🤔आज का काल चिन्तन😰
◀ *मन का विखण्डन*▶
*गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।*
*न च शक्नोम्यवस्थ तुं भ्रमतीव च मे मनः॥३०*
भावार्थ:- अर्जुन कह रहे हैं, की हे माघव! मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, और मेरी त्वचा जल रही है। मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ, मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है।
वह बहुत कमजोर दिखाई पड़ रहा है और कहता है कि मैं रथ पर बैठ भी सकूंगा या नहीं, मुझमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं है।
गहरे में मन में जो घटित होता है, वह शरीर के रोएं-रोएं तक फलित हो जाता है। अर्जुन इतना बलशाली होते हुए भी अचानक ऐसा बलहीन हो गया कि रथ पर बैठना उसे कठिन लगने लगा, वह क्षणभर पहले ऐसा नहीं था। इस क्षणभर में वह अशक्त हो गया। इस क्षण भर में ऐसा क्या हो गया है?
इस क्षण में एक ही घटना घटी है। अभी - अभी उसका मन युद्ध के लिए तैयार था लेकिन अचानक उसका मन दुर्बल हो गया। 'मन' स्व-विरोधी हो गया। जैसे ही मन विरोधी खंडों में विभाजित होता है, तत्काल शरीर रुग्ण, दीन हो जाता है। उसके धनुष का गिर जाना, उसके हाथ-पैर का कंपना, उसके रोओं का खड़ा हो जाना इसी बात का सूचक है। शरीर हमारे मन की छाया से ज्यादा नहीं है और उसकी शक्ति से ही वह शासित है। यह जो अर्जुन के साथ हुआ वह उसके मन में पैदा हुए चक्रवात के शरीर तक पहुंचने का परिणाम है। हमारे जीवन में शरीर से बहुत कम चक्रवात मन तक पहुंचते हैं। परन्तु प्रायः वे मन से ही शरीर तक पहुंचते ही हैं।
जगत में दो प्रकार प्रक्रियाओं की संभावनाएँ हैं- या शरीर की प्रक्रिया और या कि चेतना की प्रक्रिया। विज्ञान शरीर की प्रक्रिया पर ध्यान देता है, धर्म मनुष्य की चेतना की प्रक्रिया पर ध्यान देता है।
किसी पेड़ की डाली पर यदि चोट करें तो आवश्यक नहीं है कि जड़ों तक पहुंचे। परन्तु जड़ों को पहुंचाई गयी चोट पत्तों तक अवश्य पहुंच जाती है। इसलिए श्री कृष्ण अर्जुन की उस स्थिति की चिंता करते हैं कि उसकी चेतना को क्या हो रहा है, उसके शरीर पर भी जिस कारण से वे परिणाम दिखाई दे रहे हैं।
परन्तु हम लोग जो उपाय करते हैं वे शरीर से शुरू होने वाले होते हैं पर रूग्णता मिटती ही नहीं। क्योंकि हमारा उपाय मन से शुरू नहीं होता, चेतना से शुरू नहीं होता है।
यह प्रत्येक मनुष्य की स्थिति है। गीता मनुष्य जाति का सटीक मनोविज्ञान है। हमारा जीवन भी अन्तर और बाह्य प्रक्रियाओं का मिला जुला प्रभाव है इसलिए जिंदगी में क्रांति नहीं हो पाती है। लेकिन अर्जुन के जीवन में क्रांति निश्चित है।
अर्जुन संन्यासी हो नहीं सकता क्योंकि जो संसारी होने की भी हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है, उसके संन्यासी होने का कोई उपाय नहीं है। वास्तव में संन्यास संसार से भागने का नाम नहीं है, संसार को पार कर जाने का नाम है।
संन्यास, संसार की जलन और आग का अतिक्रमण है। और जो उसे पूरा पार कर लेता है, वही अधिकारी हो पाता है। संन्यास संसार से विरोध नहीं, संन्यास संसार की संपूर्ण समझ और संघर्ष का फल है। जो संन्यास की स्थिति में आ गया है। वह पलायनवादी हो तब तो अभी रास्ता है उसके सामने। यदि संघर्ष में जाए, तो कठिनाई है।
यहाँ ऐसा लगता है कि गीता अर्जुन के संपूर्ण शरीर की शिथिलता को मिटाने के लिए है। यह सब उसके मन के भीतर समा गए विक्षेप के कारण है। श्री कृष्ण उसे वापस आत्मवान् , संकल्पवान व्यक्तित्व बनाने का उपाय करते है।
निवेदन
रामनारायण सोनी
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