र हैं। उन्होंने संस्कृति को करीने से सहेजा है। भारती जी ने अपनी रचना के माध्यम से ऐसे ही कुछ दृष्यों को जीवन्त कर दिया है।
लोकसंस्कृति जिस जमीन पर पनपती है वह अभी भी कायम हैं। उसके कार्य में परिवर्तन जरूर हुआ है। गाँव अब कितने बदल गए हैं। जीवन शैली ही बदल गई है लेकिन शुक्र है कि मूल संवेदना अभी भी जस की तस मौजूद है। हमारी जिम्मेदारी है इन संवेदना का अनुरक्षण करने और उन्हें तरज़ीह देने की।
स्त्रियों ने अधिकतर लोकगीतों की रचना की है, उन्हें गाया ही नहीं उनको जिया भी है। उनके पारम्परिक स्वरूप का निर्वाह भी वे बखूबी करती हैं। लोकगीतों की लय इतनी स्वाभाविक हो जाती है कि वे शास्त्रीय रूप ले लेती है और पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। लेकिन लोकगीतों की भाषाएं और बोलीयाँ क्षतिग्रस्त हो रही हैं जिसे बचाने की लिए काम करने की जरूरत है। यहाँ कवियित्री ने लोकगीतों और लोकरंजन में प्रयुक्त मूल शब्दों को, जैसे सितोली, पव्वा-पाँचे, चाराने, पकड़म-पाटी, लंगड़ी-ताली, संजा, कला-कोट, दड़ी-कबड्डी आदि यथावत रख कर उन्हें जीवन्त रखा है। इसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिये। इस कविता में बोलचाल के प्रवाहवान शब्द हैं जैसे चाराने, दड़ी, पकड़म-पाटी आदि। ये अगली पीढ़ियों के लिये सनद होगी।
लोकगीत अध्ययन करने का विषय नहीं है इसलिये कवियित्री ने उस बचपन को जिया है
और आजादी को पिया है। उन्होंने लोक को पाश्चात्य फोक से अलग कर विवेचन करने की जरूरत पर बल दिया। हमें लोकगीतों की प्रासंगिकता पर आ रहे खतरों को पहचानने और उसका मुकाबला करने की जरूरत है। 
गांव में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक और सामुदायिक जीवन का ह्रास हो रहा है उसमें सामुदायिकता से उपजे गीत शायद ही बचें। परन्तु इस कविता में प्रयास किया गया है। इन प्रतिनिधि शब्दों में संस्कृति की छाप है। इनका उल्लेख हमारे विगत जीवन के मूल में रहे यथार्थ से उपजी अभिव्यक्ति हैं। ईश्वर करे इनके ऊपर बाजारवाद, फूहड़ता, सांस्कृतिक दरिद्रता का खतरों से बची रहे।

रामनारायण सोनी
26.01.2020

Friday, January 24, 2020

समीक्षा १०

एक कविता का अंश

मैं निर्मल स्रोत निर्झर हूँ भूधर से फूट आया हूँ ।
धुआँ बन कर अगन की भित्तियों से टूट आया हूँ  
बहुत उलझन बहुत पीड़ा घनेरी मोह पाशों में 
उन्ही कुछ दीर्घ धागों से वहम के छूट आया हूँ

                        डॉ जय वैरागी

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मेरी नजर में

हाथी का बच्चा जब छोटा होता है तब एक साधारण सी रस्सी उसके पैर में बाँधी जाती है और वह बँधा महसूस करने लगता है। समय बीतता जाता है और यह बन्धन उसके अवचेतन मन में पैठ जाता है। धीरे धीरे हाथी बड़ा हो जाता है तब भी वह हल्की सी जंजीर से बँधा रहता है लेकिन अपार शक्ति का स्वामी होते हुए भी वह जंजीर को तोड़ कर मुक्त होने की सोचता तक नहीं। ऐसा इसलिये होता है कि उसका अवचेतन अब भी  जंजीर को अटूट बंधन मान कर ही बैठा है। यही नियम उस आदमी पर भी लागू होता है जो अपने कुत्ते को जंजीर से बाँध कर सुबह सुबह घुमाने ले जाता है। प्रश्न उठता है कि कुत्ता आदमी से बँधा है या आदमी कुत्ते से? लेकिन देखिये यदि जंजीर आदमी के हाथ से छूट जाए और कुत्ता भागने लगे तो आदमी उसके पीछे दौड़ने लगता है। स्पष्ट है कुत्ता आदमी से नही आदमी कुत्ते से बँधा है। यह भी अवचेतन का कमाल है। 
विमोह तो हम स्वयं ओढ़ते हैं और दोष किसी अन्य को देते हैं। यह खूबसूरत वहम हमारे अवचेतन में अवस्थित हो चुका है। वस्तुतः ये वहम के दीर्घ सूत्र ही अपने अवचेतन से हटाने हैं। ये दीर्घ भी इसलिए लग रहे हैं कि हमने इन्हें दीर्घ मान लिये हैं अन्यथा तो ये सुबह पत्तों पर जमी ओस के जमाव से अधिक नहीं है। जब साँप अपनी केंचुली में रहता है तब वह समस्त को एक धुँधलके में डूबा समझता है पर उस केंचुली के हटते ही यथार्थ और सत्य प्रकट हो जाता है। मजे की बात तो यह है कि इस केंचुली को और कोई नही वह स्वयं ही हटाता है। भूगर्भ में मौजूद निर्मल शीतल जल को निर्झर बनने में सतह की कुछ पर्तें ही तो अवरोध बनी होती है। भीतर प्रचुर निर्मल जल राशि विद्यमान है तथा देश, काल और परिस्थिति के अनुकूल होते ही निर्झर फूट पड़ता है। फिर यदि निर्झर दृष्यमान है तो तय है कि वह सारे बन्धनों से मुक्त हो चुका है और अपने स्वयं के माध्यम से आत्म साक्षात्कार कर चुका है। अपने निःसर्ग को प्राप्त कर चुका है। हमें भी वहम सिर्फ इतना सा है कि हम एक रस्सी को साँप समझ बैठे हैं पर ज्ञान रूपी प्रकाश के आते ही वहम दूर हो जाता है और सत्य उजागर हो जाता है। 
भारतीय ऋष्य पंरपरा में विचारक जब आत्मचिन्तन के अतिरेक में पहुँचता है तो सूत्र लिखे जाते हैं। उपरोक्त चार पंक्तियाँ सूत्रात्मक हैं। इनका विस्तार करने पर लगता है कि वे प्रकृति और पुरुष के अक्षुण्ण विधान के ही विवेचन है। 
साधुवाद।

रामनारायण सोनी

Tuesday, January 21, 2020

समीक्षा ९

समीक्षा ९

सांझ-टूटी तारिका

मेरे प्रवासी! 
कविता का मुख्य आलम्बन एक प्रवासी है। यह प्रवासी कौन है जिसे आश्वस्त किया जा रहा है? मेरे ख्याल से तो यह न शरीर न आत्मा न कोई और बल्कि यह मन है। 
ऐसा क्यों है? क्योंकि टूटता मन है, तोड़ता मन है पर जोड़ता भी मन है। मन जितना प्रवास करता है इस जगत में उतना श्रेष्ठ प्रवासी कोई नही।
"यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति। दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं, तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु।"  यजुर्वेद ३४/१
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। प्रकाशों का भी प्रकाश, वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।
"टूटी तारिका" भी एक पारम्परिक संकल्पना ही है। तारे का टूटना वैज्ञानिक सत्य नहीं है क्योंकि तारा तो एक सूर्य है। सूर्य का विखण्डन तो उसके सौरमण्डल का प्रलय है। पर कवि टूटते हुए तारे के विखण्डन को हत भाग्य और एक अभिशाप के रूप में लेता है और मन को इस विखण्डन की विभीषिका से भयमुक्त रखना चाहता है। आशय स्पष्ट है कि यह जगत गगन की तरह विशाल है और इसमें आये दिन विध्वंस चलते रहते हैं पर ए मेरे प्रवासी मन उन ऋणात्मकताओं से घबरा कर तुम किसी हताशा के शिकार न हो जाओ। इन टूटते हुए तारों का सत्य यह है कि ये उल्काएँ हैं जो तुम्हारी जगती की ओर आती हैं पर नैसर्गिक दिव्य आवरण से युक्त होने से वे समय के साथ स्वतः नष्ट हो जावेगी। अतः जो ऋणात्मकता के ध्वंस दिखाई दे रहे हैं वे आभासी हैं इसलिये तू निश्चिंत रह।
मन-चकोर एक अनाेखा रूपक है। चकोर, चाँद और रात एक युग्म है। अँधियारी रात चकोर के लिये हताशा है। चाँद का एकात्म दर्शन चकोर का चरम लक्ष्य है, आनन्द की वह पराकाष्ठा है।
उसकी दैहिक, और आत्मिक लयात्मकता केवल चाँद का दर्शन है। पर यह परिस्थिति तब निर्मित होगी जब समय रात का हो, गगन में चाँद अपनी शुभ्र किरणें लेकर विचर रहा हो। अपने पंखों से प्रवास करते हो, इस निःसर्ग का त्याग तो दमन है। प्रतीक्षा करो कि चाँद निकले। वातायन खुले रहें। प्रतीक्षा करो उस क्षण की जब तुम्हारा प्रिय तुम्हारे समक्ष होगा। 
प्रतीक्षा करो कि चाँद बादलों और परिच्छायाओं से आच्छादित नही होगा, कुहासों का विषैला दंश न होगा। रात काली न होगी। 
तुम्हारा दिव्य गुण ही है यह कि तुम संकल्पों के आवरण में रहो, विकल्पों के कुहासों से दूर रहो। 
"ज्योतिषां ज्योतिरेकं" अर्थात् तुम परम ज्योति से 'ज्योतित' हो। अपने इस दिव्य गुण का तुम्हें संज्ञान हो। वह देखो, /अन्तर-दिवा तुम्हारा/ हुई नहीं भोर इसी से/ बुझा नहीं है। अर्थात् वह आजीवन जयोतित रहता है, यह निःसर्ग ही है। 
वैसे तो सम्पूर्ण कविता मन की विभिन्न स्थितियों-परिस्थितियों का डिसेक्सन है पर कविता की अन्तिम लाइन कविता का आध्यात्मिक अमर संदेश है। विषैली नागिन इसे डंस नही सकेगी। यह मन का अमृतत्व है। 
गीता  
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
इस जीव लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव बना है। वह प्रकृति में स्थित हुआ (देहत्याग के समय) पाँचो इन्द्रियों तथा मन को अपनी ओर खींच लेता है अर्थात् उन्हें एकत्रित कर लेता है।।
 कविता एक रूपक के सहारे मन की उद्वेलनाओं, हताशाओं, भ्रान्तियों और निर्मल धारणाओं के उस पार स्वर्णिम भविष्य की आशा जगाती है। मन की अपरिमित शक्ति का परिचय कराती है। मन का दमन नही करती वरन् उसमें उत्साह भरती है उसे 'किंकर्तव्यविमूढ़' नही बनाती वरन् संकल्प को दृढ़ बनाती है। उसे अपने उद्देष्य पर पूर्णतया केन्द्रित होने पर जोर देती है।

रामनारायण सोनी
22.01.20

Saturday, January 18, 2020

समीक्षा ८

समुद्र का मंथन

समुद्र के किनारे रेत पर
टहलते टहलते ……
गुनगुनाये जा सकते है
गीत
उकेरे जा सकते है
प्रेम संदेश या प्रिय का नाम
पर कौन ले पाता है
थाह समुद्र की गहराई का
लहरे ……..
केवल सतह ही नही होती
वे मथती रहती है
खुद समुद्र को भी गहराई तक
दिन -ओ- रात
निकल चुका है मंथन का विष
निकल चुका है मंथन का अमृत
पर मंथन अब भी जारी है
नही चाहता समुद्र भी
अब ऐसे वरदान
फिर भी करता रहता है
मंथन स्वंय का दिन रात
समुद्र अकेले अकेले अकेले

डॉ सीमा शाहजी
❗❗❗❗❗❗

पौराणिक कथाएँ मात्र मिथक नही है वे सोद्देष्य होती हैं और उनमें स्पष्ट संकेत होते हैं जीवन दर्शन के। समुद्र मन्थन भी एक ऐसी ही गाथा है। मन्थन का अर्थ केवल बिलोना नही है वरन् एक ऐसी प्रक्रिया है जो एक समांगी मिश्रण से उसमें समाहित सार तत्वों को अलग अलग करना है। जो मथा जाए उसमें गाम्भीर्य हो, गहनता हो, प्रचुरता हो, और वे तत्व योगिक न हो। ध्यान रहे पानी को या छाछ को मथने के कोई लाभ न होगा। मन्थन बिना श्रम के असंभव है।
कविता इन सभी शाश्वत नियमों कायदों का ईमानदारी से पालन करती है। समुद्र तट की रेत पर खड़े हो कर मन्थन कर पाना दिवा स्वप्न है। एक और सत्य यहाँ अनावृत होता है कि अमृत प्राप्ति के लिये किया गया मन्थन पहले जहर ले कर आवेगा। अगर रुक गए तो अपना बनाये जिन्न की तरह स्वयं अलादीन को खत्म कर देगा। लेकिन कवियित्री मिथक से और आगे चल पड़ती है। कविता समुद्र मन्थन का हाथ पकड़ कर चलना शुरू करती है और आत्म-मंथन के अपने निर्दिष्ट गन्तव्य तक पहुँच जाती है। समुद्र मंथन मात्र श्राखित रत्नों की प्राप्ति के लिये था परन्तु वहाँ १३ और रत्नों की प्राप्ति होती है। इसी तरह कविता में पुरा मन्थन अब आत्म मन्थन में बदल जाता है। जगत की यात्रा एक अन्तर्यात्रा में रूपान्तरित हो जाती है। लेकिन इस यात्रा को अनन्त यात्रा होना है। कविता अपने सामान्य अर्थों में एक कुछ शब्दों और भावों की जमावट लगती है लेकिन इतनी फौरी नहीं कि पढ़ कर सरपट निकल जाएँ। इसका भी मन्थन किया जाए तो जो निर्गमित तथ्य होगा आत्म मन्थन अविरल हो और उसकी दिशा अन्तर्यात्रा ही हो, परिणाम तो स्वयं सिद्ध सत्य की प्राप्ति होगी। 

स्वस्ति! साधु!!

रामनारायण सोनी

Friday, January 17, 2020

समीक्षा ७

एक कविता डॉ जय वैरागी की। श्वासों की अल्पता और प्राणों का कल्प। चिन्तन के दार्शनिक आयाम।

सत्य की आहुतियों को जानिए
राख है ,भभूतियों को जानिए
साधना उपासना में जब जली
आत्म की अनुभूतियों को जानिए।।

*प्राण के इस कल्प को पहचानिए*
*सत्य के संकल्प को पहचानिए*
*है यहां निर्धारणा में गिनतियाँ*
*श्वास कितनी अल्प है पहचानिए।।*
                  डॉ जय वैरागी

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मेरी नजर में

प्राणों की उपासना

साँस आती है, साँस जाती है। यह क्रम-अनुक्रम लगातार है। जीवन चलता ही जाता है। बस एक बार जा कर नहीं लौटी तो जीवन भी लौट नहीं पाता है। 
यह सत्य है। सत्य का विकल्प नहीं है केवल संकल्प है। लोग अक्सर इस सच को लिखने पढ़ने और सुनने से भी डरते हैं। एक पक्षी होता है शुतुर्मुर्ग, सब पक्षियों में अधिक ऊँचा, विशालकाय। इतना सक्षम कि वह जमीन पर चालीस किलो मीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से दौड़ सकता है लेकिन जब उसे किसी तरफ से बहुत डर लगता है तो वह अपना सिर रेत में धँसा कर छिपा लेता है और समझ लेता है कि अब वह सुरक्षित हो गया है। क्या यह विकल्प है? नहीं यह कोई विकल्प नही है।
प्राण अमूर्त है किसी ने देखा नही। साँस के नेपथ्य में बस प्राण है, वही जीवन का सूत्रधार है। प्राण है तो चेष्टा है, चाह है, पहचान है। जीवन का अस्तित्व ही प्राण से है। परन्तु केवल आती जाती ये साँसें ही जीवन का आधार नहीं है। यदि इसमें प्राण न हो तो शरीर निरी धौंकनी भर है। जीवन की सार्थकता प्राण से है। जिसने प्राण के इस कल्प को पहचाना उसने ही जीवन के महान सत्य को जाना है। इसलिए सत्य को जानिये, संकल्प को पहिचानिये।
दोहा :
'रामु सत्य संकल्प' प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥
            ।।सुन्दर काण्ड।।
साँस कितनी आई कितनी गई इसकी गिनती उम्र हो सकती है लेकिन इस गिनती के उस पार जीवन के यथार्थ में बस प्राण ही की चेतना है। साँस की शक्ति अत्यल्प है। शक्तिमान तो प्राण है। लेकिन इन सब से बड़ी इस प्राण की वह शक्ति है जिससे प्राण जीवन के परम स्रोत से प्राणित है।
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
(केनोपनिषद् 1/8)
जो प्राण के द्वारा प्राणित (चेष्टावान) नहीं है, बल्कि जिससे प्राण अनुप्राणित (चेष्टायुक्त) होता है, उसी ब्रह्म को तू जान। उसे नहीं जिसकी यह संसार उपासना करता है॥
वस्तुतः साधना और उपासना मात्र से उस परमात्म शक्ति को जान पाना भी मंजिल नही पर मार्ग अवश्य है।परमात्म सत्ता वह एक आत्मानुभूति है। अनुभूति निःशब्द है, गूँगे का गुड़ है। इसलिये...
साधना उपासना में जब जली 
आत्म की अनुभूतियों को जानिए ।।
और
सत्य की अनुभितियाँ जीवित रहे 
भ्रमण इस मरघट का होना चाहिए ।
चाहे जितने चोले बदल जाएँ, जन्म मृत्यु के फेरे लग जाएँ ब्रह्म की अर्थात् सत्य की वे अलौकिक अनुभूतियाँ विस्मृत न हों। 
"पार होकर के परिधि से निकल"
जिंदगी का जोग भी आसन ही है।"
कबीर कहता है- "तुम हद से बेहद में चले जाओ।" सीमित से असीमित में चले जाओ, अंत से अनन्त में चले जाओ, असत्य से सत्य में चले जाओ। केवल सत्य ही नित्य है, असत्य बदलता रहता है, जन्मता है विकास पाता है मरता है। अर्थात् "असतो मा सद्गमय।"
वैरागी जी की सहज सरल पंक्तियाँ संकेत करती हैं उपनिषद् के ये कथ्य जिन्हें पढ़ कर केनोपनिषद् का सूत्र स्मरण हो आते हैं। कबीर का स्मरण हो आता है। तुलसी का स्मरण हो आता है। 

साधुवाद

रामनारायण सोनी
(18.01.2020) 

Thursday, January 16, 2020

समीक्षा ६

समीक्षा ५

*परिवर्तन*

सांझ की धूप ने करवट ली 
धुंधलका जाने को तैयार 
जल उठेंगे 
दीप सहस्त्रों
मिटाने को तिमिर 
प्रकाशित करेंगे विश्व को 
समेटेंगे अंधकार को 
लेकर अपने आगोश में 
भर देंगे नए उजास को 
यही क्रम दोहराएगी सृष्टि 
यही परिवर्तन का है आधार 
यही निरंतरता का क्रम 
गतिमान है 
सत्य है 
नित्य है

आशीष त्रिवेदी

🌷🌷🌷🌹🌹🌹

मेरी नजर में

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोड़े आहिं॥
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिट कूदि चढि जाहिं॥

अर्थ
 रहीम कहते है कि देाहों में भले ही असर कम हो परंतु उनके अर्थ बड़े ही गूढ़ और दीर्घ होते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई नट अपने करतब के दौरान अपने बड़े शरीर को सिमटा कर कुंडली मार लेने के बाद छोटा लगने लगने लगता है।

पहले तो बड़ा अटपटा सा लगा कि क्या रिश्तों के भी बीज हो सकते हैं? लेकिन धीरे धीरे लगा कि रहीम ने यों ही नही कहा होगा "दीरघ दोहा अरथ के"। 
"सांझ होने को है।" कहने को तो यह एक कालखण्ड का संकेत है पर इसके पीछे कई और अनुक्रम जुड़े हैं। कुछ शब्दार्थों की तरह लगा तो कुछ लक्षणा शक्ति की तरह। यथा- दीप जलेगा, संध्या वन्दन होगा। गौएँ अपने खूँटों पर पहुँचेगी। गोवत्सों को माँ और मातृत्व प्राप्त होगा। दीपों के जलने पर अंधकार दूर होगा। 
एक फसल रिश्तों की होगी दूसरी भावों की होगी,  संवेदनाओं की होगी। रिश्तों के बीज सा एक बीज यह भी है। रिश्ते भी उगते हैं। सांझ के धुँधलके का बीज कितने आयामों के द्वारा खोलता है। बीज का उपाख्यान केवल खुद के उग जाने से पूरा नहीं होता वरन वह बहुगुणन भी करता है अपने कई प्रतिरूपों में। रिश्ते भी बहुगुणन करते हैं बीजों की तरह। जैसे बेटी ब्याह कर जाती है जवाँई के संग। यह बीजकृत रिश्ता है। पर इस रिश्ते के माध्यम से वह अनेक रिश्तों का एक नया ससार खड़ा करती है। कुछ रिश्ते वह अपने लिये और कुछ अपनों के लिये तैयार करती है। सच है एक रिश्ते का बीज बोया तो कई और रिश्तों की फसल उग आती है। 
जब दीप जलेंगे तो अन्धकार खुद को समेट कर अलग बैठा होगा। यह दीप के साहस का सम्मान है पर दीप से अन्धकार का अटूट रिश्ता भी है। वह इतना दूर भी नही जावेगा कि फिर लौट न सके। अन्धकार और दीप के बीच उजास एक और रिश्ता बन कर खड़ा है जो रिश्तों का विकास भी है। यह "उजास" एक नया रिश्ता है। कविता में यह रिश्ता नेपथ्य से झाँकता नजर आता है। 
यह सच है कि सृष्टि अपना यह क्रम अनवरत दोहराएगी। उजास समय की माँग के अनुसार आवेगा फिर अपना प्रयोजन पूरा होने पर चला जावेगा और पुनः पुनः लौट कर आवेगा। परिवर्तन होगा पुनरावृत्ति की शक्ल में। रिश्ते फिर कायम होंगे। 
सृष्टि तीन कालों में आबद्ध है। उत्पत्ति, पालन और लय के तीन चरणों व्यवहृत है। घटना क्रमों में कार्य का गतिशील होना उसके विकास की धारा सुनिश्चित करता है। समस्त सृष्टि अव्यक्त से व्यक्त होती हैं। आदि से लय के बीच गतिशीलता होती है, निरन्तरता होती है। जो नित्य नही है वह निरन्तर है। सत्य ही नित्य है।
जिस प्रकार नेपथ्य में खड़े सूत्रधार रंगमंच के संपूर्ण परिदृष्य गढ़ता है वैसे ही कविता अन्दर बाहर को समन्वित करती है। अध्यात्म से अधिभूत को जोड़ती है। अपना उद्देष्य पूरा करती है।

रामनारायण सोनी


Wednesday, January 15, 2020

समीक्षा ५

डॉ जय वैरागी अपने सृजन में अनूठे प्रयोग करते हैं। इनकी रचनाओं में भारतीय जीवन दर्शन की गहरी छाप मिलती है और कविता  सकारत्मकता की ओर ले जाती है। प्रस्तुत है उनकी एक कविता जो उन्होने 2002 में लिखी है।
मै  नए  युग  का पुरोधा
युग  बदलना  जानता  हूँ
वक्त    की    धारा  की  हर
तासीर  को   पहचानता हूँ

सृजन  और  विध्वंस  के मैं
गीत  युग  से गा  रहा  हूँ
बह  रही  धारा  के  संग  संग
मै भी बहता जा  रहा  हूँ

पर  अटल विश्वास  की
चट्टान  सा  पथ  में कही
जब पडा  गढना मुझे
नव  शून्य  मैं बनता  वही ।।

मील  का   पत्थर  स्वयं को
हर  दिशा  मै  मानता  हूँ   ।।

नव सृजन नव चेतना का
जब कभी  आगाज़ होगा
ठूंठ में नव कोपलों से
फिर नया मधुमास होगा

जब मरुथल  में हरापन
ढाँक लेगा लाज को
रेत की स्वर रागिनी भी
साथ देगी साज को

शंख की जब गर्जनाएँ
युद्ध मे उदघोष देगी
दण्ड की नियमावली में
कौरवों को दोष देगी ।।

नैपथ्य में गांडीव सा प्रण
मैं कही जब तानता हूँ
मैं नए युग का पुरोधा
युग बदलना जनता हूँ  ।।

      डॉ. जय वैरागी
        2002

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"मेरी नजर में"

कविता का अंश

"नव सृजन नव चेतना का
जब कभी आगाज़ होगा
ठूंठ में नव कोपलों से
फिर नया मधुमास होगा"

कोई कहता है बसन्त के बाद ग्रीष्म आती है, कोई कहता है बसन्त बरस में एक ही बार आती है तो कोई कहता है शिशिर के बाद बसन्त आती ही है, पतझड़ के बाद बसन्त आती ही है।
जो लोग पतझड़ के बाद बसन्त को अवश्यंभावी समझते है सृजन की सामर्थ्य केवल उन्हीं में है। वे ठूँठ में से नवपल्लव उगाते है। मैने देखा है, यह सत्य घटना है - किसान के नींबू के खेत में कोई पेड़ को जमीन के छह इन्च ऊपर से काट गया। वह मन मसोस कर रह गया। कुछ दिन बाद उसने उस ठूँठ में नींबू की एक कलम लगा दी। समय आने पर उस में अंकुर फूट आये। कुछ समय बाद उसमें फल आने शुरू हो गए। विध्वंस के बाद भी नव सृजन की अपरिमित संभावनाएँ मौजूद हैं।
वास्तव में कोंपलों का सृजन मधुमास के गढ़ने की तैयारी है। नव चेतना का आह्वान बीज में से अंकुरण का आह्वान है वही द्वार खोलता है पौधे के नव सृजन का। नव चेतना का आह्वान कलिका के  फूटने से फूल के सृजन की तैयारी है। कठोर चट्टानों में से सोता फूटने पर झरने के सृजन का आगाज ही है। जब जब ऐसे आगाज़ अंजाम पाएँगे वे जड़त्व में चेतना लाएँगे, अमूर्त आशाएँ साकार होंगी । चेतना का सर्व श्रेष्ठ गुण है विकास और विकास के बिना सृजन अकल्पनीय है। मधुमास भी चेतना के माध्यम से विकास ही है, प्रकृति का स्वाभाविक सृजन है। प्रकृति की यह सृजन प्रक्रिया जगत में जीवन की संचेतना है। कविता आगे न सिर्फ अनूठे परिदृष्य निर्माण करती है अपितु वह नित्य निरन्तर अग्रसर होने को कहती है।

"सृजन और विध्वंस के मैं
गीत युग से गा रहा हूँ
बह रही धारा के संग संग
मै भी बहता जा रहा हूँ"

परमाणु युद्ध की भीषण त्रासदी मानव इतिहास की सब से वीभत्स घटना है। जिसने न केवल सम्पदा को विनष्ट किया बल्कि बचे खुचे जीवन को पीडाओं के अम्बार में धकेल दिया। इस  विस्फोट के पूर्व और बाद के जापान की तुलना कर के देखिये। वहाँ पर ठूँठ में कोंपल उगाने की क्षमता नहीं पैदा हुई होती तो वह देश मर ही जाता। उसने नव चेतना का आह्वान न किया होता तो नव सृजन भी अकल्पनीय होता। डॉ जय वैरागी की ये पंक्तियाँ आपके भीतर संन्निहित चेतना का आह्वान कर नव सृजन के लिये आमन्त्रित कर रही है।
इसलिये बसन्त के बाद के ग्रीष्म की प्रकल्पना छोड़िये, पतझड़ के बाद के बसन्त होने की नव चेतना का आगाज़ कीजिये।
इसलिये अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली नव चेतना का आह्वान कीजिये। मृत्यु से अमरता की ओर गमन कीजिये।
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय।

रामनारायण सोनी

Monday, January 13, 2020

समीक्षा ३

*वो पिता ही होता है*
जो दुख दर्द को हरदम पीता है
ग़म !खाता ग़मज़दा नहीं होता
वह पिता ही होता है ........!
उसके दुख दर्द का पता सबको होता है ........
लेकिन !महसूस! कौन करता है....!
हाँ !वह अकेले में रोता है
आसुओं को पीकर भी बाहर से
खारा !ओर अंदर से "मीठा"ही होता है
वो !पिता ही होता है .....  .!!
सब ! सब कुछ !" सब "को देने की चाहत में .......!
मैं ! मेरा !अपना !सब कुछ  दे चुका होता .....
वो ! पिता ही होता है .......!!
बस ! एक शब्द ! सुनकर बेहद ! दुखी... 
विचलित !होता .......!
क्या ! किया आपने "हमारे"लिए....?
शायद !यही "सुनने" के लिए ... 
उम्रभर ! मर-मर के जीता है
जीते !जी मर के भी जीता है .....
वो ! विष !पीकर भी ...  
जीता...  है
वो ! पिता ही होता वो पिता ही होता है .........!!!
बी.डी. गुहा रायपुर छत्तीसगढ़✍🙏

*मां*
-- -------*---------
माँ !शब्द नहीं ......
शब्द !कोष है .......!
अंत !नहीं प्रारम्भ है
अनन्त !स्वरूप !अनन्त ऋचाएं...
मूलतः मां ......
सिर्फ !मां है.........!!
नन्हा !सा शब्द "मां" .......
शब्द !नहीं शब्द ! सागर है .... .!
मां !गागर !में सागर है ....
मां !श्रष्टि में श्रेष्ठ ! श्रेष्ठतम ....
सुख !सागर है .......!!
दया !ममता !करुणा!त्याग!
निस्वार्थ!भाव -भावना का
महा!सागर है........!!
तारक!है उद्धारक है ......!
मां...........!!
मां !है तो संसार है संस्कार है ....!
मां ! भाव !नहीं भव सागर है....!!
मां !तुझे प्रणाम ........!
प्रणाम !मां......!!


बी.डी. गुहा रायपुर छत्तीसगढ़

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सर !कविता में "गरीबी और बेबसी"को मैंने भी प्रत्यक्ष भोगा है
जँहा तक मुझे याद है 1975-76 वर्ष में मैं स्वयम 36 किलोमीटर सायकल से आना जाना( आयुध कारखाने में
ठेकेदार के पास मात्र!तीन रुपये दिन की मजदूरी करता था )
इन्ही संघषों के साथ एम ए समाज शास्त्र का अध्ययन पूर्ण किया बाद में लक्ष्मी जी सरस्वती जी की कृपा से अच्छी नोकरी मिली और बेहतर जीवन जी रहा हूँ  लेकिन "वो"पल संघषों का
आना जाना आज भी इंशानियत
के मर्म को समझने में प्रेरक रहा है
यही कारण है कविताओं में मानवीयता का पीड़ित भाव संवेदना अतिसंवेदना के रूप में
शब्दों और भाव भावनाओं में
साकार अनुभूति का प्रतिबिंब
उभरता है  आप एवम ग्रुप के
सभी साथियों का उत्साहवर्धन
हमेशा प्रेरित करता है जो भी
लिखू "अतिरंजित"न लगे
आप सभी का विनम्र सादर आभार 

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प्रिय श्री गुहा जी

समाज के वैषम्य और दैन्य को उघाड़ती कविता, मर्म को भेदती कविता, पर पीड़ा को अनुभूत करती कविता, कवि के व्यथित मन को उद्घाटित करती कविता है यह।
कहते हैं कि कविता कवि के हृदय की अनुकृति है-फोटो कॉपी है। काव्य के मनु कहे गए वाल्मीकि का हृदय भी क्रोंच की पीड़ा का आत्मानुभूत कर गया था और तब से सृजन का यह संसार चल पड़ा। सृजन धर्मा उनके वंशज हैं।
आप भी इसी अनुक्रम में सज्ज हैं।

साधुवाद

रामनारायण सोनी

समीक्षा १

समीक्षा १

*नयनो में बसती गयी छवियां लेकर मर्म।*
*प्यासी है संवेदना प्यासे अपने धर्म।।*
धर्म आत्म आधार है , चेतना मन अविचल ।
निर्झर है परमात्मा निर्झरणी कल कल
हलचल स्पंदित हुई संघर्षों की ओट ।
मेरे मन पर चोट है तेरे मन मे खोट ।।

           डॉ जय वैरागी
           18.11.2019
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मेरी नजर में

मैं दर्पण के सामने खड़ा था। मुझे मैं ही देख रहा था। मैं अपनी छबि देख रहा था पर एक इससे बड़ा मर्म यह था कि छबि मुझे ही देख रही थी। मैंने अपनी उस छबि से कभी नहीं पूछा कि उसने मुझमें क्या देखा? यदि मैं ऐसा कर पाता तो मैं कबीर हो जाता। "जो दिल खोजा आपना"।
यह सच ही है कि मेरी खोज मुझ से बाहर ही बाहर है। क्योंकि छबियाँ सारी नयनों के द्वार पर अटकी रह गई। अगर वे दिल में उतर जाती तो असर कर जाती।
एक फिल्मी गीत है-"आँखों से जो उतरी है दिल में, तसवीर जो उस अनजाने की" आगे के बोल एक गहरी संवेदना की अनुभूति है।
वस्तुतः संवेदना की प्यास अभी बुझी नहीं है। प्यासी संवेदनाएँ अनुभूति कैसे पैदा कर सकती हैं? जैसे एक पशु मैदान में चर रहा होता है और यदि उसके पास कोई अन्य पशु मरा पड़ा हो तो भी चरने वाला पशु चरता ही रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि वहाँ चरने वाले पशु की संवेदना ही मरी पड़ी है। संवेदना नहीं तो अनुभूति नही। संवेदना की अपनी प्यास है। यही मर्म है।
फिर हुआ यूँ कि मैं आइने के सामने से हट गया। मेरे हटते ही मेरी छबि दर्पण से हट गई। अजीब बात है। परन्तु अब मुझे समझ में आ जाना चाहिये कि मैं अपनी छबि लेकर आया था और मेरे हटने सिद्ध हो गया कि मेरी छबि भी मेरे साथ ही चलती है। और तब उस दिन यह मर्म भी समझ में आ गया कि मेरे मर्म भी मेरे साथ ही चलते हैं। लेकिन इसमें संवेदना की प्यास बनी रहना भी जरूरी है। संवेदना हृदय का धर्म है, बोले तो "दिल दा मुआमला है"। हृदय का अप्रतिम लक्षण और शस्त्र है संवेदना। हृदय की प्यास संवेदना की प्यास है और संवेदना की खोज छबियों में होनी चाहिये।
लेकिन फिर जब दर्पण के सामने तुम आओगे, वहाँ तुम्हारी अपनी छबि होगी। मेरी तरह तुम खाली मत लौट जाना। अब वहाँ मेरी नही तुम्हारी छबि है। उसमें संवेदना की तलाश करना। धर्म के मर्म को खोजने का प्रयत्न करना। इस बार एक अनुप्रयोग कर के देखना। अभी तक तुम उससे पूछते रहे हो कि मैं कैसा लग रहा हूँ? अब की बार वह तुमसे पूछेगी कि तुम कैसे लगते हो? तुम्हारा अपना जवाब तुम्हें अंदर तक हिला कर रख देगा। डरना मत। ये जागी संवेदनाएँ तुम्हें आत्मीय अध्यात्म से परिचय कराएँगी। धर्म का पिपासु असल में अध्यात्म का पिपासु है। धर्म की मेन रूट अध्यात्म के गहनतम सागर में होती है।

रामनारायण सोनी

समीक्षा २

पूछा उन से

आवाज खोकर मृत हो गए
पटाखों से पूछा ....

रंग खोकर भी बच गए
कुमकुम से पूछा  ....

बची खुची दीपावली का हश्र ...?
बोल नही पाया
दम तोड़ चुका पटाखा
दम तोड़ चुका रंग
बस इतनी ही आवाज आई
बुझ रहे दीपक से
दीपावली बीत गयी
बचे खुचो का तो
यही हश्र होता है .....।

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मेरी नजर में

नियति ने कुछ युग्म बनाए हैं। सुख दुःख, जन्म मृत्यु, ऊँच नीच, अच्छा बुरा वगैरा वगैरा। सिक्का है तो दो पहलू है। एक तरफ मूल्य लिखा है तो दूसरी तरफ राष्ट्र की कोई पहचान। वैसे ही कविता कुछ सूत्रों की तरह होती है जिनका कलापक्ष लगभग स्थिर होता है पर भावपक्ष विभिन्नता लिये होता है। जैसे "शाम हो गई है" अर्थ देती है कि सूरज डूब गया है। भाव देती है कि दिया जलाओ, रात होने को है, वक्त अब विश्राम का आ गया है आदि आदि। आसमान में घिरे बादल बाढ़ का संदेश भी देते हैं पर उसका जल जीवन भी है।

इसी तरह उक्त कविता के दूसरे पहलू में छिपे उन भावों को उघाड़ने का प्रयास है जो हमारी अपेक्षाएँ और सीख भी है।

पटाखे, रंग और दीपक के माध्यम से संकेत है उनकी अपनी अस्मिताओं का, संबंध है उनके नैसर्गिक धर्म का, परिणति है उनके नैमित्तिक भाग्य का।
लेकिन एक सुखद संदेश है वे उनके अपने अपने औपचारिक दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते हैं। नेपथ्य से झाँकती हताशा स्पष्ट है कि जैसे गन्ने का रस गन्ने के भीतर से उसमें उसका रस एकात्मकता लिये हुए है पर इसी रस के निकल जाने पर अवशेष सिर्फ ईंधन बन कर रह जाता है और अपनी अस्मिता बचाए रखने के बावजूद श्री हीन हो जाता है। रस को यदि मूल्य समझा जाये तो उस से प्राप्त मिठास नाम के दूसरे पहलू को भूलना ठीक नहीं है।
दीपावली एक उत्सव है, एक सुअवसर है। पटाखे, रंग और दीप साधन हैं आनन्द और उत्साह प्रकट करने के । इन तीनों के बगैर दीपावली महज एक पर्व ही रह जाएगा पर उत्सव नही बन पाएगा। जैसे भी हो यदि अपनी अपनी अस्मिता खो कर भी इन साधनों ने परिणति को उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है तो उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि हताशा के।
फूलों की उम्र काँटों से बहुत अल्प है पर अपने उत्सर्ग के पूर्व वे स्वयं को खुशबू के रूप में तकसीम कर चुके होते हैं। हमें उल्लास दे कर वे उल्लसित हैं। कहने को वे चुक गए हैं पर वे अपना धर्म निभा चुके हैं।
वस्तुतः मेरे मन्तव्य में मनोयोग को यू टर्न नहीं लेना चाहिये था अपितु रचनाकार को कृतार्थ होने का अनुभव करना चाहिये था। क्योंकि जो जो जिस जिस प्रयोजन से बना था वह पूरा हआ।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।गीता।।18.45।।

अपने अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गीता।।18.47।।

सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...