Saturday, August 12, 2023

च्यवनिका #1 से #9 तक

च्यवनिका #1
(अर्थात् बूँद बूँद टपकन)

बूँद #1

टूटता हुआ तारा, आकाश में चमकती बिजली कितनी ही क्षणिक क्यों न हो पर वह दृश्य तो हमारे अन्तर्पट पर लकीरें छोड़  जाती है। इसी तरह तुम आये कुछ पल के लिये मेरे जीवन में और देखो मैं कितना बदल गया हूँ। आकाश में तारा जो टूटा एक चमकती लकीर सी पगडण्डी बना कर छोड़ गया, मेरी मंजिल की राह बन गई है अब वह। बिजली जो चमकी बादलों में, मैंने इस गहन अन्धकार में भी देख लिया कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ ?
हाँ,  मेरा प्रियतम अथवा मेरा गुरू हो तुम। वह छूटी हुई चमक मुझ में गुरूसत्ता के रूप में विद्यमान है। तुम व्यक्ति नहीं हो सकते, तुम मेरे भीतर का प्रकाश बन कर बस गये हो। प्रकाश आत्मा का, प्रकाश जो मुझे तमस के महाब्धि में गिरने से बचायगा, प्रकाश जो जीवन में आने वाली निराशाओं से बचाएगा। यह प्रकाश मेरी जिजीविषा का उत्प्रेरण है। प्रकाश जो परमात्मा का ही है जो तुम्हारे दर्पण से हो कर मुझ तक सहज रूप से पहुँच रहा है।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।श्रीमद्भगवद्गीता 13/18।।
मैं उस सद्गुरू को प्रणाम करता हूँ।

रामनारायण सोनी

च्यवनिका २
(अर्थात् बूँद-बूँद टपकन)

बूँद #2

वे प्रश्न जागरण के

जितनी देर मैं जागता हूँ उस पूरे समय में मेरी आँखे, कान दूसरों को जानने, समझने और उनसे बातें करने में लग जाते हैं। हर प्रश्न में, हर व्यवहार में हर घड़ी उठते प्रश्न उन्हें ही देखने परखने के लिये होते हैं। मैं जब आईने के सामने खड़ा होता हूँ तो मैं किसी अन्य से तुलना करने में लग जाता हूँ जैसे वह मेरे साथ ही खड़ा हो।
यकायक कहीं से उड़ते हुए प्रश्न मेरे कानों में आ घुसते हैं- "तुम कौन हो, क्या हो, क्यों धरती पर आ टपके हो?" मैं चौंक जाता हूँ और दूसरे कान से वे प्रश्न बेजान हो कर गिर पड़ते हैं। जितनी देर तक के वे भीतर रहे मेरी छटपटाहट बनी रही। वे मेरी सहनशीलता के परे थे।
परन्तु ये प्रश्न मुझे मुझसे मिलवा सकते थे, मुझे मैं जानता ही नहीं हूँ वे मेरी पहचान से पहचान करवा सकते थे। वे समुद्र मन्थन के सुमेरू पर्वत थे जो मुझे मथने में सक्षम थे। वे चिन्तन के कच्छप जैसे आधार बन कर आये थे। मेरे भीतर बसे विष जैसे काले रत्न को बाहर निकाल फेंकने में सक्षम थे। अब मन्थन नहीं होगा। अस्मिता की पहिचान के अमृतत्व तक अब नहीं पहुँचा जा सकेगा।
क्या इस तू, तुम, वह और वे के महाजाल में "मैं" तक पहुँच पाना अलक्षित हो जावेगा। मेरा अवचेतन बस इन्हीं से भरा पड़ा है।
सुना है कि अन्धे कमरे से अँघेरे को हटाने के लिये अँधेरे का उलीचना उपाय नहीं है वरन् वहाँ अपना प्रज्जवलित दीप रखना पड़ेगा। आत्मदीप। दृष्टि को अन्तर्दृष्टि बनाना होगी। वे दिवंगत प्रश्न मैं कौन हूँ, क्या हूँ, क्यों जन्मा हूँ? के रूप में परिवर्धित होते ही परिदृश्य बदल जावेंगे, उधर ही जाना होगा। अच्छा! चलता हूँ।

रामनारायण सोनी
०१.०६.२३

च्यवनिका
(अर्थात् बूँद बूँद टपकन)

बूँद #3

च्यवनिकाएँ

वारिद याने बादल। वारिद याने पानी देने वाला। प्रकृति की यह अद्भुत संरचना है। इस बादल का पिता है सागर जो इसके जन्म का कारक है माँ इसकी पूरी धरती है जिसकी गोद में यह खेलता है। आकाश इसका रमणस्थल है। हवा के परों पर अठखेलियाँ करता है। सागर ने सूरज की आग को पिया है और अपने तन से शिबी की तरह का दान बादल के रूप में दिया है। सागर ने जन्म दिया पर अपना नाम इसको नहीं दिया अपितु इसे पानी के नाम पर 'वारिद' दिया है। निश्चित रूप से यह सागर का ही टुकड़ा है। यह 'बादल' उस पानी का ही बीच का नाम है जो चला था पानी फिर बन गया पानी।
यह जो बारिश है न, यह बादल की चुअन है। यही चुअन हम पर जीवन का छिड़काव करने आती है। बादल अगर चूता नहीं तो किसी पहाड़ पर स्वयं को उँडेल देता और धरती पर पानी नहीं केवल बाढ़ होती। यह उपकार है बादल का, उपकार है सागर का, उपकार है पवन का, उपकार है पानी का, उपकार है तेज का, उपकार है आकाश का। प्रकृति के पाँचों प्रखण्ड जी जान से लगे रहते हैं सागर से हम तक जीवन ढोने में। शायद हमने बादल को इस तरह कभी देखा ही नहीं।
बादल सागर के टुकड़े ला कर देता है हमें, जीवन ला कर देता है हमें। बादल की चुअन को संस्कृत में च्यवन कहते हैं। इस च्यवन में से हमारे हिस्से में जो आई है वह 'च्यवनिका' है। जो जीवन देता है वह अमृत है। इसलिये 'च्यवनिका' वह अमृत बिन्दु है जो उस अनन्त परमात्मा के सागर से चले बादलों की ही चुअन है।

रामनारायण सोनी
२.७.२३

हिन्दीशब्दकोश में च्यवन की परिभाषा
च्यवन संज्ञा पुं० [सं०] १. चूना । झरना । टपकना । २. एक ऋषि का नाम । विशेष—इनके पिता भृगु और माता पुलोमा थीं । इनके विषय में कथा है कि जब ये गर्भ में थे, तब एक राक्षस इनकी माता को अकेली पाकर हर ले जाना चाहता था । यह देख च्यवन गर्भ से निकल आए और उस राक्षस के उन्होंने अपने तेज से भस्म कर डाला । ये आपसे आप गर्भ से गिर पड़े थे, इसी से इनका नाम च्यवन पड़ा । एक बार एक सरोवर के किनारे तपस्या करते इन्हें इतने दिन हो गए कि इनका सारा शरीर वल्मोक ( बिमौट = दीमक की मिट्टी) से ढक गया, केवल चमकली हुई आँखें खुली रह गई । राजा शर्याति की कन्या सुकन्या ने इनकी आँखों को कोई अद्भुत वस्तु समझ उनमें काँटे चुभा दिए । इसपर च्यवन ऋषि ने क्रुद्ध होकर राजा शर्याति की सारी सेना और अनुचर वर्ग का मलमूत्र रोक दिया । राजा ने घबराकर च्यवन ऋषि से क्षमा माँगी और उनकी इच्छा देख अपनी कन्या सुकन्या का उनके साथ व्याह कर दिया । सुकन्या ने भी उस वृद्ध ऋषि से विवाह करने में कोई आपत्तिनहीं की । विवाह के पीछे एक दिन अश्विनीकुमार ने आकर सुकन्या से कहा—'बूढे पति को छोड़ दो, हम लोगों से विवाह कर लो' । पर जब वह किसी प्रकार समत व हुई, तब अश्विनीकुमारों मे प्रसन्न हेकर च्यवन ऋषि के बूढे से सुंदर युवक कर दिया । इसके बदले में च्यवन ऋषि ने राजा शर्याति के यज्ञ में अश्विनीकुमारों को सोमरस प्रदान किया । इंद्र ने इसपर आपत्ति की । जब इन्होंने नहीं माना, तब इद्र ने इसपर वज्र चलाया । च्यवन ऋषि ने इसपर क्रुद्ध होकर एक महा विकराल असुर उत्पन्न किया, जिसपर इंद्र भयभीत होकर इनकी शरण में आया ।

च्यवनिका
#4

बूँद-बूँद बूँद

सारा समुन्दर बूँद बूँद ही तो है, और बारीकी से देखें तो बूँद ही तो है। बूँद एक शब्द का महाकाव्य है। इसमें सारे सर्ग हैं, सारे सोपान हैं, सारे रस हैं, सारे भाव-विभाव-अनुभाव है। हाँ इसमें संचारीभाव भी है। बूँद व्याकरण भी है और रचना भी। बूँद अनगिनत पात्रों का एकांकी नाटक है। बूँद भीतर से नरम और बाहर से चमकीली है।
बूँद कभी हवा में उड़ जाती है हवा जैसी हो कर, कभी जम जाती है पत्थर सी हो कर। कभी पत्तों की नोक पर ठहर कर मोती की तरह हो जाती है तो कभी दिल से नमक खींच कर लाती है और आँखों से बह कर जी हलका कर देती है। कभी बरखा बन कर धरती को तर बतर कर देती है तो कभी मेरी प्रियतमा की अलकों में ठहर कर श्रृंगार कर देती है। बूँद जो प्यास का समाधान है, बूँद जो पसीने का आधान है यही बूँद कहीं कहीं व्यवधान है। बूँद कभी घुल जाती है किसी में तो बूँद किसी को घोल लेती है खुद में। कभी पुतलियों में तैर जाती है तो कभी सूखी रेत में गिर कर खो जाती है। प्रपात में झरती है तो उसका निनाद लगता है जैसे प्रकृति गाने लगी है।
कुछ बूँदें जो द्रौपदी की आँखों से निकल कर लावा बनी तो अनगिनत लोगों को राख के ढेर में तबदील कर गई। बूँद बूँद बूँद मिल कर बाढ़ बन जाती है तब वह उच्छृंखल हो जाती है, विप्लव का पर्याय बन जाती है। जब ठहर जाती है तो सरोवर, झील, पोखर हो जाती है। बूँदें अपने प्रिय को अलविदा कहने लगती है तो लगता है वह मौन हो कर भी बिरहा गीत गा रही है। कभी इसमें विष घुल जाता है तो कभी नशा। कभी अमृत घुल जाता है तो कभी दवा। बूँद बदलियों के गर्भ में पलती है और जन्मते ही धरा की गोद में आ जाती है। अपनी ही जात के पानी में जब टप-टप टपकती है टिप-टिप का नाद उत्पन्न करती है। इसी बूँद को बरस भर के इन्तजार के बाद पपीहा पिऊ पिऊ कर आकाश में ही पी जाता है। एक लम्बी सी प्यास का छोटा सा प्यारा सा आत्मसात प्रखर प्रेम।
बूँद हमारे मुँह से प्रवेश कर खून में मिल जाती है फिर रग रग में घूमती है फिर एक दिन चिता पर लेट कर आकाश में कहीं गुम हो जाती है। कोई नहीं जानता। आते हुए देखा है उसे सब ने पर कौन देख पाया है उसे इस तरह जाते हुए।

रामनारायण सोनी
28.07.23

च्यवनिका
#4
कौन है जो क्षितिज के पार गया है?
क्षिति का अर्थ है- जमीन, धरती, पृथ्वी। एक और अर्थ भी सुना है-निवास स्थान। जो धरती से जन्मा है वह क्षितिज है या हम जहाँ रहते हैं वहाँ से क्षितिज वह काल्पनिक किन्तु सत्य आभासित होने वाली परिधि है जिसके पार हमारी दृष्टि नहीं जा सकती है। क्षितिज के उस पार अथवा हमारे क्षितिज में रह रहे आदमी का भी अपना क्षितिज है। उसके क्षितिज से हमारा क्षितिज टकराता नहीं है। कमाल की बात है कि आदमी चलता है तो हाथ में पकड़े छाते जैसा अपना क्षितिज उसके अपने साथ साथ चलता है।
कभी कभी लगता है अगर परिधि का यह सीमांकन नहीं होता तो मीलों दूर तक हमें दिखाई देता। प्रकृति ने इस तरह की कई सीमाएँ तय की हैं जैसे अगर हम पूरे जोर से चिल्लावें तो यह आवाज कुछ दूर चल कर मर जाती है। अगर आवाज कुछ दूर चल कर न मरती तो यूक्रेन में बम्बार्डमेन्ट करने वाली मिसाइलों की गड़गड़ाहट यहाँ तक आ कर हमारे कान फोड़ देती। पूरी दुनिया को पूरी दुनियाँ की आवाज सुनाई देती। पानी समुद्र से चल कर आता है और बह कर फिर वहीं चला जाता है अगर बहता नहीं तो धरती पर पानी ही पानी होता। खुशबू और बदबू कुछ दूर चल कर मर जाती है नहीं तो समझ लो क्या हो जाता। मतलब हमारे आँख नाक, कान की प्रति रक्षा की और सृष्टि क्रम को व्यस्थित करने के लिये प्रकृति ने कठोर नियम बनाये है।
श्रीदुर्गासप्तशती के मन्त्र में आता है "या देवि सर्व भूतेषु स्मृति रूपेण संस्थिता" और "या देवि सर्व भूतेषु भ्रान्ति रूपेण संस्थिता"
हमारे शारीरिक संस्थान में स्मृति होने का वरदान है पर बचपन से अभी तक की सारी की सारी घटनाओं का रिकार्ड रहना नहीं होता है। अगर ऐसा होता तो हमारे दिमाग में एक ट्रेन्चिंग ग्राउन्ड होता। इसलिये भूलने का एक अभिशाप हमें वरदान के रूप में मिला हुआ है कि पूरे जीवन की कुछ घटनाओं के कुछ अंश ही हमें स्मृति में रहते हैं। सृष्टिकर्ता की अनगिनत ऐसी अनुकम्पा प्रकृति के माध्यम से अनुशासित ढंग से चल रही है। यह अहसास हमें होते रहना चाहिये।

रामनारायण सोनी
३.७.२३

#5

नदिया चले चले है धारा!

तुम एक नदी हो। बस बहती ही बहती हो। तुमने कभी अपनी धार को देखा ही नहीं। धार एक प्रवाह है, गति है। तुम्हारी इस धार में विकास है क्योंकि तुम अपने घर से चली थी तब एक महीन रेखा थी और चलते चलते ही बढ़ी हो। धार जो कभी मन्थर है, कभी बावली होती है, कभी ऊपर से नीचे गिरती है। धार जो लहरा सकती है, मुड़ सकती है, पत्थरों से टकरा सकती है लेकिन अपने गन्तव्य तक जाने के लिये सदैव तत्पर रहती है।
नदी! तुमने अपनी धार को देखा ही नहीं। तुम धार ही से पर्वत के शिखर को समुन्दर से जोड़ती हो, शहरों को और गाँवों को जोड़ती हो, संस्कृतियों को जोड़ती हो, संस्कारों को पालती हो, लोगों को लोगों से जोड़ती हो।
यह जीवन एक नदी है। जीवन का प्रवाह ही धारा है। बहना और बहते रहना ही धर्म है। जीवन का प्रवाह ही धारा का प्रवाह है। नदी उद्गम से अवसान तक की समग्रता है। नदी का सबसे बड़ा गुण बहना है, गति है, निरन्तरता है।  उसमें जो बहाव है वही धारा है।

रामनारायण सोनी
०१.०८.२३
[03/08, 8:31 am] P K Mathur: My dear Soniji,It was indee a great pleasure to go through your latest piece of your Dharavahik novel chuvenica.It very clearly depicts your philosophical wisdom and imparts the wonderful knowledge of the benefits of continuity , through the example of the river Dhara, in joining together various different literatures,cultures and thought processes.I congratulate you and convey my heart felt greetings and best wishes for your this noble effort .With my affectionate and warm regards,Pratap Mathur.🙏💐👍👍💐🙏
[03/08, 8:32 am] P K Mathur: indeed


च्यवनिका #7

दर्पण का साक्षीभाव

एक दर्पण के पास अपना कुछ भी देने का नहीं है लेकिन उसे जैसे ही कोई बिम्ब मिला उसे वह पूर्ण रूप से लौटा देता है। रंगीन को रंगीन और रंगहीन को रंगहीन ही लौटाता है। रोते को रोता हुआ और हँसते को हँसता हुआ। एक खास बात और है कि गीली वस्तु का प्रतिबिम्ब गीला नहीं लौटाता है। वह केवल आकार ग्रहण करता है और वही लौटाता भी है। वह अपना कोई भी काम अँधेरे में किसी बिम्ब के सामने होते हुए भी वह कुछ नहीं कर पाता। उसे अपना काम करने के लिये उजाला चाहिये।
दर्पण कितनी ही कोशिश करे बिचारा मुखौटे के उस पार नहीं देख पाता है, काले चश्मे के पीछे की आँखों की नमी नहीं देख पाता है। आदमी की चालाकी को पढ़ नहीं पाता है।
चाँद भी एक बड़ा सा दर्पण है जो सूरज से आई रोशनी लौटाता है अगर ऐसा न हुआ होता तो धरती की रातें काली ही रहती। दर्पण और दर्पण बना चाँद बिम्ब को ले कर प्रतिबिम्ब लौटा देता है। पानी को देख कर गीला नहीं होता, आग को देख कर झुलसता नहीं। वह बिम्ब को एक क्षण भी अपने पास नहीं रख पाता। बिम्ब के हटते ही सब गायब।
दर्पण केवल साक्षी है, वह निर्लिप्त है विशुद्ध आत्मा की तरह। दर्पण से निकले प्रतिबिम्ब की तरह चेतना भी आत्मा की व्यापकता का ही स्वरूप है।
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ।।अष्टावक्र गीता १-१२।।

रामनारायण सोनी
6.8.23

[06/08, 12:14 pm] P K Mathur: My dear Soniji, your today’s excellent write-up vividly narrates various nice attributes and short comings of a mirror elegantly.A mirror does reflect and produces the true image of any object without any change or aberration without getting affected by the presence of environmental changes such as water or fire..However ,it is not possible for the mirror to serve in dark as well as probe inside the face masks or behind the coloured glasses.Thus it is not able to recognise and catch the chest and cunning persons.
It can be said that just like the reflection from a mirror,the life energy is a natural and bigger form of the soul ‘s prrception and action.
[06/08, 12:16 pm] P K Mathur: cheat

च्यवनिका #8

जो कुछ तुम्हारे मन का हो तो अच्छा। तुम्हारा जो मन शिद्धत से चाहता हो लेकिन वह न हो पाया तो और भी अच्छा। थोड़ी देर के लिये तुम अवसाद में, पश्चाताप में, सकते में आ जाते हो और हताशा से घिर जाते हो। यह स्थिति दो प्रक्रिया और दो अलग अलग परिणाम की संभावना पैदा करती है। यातो तुम वह काम बन्द कर देते हो या फिर उसी पल एक रिव्यू चालू हो जाता है कि आखिर वे कौन कौन से कारण हैं जिनके रहते कार्य नहीं हो सका। पहली स्थिति में तुम थोड़े भी ठहर गये तो काम की इतिश्री समझो। दूसरी स्थिति में थोड़ी सी देर भी ठहर गये तो तुम्हारे उसी मन में ढेर से सुधारात्मक विचार, कई कई रचनात्मक विधियाँ जन्म लेने लगेगी। इसलिये यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मन काम न होना कई नई सम्भावनाओं को जन्म देता हैं।
"मन के हारे हार है मन के जीते जीत।" मन हारा तो सब हारा। लेकिन हारे हुए मन को वही मन वापस जिता सकता है। इसलिये मन को उसकी अपनी शक्ति से जीतने का अवसर प्रदान करो। बस इतना सा जान लो कि "बाधाओं के उस पार कामयाबी खड़ी है।"

रामनारायण सोनी
९.८.२३

च्यवनिका #9

इन पर्वतों को देखो इन पेड़-पौधों देखो, ये वनस्पति आदि को थाम कर वहीं के वही रुके हुए खड़े हैं, आदिकाल से। सागर को देखो वह चक्रवातों, तूफानों और ज्वारभाटों को अपनी अंक में समेटे अपनी सीमा खुद ही तय करके भी यह शान्त खड़ा है। सूरज स्वयं में निरन्तर विस्फोट झेलता है पर अपना मण्डल अर्थात् सौर परिवार को व्यवस्थित ले कर स्थिर है, अविचल है। और यह धरती ? इसे हमने धरती कह दिया पर शास्त्र इसे भू लोक कहता है। लोक अर्थात् एक सर्वांगीण व्यवस्था जो जीवन देती है, उसे पालती है और उपसंहार होने पर इसे आत्मसात् भी कर लेती है। इस लोक के प्रकट होने के पूर्व से ही इस धरा में मातृत्व प्रकट हो गया था। नदी, नाले, झीलें, सरोवर प्राणियों और प्रकृति लिये जल ले कर मुस्तैद खड़े हैं। हवा हजारों हजार अवरोधों के बावजूद प्राण और गन्ध ले कर निरन्तर चल रही है। देख सकते हो कि इसी प्रकार प्रकृति का प्रत्येक अंग स्वयं कष्ट में है फिर भी अपना धर्म कर्म कभी नहीं छोड़ता और परस्पर सदैव सेवा में रत है। हर कहीं कोई न कोई संकट चल रहा है इसके बावजूद सब चल रहा है।
हम भी थोड़ा विचार कर लें कि इनकी तरह हमारी अपनी जिजीविषा बनी हुई है कि नहीं?

रामनारायण सोनी
१०.०८.२३

Wednesday, August 9, 2023

#9

च्यवनिका #9

इन पर्वतों को देखो इन पेड़-पौधों देखो, ये वनस्पति आदि को थाम कर वहीं के वही रुके हुए खड़े हैं, आदिकाल से। सागर को देखो वह चक्रवातों, तूफानों और ज्वारभाटों को अपनी अंक में समेटे अपनी सीमा खुद ही तय करके भी यह शान्त खड़ा है। सूरज स्वयं में निरन्तर विस्फोट झेलता है पर अपना मण्डल अर्थात् सौर परिवार को व्यवस्थित ले कर स्थिर है, अविचल है। और यह धरती ? इसे हमने धरती कह दिया पर शास्त्र इसे भू लोक कहता है। लोक अर्थात् एक सर्वांगीण व्यवस्था जो जीवन देती है, उसे पालती है और उपसंहार होने पर इसे आत्मसात् भी कर लेती है। इस लोक के प्रकट होने के पूर्व से ही इस धरा में मातृत्व प्रकट हो गया था। नदी, नाले, झीलें, सरोवर प्राणियों और प्रकृति लिये जल ले कर मुस्तैद खड़े हैं। हवा हजारों हजार अवरोधों के बावजूद प्राण और गन्ध ले कर निरन्तर चल रही है। देख सकते हो कि इसी प्रकार प्रकृति का प्रत्येक अंग स्वयं कष्ट में है फिर भी अपना धर्म कर्म कभी नहीं छोड़ता और परस्पर सदैव सेवा में रत है। हर कहीं कोई न कोई संकट चल रहा है इसके बावजूद सब चल रहा है। 
हम भी थोड़ा विचार कर लें कि इनकी तरह हमारी अपनी जिजीविषा बनी हुई है कि नहीं? 

रामनारायण सोनी
१०.०८.२३

Saturday, August 5, 2023

#6

च्यवनिका
#6

दर्पण का साक्षीभाव

एक दर्पण के पास अपना कुछ भी देने का नहीं है लेकिन उसे जैसे ही कोई बिम्ब मिला उसे वह पूर्ण रूप से लौटा देता है। रंगीन को रंगीन और रंगहीन को रंगहीन ही लौटाता है। रोते को रोता हुआ और हँसते को हँसता हुआ। एक खास बात और है कि गीली वस्तु का प्रतिबिम्ब गीला नहीं लौटाता है। वह केवल आकार ग्रहण करता है और वही लौटाता भी है। वह अपना कोई भी काम अँधेरे में किसी बिम्ब के सामने होते हुए भी वह कुछ नहीं कर पाता। उसे अपना काम करने के लिये उजाला चाहिये। 
दर्पण कितनी ही कोशिश करे बिचारा मुखौटे के उस पार नहीं देख पाता है, काले चश्मे के पीछे की आँखों की नमी नहीं देख पाता है। आदमी की चालाकी को पढ़ नहीं पाता है। 
चाँद भी एक बड़ा सा दर्पण है जो सूरज से आई रोशनी लौटाता है अगर ऐसा न हुआ होता तो धरती की रातें काली ही रहती। दर्पण और दर्पण बना चाँद बिम्ब को ले कर प्रतिबिम्ब लौटा देता है। पानी को देख कर गीला नहीं होता, आग को देख कर झुलसता नहीं। वह बिम्ब को एक क्षण भी अपने पास नहीं रख पाता। बिम्ब के हटते ही सब गायब। 
दर्पण केवल साक्षी है, वह निर्लिप्त है विशुद्ध आत्मा की तरह। दर्पण से निकले प्रतिबिम्ब की तरह चेतना भी आत्मा की व्यापकता का ही स्वरूप है। 
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ।।अष्टावक्र गीता १-१२।।

रामनारायण सोनी
6.8.23

Thursday, August 3, 2023

च्यवनिका 6

च्यवनिका
#6

गुरू के पास चलो

दीपक जलता है तो उसके तले अँधेरा होता है, ऐसा लोग कहते हैं लेकिन इसका दूसरा पहलू बड़ा दिलचस्प है। दीपक अँधेरे में ही जलता है और जलते ही वह अपने चारों ओर का अँधेरा दूर करता है। जो कुछ थोढ़ा सा अँधेरा छूट जाता है उसे अपने नीचे रख लेता है। इसका प्रमाण यह है कि उसके बुझते ही छिपा पड़ा अँधेरा फिर चारों ओर फैल जाता है। 
अँधेरा जो पहले से ही मौजूद है वह दीपक के साहस का, दीपक के उत्सर्ग का, दीपक के परमार्थ का सम्मान करता है और जब तक दीपक जलता है वह उसके उजास से सँट कर खड़ा रहता है और मजे की बात यह है कि जब तक दीपक बुझ नहीं जाता वह दूर ही खड़ा रहता है। 
आशा प्रकाश है और निराशा अन्धकार। चिन्तन प्रकाश है और चिन्ता अँधेरा। सकारात्मकता प्रकाश का ही एक रूप है और नकारात्मकता अंधकार का। ज्ञान रोशनी का पर्याय है, अज्ञान अन्धकार का। सत्य प्रकाश का द्योतक है और असत्य अँधेरे का। हर व्यक्ति इसी अँधेरे और प्रकाश के बीच अपनी समस्त जीवन यात्रा पूर्ण करता है। जिनको प्रकाश के इस स्रोत का सही पता मालूम होता है वे इस स्रोत को गुरू कहते हैं। गुरू अज्ञान के अँधेरे में खड़े लोगों का बाहर निकालकर ज्ञान रूपी प्रकाश में लाकर खड़ा करने की क्षमता रखते हैं। जो उनके मन की अँधेरी कोठरी में ज्ञान का सूरज उगा सकते हैं, जो उनका हाथ पकड़कर उजियारे से सीधा परिचय करा सकते हैं। इसीलिये वेद कहता है कि "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात अन्धकार से मुक्ति के लिए प्रकाश की ओर चलो। और इस ज्ञान-प्रकाश के लिये "वरान्निबोधत" अर्थात गुरू के पास जाओ।

रामनारायण सोनी
३.८.२३

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...