Friday, September 27, 2019

फिर नया मधुमास होगा

*नव सृजन नव चेतना का*
*जब कभी आगाज़ होगा*
*ठूंठ में नव कोपलों से*
*फिर नया मधुमास होगा*

           डॉ जय वैरागी

कोई कहता है बसन्त के बाद ग्रीष्म आती है, कोई कहता है बसन्त बरस में एक ही बार आती है तो कोई कहता है शिशिर के बाद बसन्त आती ही है, पतझड़ के बाद बसन्त आती ही है। जो पतझड़ के बाद बसन्त को अवश्यंभावी समझता है सृजन की सामर्थ्य केवल उसी में है। वह ठूँठ में से नवपल्लव उगाता है। मैने देखा है, यह सत्य घटना है - किसान के नींबू के खेत में कोई पेड़ को जमीन के ६ इन्च ऊपर से काट गया। वह मन मसोस कर रह गया। कुछ दिन बाद उसने उस ठूँठ में नींबू की एक कलम लगा दी। समय आने पर उस में अंकुर फूट आये। दो बरस बाद उसमें फल आने शुरू हो गए।
वास्तव में कोंपलों का सृजन मधुमास के गढ़ने की तैयारी है। नव चेतना का आह्वान बीज में से अंकुरण का आह्वान है वही द्वार खोलता है पौधे के नव सृजन का। नव चेतना का आह्वान कलिका के  फूटने से फूल के सृजन की तैयारी है। नव चेतना कठोर चट्टानों में से सोता फूटने पर झरने के सृजन का आगाज है। जब जब ऐसे आगाज़ अंजाम पाएँगे वे जड़त्व में चेतना लाएँगे। चेतना का सर्व श्रेष्ठ गुण है विकास और विकास के बिना सृजन अकल्पनीय है। मधुमास भी चेतना के माध्यम से विकास है, प्रकृति का सृजन है। प्रकृति की सृजन प्रक्रिया जीवन की संचेतना है।

*"सृजन और विध्वंस के मैं*
*गीत युग से गा रहा हूँ*
*बह रही धारा के संग संग*
*मै भी बहता जा रहा हूँ"*

यदि अन्यथा न लिया जाए तो परमाणु बम के विस्फोट के पूर्व और बाद के जापान की तुलना कर.के देखिये। वहाँ पर ठूँठ में कोंपल उगाने की क्षमता नहीं पैदा की होती तो वह देश मर ही जाता। उसने नव चेतना का आह्वान न किया होता तो नव सृजन भी अकल्पनीय होता। डॉ जय वैरागी की ये पंक्तियाँ आपके भीतर संन्निहित चेतना का आह्वान कर नव सृजन के लिये आमन्त्रित कर रही है।
इसलिये बसन्त के बाद के ग्रीष्म की प्रकल्पना छोड़िये, पतझड़ के बाद के बसन्त होने की नव चेतना का आगाज़ कीजिये। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली नव चेतना का आह्वान कीजिये।
असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मामृतं गमय

Monday, September 16, 2019

तुलसी अलंकरण

एक संक्षेपिका अपनी तीनों पुस्तकों के संदर्भ में प्रस्तुत है जिन्हें वनाञ्चल ने कोट किया है....

किसको बताऊँ कि जिस पौधे को लहलहाते हुए देख रहे हैं उसके मूल में कौन है? "पिंजर प्रेम प्रकासिया" के प्रथम खण्ड के प्राणों में कौन बसा है? वह केवल प्रेम है। लौकिक, अलौकिक कभी ढाई आखर का तो कभी मौन। कभी अन्तस से बोलता है कभी मेघ गर्जन करता है। कभी आकुल करता है तो कभी रेशमी स्पर्श देता है। कभी ओँखों से बहता है कभी ऐसा जमता है कि पुतलियाँ पथरा जाती है। कौन है और कहाँ से आया है। संजय की सी दिव्य दृष्टि भी इसकी देख नहीं पाती पर एक सहज सरल हृदय के छोटे से प्याले में चाँद जैसा उतर आता है। मेरे हृदय के आवास में दो द्वार नही है उसके लिये; केवल एक है आने का। बस एक बार आया वह फिर मैं उसे नहीं वरन् वह अंक में भर लेता है मुझे। जाने का नाम नहीं लेता। क्यों? मैंने उसे नहीं उसने मुझे जकड़ लिया है। अनकन्डीशनल अटैचमेंट। इसी कारण प्रेम इस हाड़ मांस के पिंजर में फफकता उजास पैदा करता है।
"जीवन संजीवनी" को लाने वाला हनुमान कोई और है। उसमें कहीं कहीं अर्जुन और केशव उतर आते हैं और मैं मन्त्रमुग्ध हो जाता हूँ, टकटकी बँध जाती है मेरी।
जिन्दगी के कैनवास" की केवल कूँची बनी है मेरी कलम पर इसके रंग का रसायन कहीं और से आया है कैनवास बनी पृष्ठभूमि भी रसायन शास्त्री की ही है।
त्रिपथगा का सौंदर्य सबने देखा पर कहाँ है गंगोत्री, कौनसा है गौमुख। कैसे कह दूँ कि चितेरा मैं हूँ। चित्रों में दिखने वाले रंग तो मेरे हैं पर भाव कौनसे तिरोहित होते हैं। सेल्यूलॉइड पर धूप छाँव के चित्र की पृष्ठभूमि कहीं से खींच कर लाई गई है। श्वेत पर्दे पर जो दौड़ती दिखाई पड़ती है वह आभासी है।

  मित्रों! जब मैं लिखता हूँ..
  तो मैं नही
  कोई और ही लिखता है
     मुझे बस तसल्ली है..
     ...कि मैं लिखता हूँ।

  वो ही आता है बस
     कलम पर बैठ जाता है
     मन की सीढ़ी पर
     वो ही चढ़ जाता है।

भावों के दरिया में..
     ..रंग घोल घोल जाता है।
         मुझे बस तसल्ली है..
          ...कि मैं लिखता हूँ

और सब समझते हैं कि मैं लिखता हूँ...

             रामनारायण सोनी

Tuesday, September 10, 2019

स्वयं का जीवन परिचय

मेरे प्रिय आत्मन्!

मैं शाजापुर जिले के एक छोटे से गाँव मकोड़ी में जन्मा हूँ। मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरा परिवार आध्यात्मिक भावनाओं और विचारों से लबरेज था। तत्कालीन ठेठ गाँव का परिवेश और उसमें रचे बसे सुरम्य ग्राम्य जीवन की मनमोहक छटा की याद सचमुच मुझे आज भी गुदगुदाती है।
प्रकृति की गोद में खेलता जीवन और चारों दिशाओं से आम्रकुंजों से घिरे हुए गाँव की छबि आज तक मेरे मन में बसी हुई है।
मेरी दादी सूरज बाई अौर माँ दरियाव बाई रात्रि के अन्तिम प्रहर में उठ कर चक्की पीसते हुए समवेत स्वर में पारंपरिक प्रभाती और भजन गाती थी जिनके भावों को लेते हुए कुछ रचनाएँ अपने काव्य संग्रह में परिलक्षित होती है तथा उन संचित भावों का आध्यात्मिक प्रभाव मेरे जीवन सदैव रहा है।
यद्यपि मैं विज्ञान का विद्यार्थी था फिर भी मेरी हायर सेकण्डरी स्तरीय शिक्षा में मैने मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, निराला, प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, वृन्दावनलाल वर्मा आदि कवियों, लेखकों के साहित्य को बड़े मनोयोग से पढ़ा। तब मैं डायरी लिखता रहता था। इसके बाद मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया। इसके पश्चात् म.प्र.वि.मं. में विभिन्न इंजीनियरिंग पदस्थापनाओं पर कार्यरत रहा। मुझे दो बार अतिविशिष्ट सेवाओं के लिए विशेष अवार्ड मिले।
सन् २००६ में सेवा निवृत्ति के पश्चात् २०१२ तक मुझे विद्युत वितरण कम्पनी इदौर में पुनर्नियुक्ति मिलती रही। इस दौरान मैंने सोशियो-टेक्नीकल और "टेक्नीकल कम रेवेन्यू एनालिसिस" के शोध कार्य किये जो मेरे द्वारा एकल प्रयास से स्थापित एम.आर.डी.एम. सेल के रूप में कार्यशील है। यह मेरे जीवन का सब से सुनहरा तकनीकी काल था। जो मेरे मन का एक परितोष प्रदान करता है।
सन् २०१२ में मेरे जीवन की तीसरी पारी शुरू हुई। फिर मुझे लगा कि हम जीवन भर समाज से किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ लेते रहते हैं तो हमारा कर्तव्य बनता है कि हम किसी न किसी रूप में समाज को लौटावें। सोशियो-टेक्नीकल एरिया में मैने कुछ शोध किए थे कि टेक्नोलोजी सिर्फ विकास और राजस्व अर्जन की बात न करे अपितु समग्र प्रयास जनता की परेशानियों को कम करे और सेवा करने वाली एजेन्सी को नुकसान भी न हो। कुछ प्रयोग बहुत सफल भी रहे। जैसे कि ईमानदार उपभोक्ता को परेशानी न हो लेकिन विद्युत चोरी करने वालों पर शिकंजा कसा जाय अन्यथा इनके चुराए राजस्व की भरपाई ईमानदारों को करना पड़ती है। इन विषयों का स्पेशलाइजेशन होने से विद्युत वित. कम्पनी में भर्ती होने वाले लगभग सभी बेच में ट्रेनिंग प्रदान करने का कार्य २००६ से अद्यतन जारी है। विश्वविद्यालय स्तर पर "स्मार्टग्रिड" जैसे अत्याधुनिक विषय पर सेमीनार एड्रेस करने का सौभाग्य भी मिलता है।
ईश्वर की अनुकम्पा से अब तीसरी पारी में साहित्य के पड़े वे बीज पुनः अंकुरित होने लगे। सन २०१३ में मेरी प्रथम पुस्तक "पिंजर प्रेम प्रकासिया" अौर २०१५ में  "जीवन संजीवनी" प्रकाशित हुई। ये कृतियाँ गद्यात्मक हैं। सन् २०१५ में एक सुखद संयोग हुअा कि मैं "रोटरी काव्यमञ्च" अौर "इन्सा, इन्दौर चेप्टर, इन्दौर" से जुड़ा जहाँ प्रबुद्ध वरिष्ट रचना धर्मियों का सानिध्य, प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन मिला। युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरी जी महाराज ने असीम अनुकम्पा कर मुझे दीक्षा प्रदान है। स्वामी प्रबुद्धानन्द सरस्वती, चिन्मय मिशन इन्दौर का आशीर्वाद औपनिषदेय चिन्तन के रूप में मिलता रहा है। डॉ कीर्ति स्वरूप रावत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सुविख्यात लेखक और शोध प्रदर्शक का आशीष मुझे मिलता ही रहता है। स्पष्ट है मेरे पास जो कुछ निसर्ग होता है उसके मूल तात्विक स्वरूप इन्हीं श्रेष्ठिय जनों का प्रदत्त प्रसाद होता है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में वे लोग हैं जो मेरे इस प्रयास में सहभागी रहे हैं, मैं अभिभूत हूँ और उनका कृतज्ञ हूँ।
जब भाव गहराते हैं तो शब्द नहीं मिलते और शब्द ढूँढते ढूँढते भावों की श्रृंखला बिखर जाती है लेकिन इन दोनों का मेल कभी कभी कुछ पलों के लिये हो जाता है तो साहित्य सृजित हो जाता है, कविता जन्म ले लेती है। मेरे साहित्यिक गुरु डॉ रमेश सोनी का कहना है कि कविता की नहीं जाती है वह तो हो जाती है। और कविता तुम्हारे माध्यम से खुद को लिखवा लेगी। उन्होंने एक प्रयोग और करने की भी सीख दी थी कि शब्दों में भाव पिरोने के बजाय भावों को शब्दों में निरूपित करने का प्रयास करें।
मेरे काव्य संग्रह की मूलाधार ये पंक्तियाँ देखें -
जैसे नेपथ्य से उभर कर आई,
किसी अनजान पवित्र रूह ने
अन्तस में इस तरह गुनगुनाई
कि मैं अभिभूत हो गाने लगा

मित्रों! जब मैं लिखता हूँ..
  तो मैं नही
  कोई और ही लिखता है
     मुझे बस तसल्ली है..
     ...कि मैं लिखता हूँ।

  वो ही आता है बस
    कलम पर बैठ जाता है
     मन की सीढ़ी पर
      वो ही चढ़ जाता है।

भावों के दरिया में..
     ..रंग घोल घोल जाता है।
         मुझे बस तसल्ली है..
          ...कि मैं लिखता हूँ

मेरे संकलन में कुछ अटपटी, लटपटी कविताएँ संग्रहित हैं। जब जब जो जो मन में आया लिख लिया। कविता की शास्त्रीयता, छन्द विन्यास, गीत, रस-अलंकार का मैं जानकार नहीं हूँ इसका आभास पाठक को जहाँ-तहाँ हो जाएगा। इस संकलन में सन् १९८५ से अद्यतन रचनाएँ सम्मिलित हैं।
जिन्दगी के आयाम अनन्त हैं। किंचिद् भावनाओं के रंग कलम की कूँची में पड़ गए और पृष्ठों के कैनवास पर सहज में उतर आए हैं इसलिए कदाचित् काव्य कलात्मकता का अभाव खल सकता है।
मैं थोड़ा थोड़ा प्रयोगधर्मी भी रहा हूँ। टेकनीकलिटि का उपयोग जहाँ तहाँ करता रहता हूँ। किसी अन्य की कविता अच्छी लगे तो मैं उसका इलस्ट्रेशन तैयार करता हूँ। उनकी लिखी इबारत की टीका सिर्फ इसलिये करता हूँ कि उनके सृजन को समझ सकूँ इसलिये नहीं कि उनकी निन्दा करूँ। मन करता है कि किसी की अच्छी रचनाओं का वीडियो बना कर यू-ट्यूब पर प्रकाशित करूँ। कोई अपनी रचना गाये तो उसे और सजा दूँ, जन्मजात स्वर्णकार जो हूँ। लोग अपनी रचनाओं का ब्लॉग आदि पर संग्रहण करे, इसमें मैं सहायता करता हूँ। मेरी पुस्तक "जीवन संजीवनी का प्रकाशन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया "किंडल" पर हो चुका है।
अपने सेवा काल में प्रत्यक्ष देखे गए सामाजिक, मानवीय सुख-दुःख, पीड़ा, करुणा, पर्यावरणीय परिवेश अौर उनकी अनुभूत संवेदनाओं के कुछ पलों की अभिव्यक्ति किंचिद् रचनाओं में झाँकती नजर आएगी।
"जिन्दगी के कैनवास" में संकलित नायिका प्रधान रचनाओं की भावात्मक पृष्ठभूमि मेरी सहधर्मिणी श्रीमति शकुन्तला सोनी की हैं जिनके शब्द मैंने दिए हैं। उनकी इस सहभागिता पर मैं गर्वित हूँ।
यहाँ इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि वाट्सएप ग्रुप "शब्द-धरा वनांचल" के सदस्य डॉ जय वैरागी, डॉ सीमा शाहजी, श्रीमति भारती सोनी, श्री धर्यशील येवले जी ने मेरी काव्य यात्रा में प्रोत्साहन और मार्गदर्शन का कार्य किया है। मैं उनका भी हृदय से आभारी हूँ। उनके इस कार्य से मैं अनुग्रहीत अौर उपकृत हूँ।

रामनारायण सोनी

टूट कर जुड़ना

"जुड़ना और जुड़ कर टूटना" नियति की विद्रूप तूलिका से निर्मित आकार जीवन में किसी ज्वालामुखी के बिखरे लावा से कम नहीं है। जलते लावा को कोई नहीं छूता अलबत्ता लोग समझाएँगे कि इससे दूर रहें। लेकिन नियति ने इस विध्वंस में एक सृजन छिपा रखा है वह है अप्रतिम ऊर्जा की रश्मियाँ अर्थात् अप्रतिम उर्वरा। साहस और कर्म के बीज बोने की क्षमता तो खुद में स्थापित करना होगी। एक बात तो तय समझें कि जो उर्वरा ठण्डे हुए लावा में है वह साधारण मिट्टी में नहीं। पर जरूरत है उर्वरा के सदुपयोग करने की।
आपकी बोई फसल काटने पूरा गाँव आएगा। तब आपको जीवन में असीम सुख और आनन्द की अनुभूति हुई होगी कि ईश्वर ने आपमें "देने" की क्षमता समाहित कर दी है। यह क्षमता आपके मन में कई संभावनाओं का सृजन करती हैं।
संघर्ष के बिना जीवन का सोंदर्य पाना असंभव है। संघर्ष के साथ जुड़ा है अवसाद, आत्महीनता, घृणा, पलायन और तितिक्षा। इस प्रबल झंझा में खड़ा रखने वाला केवल एक ही संबल है वह है आपका आत्मविश्वास। अपने कर्मों का बीज बोना और धीरतापूर्ण फसल पकने की प्रतीक्षा करना अनिवार्य है। कच्चे फल मत तोड़ बैठना। आपकी सफलता उतनी ही चमकदार है जितना तीव्र आपका संघर्ष है।
यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो पावेंगे-
सुषारथि अश्वानिव यन्मनुष्यान नेनीयते अभिषुभिर्वाजिन इव।
हृत प्रतिष्ठं यदजीरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। यजुर्वेद ३४/६
जिस प्रकार उत्तम सारथि घोड़ो को लगाम से साध कर भलीभांति चलाता है | उसी प्रकार हमारा मन जो अतयंत फुर्तीला और वेगवान है, हमारे जीवन को चलाता है। हे ईश्वर मेरा मन शुभ संकल्पों वाला हो।
संघर्षों के क्षणों में आपके संकल्प में मन में शिवत्व न हो तो बड़ा विध्वंस प्रस्तुत हो जाता है। मन को नियंत्रित करती है बुद्धि। इसलिए भागवत कहती है--सत्यं परं धीमहि। और बुद्धिर्यस्य बलं तस्य।

मेरी वैदिक शुभकामना है--

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः।
यद्पूर्वं यक्ष्मन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/२

जिस मन से कर्मठ और धीर विद्वान लोग अपने सब शुभ कर्म करते हैं।
जो अपूर्व और पूज्य मन सबके अन्दर है। वह मन शुभ विचारों वाला हो।

निवेदक
रामनारायण सोनी

हिन्दी दिवस पर वनाञ्चल को विवरण


मेरे प्रिय आत्मन्!

मैं शाजापुर जिले के एक छोटे से गाँव मकोड़ी में जन्मा हूँ। मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरा परिवार आध्यात्मिक भावनाओं और विचारों से लबरेज था। तत्कालीन ठेठ गाँव का परिवेश और उसमें रचे बसे सुरम्य ग्राम्य जीवन की मनमोहक छटा की याद सचमुच मुझे आज भी गुदगुदाती है।
प्रकृति की गोद में खेलता जीवन और चारों दिशाओं से आम्रकुंजों से घिरे हुए गाँव की छबि आज तक मेरे मन में बसी हुई है।
मेरी दादी सूरज बाई अौर माँ दरियाव बाई रात्रि के अन्तिम प्रहर में उठ कर चक्की पीसते हुए समवेत स्वर में पारंपरिक प्रभाती और भजन गाती थी जिनके भावों को लेते हुए कुछ रचनाएँ अपने काव्य संग्रह में परिलक्षित होती है तथा उन संचित भावों का आध्यात्मिक प्रभाव मेरे जीवन सदैव रहा है।
यद्यपि मैं विज्ञान का विद्यार्थी था फिर भी मेरी हायर सेकण्डरी स्तरीय शिक्षा में मैने मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, निराला, प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, वृन्दावनलाल वर्मा आदि कवियों, लेखकों के साहित्य को बड़े मनोयोग से पढ़ा। तब मैं डायरी लिखता रहता था। इसके बाद मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया। इसके पश्चात् म.प्र.वि.मं. में विभिन्न इंजीनियरिंग पदस्थापनाओं पर कार्यरत रहा। मुझे दो बार अतिविशिष्ट सेवाओं के लिए विशेष अवार्ड मिले।
सन् २००६ में सेवा निवृत्ति के पश्चात् २०१२ तक मुझे विद्युत वितरण कम्पनी इदौर में पुनर्नियुक्ति मिलती रही। इस दौरान मैंने सोशियो-टेक्नीकल और "टेक्नीकल कम रेवेन्यू एनालिसिस" के शोध कार्य किये जो मेरे द्वारा एकल प्रयास से स्थापित एम.आर.डी.एम. सेल के रूप में कार्यशील है। यह मेरे जीवन का सब से सुनहरा तकनीकी काल था। जो मेरे मन का एक परितोष प्रदान करता है।
सन् २०१२ में मेरे जीवन की तीसरी पारी शुरू हुई। फिर मुझे लगा कि हम जीवन भर समाज से किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ लेते रहते हैं तो हमारा कर्तव्य बनता है कि हम किसी न किसी रूप में समाज को लौटावें। सोशियो-टेक्नीकल एरिया में मैने कुछ शोध किए थे कि टेक्नोलोजी सिर्फ विकास और राजस्व अर्जन की बात न करे अपितु समग्र प्रयास जनता की परेशानियों को कम करे और सेवा करने वाली एजेन्सी को नुकसान भी न हो। कुछ प्रयोग बहुत सफल भी रहे। जैसे कि ईमानदार उपभोक्ता को परेशानी न हो लेकिन विद्युत चोरी करने वालों पर शिकंजा कसा जाय अन्यथा इनके चुराए राजस्व की भरपाई ईमानदारों को करना पड़ती है। इन विषयों का स्पेशलाइजेशन होने से विद्युत वित. कम्पनी में भर्ती होने वाले लगभग सभी बेच में ट्रेनिंग प्रदान करने का कार्य २००६ से अद्यतन जारी है। विश्वविद्यालय स्तर पर "स्मार्टग्रिड" जैसे अत्याधुनिक विषय पर सेमीनार एड्रेस करने का सौभाग्य भी मिलता है।
ईश्वर की अनुकम्पा से अब तीसरी पारी में साहित्य के पड़े वे बीज पुनः अंकुरित होने लगे। सन २०१३ में मेरी प्रथम पुस्तक "पिंजर प्रेम प्रकासिया" अौर २०१५ में  "जीवन संजीवनी" प्रकाशित हुई। ये कृतियाँ गद्यात्मक हैं। सन् २०१५ में एक सुखद संयोग हुअा कि मैं "रोटरी काव्यमञ्च" अौर "इन्सा, इन्दौर चेप्टर, इन्दौर" से जुड़ा जहाँ प्रबुद्ध वरिष्ट रचना धर्मियों का सानिध्य, प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन मिला। युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरी जी महाराज ने असीम अनुकम्पा कर मुझे दीक्षा प्रदान है। स्वामी प्रबुद्धानन्द सरस्वती, चिन्मय मिशन इन्दौर का आशीर्वाद औपनिषदेय चिन्तन के रूप में मिलता रहा है। डॉ कीर्ति स्वरूप रावत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सुविख्यात लेखक और शोध प्रदर्शक का आशीष मुझे मिलता ही रहता है। स्पष्ट है मेरे पास जो कुछ निसर्ग होता है उसके मूल तात्विक स्वरूप इन्हीं श्रेष्ठिय जनों का प्रदत्त प्रसाद होता है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में वे लोग हैं जो मेरे इस प्रयास में सहभागी रहे हैं, मैं अभिभूत हूँ और उनका कृतज्ञ हूँ।
जब भाव गहराते हैं तो शब्द नहीं मिलते और शब्द ढूँढते ढूँढते भावों की श्रृंखला बिखर जाती है लेकिन इन दोनों का मेल कभी कभी कुछ पलों के लिये हो जाता है तो साहित्य सृजित हो जाता है, कविता जन्म ले लेती है। मेरे साहित्यिक गुरु डॉ रमेश सोनी का कहना है कि कविता की नहीं जाती है वह तो हो जाती है। और कविता तुम्हारे माध्यम से खुद को लिखवा लेगी। उन्होंने एक प्रयोग और करने की भी सीख दी थी कि शब्दों में भाव पिरोने के बजाय भावों को शब्दों में निरूपित करने का प्रयास करें।
मेरे काव्य संग्रह की मूलाधार ये पंक्तियाँ देखें -
जैसे नेपथ्य से उभर कर आई,
किसी अनजान पवित्र रूह ने
अन्तस में इस तरह गुनगुनाई
कि मैं अभिभूत हो गाने लगा

मित्रों! जब मैं लिखता हूँ..
  तो मैं नही
  कोई और ही लिखता है
     मुझे बस तसल्ली है..
     ...कि मैं लिखता हूँ।

  वो ही आता है बस
    कलम पर बैठ जाता है
     मन की सीढ़ी पर
      वो ही चढ़ जाता है।

भावों के दरिया में..
     ..रंग घोल घोल जाता है।
         मुझे बस तसल्ली है..
          ...कि मैं लिखता हूँ

मेरे संकलन में कुछ अटपटी, लटपटी कविताएँ संग्रहित हैं। जब जब जो जो मन में आया लिख लिया। कविता की शास्त्रीयता, छन्द विन्यास, गीत, रस-अलंकार का मैं जानकार नहीं हूँ इसका आभास पाठक को जहाँ-तहाँ हो जाएगा। इस संकलन में सन् १९८५ से अद्यतन रचनाएँ सम्मिलित हैं।
जिन्दगी के आयाम अनन्त हैं। किंचिद् भावनाओं के रंग कलम की कूँची में पड़ गए और पृष्ठों के कैनवास पर सहज में उतर आए हैं इसलिए कदाचित् काव्य कलात्मकता का अभाव खल सकता है।
मैं थोड़ा थोड़ा प्रयोगधर्मी भी रहा हूँ। टेकनीकलिटि का उपयोग जहाँ तहाँ करता रहता हूँ। किसी अन्य की कविता अच्छी लगे तो मैं उसका इलस्ट्रेशन तैयार करता हूँ। उनकी लिखी इबारत की टीका सिर्फ इसलिये करता हूँ कि उनके सृजन को समझ सकूँ इसलिये नहीं कि उनकी निन्दा करूँ। मन करता है कि किसी की अच्छी रचनाओं का वीडियो बना कर यू-ट्यूब पर प्रकाशित करूँ। कोई अपनी रचना गाये तो उसे और सजा दूँ, जन्मजात स्वर्णकार जो हूँ। लोग अपनी रचनाओं का ब्लॉग आदि पर संग्रहण करे, इसमें मैं सहायता करता हूँ। मेरी पुस्तक "जीवन संजीवनी का प्रकाशन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया "किंडल" पर हो चुका है।
अपने सेवा काल में प्रत्यक्ष देखे गए सामाजिक, मानवीय सुख-दुःख, पीड़ा, करुणा, पर्यावरणीय परिवेश अौर उनकी अनुभूत संवेदनाओं के कुछ पलों की अभिव्यक्ति किंचिद् रचनाओं में झाँकती नजर आएगी।
"जिन्दगी के कैनवास" में संकलित नायिका प्रधान रचनाओं की भावात्मक पृष्ठभूमि मेरी सहधर्मिणी श्रीमति शकुन्तला सोनी की हैं जिनके शब्द मैंने दिए हैं। उनकी इस सहभागिता पर मैं गर्वित हूँ।
यहाँ इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि वाट्सएप ग्रुप "शब्द-धरा वनांचल" के सदस्य डॉ जय वैरागी, डॉ सीमा शाहजी, श्रीमति भारती सोनी, श्री धर्यशील येवले जी ने मेरी काव्य यात्रा में प्रोत्साहन और मार्गदर्शन का कार्य किया है। मैं उनका भी हृदय से आभारी हूँ। उनके इस कार्य से मैं अनुग्रहीत अौर उपकृत हूँ।

रामनारायण सोनी

Tuesday, September 3, 2019

सेहरा में गुलाब

मौन की गहराइयाँ
गुनगुना रही है
नेपथ्य से
पदचापों के आलाप

तैरते गूँजे मुखर स्वर
बाँधे पगों में अपने
झुनइुनाते घूँघरू
आरूढ़ हवा के परों पर

मन के द्वारे
दस्तक दी किसने
रेडियो की संवाही तरंगें
दिखती कहाँ है

काँधे पर टिका सर
नही है, पर है
एहसासों ने बना लिया
तिलिस्मी एक आशियाना

रेतीले इस सेहरा में
गुलाबों की खुशबुएँ
कुछ पता नहीं!
यह इबादत है या इश्क

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...