Tuesday, January 28, 2020
समीक्षा १२
Sunday, January 26, 2020
समीक्षा ११
श्री धैर्यशील येवले जी पुलिस विभाग में निरीक्षक हैं। इनकी काव्य साधना उत्तम कोटि की है तथा जीवन के यथार्थ और जीवन्त-दर्शन से ओतप्रोत होती है। इनकी एक कविता .....
*मंगलमय*
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है ,
आकाश ,वायु ,जल
पृथ्वी ,अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है ।
मोल तेरा कुछ भी नही
परन्तु तू है अनमोल
बिखरा दे हवा में
अपनी सुगंध
तेरी आत्मा
परमात्मा का ही हिस्सा है ।
आदित्य रश्मियों का
कर स्वागत
अंतस के तमस को
बाहर कर
तू अखंड ज्योति का
ही हिस्सा है ।
ज्ञान के भवसागर से
हो कर जाते है मार्ग
उन्नति के ,
नव वर्ष की शुभघड़ी
लिख रही तेरा ही
मंगलमय किस्सा है।
धैर्यशील येवले इंदौर
🌷💐🌸🌱🌿🌴🌳🧩🌈
*मेरी नजर में*.......
"तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनन्त का हिस्सा है,
आकाश, वायु, जल
पृथ्वी, अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है।"
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।7.9।।
क्योंकि इन सब में पस्मात्मा का निवास है।
"तेरी आत्मा
परमात्मा का ही हिस्सा है ।"
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।
"आदित्य रश्मियों
कर स्वागत
अंतस के तमस को
बाहर कर"
असुर्याः नाम ते लोकाः अन्धेन तमसा आवृताः सन्ति । ये के च जनाः आत्महनः सन्ति ते प्रेत्य तान् अभिगच्छति ।।3/ईशावास्योपनिषद्।।
वे लोक सूर्य से रहित हैं और गाढ़े अन्धकार से आच्छादित हैं। उन लोकों को वे सभी लोग यहां से प्रयाण करने पर पहुंचते हैं जो कोई भी अपनी आत्मा का हनन करते हैं।
इसलिये तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
तू अखंड ज्योति का
ही हिस्सा है ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।गीता 15/18।।
समस्त ज्योतियों में स्थित स्थूल ज्योति में उसी ज्योति को श्रेष्ठ कहा गया है, जो सबके हृदय में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानगम्य तीनों रूपों में प्रविष्ट है।
तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है ,
ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानंभूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एवयच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव।।माण्डूक्योपनिषद्।।
'ॐ' अक्षर अविनाशी 'ब्रह्म' का प्रतीक है। उसकी महिमा प्रकट ब्रह्माण्ड से होती है। भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों वाला यह संसार 'ॐकार' ही है। यह सम्पूर्ण जगत् 'ब्रह्म-रूप' है। 'आत्मा' भी ब्रह्म का ही स्वरूप है। 'ब्रह्म' और 'आत्मा' चार चरण वाला स्थूल या प्रत्यक्ष, सूक्ष्म, कारण तथा अव्यक्त रूपों में प्रभाव डालने वाला है।
"आकाश, वायु, जल
पृथ्वी, अग्नि
ने सुनाया वो किस्सा है।"
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।गीता।।7/4।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।
धैर्यशील येवले जी ने आज जो अपनी कविता में सहज रूप में जो जो लिख डाला वह मुझे गीतात्मक और औपनिषदेय चिन्तन लगा।
समस्त व्यष्टि और समष्टि में ब्रह्म को समझना श्रेष्ठ चिन्तन है।
रामनारायण सोनी
Saturday, January 25, 2020
समीक्षा ९
Friday, January 24, 2020
समीक्षा १०
Tuesday, January 21, 2020
समीक्षा ९
Saturday, January 18, 2020
समीक्षा ८
Friday, January 17, 2020
समीक्षा ७
Thursday, January 16, 2020
समीक्षा ६
Wednesday, January 15, 2020
समीक्षा ५
डॉ जय वैरागी अपने सृजन में अनूठे प्रयोग करते हैं। इनकी रचनाओं में भारतीय जीवन दर्शन की गहरी छाप मिलती है और कविता सकारत्मकता की ओर ले जाती है। प्रस्तुत है उनकी एक कविता जो उन्होने 2002 में लिखी है।
मै नए युग का पुरोधा
युग बदलना जानता हूँ
वक्त की धारा की हर
तासीर को पहचानता हूँ
सृजन और विध्वंस के मैं
गीत युग से गा रहा हूँ
बह रही धारा के संग संग
मै भी बहता जा रहा हूँ
पर अटल विश्वास की
चट्टान सा पथ में कही
जब पडा गढना मुझे
नव शून्य मैं बनता वही ।।
मील का पत्थर स्वयं को
हर दिशा मै मानता हूँ ।।
नव सृजन नव चेतना का
जब कभी आगाज़ होगा
ठूंठ में नव कोपलों से
फिर नया मधुमास होगा
जब मरुथल में हरापन
ढाँक लेगा लाज को
रेत की स्वर रागिनी भी
साथ देगी साज को
शंख की जब गर्जनाएँ
युद्ध मे उदघोष देगी
दण्ड की नियमावली में
कौरवों को दोष देगी ।।
नैपथ्य में गांडीव सा प्रण
मैं कही जब तानता हूँ
मैं नए युग का पुरोधा
युग बदलना जनता हूँ ।।
डॉ. जय वैरागी
2002
🌹🌷🌹🌷🌹
"मेरी नजर में"
कविता का अंश
"नव सृजन नव चेतना का
जब कभी आगाज़ होगा
ठूंठ में नव कोपलों से
फिर नया मधुमास होगा"
कोई कहता है बसन्त के बाद ग्रीष्म आती है, कोई कहता है बसन्त बरस में एक ही बार आती है तो कोई कहता है शिशिर के बाद बसन्त आती ही है, पतझड़ के बाद बसन्त आती ही है।
जो लोग पतझड़ के बाद बसन्त को अवश्यंभावी समझते है सृजन की सामर्थ्य केवल उन्हीं में है। वे ठूँठ में से नवपल्लव उगाते है। मैने देखा है, यह सत्य घटना है - किसान के नींबू के खेत में कोई पेड़ को जमीन के छह इन्च ऊपर से काट गया। वह मन मसोस कर रह गया। कुछ दिन बाद उसने उस ठूँठ में नींबू की एक कलम लगा दी। समय आने पर उस में अंकुर फूट आये। कुछ समय बाद उसमें फल आने शुरू हो गए। विध्वंस के बाद भी नव सृजन की अपरिमित संभावनाएँ मौजूद हैं।
वास्तव में कोंपलों का सृजन मधुमास के गढ़ने की तैयारी है। नव चेतना का आह्वान बीज में से अंकुरण का आह्वान है वही द्वार खोलता है पौधे के नव सृजन का। नव चेतना का आह्वान कलिका के फूटने से फूल के सृजन की तैयारी है। कठोर चट्टानों में से सोता फूटने पर झरने के सृजन का आगाज ही है। जब जब ऐसे आगाज़ अंजाम पाएँगे वे जड़त्व में चेतना लाएँगे, अमूर्त आशाएँ साकार होंगी । चेतना का सर्व श्रेष्ठ गुण है विकास और विकास के बिना सृजन अकल्पनीय है। मधुमास भी चेतना के माध्यम से विकास ही है, प्रकृति का स्वाभाविक सृजन है। प्रकृति की यह सृजन प्रक्रिया जगत में जीवन की संचेतना है। कविता आगे न सिर्फ अनूठे परिदृष्य निर्माण करती है अपितु वह नित्य निरन्तर अग्रसर होने को कहती है।
"सृजन और विध्वंस के मैं
गीत युग से गा रहा हूँ
बह रही धारा के संग संग
मै भी बहता जा रहा हूँ"
परमाणु युद्ध की भीषण त्रासदी मानव इतिहास की सब से वीभत्स घटना है। जिसने न केवल सम्पदा को विनष्ट किया बल्कि बचे खुचे जीवन को पीडाओं के अम्बार में धकेल दिया। इस विस्फोट के पूर्व और बाद के जापान की तुलना कर के देखिये। वहाँ पर ठूँठ में कोंपल उगाने की क्षमता नहीं पैदा हुई होती तो वह देश मर ही जाता। उसने नव चेतना का आह्वान न किया होता तो नव सृजन भी अकल्पनीय होता। डॉ जय वैरागी की ये पंक्तियाँ आपके भीतर संन्निहित चेतना का आह्वान कर नव सृजन के लिये आमन्त्रित कर रही है।
इसलिये बसन्त के बाद के ग्रीष्म की प्रकल्पना छोड़िये, पतझड़ के बाद के बसन्त होने की नव चेतना का आगाज़ कीजिये।
इसलिये अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली नव चेतना का आह्वान कीजिये। मृत्यु से अमरता की ओर गमन कीजिये।
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय।
रामनारायण सोनी
Monday, January 13, 2020
समीक्षा ३
*वो पिता ही होता है*
जो दुख दर्द को हरदम पीता है
ग़म !खाता ग़मज़दा नहीं होता
वह पिता ही होता है ........!
उसके दुख दर्द का पता सबको होता है ........
लेकिन !महसूस! कौन करता है....!
हाँ !वह अकेले में रोता है
आसुओं को पीकर भी बाहर से
खारा !ओर अंदर से "मीठा"ही होता है
वो !पिता ही होता है ..... .!!
सब ! सब कुछ !" सब "को देने की चाहत में .......!
मैं ! मेरा !अपना !सब कुछ दे चुका होता .....
वो ! पिता ही होता है .......!!
बस ! एक शब्द ! सुनकर बेहद ! दुखी...
विचलित !होता .......!
क्या ! किया आपने "हमारे"लिए....?
शायद !यही "सुनने" के लिए ...
उम्रभर ! मर-मर के जीता है
जीते !जी मर के भी जीता है .....
वो ! विष !पीकर भी ...
जीता... है
वो ! पिता ही होता वो पिता ही होता है .........!!!
बी.डी. गुहा रायपुर छत्तीसगढ़✍🙏
*मां*
-- -------*---------
माँ !शब्द नहीं ......
शब्द !कोष है .......!
अंत !नहीं प्रारम्भ है
अनन्त !स्वरूप !अनन्त ऋचाएं...
मूलतः मां ......
सिर्फ !मां है.........!!
नन्हा !सा शब्द "मां" .......
शब्द !नहीं शब्द ! सागर है .... .!
मां !गागर !में सागर है ....
मां !श्रष्टि में श्रेष्ठ ! श्रेष्ठतम ....
सुख !सागर है .......!!
दया !ममता !करुणा!त्याग!
निस्वार्थ!भाव -भावना का
महा!सागर है........!!
तारक!है उद्धारक है ......!
मां...........!!
मां !है तो संसार है संस्कार है ....!
मां ! भाव !नहीं भव सागर है....!!
मां !तुझे प्रणाम ........!
प्रणाम !मां......!!
बी.डी. गुहा रायपुर छत्तीसगढ़
🌹🌹🌹🌷🌷🌷🌹🌹🌹
सर !कविता में "गरीबी और बेबसी"को मैंने भी प्रत्यक्ष भोगा है
जँहा तक मुझे याद है 1975-76 वर्ष में मैं स्वयम 36 किलोमीटर सायकल से आना जाना( आयुध कारखाने में
ठेकेदार के पास मात्र!तीन रुपये दिन की मजदूरी करता था )
इन्ही संघषों के साथ एम ए समाज शास्त्र का अध्ययन पूर्ण किया बाद में लक्ष्मी जी सरस्वती जी की कृपा से अच्छी नोकरी मिली और बेहतर जीवन जी रहा हूँ लेकिन "वो"पल संघषों का
आना जाना आज भी इंशानियत
के मर्म को समझने में प्रेरक रहा है
यही कारण है कविताओं में मानवीयता का पीड़ित भाव संवेदना अतिसंवेदना के रूप में
शब्दों और भाव भावनाओं में
साकार अनुभूति का प्रतिबिंब
उभरता है आप एवम ग्रुप के
सभी साथियों का उत्साहवर्धन
हमेशा प्रेरित करता है जो भी
लिखू "अतिरंजित"न लगे
आप सभी का विनम्र सादर आभार
🌹🌹🌹🌹🌷🌷🌷
प्रिय श्री गुहा जी
समाज के वैषम्य और दैन्य को उघाड़ती कविता, मर्म को भेदती कविता, पर पीड़ा को अनुभूत करती कविता, कवि के व्यथित मन को उद्घाटित करती कविता है यह।
कहते हैं कि कविता कवि के हृदय की अनुकृति है-फोटो कॉपी है। काव्य के मनु कहे गए वाल्मीकि का हृदय भी क्रोंच की पीड़ा का आत्मानुभूत कर गया था और तब से सृजन का यह संसार चल पड़ा। सृजन धर्मा उनके वंशज हैं।
आप भी इसी अनुक्रम में सज्ज हैं।
साधुवाद
रामनारायण सोनी
समीक्षा १
समीक्षा १
*नयनो में बसती गयी छवियां लेकर मर्म।*
*प्यासी है संवेदना प्यासे अपने धर्म।।*
धर्म आत्म आधार है , चेतना मन अविचल ।
निर्झर है परमात्मा निर्झरणी कल कल
हलचल स्पंदित हुई संघर्षों की ओट ।
मेरे मन पर चोट है तेरे मन मे खोट ।।
डॉ जय वैरागी
18.11.2019
🌷🌷🌷🌷🌷
मेरी नजर में
मैं दर्पण के सामने खड़ा था। मुझे मैं ही देख रहा था। मैं अपनी छबि देख रहा था पर एक इससे बड़ा मर्म यह था कि छबि मुझे ही देख रही थी। मैंने अपनी उस छबि से कभी नहीं पूछा कि उसने मुझमें क्या देखा? यदि मैं ऐसा कर पाता तो मैं कबीर हो जाता। "जो दिल खोजा आपना"।
यह सच ही है कि मेरी खोज मुझ से बाहर ही बाहर है। क्योंकि छबियाँ सारी नयनों के द्वार पर अटकी रह गई। अगर वे दिल में उतर जाती तो असर कर जाती।
एक फिल्मी गीत है-"आँखों से जो उतरी है दिल में, तसवीर जो उस अनजाने की" आगे के बोल एक गहरी संवेदना की अनुभूति है।
वस्तुतः संवेदना की प्यास अभी बुझी नहीं है। प्यासी संवेदनाएँ अनुभूति कैसे पैदा कर सकती हैं? जैसे एक पशु मैदान में चर रहा होता है और यदि उसके पास कोई अन्य पशु मरा पड़ा हो तो भी चरने वाला पशु चरता ही रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि वहाँ चरने वाले पशु की संवेदना ही मरी पड़ी है। संवेदना नहीं तो अनुभूति नही। संवेदना की अपनी प्यास है। यही मर्म है।
फिर हुआ यूँ कि मैं आइने के सामने से हट गया। मेरे हटते ही मेरी छबि दर्पण से हट गई। अजीब बात है। परन्तु अब मुझे समझ में आ जाना चाहिये कि मैं अपनी छबि लेकर आया था और मेरे हटने सिद्ध हो गया कि मेरी छबि भी मेरे साथ ही चलती है। और तब उस दिन यह मर्म भी समझ में आ गया कि मेरे मर्म भी मेरे साथ ही चलते हैं। लेकिन इसमें संवेदना की प्यास बनी रहना भी जरूरी है। संवेदना हृदय का धर्म है, बोले तो "दिल दा मुआमला है"। हृदय का अप्रतिम लक्षण और शस्त्र है संवेदना। हृदय की प्यास संवेदना की प्यास है और संवेदना की खोज छबियों में होनी चाहिये।
लेकिन फिर जब दर्पण के सामने तुम आओगे, वहाँ तुम्हारी अपनी छबि होगी। मेरी तरह तुम खाली मत लौट जाना। अब वहाँ मेरी नही तुम्हारी छबि है। उसमें संवेदना की तलाश करना। धर्म के मर्म को खोजने का प्रयत्न करना। इस बार एक अनुप्रयोग कर के देखना। अभी तक तुम उससे पूछते रहे हो कि मैं कैसा लग रहा हूँ? अब की बार वह तुमसे पूछेगी कि तुम कैसे लगते हो? तुम्हारा अपना जवाब तुम्हें अंदर तक हिला कर रख देगा। डरना मत। ये जागी संवेदनाएँ तुम्हें आत्मीय अध्यात्म से परिचय कराएँगी। धर्म का पिपासु असल में अध्यात्म का पिपासु है। धर्म की मेन रूट अध्यात्म के गहनतम सागर में होती है।
रामनारायण सोनी
समीक्षा २
पूछा उन से
आवाज खोकर मृत हो गए
पटाखों से पूछा ....
रंग खोकर भी बच गए
कुमकुम से पूछा ....
बची खुची दीपावली का हश्र ...?
बोल नही पाया
दम तोड़ चुका पटाखा
दम तोड़ चुका रंग
बस इतनी ही आवाज आई
बुझ रहे दीपक से
दीपावली बीत गयी
बचे खुचो का तो
यही हश्र होता है .....।
🌹🌹🌹🌹🌹
मेरी नजर में
नियति ने कुछ युग्म बनाए हैं। सुख दुःख, जन्म मृत्यु, ऊँच नीच, अच्छा बुरा वगैरा वगैरा। सिक्का है तो दो पहलू है। एक तरफ मूल्य लिखा है तो दूसरी तरफ राष्ट्र की कोई पहचान। वैसे ही कविता कुछ सूत्रों की तरह होती है जिनका कलापक्ष लगभग स्थिर होता है पर भावपक्ष विभिन्नता लिये होता है। जैसे "शाम हो गई है" अर्थ देती है कि सूरज डूब गया है। भाव देती है कि दिया जलाओ, रात होने को है, वक्त अब विश्राम का आ गया है आदि आदि। आसमान में घिरे बादल बाढ़ का संदेश भी देते हैं पर उसका जल जीवन भी है।
इसी तरह उक्त कविता के दूसरे पहलू में छिपे उन भावों को उघाड़ने का प्रयास है जो हमारी अपेक्षाएँ और सीख भी है।
पटाखे, रंग और दीपक के माध्यम से संकेत है उनकी अपनी अस्मिताओं का, संबंध है उनके नैसर्गिक धर्म का, परिणति है उनके नैमित्तिक भाग्य का।
लेकिन एक सुखद संदेश है वे उनके अपने अपने औपचारिक दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते हैं। नेपथ्य से झाँकती हताशा स्पष्ट है कि जैसे गन्ने का रस गन्ने के भीतर से उसमें उसका रस एकात्मकता लिये हुए है पर इसी रस के निकल जाने पर अवशेष सिर्फ ईंधन बन कर रह जाता है और अपनी अस्मिता बचाए रखने के बावजूद श्री हीन हो जाता है। रस को यदि मूल्य समझा जाये तो उस से प्राप्त मिठास नाम के दूसरे पहलू को भूलना ठीक नहीं है।
दीपावली एक उत्सव है, एक सुअवसर है। पटाखे, रंग और दीप साधन हैं आनन्द और उत्साह प्रकट करने के । इन तीनों के बगैर दीपावली महज एक पर्व ही रह जाएगा पर उत्सव नही बन पाएगा। जैसे भी हो यदि अपनी अपनी अस्मिता खो कर भी इन साधनों ने परिणति को उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है तो उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि हताशा के।
फूलों की उम्र काँटों से बहुत अल्प है पर अपने उत्सर्ग के पूर्व वे स्वयं को खुशबू के रूप में तकसीम कर चुके होते हैं। हमें उल्लास दे कर वे उल्लसित हैं। कहने को वे चुक गए हैं पर वे अपना धर्म निभा चुके हैं।
वस्तुतः मेरे मन्तव्य में मनोयोग को यू टर्न नहीं लेना चाहिये था अपितु रचनाकार को कृतार्थ होने का अनुभव करना चाहिये था। क्योंकि जो जो जिस जिस प्रयोजन से बना था वह पूरा हआ।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।गीता।।18.45।।
अपने अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गीता।।18.47।।
सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।
रामनारायण सोनी
डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला
आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...
-
"बूँद की रग रग में पानी ही पानी है" इस बात को समझना आसान है बनिस्बत इसके कि पानी ही से बूँद बनी है या यहाँ पानी का वर्तमान नाम ही ...
-
क्या कानून केवल साक्ष्य ही के नेत्रों से देखता है? ऐसा हो न हो लेकिन लॉ ग्रेज्युएट, खण्डवा निवासी कवि अरुण सातले जी ने अपनी रचना के माध्यम स...
-
डॉ जय वैरागी अपने सृजन में अनूठे प्रयोग करते हैं। इनकी रचनाओं में भारतीय जीवन दर्शन की गहरी छाप मिलती है और कविता सकारत्मकता की ओर ले जाती ...