Sunday, March 26, 2023

हार-जीत

लहर-लहर

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हार-जीत, जीत-हार

क्या तुमने यही सोच रक्खा है कि तुम्हें हमेशा ही मनचाहा मिलेगा, अनचाहा कभी भी नहीं मिलेगा, यदि ऐसा है तो तो तुम गलत हो। तुम्हें बचपन से खेल खेलना सिखाया गया है जिसमें कभी जीत तो कभी हार होती है। तुम्हें दोनों तरह की आदत होनी चाहिये। तुमने यह शायद सोचा ही नहीं कि तुम्हारी हर जीत में किसी की हार छुपी होती है और तुम्हारी हर हार में कोई सीख छुपी होती है। सावधान! कुछ जीत जीवन को आघात कर सकती है, उसे ऊँचाइयों से गिरा सकती हैं जैसे रावण जीतता गया और एक दिन आततायी हो गया। बुद्ध एक दिन छोटी सी यात्रा में विह्वल हो कर हारे और वानप्रस्थी हो गये पर जब वापस लौटे तो जीत-हार की परिधि से बाहर निकल कर लोककल्याण के सूत्र ले कर जगत में लौटे। 
जीवन में हार जीत का सम्मिश्रण है। याद रहे जीत में दम्भ न हो और हार में अवसाद न हो। ये तो रोज की छोटी-छोटी स्पर्धाओं के तात्कालिक परिणाम हैं जैसे चलती राह में मील के पत्थर होते हैं। हर सुबह अँधेरे पर जीत नहीं है, हर साँझ उजाले की हार नहीं है यह रात दिन के पड़ावों पर घटित होने वाला क्रम है। सुबह श्रम ले कर आती है और साँझ तारों भरी रात अथवा चाँदनी ले कर आती है। न तो यह संघर्ष है न ही द्वन्द्व अपितु यह एक क्रम है। 
एवरेस्ट पर चढ़ कर झण्डा फहराना लोग एवरेस्ट को जीतना समझते हैं, क्या एवरेस्ट हारा है? वह तो आदिकाल से स्वानुशासन में खड़ा है। वस्तुतः एवरेस्ट के शिखर पर पहुँच जाना एक उपलब्धि है, किसी की हार-जीत नहीं। 
एक और बड़ी अजीब बात है कि कभी कभी तुम किसी और की जीत को अपनी हार मान लेते हो, उसके विकास को, उन्नति को देख कर अपने को हारा महसूस करते हो वहीं अपनी किसी उपलब्धि में किसी पर अपनी जीत का आभास करते हो। ये दोनो स्थितियाँ अवाञ्छनीय हैं, आभासी हैं।
इसलिये ध्यान केवल खेल पर हो, खेल भावना से खेल हो। "खेलो बस खेल के लिये फिर परिणाम जो भी हो।"

रामनारायण सोनी

Tuesday, March 21, 2023

जड़ चेतन

जड़ में चेतन का आविर्भाव

कभी कभी हम जो देखते है वह वास्तविकता में कुछ और ही होता है। इसे भ्रम भी नहीं कहा जा सकता। समुद्र के किनारे खड़े हो कर हम देखते हैं तो हमें केवल लहरें दिखाई देती है। अकेली ये लहरें समुद्र नहीं है। समुद्र के भीतर अगर गोता लगा कर देखें तो दिखाई देने वाला पानी, केवल पानी समुद्र नहीं है। आग लगने पर उठने वाला धुआँ कुछ दूर जा कर अदृष्य हो जाता है हमें लगता है वह आकाश में जा कर खो गया पर असल में वह वायुमण्डल की हवा के अणुओं के बीच छिप गया है। दुनिया में जिस जिस वस्तु के जो जो रंग दिखाई देते हैं वे उनके अपने नहीं हैं अपितु वे सूर्य के प्रकाश के वर्णक्रम के एक खास रंग को परावर्तित कर रहे हैं जैसे पत्ता हरा इसलिये दिखाई दे रहा है कि वह उस पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी में से केवल हरा रंग परावर्तित करता है। चाँदनी रात में तारे कहीं चले नहीं जाते है पर लगता है चाँदनी के उजाले ने उन्हें ढँक लिया है। मरुस्थल की तपती रेत पर से उठती गर्म हवा भी पानी की झील लगने लगती है पर वह पानी नहीं है। अर्थात् जो दिखाई पड़ रहा है उसकी वास्तविकता कुछ और ही होती है।
एक बीज जमीन में बोते हैं तो उसमें अंकुर फूटता है, वह बड़ा होते होते पौधा अथवा वृक्ष हो जाता है। हमें यह सारी प्रक्रिया भौतिक प्रकिया मालूम पड़ती है। हम इस बीज से वृक्ष बनने की प्रकिया के पूर्ण साक्षी हो सकते हैं। लेकिन जो दिखाई दे रहा है वह पूरी तरह वैसा नहीं है। इसकी एक चमत्कारिक घटना को हम देख नहीं सकते। बीज एक जड़ वस्तु है, ठीक एक कंकर की तरह। विज्ञान भी इस बात को सिद्ध कर चुका है कि पौधा, वृक्ष आदि अन्य वनस्पतियाँ जीवित है। बड़ा चमत्कार है कि जड़ बीज में से जीवन कैसे प्रस्फुटित हो गया। वस्तुतः जड़ बीज में से अंकुरण की भौतिक प्रक्रिया को हम देखते हैं पर सृष्टिकर्ता की चेतना का वह अंश हमें दिखाई नहीं देता जिसने अंकुर में जीवन का संचार होता है। वास्तव में बीज बोने से वृक्ष होने और फिर उसके सर्वांगीण विकास के प्रत्येक क्षण में चेतना अनवरत काम करती है। वृक्ष को काट देने अथवा आयु पूर्ण हो कर सूख जाने पर वृक्ष फिर वह जड़ रूप में परिवर्तित हो जाता है। हम कहतें हैं वृक्ष मर गया। लेकिन इस आद्योपान्त घटना में हमें उस परमचेतन और उसकी चेतना का आभास नहीं होता।
"हम उस परम चैतन्य और उसकी चेतना का आभास करें"।

रामनारायण सोनी
२२.०३.२३

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...