संगच्छध्वं संवदध्वं
सं वो मनांसि जानताम्
देवा भागं यथा पूर्वे
सञ्जानाना उपासते ||
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् |
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ||
हम सब एक साथ चले; एक साथ बोले; हमारे मन एक हो |
प्रााचीन समय में देवताओं का ऐसा उत्तम आचरण रहा इसी कारण वे वंदनीय है |
एक एक जुड़ कर सौ होते है यह उसे तब पता चलता है जब उसमें से अकेला एक बाहर हो जाए। संगठन भी इसी अवधारणा पर निर्मित होते हैं और टिके रह सकते हैं। परन्तु यह एकतर्फ़ा भी नहीं है। एक कहावत है प्याज के छिलके मत उतारो बात बिगड़ जाएगी। छिलका छिलका कर के प्याज पूरा समाप्त हो जाएगा। अब जरा गौर से देखें एक हाथ में प्याज हो और दूसरे हाथ से छिलके उतारें। जिस हाथ में प्याज है वह आखिर तक प्याज ही कहलाएगा वहीं उतरने वाला छिलका प्याज नहीं छिलका ही कहलाएगा। संगठन में शामिल होने पर ही इकाई का महत्व है अलग होने पर अपना सहअस्तित्व खो देती है। संगठन एक सहअस्तित्व है। बनता भी है एक एक कर और बिखरता भी है एक एक के अलग होने से। जितने भी सफल संगठन हैं उनके पास निर्धारित टीम वर्क है। उनमें एक लयात्मकता होती है। एक मानस से ताने बाने जैसी बुनी होती है। सफलता इसकी ही परिणिति है। एक इतिहास के छात्र से मैंने पूछा कि तुम जो पढ़ते हो वह सब तो कब के मर खप गए उनके बारे में अब कुछ पढ़ने से क्या फायदा। उसका जवाब था कि सब आज के लिए सीख हो सकती है। पूर्व में जो अच्छा किया गया उसका अनुकरण किया जाना चाहिए और जो कार्य असफल हुए उनसे सीख लेनी चाहिए। हमारे राष्ट्र गीत में शुरू में ही कहा गया है "जन गण मन"। यहाँ के संदर्भ में जन इकाई है, गण संगठन है और मन मतैक्य होने की बात कहता है। चलें! हम समवेत हो जाएँ।