Thursday, July 27, 2023

बूँद -बूँद बूँद

बूँद-बूँद बूँद

च्यवनिका
#4

च्यवनिका

#4


बूँद-बूँद बूँद


सारा समुन्दर बूँद बूँद ही तो है, और बारीकी से देखें तो बूँद ही तो है। बूँद एक शब्द का महाकाव्य है। इसमें सारे सर्ग हैं, सारे सोपान हैं, सारे रस हैं, सारे भाव-विभाव-अनुभाव है। हाँ इसमें संचारीभाव भी है। बूँद व्याकरण भी है और रचना भी। बूँद अनगिनत पात्रों का एकांकी नाटक है। बूँद भीतर से नरम और बाहर से चमकीली है।

 बूँद कभी हवा में उड़ जाती है हवा जैसी हो कर, कभी जम जाती है पत्थर सी हो कर। कभी पत्तों की नोक पर ठहर कर मोती की तरह हो जाती है तो कभी दिल से नमक खींच कर लाती है और आँखों से बह कर जी हलका कर देती है। कभी बरखा बन कर धरती को तर बतर कर देती है तो कभी मेरी प्रियतमा की अलकों में ठहर कर श्रृंगार कर देती है। बूँद जो प्यास का समाधान है, बूँद जो पसीने का आधान है यही बूँद कहीं कहीं व्यवधान है। बूँद कभी घुल जाती है किसी में तो बूँद किसी को घोल लेती है खुद में। कभी पुतलियों में तैर जाती है तो कभी सूखी रेत में गिर कर खो जाती है। प्रपात में झरती है तो उसका निनाद लगता है जैसे प्रकृति गाने लगी है।

कुछ बूँदें जो द्रौपदी की आँखों से निकल कर लावा बनी तो अनगिनत लोगों को राख के ढेर में तबदील कर गई। बूँद बूँद बूँद मिल कर बाढ़ बन जाती है तब वह उच्छृंखल हो जाती है, विप्लव का पर्याय बन जाती है। जब ठहर जाती है तो सरोवर, झील, पोखर हो जाती है। बूँदें अपने प्रिय को अलविदा कहने लगती है तो लगता है वह मौन हो कर भी बिरहा गीत गा रही है। कभी इसमें विष घुल जाता है तो कभी नशा। कभी अमृत घुल जाता है तो कभी दवा। बूँद बदलियों के गर्भ में पलती है और जन्मते ही धरा की गोद में आ जाती है। अपनी ही जात के पानी में जब टप-टप टपकती है टिप-टिप का नाद उत्पन्न करती है। इसी बूँद को बरस भर के इन्तजार के बाद पपीहा पिऊ पिऊ कर आकाश में ही पी जाता है। एक लम्बी सी प्यास का छोटा सा प्यारा सा आत्मसात प्रखर प्रेम।

बूँद हमारे मुँह से प्रवेश कर खून में मिल जाती है फिर रग रग में घूमती है फिर एक दिन चिता पर लेट कर आकाश में कहीं गुम हो जाती है। कोई नहीं जानता। आते हुए देखा है उसे सब ने पर कौन देख पाया है उसे इस तरह जाते हुए। 


रामनारायण सोनी

28.07.23

Thursday, July 13, 2023

डाकटिकिट में हिन्दी और भारतीय भाषाएँ

डाकटिकिट में हिन्दी और भारतीय भाषाएँ

जब मैंने कुछ डाकटिकिटों को ध्यान से देखा तो मुझे लगा हर डाक टिकिट, लिफाफा, पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय पत्र केवल संचार के साधन और संदेश वाहक ही नहीं हैं वरन् उनमें विभिन्न संस्कृतियाँ, परम्पराएँ, इतिहास, और साहित्य, भाषाएँ, बोलियाँ आदि की तमाम सारी खूबियाँ भरी पड़ी हैं। जैसे नींबू से नींबू का रस और फिर उससे नींबू का सत तैयार होता है वैसे ही ये अत्यन्त लघु लेकिन बहुउद्देश्यीय अभिलेख हैं। इन्हें जब इतिहास के सापेक्ष में देखा जाता है तब ये डाकटिकिटें दस्तावेज शिलालेखों, भित्तिचित्रों, जीवाश्म अभिलेखों की तरह के 'पुरालेख' दिखाई देते हैं। इनमें कई तरह के मिथक, कहानियाँ, संवाद, व्यक्तित्व, कृतित्व और परम्पराएँ भरी पड़ी हैं।
जिस प्रकार पुस्तकें लिखी जाती है, शिल्प गढ़े जाते हैं, रंगों से आकार उकेरे जाते हैं उसी प्रकार डाक टिकिटों का निर्माण भी अपने आप में एक सृजन ही है। अलबत्ता इनका आकार बहुत छोटा होने से उनमें वाञ्छित उद्देश्य की स्पष्ट अभिव्यक्ति किया जाना और दुरूह है। देखा जाए तो उनमें आकार और प्रकार की सीमा नहीं है परन्तु इन डाक टिकिटों में सीमित स्थान होने और रंग संयोजन की पर्याप्त स्वतन्त्रता नहीं मिल पाने के बावजूद उपयुक्त डिजाइन तैयार करना एक दुरूह और दुष्कर कार्य है। इन सब के बावजूद इनकी डिजाइनों को अन्तर्राष्ट्रीय मानकों और कड़े नियमों का परिपालन करना अनिवार्य होता है।
इस चर्चा को उपयोगी और सार्थक बनाने के लिये हमें डाक टिकिटों के विषय में, भाषा और बोली के विषय में तथा साहित्य के विषय में एक संक्षेप लेकिन आधारभूत जानकारी प्राप्त कर लेना जरूरी है।
डाक टिकिटों का स्वयं का इतिहास बहुत अधिक पुराना नहीं है जबकि उनमें उक्त इतिहास पुराना हो सकता है।
डाक टिकट संग्रह:- आम आदमी के सामने जैसे ही टिकिट शब्द आता है उसे रेलवे और बस में सफर करने वाले टिकटों का आकार प्रकार जेहन में आता है लेकिन डाक टिकिट का उद्देश्य और विधेय इनसे बिलकुल अलग है। वहीं डाक टिकिट, मुद्रांकित लिफाफे, पोस्टमार्क, पोस्टकार्ड और डाक वितरण से संबंधित अन्य सामग्रियों का अध्ययन मोटे तौर पर हिन्दी में 'डाकटिकिट संग्रह' कहलाता है जबकि यह इसके लिये प्रयुक्त और अधिकृत शब्द 'फिलेटली' का न तो शब्दार्थ है न ही अन्तर्राष्ट्रीय मानक के अनुरूप है लेकिन हिन्दी भाषा अब अधिकतर देशों की सम्पर्क भाषा बन चुकी है तो यह फिलेटली से अधिक प्रभावी हो चुका है। वस्तुतः 'डाक टिकट संग्रह' शब्द ऊपर उल्लिखित वस्तुओं के संग्रह को दर्शाता है। 'फिलेटली' शब्द 1864 में एक फ्रांसीसी, जॉर्जेस हेरपिन द्वारा गढ़ा गया था, जिन्होंने इसे ग्रीक फिलोस, "लव," और एटेलिया, "जो कर-मुक्त है" से आविष्कार किया था वस्तुतः तो यह भी अंग्रेजी से इतर है।
प्रारंभिक डाक टिकट :- पत्र डाक के रूप में पूर्वभुगतान (प्रिपेड) किया गया पहला डाक टिकट 1840 में इंग्लैंड में जारी किया गया था। यह रॉलैंड हिल नामक व्यक्ति के दिमाग की उपज थी। तब डाक शुल्क मुख्य रूप से तय की गई दूरी (और पत्र के वजन) द्वारा निर्धारित किया गया था। हिल ने एक प्रस्ताव दिया कि सभी डाक शुल्क प्रीपेड हों, और ग्रेट ब्रिटेन के भीतर एक निश्चित दर पर किसी भी दूरी पर पत्र ले जाए जा सके। बाद में हिल ने दो प्रकार के साधन बनाए, पहला प्रीपेड लिफाफे और दूसरा चिपकने वाले डाक टिकट।
कालान्तर में डाक टिकट को 1842 में न्यूयॉर्क शहर के अर्ध-आधिकारिक सिटी डिस्पैच पोस्ट द्वारा उपयोग के लिए अपनाया गया था। अगले वर्ष ब्राजील, ज्यूरिख के स्विस और जिनेवा ने डाक टिकट भी जारी किए। 1847 में अमेरिकी सरकार ने क्रमशः बेंजामिन फ्रैंकलिन और जॉर्ज वाशिंगटन की तस्वीरों वाले 5 और 10 प्रतिशत मूल्य के टिकट जारी किए। 1850 में ऑस्ट्रिया और विभिन्न जर्मन राज्यों ने इसका अनुसरण किया, जिसके बाद दुनिया के शेष देशों ने डाक टिकट जारी करना शुरू किया। ये शुरुआती डाक टिकट कागज की चादरों पर छपे थे।
स्मारक डाक टिकट नियमित डाक टिकट होते हैं जो किसी घटना, गतिविधि या राष्ट्रीय महत्व के व्यक्ति के सम्मान में जारी किए जाते हैं।अन्य नियमित डाक टिकटों के विपरीत वे केवल एक बार मुद्रित होते हैं और प्रचलन से बाहर कर दिये जाते हैं। एक शौक के रूप में डाकटिकट संग्रह डाक टिकटों को जारी करने के तुरंत बाद डाक टिकट संग्रह के शुरुआती संदर्भ के बाद, 1841 के बाद विशेष देशों के विभिन्न मुद्दों के व्यवस्थित संग्रह का सौक तेजी से आगे बढ़ा।
डाक सामग्रियों में फिर डाक स्टेशनरी या लिफाफे, रैपर और लेटर शीट के साथ-साथ कई स्थानीय मुद्दों को भी शामिल किया गया है। संग्रहण की प्रक्रिया और व्यवस्थापन के लिये मानक आधुनिक स्टाम्प कैटलॉग की पद्धति ग्लोबल लेवल पर निर्धारित है।
जिन पुस्तकों में डाक टिकट रखने के लिए पहली बार उपयोग किए गए थे और उन्हें 'स्टैम्प एल्बम' के रूप में जाना जाता है। विशिष्ट मुद्रित स्टाम्प एल्बम में देशों के नाम वाले पृष्ठ होते हैं। ब्लैंक एल्बम लूज़-लीफ़ फोलियो होते हैं जिनके खाली पृष्ठ डाक टिकट संग्रहकर्ताओं को अपनी इच्छा के अनुसार डाक टिकटों की व्यवस्था करने की अनुमति होती है। एक संग्रह की व्यवस्था में, स्टैम्प सीधे एल्बम पृष्ठ पर चिपकाए नहीं जाते हैं।
यह जानकारी अति संक्षेप में उल्लिखित है और हमारी चर्चा में शामिल है।

भाषा और साहित्य के समकक्ष डाकटिकिटें-
रघुवंशम् महाकाव्य में महाकवि कालिदास ने प्रार्थना में कहा है "वागर्थाविव सम्पृक्तौ" जिसका तात्पर्य है वाणी और अर्थ आपस में एकदम मिले हुए हैं। वाणी का व्यावहारिक स्वरूप है भाषा। जो कुछ भी कहा जाता है उसका कोई न कोई अर्थ होना चाहिये इसका उलट देखें तो जो हम व्यक्त करना चाहते हैं वह किसी शब्द से व्यक्त होने चाहिये यही भाषा का निहित उद्देश्य है। भाषा के चार अवभाजित अवयव है- लिपि, शब्द या संकेतक, अर्थ और भाव। संसार की कोई भी भाषा हो जब तक ये चारों अवयव उसमें नहीं है भाषा परिपूर्ण नहीं कही जा सकती। भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में- जिसके द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावों को समझ सके उसे भाषा कहते है। सार्थक शब्दों के समूह या संकेत को भाषा कहते है।
भाषा और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाषा के बिना साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती और साहित्य के बिना भाषा का विकास असंभव सा प्रतीत होता है। अतः दोनों ही एक दूसरे के अनुपूरक हैं। भाषा विचारों को प्रकट करने का माध्यम है तो वहीँ साहित्य विचारों, कल्पनाओं और कलाओं को सहेजने और संरक्षित करने का साधन है।

वस्तुतः भाषा के जिन अवयवों की चर्चा यहाँ की गई है डाकटिकिटों के मुद्रण और प्रसारण में ये तत्व दूध में मक्खन जैसा मिश्रित और संनिहित हैं। इसकी लिपि रेखांकन है, रेखांकन से बने चित्र भाषा के संकेतकों के समान हैं, इनका सृजन सार्थक उद्देश्य की प्रतिपूर्ति है, और भाव संप्रेषण तो चित्रों का सब से सशक्त माध्यम है ही। एक साधारण सा चित्र भी हजारों वाक्यों के निरूपण की क्षमता रखता है फिर डाक सामग्रियाँ तो एक सुव्यवस्थित प्रक्रम है। जिस तरह भाषा भावों का संप्रेषण और उनका दस्तावेजीकरण करने में समर्थ है डाकटिकिटें और डाक सामाग्रियाँ संतृप्त तरीके से करने यही कार्य संपादित करने में समर्थ है।

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विश्व प्रसिद्ध (इन्दौर निवासी) फिलेटलिस्ट श्री रवीन्द्र नारायण पहलवान ने इस विषय में बहुत प्रशंसनीय कार्य किये हैं। इनका एक अनूठा प्रयास तद्रूप में एल्बम की शक्ल में मेरे सामने है। यह प्रयास अनूठा इसलिये है कि इस संकलन में उन्होंने विश्व स्तर पर हिन्दी भाषा और भारत में प्रचलित कई भाषाओं में प्रदर्शित कई देशों की डाक सामग्रियों में अंकन तथा इन्हें कई देशों ने किया है। इनके मूल रिकॉर्ड्स श्री पहलवान के मौलिक संग्रह में सम्मिलित है। चूंकि उनका मौलिक संग्रह अमूल्य है पर उस पर मैं अपनी राय व्यापक स्तर पर देना चाहता था तो मेरे निवेदन पर उन्होंने एल्बम की रंगीन प्रतिलिपि तैयार करवा कर दी है जो इस आलेख के लिये मेरे पास उपलब्ध है। आभार। इसका प्रत्येक फलक भी मौलिक के क्रमानुसार नत्थी है। मैं अपनी सुविधा के लिये क्रमवार पृष्ठ 1 से संदर्भ में लूँगा जबकि यह सब फिलेटली के प्रोटोकॉल में फिट नही होता है पर  व्यवस्थित चर्चा हो सके इसलिये किया जा रहा है। इसमें कुल 26 फलक (फोलियो) हैं। एल्बम का शीर्षक है 'हिन्दी और भारतीय भाषायें'। हमारी इस चर्चा में डाक टिकिट का विस्तृत विवेचन नहीं होगा अपितु फिलेटली वर्सेस भाषा, बोली और साहित्य तथा इनके ऐतिहासिक महत्व पर आधारित होगा।

पहला फलक प्रथम दिवस आवरण FIRST DAY COVER. इसमें डाक टिकिट के साथ देवनागरी लिपि के कुछ वर्ण अंकित हैं जो हिन्दी भाषा की लिपि 'देवनागरी' को दर्शाता है। इसमें डायरी की तरह हिन्दी में हस्तलिखित पत्र प्रदर्शित है। निश्चित रूप से यह भाषा, इतिहास, पत्र लेखन जैसी विधा का मिनिएचर स्वरूप में प्रदर्शित है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इस डाक टिकिट में महात्मा गाँधी के और चरखा आदि चित्रों के की पृष्ठभूमि में देवनगारी के अक्षर छपे हैं।
फलक 2 में भारत और मारीशस ने विश्व हिन्दी सम्मेलन के संदर्भ में अपने अपने स्तर टिकट और प्रथम दिवस कवर जारी किये हैं। इसमें दर्शित डाक टिकट में भारतेतर देश मारीशस ने हिन्दी हिन्दी को प्रमुख स्थान दिया है।
बीच में जो 25 (रु.) के टिकट में षृष्ठभूमि में भारत की आदिभाषा नागरीलिपि में आलेखित है। हिन्दी दिवस पर 1988 में भारत द्वारा जारी 60(रु.) में भारतवर्ष के वर्तमान मेप में केन्द्र पर उगे एक फूल की पंखुड़ियों के मध्य में 'हिन्दी' छ्पा है और फूल के चारों ओर देवनागरी में देश की अन्य भाषाओं के नाम वर्णक्रमानुसार - भारतीय/क्षेत्रीय भाषा असमिया, उड़िया, उर्दू, कन्नड़, काश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलगु, मलयालम, सिन्धी, संस्कृत, मराठी, बांगला, पंजाबी छपा हुआ है। फलक 2 और 3 पर 25 की   अलग अलग टिकटों में एक ही देवी की मूर्ति का चित्र है पर एक की पृष्ठभूमि में संस्कृत और दूसरी में तेलगु भाषा अंकित है।
ऐसा लगता है कि यहाँ भाषा के साथ साथ साथ पौराणिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और इससे जुड़ी घटनाओं, इतिहास तथा उनके प्रमुख पात्रों का भी जिक्र होना जरूरी है। फलक क्रमांक 4 अवधी, संस्कृत भाषा, के साथ पतंजलि, वाल्मीकि अपने कृतीत के साथ प्रदर्शित है। एक विशेष बात दिखाई दी कि एशियाई खेल के लिये जारी टिकिट में अर्जुन की धनुर्विद्या प्रदर्शित है।
फलक 5 में टिकिटों के माध्यम से पाणिनी से सूरदास तक की संक्षिप्त साहित्यिक यात्रा के संकेत हैं। फलक 6 में टिकिटों का कोलाज (लघु पत्रक) है जो हस्तलिखित पाण्डुलिपियों की पृष्ठ भूमि पर है। फलक 8, 9, 10 में दर्शित टिकिटों पर हिन्दी के प्रेमचन्द, निराला आदि लेखकों, कवियों के चित्रों का अंकन कर के उनके युगीन हिन्दी साहित्य को ही रेखांकित किया है। फलक 11 पर पंचतंत्र के पात्रों के चित्र वाली 4 रु. मूल्य की टिकिट देख कर लगता है कि संस्कृत भाषा में मूल ग्रन्थ का हिन्दी में अनुवाद किये जाने का परोक्ष संकेत है जो साहित्य की ही विधा है। फलक 13 पर एक टिकट में पहाड़ी पृष्ठभूमि पर 'अद्वैत' अंकित है जो संस्कृत साहित्य और भारतीय औपनिषदेय दर्शन साहित्य का स्पष्ट संकेत है। फलक 14 में उल्लिखित 'भारत का भाषाई ऐक्य' पर जारी प्रथम दिवस के उसी आवरण में भारतीय बाँगला, गुजराती और हिन्दी के साहित्यकारों को एक साथ चार टिकटों को शामिल करना एक प्रशंसनीय कार्य है जो भारतीय को हिन्दी के साथ समग्रता में खड़े करने उपक्रम है। फलक 16 में उर्दू के उन्नायक और बेहतरीन शायर बहादर शाह जफर से ले कर मोहम्मद इकबाल को याद कर उर्दू भाषा को सम्मान प्रदान किया है। कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम जब भी आता है तो उनकी कृति जो मूलरूप से बँगला में है का स्मरण होता ही है। उनकी स्मृति में जारी डाक टिकट बाँगला भाषा का भी सम्मान है। इसी तरह फलक 19 और 20 पर अंकित 10 टिकटों में अलग अलग भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को याद कर भारतीय बोली भाषाओं की महत्ता पर मुहर लगाई है।
हिन्दी भारत ही नहीं विश्वस्तर की संपर्क भाषा है। दक्षिण भारत में भी यह संपर्क भाषा का काम करती है लेकिन दक्षिण भारतीय भाषाओं के संत अरुणगिरिनाथर से लेकर देशिकविनायकम पिल्लै तक के संत कवियों ने अपने लेखनकर्म से तमिल को लोकभाषा का स्वरूप दिया। इन संतो के अलग अलग दस डाक टिकट जारी हुए जो तमिल भाषा को विभूषित करती हैंl इसी क्रम में फलक 22,23 में पजाबी, मणिपुरी, कन्नड़, आसामी भाषाओं के अग्रपुरुषों को अंकित किया गया है।
फलक 24 पर 8 डाकटिकटों भिन्न भिन्न गायकों का कोलाज है जिसमें भूपेन हजारिका, हेमन्त कुमार जैसे विभिन्न फिल्मी गायकों ने हिन्दी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में (मल्टीलिंग्विस्टिक हो कर) सफलता से गीत गाये हैं। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ओमान, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों ने हिन्दी भाषा में डाक टिकट जारी कर हिन्दी को लोकप्रिय संपर्क भाषा का सम्मान दिया है।
उपरोक्त वर्णित डाक टिकट संग्रह में वैसे देखने में तो लगता है कि अधिकतर डाक टिकटों में भारतभर के विभिन्न परिक्षेत्रों के महापुरुषों के चित्र हैं परन्तु विभिन्न भाषाओं की केवल लिपि लिखने से प्रदर्श उपयुक्त नहीं हो पाता परन्तु टिकटों में उनके कर्मकेत्र और भाषा साहित्य में योगदान को रेखांकित करता है।
उपसंहार में कहें तो इसी तथ्य की पुष्टि होती है कि फिलेटली में हिन्दी और भारतीय भाषा के साथ साथ भारतीय संस्कृति की विविधता होते हुए भी उनकी समग्रता निरूपित की गई है। जैसा कि पूर्व में कहा गया है कि डाकटिकट एक बड़े से केनवास का युक्तियुक्त मिनियेचर प्रेजेन्टेशन है। यह प्रयास इसलिये भी प्रशंसनीय है कि फिलेटली के अन्तर्राष्ट्रीय कठोर मानकों का अनुशीलन बरकरार रखते हुए उस फ्रेम में हिन्दी और भारतीय भाषाओं को ऐतिहासिक बना कर महिमा मण्डित किया है।

रामनारायण सोनी
25 ए, ब्रजेश्वरी मेन
इन्दौर, 452013
मो. नं. 9340761477


डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...