आज का लघुचिन्तन
आईना, प्रतिबिम्ब और तुम?
(जीवन दर्शन)
•आईना अपना कुछ नहीं, तुम्हारा सच बोलता है। कभी कभी वह आभासी सच बोलता है जैसे कि बायें गाल पर लगे तिल को प्रतिबिम्ब में दायें गाल पर बताता है। तुम रीयल हो वह वर्च्यूअल है। तुम बिम्ब हो वह छाया है। तुम आत्मतत्व हो वह असत् है।
•तुम साफ साफ दिखो इसके लिये समय समय पर उस पर लगी गर्द को साफ करते रहना जरूरी है। विज्ञान कहता है कि तुम्हारे साइज के आधे का आईना तुम्हें पूरा पूरा दिखा सकता है। तुम्हें बाह्य दृष्टि से आईने में दिखने वाले स्थूल के दर्शन होंगे। आईने में तुम स्वयं को देख सको यह शक्ति तुम्हारी अपनी लाक्षणिक क्षमता है।
•आईने का सच असल में तुम्हारा ही सच है। तुम्हारे चेहरे की झुर्रियाँ आईना नहीं मिटा सकता। लेकिन तुम देखने में सक्षम होने के बावजूद स्वयं के मुख को देख नहीं सकते। तुम्हें अपना आत्मस्वरूप देखने के लिये जरूर चाहियेगा।
•तुम्हारी रोती शक्ल को आइना मुस्कुराता हुआ नहीं बता पाएगा। आईना तुम्हारे सिद्धान्त नही आचरण और व्यवहार बताता है। भीतर के सिद्धान्त कर्मों के रूप में रूपायित होते हैं।
•आईना तुम्हारा इतिहास नहीं वर्तमान बताता है। उसके पास इतिहास होता तो वह तुम्हें तुम्हारा बचपन दिखा देता। वह रीयल टाइम कमेन्ट्री है। वह तुम्हारे आँसुओं से आईना गीला नहीं होगा। आत्मा अलिप्त है, कर्म परिलब्धि है और फल परिणाम है।
•तुम्हारे अँधेरे में वह मौन है पर तुम्हारे उजाले वह तुम्हें तुमको लौटा देता है। वर्तमानकाल का संज्ञान जानना हो तो आईने की फंक्सनालिटी से सीखो। भविष्य भी वह नहीं दिखा सकता। आईना तुम्हे साहस देगा। अँधेरा अज्ञान है और प्रकाश ज्ञानस्वरूप है।
•अपना आईना टूटने मत दो वरना तुम टुकड़े टुकड़े दिखाई दोगे। आत्मा की मौलिकता जगत की टूटन से प्रभावित नहीं होती। मतलब बाहरी टूटन से अन्तस को अलग रखो। मन की टूटन अन्तःकरण से दूर रहे।
•अपने खुद के सच से डर कर आईना देखना छोड़ मत देना वरना हो सकता है तुम फिक्टीशियस वर्ल्ड में जीते रहोगे। बाह्य दृष्टि समष्टि का बोध कराती है और अन्तर्दृष्टि अन्तःकरण का। तुम समष्टि में कैसे हो यह आईना बताएगा।
•आईना तुम्हारा जितना स्पष्ट सच बताएगा उतना दुनिया में कोई नही बता सकता। प्रकृति की इस त्रिगुणमयी संकल्पना में उस अन्य दृष्टा की मनोवृत्ति का प्रतिबिम्ब होगे इसलिये तुम्हें आत्मदृष्टा होना चाहिये।
•तुम खुद भी खुद से झूँठ बोल लेते हो पर आईना नहीं। यह तुम्हारा अन्तर्द्वन्द्व है। यह मन और बुद्धि के बीच का संघर्ष है। इस संघर्ष के वर्तमान को तुम्हारे मुख पर उभरे भावों को, रसों को पढ़ कर तुम्हें बता सकता है।
●आइना स्थूल है, बिम्ब कर्म है और तुम स्वयं आत्मा हो। जो तुम हो, वही मैं भी हूँ। तत्वमसि।
रामनारायण सोनी
२२.१२.२३
चिन्तन के आधार स्रोत..
श्रीमद्भगवद्गीता
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।।15.11।।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।5.21।।