*"अन्तर्द्वन्द्व की अमोघ ओषधी"*
प्रकृति निष्पक्ष है। बाग में टहलने वाले सभी व्यक्तियों को फूलों की सुगंध समान रूप से पहुंचती है। कोई सुगंध महसूस करे न करे।
बहुत कुछ है एक ही दृष्य में पर हम वही देखते हैं जो हम चाहते हैं, आवाजें बहुत सी हैं चारों ओर पर हम उनमें से सुनते वही है जो हम सुनना चाहते हैं।
एक पेड़ में माली उस पेड़ की सेहत देखता है, पर्यावरण प्रेमी उसकी पत्तियाँ देख कर प्रसन्न होता है, लकड़ी का व्यापारी उसकी लकड़ियों में धन देख लेता है, धूप में तपा आदमी उसकी छाया देखता है। *पेड़ की समग्रता को देखने के बजाए हर देखने वाला उसे खण्ड खण्ड कर के देखता हैं।* पर देखता वही है जो उसके मन की आँख देखना चाहती है। कक्षा में बैठा विद्यार्थी गुरू के द्वारा पढ़ाया जा रहा पाठ नहीं सुनता है तब उस समय वह बाहर कहीं से आ रही कोयल की कूक सुनता है। वह वही कर रहा है जो वह चाहता है। यह संसार मनोमय है। इसका प्रतिबिम्ब भी मनोमय है। वह समानान्तर क्रम जो बाहर भीतर चल रहा होता है वह सब सब अलग अलग चलता है। बहुत बाद में पता चलता है कि किसने क्या पाया। एक जगत बाहर से दिखता है पर जगत का कोई खण्ड भीतर ही भीतर दिखता है। बाहर उसकी मर्जी से और भीतर अपनी मर्जी से। बाहर भीतर अलग अलग देखने पर समन्वय न होने पर अन्तर्द्वन्द्व खड़ा हो जाता है। और अन्तर्द्वन्द्व तो मन में अनुकूल और प्रतिकूल की चल रही आपसी लड़ाई है। बाहर चल रहे घटनाक्रम को आँख मूँद कर अनदेखा किया जा सकता है पर भीतर मन को कौन मना करेगा। वहाँ वह अकेला नहीं बुद्धी से संयुक्त है इसलिए यह भीतर की लड़ाई बाहर की लड़ाई से कई गुना भारी है। मन भीतर की लड़ाई में व्यस्त है तो इन्द्रियाँ भी शिथिल हो जाती है, शरीर भी शिथिल हो जाता है। इन्द्रियाँ अन्तःकरण से कट जाती है। परिणामत: व्यक्ति विमूढ़ हो जाता है।
अर्जुन महाभारत में खड़े हैं, बाहर धर्मक्षेत्र और कर्मक्षेत्र खड़ा है। उनका 'भीतर' कुछ और ही देख रहा है। भीतर जो देख रहा है वह है रिश्तों की दुर्दम घाटियाँ, मोह की बन्धनाएँ, ग्लानि की धधकती भट्टियाँ और अज्ञान का अजेय शत्रु। अर्जुन का यही अन्तर्द्वन्द्व उन्हें विमूढ़ बना देता है। उनका शरीर जैसे पक्षाघात से ग्रसित हो जाता है। उनके तूणीर में अपार क्षमता वाले दिव्यास्त्र भरे पड़े हैं पर उनको गाण्डीव तक पहुँचाने वाले हाथ शिथिल हो गए हैं। अन्तर्द्वन्द्व में पड़े अर्जुन को यह भान भी नहीं रहा कि उनके पीछे उत्सर्ग का संकल्प लिए विशाल सेना खड़ी है। जिनके सारथि स्वयं वासुदेव कृष्ण हैं।
इस अन्तर्द्वन्द्व को मिटाने वाली श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता सुनने के पश्चात् अर्जुन कहते हैं; हे अच्युत! मेरा अज्ञानजन्य मोह जो कि समस्त संसाररूप अनर्थ का कारण था और समुद्रकी भाँति दुस्तर था, नष्ट हो गया है। और हे अच्युत आपकी कृपा के आश्रित होकर मेरे संशय विच्छिन्न हो गए हैं। इस अज्ञान जनित मोह का नाश और आत्मविषयक स्मृति का लाभ हो गया है तथा मन की विषमता विच्छिन्न हो गई है। इसमें एकत्व का अनुभव करने से मोह और शोक इत्यादि नष्ट हो गए हैं। अब मैं संशय रहित हुआ आपकी आज्ञा के अधीन खड़ा हूँ। मैं आपका कहना करूँगा। अभिप्राय यह है कि मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ। मुझमें अब अन्तर्द्वन्द्व शेष नहीं है।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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