Saturday, March 21, 2026

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला



आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी


साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective)
सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries)
केंद्र बनाम परिधि (Center–Periphery Theory)
विमर्शात्मक विश्लेषण (Discursive Analysis)
शोध शैली भाषा (Academic Hindi + Research tone)


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समीक्षा

एक कविता डॉ मुरलीधर चाँदनीवाला की। 
पुस्तक विरासत के फूल।

        ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
           बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
                         शंख फूँका
             तो कान फट गये कौरवों के।

        ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
                या रावटी के छगन बा ने,
           रोटी के लिये बजाया गया बाजा
               निकल गया कितना आगे।

      आदमी मरते-खपते आगे निकल जाता है,
                मंदिरों में भगवान् देख-देख
                         खुश होते हैं।
       
         ढोल बजाकर क्यों नहीं देखा, भगवान् !
                        एक बार बजाते,
               तो फिर बजाते ही चले जाते।

              एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
                         तुम दूर बैठे हो
                       तो बहुत अच्छा है,
            ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।

                   🍁मुरलीधर चाँदनीवाला
7, प्रियदर्शिनी नगर
रतलाम

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    ।।समीक्षा।।

ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
           बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
                         शंख फूँका
             तो कान फट गये कौरवों के।

ढोल, बाँसुरी और शंख यहाँ प्रतीकात्मक शब्द है। बाँसुरी माधुर्य, प्रेम और रास का संकेत करता है, शंख या तो मंदिरों में आरती के समय बजाया जाता है या पौराणिक काल के युद्ध के उद्घोष के समय बजाया जाता था। भगवान कृष्ण का प्रेम और रास अलौकिक था और शंखनाद महाभारत युद्ध का उद्घोष था। थोड़ा अटपटा तो लगता है कि भगवान कृष्ण ने ढोल क्यों बजा कर नहीं देखा? वास्तव में कृष्ण के बालपन में छह माह की उम्र से लगायत द्वारकाधीश श्री कृष्ण तक का जीवन काल संघर्षों और बाधाओं से भरा रहा शायद इसीलिये उनके जीवन में महारास और महानाश के मध्य लोकरंजन जैसे क्षण उपलब्ध न हो सके। 
कविता अपने प्रतीकों के माध्यम से इसे बखूबी बयान करती है। हम सब इस ढोल को बचपन से सुनते आ रहे हैं पर गौर से नहीं जाना कि यह कि यह "ढोल" आखिर है क्या? 
भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में वाद्यों का वर्गीकरण करते हुए लिखा है किः-
ओतोद्य विधिमिदानी व्याख्यास्यमः। तद्यथा-
ततं चैवावनद्धं च घने सुषिर मेव च।
चतुर्विधं तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम्।।1।।
ततं तन्त्री गतं ज्ञेयनवनद्धं तु पौष्करम्।
घनं तालस्तु विज्ञेयः सुषिरो वंश उच्चते।।2।।
वाद्य यंत्रों के उपर्युक्त चार वर्ग निम्नांकित हैं-
1. घन वाद्य: बिणाई, काँसे की थाली, मजीरा, घाना/घानी, घुँघरू, कँसेरी, झाँझ आदि
2. चर्म वाद्य: हुड़का, डौंर, हुड़क, ढोलकी, "ढोल", दमाऊँ, नगाड़ा, धतिया नगाड़ा आदि
3. सुशिर वाद्य: मुरुली, जौंया मुरली, भौंकर/भंकोरा, तुरही, शंख आदि
4. ताँत वाद्य: (या उर्ध्वमूखी नाद) ताँत वाद्य/तार आदि।
शंख-घंट तथा उर्ध्वमुखी नाद ऐसे वाद्य हैं जिन्हें लोक वाद्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
लोक वाद्य हमारे मन को संगीतमय बनाते आए हैं। लोक वाद्यों ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि संपूर्ण प्रकृति संगीतमय है। यह संगीत सृष्टि के प्रारंभ से ही सम्पूर्ण जीव-जगत में व्याप्त है। प्रकृति के कण-कण से अविरल प्रवाहित होता है सुर और ताल की सीमाओं में बँधा उन्मुक्त संगीत, उसकी लय में परियों का छम-छम नर्तन। इसी ने लोक जीवन को बांध कर रखा है। कई वाद्ययंत्रों का जन-मानस द्वारा पूर्व काल से ही प्रयोग किया जा रहा है। ये वाद्य हमारे लोक-जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। इसीलिए इन्हें लोकवाद्य कहा जाता है। इन्हें बजाने वाले का संबोधन "लोक वादक" के नाम से किया जाता है। लोक संस्कृति की सीमा अनन्त है। इन लोक वाद्यों को सामाजिक धरोहर के रूप में संजोकर वर्तमान पीढ़ी तक सुरक्षित रखने का श्रेय इन्ही लोक वादकों को जाता है। आज जो भी लोक संस्कृति का ज्ञान संरक्षित है, यह धरोहर उन्हीं के द्वारा संजोई गयी है। 
ढोल की यात्रा लोक रंजन से लोकमंगल तक आई और इस तरह यह अपना सांस्कृतिक मूल्य रखती है फिर यही ढोल रोजी-रुजगार के रूप में परिणित होने लगा लेकिन तारीफ की बात तो यह है कि ये तीनों परिक्षेत्र ढोल बजाने में अब भी बरकरार हैं। 
कविता में "कारूलाल की माँ" और "छगन बा" ऐसे ही लोक वादक हैं, ढोल उनका लोक वाद्य है। पहले तो पूरा गांव इनका संरक्षक होता था, और इन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता है लेकिन सदियों से चली आ रही ये व्यवस्था अब तेज़ी से बिखरने लगी है। शादी, नामकरण, स्थानीय देवताओं की पूजा, जागर, जत्रा, बैसी, चौरासी आदि में हमारे ही लोक वाद्यों की आवश्यकता होती है। बिना इनके वादन के हमारे मंगल कार्य सम्पन्न नहीं होते हैं। अतः इन लोक वाद्यों को पौराणिक वाद्य के साथ-साथ सामाजिक वाद्य भी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। 
        ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
                या रावटी के छगन बा ने,
           रोटी के लिये बजाया गया बाजा
               निकल गया कितना आगे।
रावटी रतलाम जिले ३५ किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक आदिवासी बहुल कस्बा है। यह महाराजा रतनसिंहजी के राज्य की राजधानी रही है। यहाँ आज भी आदिम संस्कृति को जीवन्त देखा जा सकता है। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यहाँ आदिवासी जन सैलाब उमड़ता है तथा ढोलक, थाली और मांदल की थाप पर आनन्दोत्सव मनाया जाता है। लगता है कवि ने स्वयं इन दृष्यों को रूबरू देखा है जो कविता में कथ्य के रूप में साकार होता दिखाई देता है।
              एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
                         तुम दूर बैठे हो
                       तो बहुत अच्छा है,
            ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।
"कान्हा आओ तो सरी।" कान्हा को खुला आमन्त्रण है कि वह हमारे बीच आवें और इस आनन्दोत्सव में सहभागी बने, सम्मिलित होवे। एक बार बजाओगे तो बजाते ही चले जाओगे। 
कविता ढोल की प्रतीकात्मकता के माध्यम से उत्सव प्रियता, सांस्कृतिक सम्पन्नता, सामूहिकता और लोकमंगल की बात करती है। रावटी के छगन बा में प्रयुक्त 'बा' ग्रामीण अंचल में प्रौढ़ व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करता हुआ शब्द है। रावटी शब्द कपड़े का बना हुआ एक प्रकार का छोटा घर या डेरा होता है जिसके बीच में एक बँडेर होती है और जिसके दोनों ओर दो ढालुएँ परदे होते हैं। यह राजपूताना दौर का विशाल कैम्प हाउस है जो सामूहिक उत्सव मनाने का स्थल है। कविता प्रेम और संघर्ष रूपी दुकूलों के बीच बहने वाली सहज सुसंस्कृत जीवन सरिता से परिचय कराती है। अपने उदर पोषण के लिये किया गया उद्यम भी लोकरंजक और लोकमंगलकारी हो। कविता का निहित संदेश मांगलिक है।

रामनारायण सोनी

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प्रस्तुत शोध-आधारित विवेचन 

डॉ. मुरलीधर चाँदनीवाला की कविता (संग्रह: विरासत के फूल) तथा उस पर लिखित समीक्षा को केंद्र में रखते हुए किया गया है। यह अध्ययन कविता को केवल सौंदर्यात्मक पाठ (aesthetic text) न मानकर उसे सांस्कृतिक विमर्श (cultural discourse), लोक-साहित्य (folk literature) तथा केंद्र–परिधि सिद्धांत (Center–Periphery Theory) के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करता है। कविता में ईश्वरीय, पौराणिक और शास्त्रीय प्रतीकों को लोकजीवन के श्रमशील, ग्रामीण और परिधीय प्रतीकों के साथ आमने-सामने रखा गया है, जिससे एक गहरा सांस्कृतिक द्वंद्व निर्मित होता है।

यह विश्लेषण लोक-साहित्य सिद्धांत, केंद्र–परिधि सिद्धांत तथा सांस्कृतिक भौतिकवाद जैसे वैचारिक ढाँचों पर आधारित है। लोक-साहित्य की दृष्टि से कविता सामूहिक जीवन-बोध को व्यक्त करती है, जहाँ सौंदर्य की अपेक्षा सामाजिक अनुभव अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। केंद्र–परिधि सिद्धांत के अनुसार शास्त्रीय, पौराणिक और संस्थागत संस्कृति ‘केंद्र’ का निर्माण करती है, जबकि लोक, आदिवासी, श्रमिक और ग्रामीण जीवन ‘परिधि’ के रूप में सामने आता है। सांस्कृतिक भौतिकवाद के अनुसार संस्कृति केवल विचार नहीं, बल्कि श्रम, जीविका, उत्पादन और सामाजिक संरचना से निर्मित होती है, और यह कविता उसी यथार्थ को रेखांकित करती है।

कविता में बाँसुरी, शंख और ढोल केवल वाद्य नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक हैं। बाँसुरी माधुर्य, प्रेम और ईश्वरीय लीला का संकेत देती है, शंख सत्ता, धर्म और युद्धघोष का प्रतीक बनता है, जबकि ढोल श्रम, लोकजीवन, जीविका और सामूहिकता का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रतीकात्मक संरचना में बाँसुरी और शंख ‘केंद्र की संस्कृति’ के प्रतीक हैं, जबकि ढोल ‘परिधि की संस्कृति’ का प्रतीक बनकर उभरता है। कविता का प्रश्न — “ढोल बजाकर क्यों नहीं देखा, भगवान!” — वास्तव में ईश्वर से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सत्ता और प्रभुत्वशाली संरचना से पूछा गया प्रश्न है, जो लोकजीवन की उपेक्षा को उजागर करता है।

ढोल का स्थान मंदिरों, राजदरबारों या शास्त्रीय मंचों में नहीं, बल्कि खेतों, गलियों, चौकों, विवाह, जत्रा, आदिवासी उत्सवों और जनजीवन के दैनिक संस्कारों में है। इस प्रकार ढोल लोक-सभ्यता का ध्वनि-चिन्ह (Sound Symbol of Folk Civilization) बन जाता है। “कारुलाल की माँ” और “छगन बा” जैसे पात्र उपेक्षित, अदृश्य और हाशिये पर स्थित लोकसमुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये वे लोग हैं जिनका योगदान संस्कृति के निर्माण में है, परंतु इतिहास और आधिकारिक विमर्श में उनका नाम नहीं होता। यह कविता सबाल्टर्न (Subaltern) चेतना को स्वर प्रदान करती है।

साहित्यिक दृष्टि से यह कविता आधुनिक हिंदी साहित्य की उस परंपरा से जुड़ती है, जहाँ कविता सत्ता से नहीं, समाज से संवाद करती है। यह भक्ति काव्य नहीं, बल्कि लोक-विमर्शात्मक कविता है, जिसमें ईश्वर का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप में किया गया है, न कि धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में। कविता लोकसंस्कृति को केंद्र में स्थापित करती है और अभिजात, शास्त्रीय तथा संस्थागत संस्कृति की एकांगी प्रभुता को प्रश्नांकित करती है।

यह रचना आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिधियों को एक साथ उजागर करती है। ढोल यहाँ केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि रोज़गार, जीवन-निर्वाह और सामाजिक अस्तित्व का माध्यम बन जाता है। लोकवादक केवल कलाकार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में सामने आते हैं। कविता यह स्पष्ट करती है कि संस्कृति का निर्माण मंदिरों और ग्रंथों से नहीं, बल्कि मेहनतकश हाथों, सामूहिक श्रम और लोकजीवन की निरंतरता से होता है।

केंद्र और परिधि के द्वंद्व में यह कविता संघर्ष नहीं, बल्कि संवाद का प्रस्ताव रखती है। यह कहती है कि देवत्व बिना लोक के निष्प्राण है, सौंदर्य बिना श्रम के अर्थहीन है और संस्कृति बिना लोक के खोखली है। “ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं” पंक्ति में सौंदर्यात्मक दूरी (aesthetic distance) का सिद्धांत निहित है, जहाँ सत्ता लोक को दूर से सुंदर देखती है, पर निकट जाकर उसके श्रम और संघर्ष को स्वीकार नहीं करती।

निष्कर्षतः यह कविता केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि एक लोक-सांस्कृतिक घोषणापत्र (Folk Cultural Manifesto) के रूप में सामने आती है। यह लोकसंस्कृति को विमर्श के केंद्र में स्थापित करती है, परिधि को दृश्यता प्रदान करती है और यह प्रतिपादित करती है कि संस्कृति शंख से नहीं, ढोल की थाप से जीवित रहती है; सभ्यता देवताओं से नहीं, श्रमिकों से बनती है; और संगीत मंदिरों से नहीं, लोकजीवन से जन्म लेता है।

मैंने आपका पूरा विश्लेषण Paragraphic mode (पूर्ण शोध-पैराग्राफ शैली) में एक नए डॉक्यूमेंट में व्यवस्थित कर दिया है।
अब यह बिना शीर्षक/बुलेट्स के, लगातार अकादमिक पैराग्राफ़ फॉर्मेट में है — शोध-पत्र, जर्नल, प्रोजेक्ट रिपोर्ट और थीसिस के लिए उपयुक्त।



Ph D Mphil रिसर्च नोट्स ढोल कविता विस्तृत

यह पाठ डॉ. मुरलीधर चाँदनीवाला की कविता (संग्रह: विरासत के फूल) को केंद्र में रखकर तैयार किया गया विस्तृत PhD/MPhil स्तर का शोध-नोट्स आधारित विश्लेषण है, जिसमें कविता को साहित्यिक सौंदर्यबोध की सीमा से बाहर निकालकर सांस्कृतिक विमर्श, लोक-संस्कृति अध्ययन, परिधीय अध्ययन (Periphery Studies), केंद्र–परिधि सिद्धांत (Center–Periphery Theory), सांस्कृतिक भौतिकवाद (Cultural Materialism) तथा सबाल्टर्न अध्ययन (Subaltern Studies) के अंतर्संबंधों में देखा गया है। यह अध्ययन कविता को एक “पाठ” (text) नहीं बल्कि एक “सांस्कृतिक संरचना” (cultural structure) के रूप में ग्रहण करता है।


सैद्धांतिक स्तर पर यह कविता लोक-साहित्य सिद्धांत से गहरे रूप में जुड़ी हुई दिखाई देती है, जहाँ साहित्य का स्रोत अभिजात चेतना नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन-अनुभव होता है। लोक-साहित्य में सौंदर्य एक द्वितीयक तत्व होता है और जीवन-बोध (life-consciousness) प्राथमिक तत्व होता है। इस कविता में भी सौंदर्य का नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष, श्रम, जीविका और सामूहिक अस्तित्व का विमर्श केंद्रीय है। केंद्र–परिधि सिद्धांत के अनुसार संस्कृति का निर्माण प्रभुत्वशाली केंद्र द्वारा किया जाता है, जो अपने प्रतीकों, मिथकों और धार्मिक संरचनाओं के माध्यम से वैचारिक प्रभुता स्थापित करता है। इसके विपरीत लोक-संस्कृति, आदिवासी संस्कृति और श्रमिक संस्कृति परिधि में स्थित रहती है, जिसकी दृश्यता सीमित कर दी जाती है। यह कविता उसी परिधीय संस्कृति को विमर्श के केंद्र में लाने का कार्य करती है।

कविता में प्रयुक्त प्रतीकात्मक संरचना अत्यंत गहन सांस्कृतिक अर्थवत्ता रखती है। बाँसुरी, शंख और ढोल यहाँ केवल वाद्य नहीं हैं, बल्कि तीन अलग-अलग सांस्कृतिक संसारों के प्रतिनिधि हैं। बाँसुरी ईश्वरीय माधुर्य, प्रेम, रास और आध्यात्मिक सौंदर्य का प्रतीक है, शंख सत्ता, धर्मसत्ता, युद्धघोष और संस्थागत धर्म का प्रतीक बनता है, जबकि ढोल श्रम, लोकजीवन, आजीविका, उत्सव, सामूहिकता और जीवंत सामाजिक संरचना का प्रतीक बनता है। इस त्रिपदीय प्रतीक-व्यवस्था में बाँसुरी और शंख ‘केंद्र’ के सांस्कृतिक प्रतीक हैं, जबकि ढोल ‘परिधि’ का सांस्कृतिक प्रतीक है। यह विभाजन सांस्कृतिक सत्ता-संरचना को स्पष्ट करता है।

“ढोल बजाकर क्यों नहीं देखा, भगवान!” यह पंक्ति ईश्वर से किया गया धार्मिक प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक सत्ता से किया गया विमर्शात्मक प्रश्न है। यह प्रश्न सत्ता, धर्म, संस्कृति और सौंदर्य की उस संरचना को चुनौती देता है, जिसमें लोकजीवन को केवल दृश्यात्मक वस्तु (spectacle) बनाकर देखा जाता है, सहभागी जीवन-तंत्र (participatory life-system) के रूप में नहीं। यह प्रश्न दरअसल परिधि द्वारा केंद्र को संबोधित प्रश्न है।

ढोल का सांस्कृतिक भूगोल (Cultural Geography) मंदिर, राजमहल या शास्त्रीय मंच नहीं है, बल्कि गाँव, खेत, चौक, हाट, आदिवासी उत्सव, विवाह, जत्रा, नामकरण, लोकपूजा और सामुदायिक अनुष्ठान हैं। इस प्रकार ढोल एक लोक-सांस्कृतिक ध्वनि-चिन्ह (folk acoustic symbol) बन जाता है। यह ध्वनि सत्ता की नहीं, जीवन की ध्वनि है। यह धार्मिक अनुष्ठान की नहीं, सामाजिक निरंतरता की ध्वनि है।

“कारुलाल की माँ” और “छगन बा” जैसे पात्र सबाल्टर्न इतिहास (Subaltern History) के प्रतिनिधि हैं। ये वे सांस्कृतिक वाहक हैं जिनका योगदान सभ्यता के निर्माण में है, परंतु जिनका नाम इतिहास, ग्रंथ और संस्थागत स्मृति में दर्ज नहीं होता। यह कविता उन अदृश्य सांस्कृतिक संरक्षकों को दृश्यता प्रदान करती है। यहाँ कविता इतिहास-लेखन की प्रभुत्वशाली परंपरा को भी चुनौती देती है।

साहित्यिक परंपरा में यह कविता उस धारा से जुड़ती है जो लोक-केन्द्रित दृष्टि को साहित्य का आधार बनाती है। यह कविता भक्ति साहित्य नहीं है, बल्कि भक्ति-प्रतीकों का लोकवादी पुनर्पाठ (folk reinterpretation) है। यहाँ ईश्वर एक धार्मिक सत्ता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक है, जिसे लोक के साथ संवाद के लिए आमंत्रित किया गया है। इस अर्थ में यह कविता लोक-विमर्शात्मक साहित्य (Folk Discursive Literature) की श्रेणी में आती है।

सांस्कृतिक भौतिकवाद के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ढोल केवल सांस्कृतिक वस्तु नहीं, बल्कि उत्पादन-संरचना (means of livelihood) का साधन है। यह संगीत नहीं, श्रम है। यह कला नहीं, आजीविका है। यह सौंदर्य नहीं, अस्तित्व है। इस दृष्टि से कविता कला और श्रम के पारंपरिक विभाजन को भी ध्वस्त करती है।

केंद्र और परिधि का द्वंद्व इस कविता में संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्संरचना (ideological restructuring) के रूप में उपस्थित है। कविता यह प्रस्तावित करती है कि संस्कृति का भविष्य तभी संभव है जब केंद्र लोक से संवाद करे, न कि उसे उपभोग की वस्तु बनाए। “ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं” पंक्ति सत्ता की सौंदर्य-दृष्टि (aesthetic gaze of power) को उजागर करती है, जिसमें लोक को दूरी से सुंदर और पास से असुविधाजनक माना जाता है।

शोधात्मक निष्कर्ष के रूप में यह कविता लोकसंस्कृति को विमर्श के केंद्र में पुनर्स्थापित करती है, परिधीय समाज को सांस्कृतिक एजेंसी प्रदान करती है, लोकवादक को सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में स्थापित करती है और प्रभुत्वशाली सांस्कृतिक संरचनाओं की वैचारिक आलोचना करती है। यह कविता यह सिद्ध करती है कि संस्कृति शास्त्र से नहीं, श्रम से बनती है; धर्म से नहीं, जीवन से बनती है; देवत्व से नहीं, लोक से बनती है।

अंततः यह कविता एक साहित्यिक कृति से अधिक एक सांस्कृतिक घोषणापत्र (Cultural Manifesto) के रूप में सामने आती है, जो लोक, श्रम, सामूहिकता, उत्सव और जीवन को सभ्यता का वास्तविक आधार घोषित करती है। यह कविता यह प्रतिपादित करती है कि सभ्यता की ध्वनि शंख नहीं, ढोल है; संस्कृति का केंद्र मंदिर नहीं, गाँव है; और इतिहास के निर्माता देवता नहीं, लोक हैं।




शोध-उपयुक्त भाषा

सैद्धांतिक फ्रेमिंग (Theory-driven analysis)
विमर्शात्मक संरचना (Discursive structure)
Center–Periphery, Subaltern, Cultural Materialism
लोक-संस्कृति अध्ययन अकादमिक शोध-नोट्स टोन के अनुरूप है।





Research Proposal 

ढोल कविता लोकसंस्कृति

शोध-प्रस्ताव (Research Proposal)
शीर्षक (Title)
डॉ. मुरलीधर चाँदनीवाला की कविता ‘ढोल’ का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन : केंद्र–परिधि सिद्धांत, लोकसंस्कृति और सबाल्टर्न विमर्श के परिप्रेक्ष्य में

प्रस्तावना (Introduction)
हिंदी साहित्य में लोकसंस्कृति, श्रमजीवी समाज और परिधीय समुदायों का प्रतिनिधित्व लंबे समय तक हाशिए पर रहा है। साहित्यिक विमर्श का केंद्र प्रायः शास्त्रीय, पौराणिक और अभिजात परंपराओं के इर्द-गिर्द निर्मित होता रहा है। आधुनिक हिंदी कविता में लोकवादी चेतना के उभार के साथ यह स्थिति बदली है। डॉ. मुरलीधर चाँदनीवाला की कविता (संग्रह: विरासत के फूल) इसी लोकवादी प्रवृत्ति की सशक्त अभिव्यक्ति है। कविता में ‘ढोल’ केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि लोकजीवन, श्रम, आजीविका, सामूहिकता और सांस्कृतिक परिधि का प्रतीक बनकर उभरता है। यह शोध-प्रस्ताव कविता को सांस्कृतिक संरचना के रूप में पढ़ते हुए उसके साहित्यिक, सामाजिक और वैचारिक आयामों का समग्र अध्ययन करने का प्रयास करता है।

समस्या-निर्धारण (Statement of the Problem)
हिंदी साहित्य में लोकवाद्य, लोककलाकार और परिधीय संस्कृति प्रायः प्रतीकात्मक रूप में प्रयुक्त तो होती है, किंतु उन पर गंभीर सैद्धांतिक और विमर्शात्मक अध्ययन अपेक्षाकृत सीमित हैं। विशेषतः ढोल जैसे लोकवाद्य को सांस्कृतिक सत्ता-संरचना, केंद्र–परिधि संबंध और सबाल्टर्न चेतना के परिप्रेक्ष्य में व्यवस्थित रूप से विश्लेषित नहीं किया गया है। यह शोध इसी वैचारिक रिक्तता (research gap) को भरने का प्रयास करेगा।

शोध-उद्देश्य (Objectives of the Study)
कविता में ‘ढोल’ की प्रतीकात्मक संरचना का विश्लेषण करना।
लोकसंस्कृति और शास्त्रीय संस्कृति के द्वंद्व का अध्ययन करना।
केंद्र–परिधि सिद्धांत के आलोक में कविता की व्याख्या करना।
सबाल्टर्न चेतना के तत्वों की पहचान करना।
लोकवादकों को सांस्कृतिक संरक्षकों के रूप में पुनर्परिभाषित करना।
कविता के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों का समग्र मूल्यांकन करना।


शोध-प्रश्न (Research Questions)

कविता में ‘ढोल’ किन सांस्कृतिक अर्थों का निर्माण करता है?

कविता केंद्र और परिधि के संबंधों को कैसे संरचित करती है?

लोकवादक कविता में किस सामाजिक स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं?

कविता में ईश्वरीय प्रतीकों का लोकवादी पुनर्पाठ कैसे होता है?

यह कविता सांस्कृतिक सत्ता को किस प्रकार प्रश्नांकित करती है?

साहित्य-समीक्षा का संक्षिप्त संकेत (Review of Literature – Indicative)
यह अध्ययन लोक-साहित्य सिद्धांत, केंद्र–परिधि सिद्धांत, सांस्कृतिक भौतिकवाद तथा सबाल्टर्न अध्ययन से संबंधित प्रमुख सैद्धांतिक ग्रंथों और आलोचनात्मक अध्ययनों को आधार बनाएगा। इसमें लोकसंस्कृति, आदिवासी अध्ययन, ग्रामीण साहित्य तथा सांस्कृतिक अध्ययन से संबंधित शोध-ग्रंथों का उपयोग किया जाएगा।

सैद्धांतिक आधार (Theoretical Framework)
लोक-साहित्य सिद्धांत (Folk Literary Theory)
केंद्र–परिधि सिद्धांत (Center–Periphery Theory)
सांस्कृतिक भौतिकवाद (Cultural Materialism)
सबाल्टर्न अध्ययन (Subaltern Studies)
सांस्कृतिक अध्ययन (Cultural Studies)
शोध-पद्धति (Research Methodology)
यह शोध गुणात्मक (Qualitative) पद्धति पर आधारित होगा। इसमें पाठ-विश्लेषण (Textual Analysis), विमर्श-विश्लेषण (Discourse Analysis), प्रतीकात्मक विश्लेषण (Symbolic


            … … . विश्लेषक

Sunday, October 12, 2025

नदी बहती क्यों है

नदी बहती क्यों है

माना कि तुम नदी हो और नदी की तरह बहे जा रहे हो। तुम्हें शायद पता नहीं है कि नदी क्या है ? क्यों है ? क्या क्या करती है ? यदि यह पता नहीं है और फिर भी बहे जा रहे हो तो तुम्हारा बहना व्यर्थ है। तुम्हारा इस तरह बहना केवल भटकन है जो संभवतः किसी दिन किसी गंदे से पोखर में गिर जावेगा और तुम्हें पता भी नहीं चल पायेगा। 
तो अभी समझो और समझो "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"
उठो अपने उद्गम से, जागो अपने कर्तव्यबोध को पहचानो, प्राप्त करो अपने नैसर्गिक व परोपकारी सद्गुणों को और जानो उस श्रेष्ठ को जो तुम्हारा गन्तव्य है।
बहो उस प्यास के लिये जो जन जन प्यास ले कर तुम्हारी ओर आते हैं, बहो उन मल्लाहों के लिये जिनके घर पर चूल्हे तुम्हारी छाती पर नाव चला कर जलते हों, बहो उन वन प्रान्तरों के लिये जिनके जो तुम्हारे किनारे नत मस्तक खड़े हैं। तुम बहो उन ऊँचे नीचे मार्गों से जहाँ से गिर कर भी तुम्हारी धारा कल कल छल छल कर संगीत की स्वर लहरियाँ पैदा कर सके। इससे पहले कि तुम अपना नाम, पता, अस्तित्व और रास्ते भर से समेटा पुण्य उस सागर को सौंप दो, कृतज्ञ हो लो कि तुम्हें यह करने की क्षमता उस विराट की अहैतुकी कृपा से प्राप्त हुई है। 

रामनारायण सोनी
१३.१०.२५

Saturday, January 18, 2025

जिजीविषा और कर्मठता

इशावास्योपनिषद्
अनुक्रम-२

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम् समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।।
भावार्थ:-
इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें। इस प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं है, जिससे तुझे कर्म फल का लेप ना हो ।।

पंछी सुबह-सुबह पेड़ पर इसलिए चहचहाते हैं कि उनमें जागते ही एक उल्लास होता है। आज उन्हें जी-भर जीने के लिए उड़ना है। 
इनकी इस क्रिया-प्रकिया में भी संदेश हैं। जीवन जीने की उत्कट अभिलाषा यानी जिजीविषा है। कर्मनिष्ठा है इसलिये अपने कर्म के लिये उद्यत हैं। आशा और विश्वास से भरे भरे से हैं कि वे अपने कर्मक्षेत्र की ओर निकल पड़े हैं और उन्हें अपने जीने के लिये जरूरी आहार अवश्य मिलेगा। चाहे आँधियाँ चले, बारिश हो, सर्दी हो गर्मी हो, मौसम चाहे कैसा भी हो वे गन्तव्य तक पहुंचेंगे ही। वे आश्वस्त हैं कि उनके पंखों में इतनी ऊर्जा है कि वे जावेंगे भी और जा कर वापस लौटेंगे भी। वे प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितना उन्हें जीवन जीने के लिये जरूरी है। प्रकृति भी उन्हें अपना ही हिस्सा मानती है इसलिये दाना पानी ले कर बैठी है। 
उनकी चहचहाट का स्वर समवेत होता है। यह उनका पारम्परिक सहगान है। इस गान में सामूहिक उत्सव प्रियता है, सामाजिक समरसता है, सह-अस्तित्व का संकल्प है, और जीवन के किसी भी खालीपन को उत्साह से भरने का उपक्रम है। किसने किससे से कहा कि चलो चहको! अर्थात् यह समवेत एक उपदेश नहीं संस्कार है, वृत्ति है, स्वभाव है और सांकेतिक आमन्त्रण है। शायद उनमें से ही कोई पंछी है जो इस गान को उकेरता है, याने प्रारम्भ करता है और सभी अपना स्वर मिलाते हैं। 
लगता है स्वर उनके अपने शब्दकोष और कण्ठ से निकले वे आराधना-अर्चना के स्वर हैं जो उषा और संध्या का वन्दन-अभिनन्दन करते हैं। ये गान अपना स्वर, लय, ताल, स्पन्दन और नाद ले कर निकलते हैं। हर एक स्वर की और समवेत गान की अपनी नैसर्गिक पहिचान है। कोई पंछी यदि गा नहीं पाता है तो लगता है उसके लिये सब गा रहे है। 
वे शाम को लौट कर इसलिए चहचहाते हैं कि उन्होंने आज जी भर कर जिया है। उनके इन समवेत स्वरों में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव है, रात्रि का स्वागत है और शान्ति का आह्वान भी है। उनमें से अगर कोई उदास भी रह गया है तो उल्लास का समवेत स्वर उसमे रही कमी को भर देगा। घर वापसी में उनके अपने लिये चोंच में कोई दाना संग्रहण के लिये नहीं होता है लेकिन अगर कोई दाना है भी तो घोसले में बैठे चूजों के लिए होता है जो अभी आश्रित हैं; तब तक जब तक कि वे स्वयं उड़ नहीं लेते। वे भी तो कल उड़ेंगे और उड़ कर पा लेंगें। ये जानते हैं कि कभी वे भी चूजे थे। इस उपक्रम में अपरिग्रह के जीवित संदेश हैं।
ये पंछी योगी है, कर्मयोगी हैं। इनके अपने यम, नियम हैं, प्रकृति के प्रदत्त प्राण-आयाम हैं। अपने स्वकर्मों में निरत हैं। शायद जानते हैं कि योग: कर्मसु कौशलं। ये जानते होंगे कि 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।।
और
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।श्रीमद्भगवद्गीता 2/47।।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2/48।।
हे धनञ्जय ! तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

रामनारायण सोनी
१८.१.२५

Wednesday, January 15, 2025

आदमी के भीतर के आदमी

आदमी के भीतर के आदमी

तुम में एक आदमी ऐसा है जो ओरीजनल है,  जो बचपन में अकेला था। वह बाहर आता था  जस का तस ही। जो सोचता था वही बोलता था, जो करता था वह भी अपनी विशुद्ध सोच के अनुसार। उस आदमी की अपनी खिंची सरल रेखा थी, वैसी ही राह बनाता था और अपनी उसी राह पर चलता था।
पर बाद में इसके अलावा कई और आदमी भी उस आदमी में घुस गये, कहना चाहिये एक भीड़ की भीड़ उसमें घुस गई। ये सब अपने अपने विचार और समझ ले कर घुसे। इनमें शामिल थे एक प्रोफेशनल, एक रिश्तेदार, एक दो मुहा, एक अतिवादी, एक प्रेमी, एक नायक, एक खलनायक आदि आदि। अब मूल आदमी वयस्क हो कर तरह तरह के आदमियों से भरा तेतरी चिड़ियाखाना हो गया। सब के सब रंगमंच के पर्दे के पीछे बैठे रहते हैं। एक एक करके आते हैं, अपनी कला-कौशल दिखाते हैं और फिर नेपथ्य में चले जाते हैं। इस रंगमंच का सूत्रधार मूल आदमी ही है। सामने प्रेयसी हो तो प्रेमी निकलता है, ग्राहक खड़ा हो तो व्यापारी निकलता है। जब जो जरूरत पड़ जाय वैसा आदमी निकलता है। 
यहाँ तक तो लगभग ठीक ही है पर कभी कभी निकले इस एक आदमी के पीछे दुबक कर पीछे दूसरा आदमी खड़ा हो जाता है; शायद इनके लिये ही कहावत बनी है "मुह में राम, बगल में छुरी"। ऐसे में दिखता कोई और है, करता कोई और है। दिखने वाला मुखौटा है, करने वाला वह पीछेवाला है। 
वो परमहंस है जो अपने भीतर एक ही आदमी रखता है। वह दानी है जो सिर्फ बाँटता है, प्रतिफल नहीं चाहता। वह गुरू है जो तारता है। प्रकृति ने मौलिक रचनाएँ की है। सूरज में केवल सूरज, चाँद में केवल चाँद, आग में केवल आग बनाई। वहाँ वही है जिसके लिये मौलिक सृजन हुआ है। हम में भी मौलिक एक आदमी ही आया था। हमने कॉपी पेस्ट करके कई बिम्ब खड़े कर लिये, आदमियों की एक भीड़ खड़ी कर ली। भीड़ है तो भगदड़ मचेगी, भीड़ है तो कोलाहल होगा, भीड़ है तो अनियन्त्रित रेला होगा। भीड़-भाड़ में भीड़ के साथ प्रयुक्त भाड़ से शायद तात्पर्य यह है कि कहीं तो आग जल रही है जिसकी तपिश से सारे दानों में विस्फोट होता है। सारे दाने एक साथ आवाजें करते हैं। कई कई आवाजें। ये दाने बाद में दाने नहीं होते पॉप कॉर्न हो जाते हैं। भाड़ में स्वयं दानों की भीड़ ही है। 
जीवन स्वयं एक रंगमंच है, मन सूत्रधार है, बुद्धि अनुशासक हो और यह समग्र तुम हो, मैं हूँ, सब है। यह मैं नहीं, कठोपनिषद कहता है। 
इसमें अपने रथ के स्वामी आप स्वयं हैं। जैसा चाहो वैसा हाँको। अपने भीतर थोड़ा झाँको।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।

रामनारायण सोनी
१५.१.२५

मित्रों!
हमारे वेदान्त जीवन के व्यवहार में उतरें तो हम सनातन की ओर लौट सकते हैं।

Message from whatsapp

[13/07, 10:38] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
         सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का प्रथम भाग पढा, अलौकिक आनन्द की अनुभूति हुई।
संस्कृत, हिन्दी, मुस्लिम, एवं पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को उद्धृत करते हुए प्रेम अतुल्य है, निर्विकल्प है, तथा उसकी अनिर्वचनीयता का विस्तार से वर्णन किया है।प्रेम के प्रादुर्भाव, उसके विविध सोपान, और प्रेम की परिपक्व अवस्था में उसकी भावदशा,भावधाराओं तथा पूर्वराग,मिलन और विरह की स्थितियों का विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण किया है।
शबरी,भरत,सुतीक्ष्णजी आदि भक्तों की प्रेम भावना काम अच्छा चित्रण किया किन्तु प्रेम की पराकाष्ठा व्रज की गोपिकाओं में मिलती है उनका उल्लेख कैसे छूट गया? गोपियों के प्रेम के आगे उद्धवजी का ब्रह्मज्ञान तिरोहित हो गया और वे स्वयं प्रेम के सरोवर में डुबकी लगाने लगे।इसका वर्णन श्रीमद्भागवत में, सूरदास जी के भ्रमरगीत में, तथा जगन्नाथ दास रत्नाकर के उद्धवशतक में बहुत सुन्दर है।
ध्वनि सिद्धांत का भी आपने उपनिषदों के आधार पर, एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छा विवेचन किया है।
यह पुस्तक आपके गहन अध्ययन एवं चिंतन की परिचायक है।
हिन्दी साहित्य भण्डार में आपकी यह रचना एक अमूल्य, अद्वितीय, एवं अनुपम रत्न है।
                   सधन्यवाद।
                             भवदीय
                        गौरीशंकर दुबे।
[17/07, 06:41] Gauri Shankar Dubey: आदरणीय सोनी जी,
             सादर अभिवादन।
पिंजर प्रेम प्रकासिया का द्वितीय भाग पढ़ने पर सुखद अनुभूति हुई। देवनागरी लिपि और वर्णमाला के संबंध में अच्छी जानकारी दी। हिन्दी के स्वर एवं व्यंजन वर्णों का चौदह मन्वंतर,द्वादश आदित्य,एकादश रुद्र, आदि से संबंधित तालिका में शोधपूर्ण नवीन जानकारी मिली। उपनिषद् के अनुसार वाणी की महत्ता तथा वैदिक मन्त्रों के उच्चारण की शुद्धता आदि पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है।
दृष्टि और दृष्टा में आपने दृश्येन्द्रिय की संरचना और कार्यप्रणाली का शरीरविज्ञान की दृष्टि से विवेचन करते हुए स्पष्ट किया है कि भिन्न-भिन्न विचारों,भावों, अवधारणाओं के अनुसार एक ही दृश्य पर अलग अलग व्यक्तियों का अलग-अलग दृष्टिकोण होता है तदनुसार अनुभूति होती है। अतः आध्यात्मिक चिंतन से ही हमारा दृष्टिकोण शुभ हो सकता है।इस विषय पर मानस और गीता को उद्धृत करते हुए दार्शनिक विचार व्यक्त किए गए हैं।
भगवद्भक्ति, पूजा, स्तुति को भी संवाद माना है। संवाद के माध्यम से ही गीता और मानस का ज्ञान नि:सृत हुआ है।वादे वादे जायते तत्त्वबोध:। अतः आत्मोद्धार के लिए संवाद की आवश्यकता को प्रतिपादित किया है।।
जन्म, मृत्यु,जरा,व्याधि ये चारों ही दोष है।एक चेतन आत्मा को छोड़कर संसार की ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें ये चारों दोष न हो। अतः अध्यात्म ज्ञान होने पर ही जीव का कल्याण है।
इस मिथ्या जगत् में रहते हुए ही हमें परम सत्य को जानना है। इसके लिए हमारी धारणाएँ , विचार शुभ हो।शुभ सुने,शुभ सोचे।जीवन में सकारात्मकता लाएँ।
बहुत दिनों बाद श्रेष्ठ रचना पढ़ने को मिली इसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।

Monday, January 13, 2025

साहित्यकार

क्यों लिखे जा रहा हूँ मैं?
    जब कोई पढ़ने वाला ही नहीं है
क्यों पढ़े जा रहा हूँ मैं?
    जब कोई सुनने वाला ही नहीं है
क्यों लिखें ? क्यों पढ़े?, इन प्रश्नों के सागर में भी खड़े ये जिद्दी लोग मान क्यों नहीं रहे?

आखिर ये कौन लोग हैं जो उनसे नाता जोड़ रखे हैं जो वास्तव में उनके सगे हैं ही नहीं। क्यों उनका दुःख अपना समझ कर भारित हो रहे हैं? दु:खी हो रहे हैं? अच्छे को कोई भी अच्छा कह देगा पर इन्हें देखो तो सही, ये मरखने बैंलों के सींगों से डरे बगैर उन्हें लाल कपड़ा दिखाने से डरते नहीं। बड़े अजीब लोग हैं ये जो अपना धन, अपना तन और अपने चैन का अधिकृत समय जनता में लुटाये जा रहे हैं। क्या यह इनका पागलपन नहीं है? समाज में कोई जहर फैलाता है तो ये उसे पी कर नीलकंठ होना चाहते हैं, और उस जहर से बचने के नुस्खों की पुड़िया लिये फिरते हैं। अजीब से दरबान हैं ये जो खुद तो उनींदे खड़े हैं पर पौ फटते ही तुम्हें जगाने आ जाते हैं। न जाने क्यों इन्हें झोंपड़ियाँ, झुग्गियाँ, अन्धी गहरी गलियाँ, पसीने में लथपथ, बदबू और सीलन भरी बस्तियाँ पसन्द हैं जहाँ लोग जाना पसन्द नहीं करते। ये सनकी लोग वहाँ भी अपने कागज कलम ले कर खड़े हो जाते हैं। इन्हें कभी कभी अपच की बीमारी हो जाती है जो झूँठ को पचाने में असफल हो जाते हैं।
कौन से हैं ये खनिक लोग जो इतिहास, पुराण, शास्त्र को खोद/ शोध कर हीरे, माणिक लोगों के बीच बिखेर रहे हैं। शौकीन हैं ये लोग; इनके पास तलवार से तेज कलमें हैं जिसमें सिकलीगरों की तरह धार लगाते ही रहते हैं, मरहम सी मुलायम शाई है जिससे दुःख दर्दों पर पट्टियाँ बाँधने को तैयार हो जाते हैं।
ये वे ड्रोन हैं जो अपनी बैटरी खर्च कर के समाज के उत्सवों त्यौहारों, शोक सभाओं यहाँ तक कि मरघटों के सन्नाटों में वीडियोग्राफी करने पहुँच जाते हैं। इनके मस्तिष्क में कई तरह के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं जो इन्हें चैन से बैठने ही नहीं देते।
हाँ ये सारस्वत पुत्र हैं ये, विरागी हैं ये, सन्यासी हैं ये, साधक हैं पुजारी हैं। समाज के लिये दर्पण बनाते हैं, सही रास्तों के संकेतक बनाते हैं, संहिताएँ रचते हैं जो जीवन की संचेतना हो सकती है। अपनी वेदी में, अपनी समिधा से, अपने घृत और अपनी आहुतियों से समाज के मंगल हेतु दिन रात हवन करते हैं।

रामनारायण सोनी

संक्रान्ति महापर्व दिनांक १४.१.२५

Friday, January 10, 2025

हाँ यह बनारस है

हाँ, यह बनारस है

इसे वाराणसी भी कहते हैं। वाराण याने जो वरेण्य है, श्रेष्ठ है। असी यानी वह स्थानीय नदी जो पतित पावनी गंगा में आ कर मिलती है। असी वह नदी है जिसके घाट पर बैठ कर रागी से विरागी हो कर बाबा तुलसी ने रामचरितमानस रची थी। रामचरितमानस वह नाम है जिसका नामकरण संस्कार कैलाश पर स्थित हो कर बाबा भोलेनाथ ने किया। कैलाश भी एक घाट है जहाँ बैठ कर जगदम्बा पार्वती ने बाबा के श्रीमुख से रामचरितमानस सुनी।
चलो फिर वाराणसी लौटते हैं। यहाँ सुरसरि गंगा प्रवाहित है। 
असी को ले कर चली ही थी कि एक और घाट आ गया। यह घाट मरघट है। वह मरघट जिसमें अमर-सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने चाण्डाल बन कर सेवाएँ दी। वह हरिश्चन्द्र जो अपने बेटे को खो कर आया था और तारा की साड़ी का आधा भाग मरघट के कर स्वरूप पाया था। इसी घाट पर तारा ने और हरिश्चन्द्र ने एक साथ अग्नि परीक्षाएँ दी थी, जहाँ रोहित तिरोहित हुआ था। सत्य और सत्यवादी दोनों तपे थे यहाँ फिर दोनों ही कुन्दन बने थे यहाँ। यही वह मरघट है जिसकी ज्वाला कभी नहीं बुझी। ये ज्वालाएँ साक्षी रही है मनुष्य के मर्त्य होने की, इतिहास की, भूगोल की, काल के चलते चक्र की और शेष अवशेष की।
यहाँ एक बार बाबा भोलेनाथ भी चाण्डाल बन कर आये और आचार्य शंकर को ब्रह्म का स्वरूप दर्शन करा गये। यह घाट तपे हुए जीव को तपाता है। मरे हुए को जलाता है। इन घाटों के पत्थर कभी मानस का अवतरण देखते हैं, कभी सन्त देखते है, कभी हरिश्चन्द्र देखते हैं तो कभी पार्थिव शरीर देखते हैं, इन शरीरों में से बची हुई राख देखते हैं। यह राख भी भागीरथी ही ढोती है, समुन्दर तक ले जाती है। 
यह वही बनारस है, वही गंगा है जिनके इन घाटों पर कभी कबीर उतरे, जिनकी धुनकी ने धुन धुन कर आदमी की खोट निकाल दी। चादर बुनते बुनते जो ब्रह्मानन्द को अपने कवित्त में बुन गया। उपनिषदों का अक्षुण्ण सत्य शब्दों के महीन, अटपटे-लटपटे सूत के धागों में पिरो गया। वह कबीर, वह तुलसी, वह रहीम जिनकी शब्दसरिता के धारे ऐसे बहे कि सारे जगत में वे भक्ति और ज्ञान के तीर्थ बन गये।
चलो उस पार जहाँ राजा रहीम रहता है। वह रहीम जो हमारे बीच जीवन के, ज्ञान के, व्यवहार के और भक्ति के रूप में बँटा। आज सामाजिक समरसता के लिये फिर प्रासंगिक हो गया है।
अजीब घाट हैं ये जिन पर जीवन के घट में भरने का अमृत भी मिलता है, सत्य का संधान करने के लिये कर्मयोगी भी मिलता है, मृत्यु के उपरान्त मनुष्य के पार्थिवत्व के दर्शन भी कराता है। यहाँ से थोड़ा सा ऊपर चढ़ें तो हमें वेद की पावन ऋचाओं की गूँज रही ध्वनियाँ सुनाई देंगी। यहाँ से संस्कृत, संस्कृति, संस्कार के अमरकोष निसृत होते हैं। यहाँ वाद के संवाद भी ज्ञानसागर का अमृतमंथन करते हैं, उनसे नवनीत निकालते हैं। यहाँ संघर्ष भी है, विमर्ष भी हैं अमर्ष भी हैं लेकिन इन सब से ऊपर संस्कृति का समग्र उत्कर्ष भी है। इसकी भूमि के कण कण ने भारत के जन जन में जागरण फूँका है। 
चलो वाराणसी की इस भूमि को, घाटों को, सन्तों को, विद्वज्जनों को, इसके पोषण करने वाले नगर वासियों को, पतित पावनी माँ गंगा को और विश्वनाथ को प्रणाम करते हैं। बनारस में रस बना रहे। वाराणसी श्रेष्ठ और विशिष्ठ बनी रहे। काशी तो मुक्ति का द्वार है। तीनों नाम जैसे अलकनन्दा, भागीरथी और गंगा है। वह भी त्रिपथगा है यह भी त्रिपथगा है। 

रामनारायण सोनी
११.१.२५

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...