धागे हमने चुने लचर
अब गाँठ उम्र भर लगनी है
साँसे हमने बुनी कुवाँरी
अब चादर कहाँ सुधरनी है
धोबी धोवे कूट कूट कर
धागे हमने चुने लचर
अब गाँठ उम्र भर लगनी है
साँसे हमने बुनी कुवाँरी
अब चादर कहाँ सुधरनी है
धोबी धोवे कूट कूट कर
स्वप्न अौर जाग्रत के मन अौर चित्त वही है।
यथा स्वप्ने द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं स्पन्दते मायया मनः ॥ ३/२९ ॥
जिस प्रकार स्वप्नकाल में मन माया से ही द्वैताभास रूप से स्फुरित होता है उसी प्रकार जाग्रत काल में भी वह माया से ही द्वैताभास रूप से स्फुरित होता है।
अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३/३० ॥
इसमें संदेह नहीं कि स्वप्नावस्था में अद्वय मन ही द्वैत रूप से भासने वाला है इसी प्रकार जागृत काल में भी निःसंदेह अद्वय मन ही द्वैत रुप से भासता है।
हम सोते हैं तो हमें सपने आते हैं। कभी सपने याद रहते हैं कभी याद नहीं रहते। कभी सपने आधे अधूरे याद रहते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें सपने आते ही नहीं है। कुछ बातें स्वप्न के विषय में जिज्ञासा पूर्ण हैं-
१, जब हम जाग रहे होते है उस समय हम सपने नहीं देखते। हमारा मन अपने आस पास की बातों में या कल्पना करने में व्यस्त रहता है।
२, जब हम सोते हैं तब या तो स्वप्न देखते हैं या स्वप्न रहित निद्रा में रहते हैं। स्वप्न मन देखता है और ठीक वैसा अनुभव करता है जैसा वह जागते वक्त स्थिति का अनुभव करता है।
जब जागते हैं तब स्वप्न नहीं आते। नींद अथात् निद्रा में ही स्वप्न आते हैं। प्रश्न उठता है कि जब हम सो जाते है तब हमारी इन्द्रियाँ और मन सभी निश्चेष्ट रहते हैं फिर कौन है जो स्वप्न देखता भी है और याद रखता भी है। जागने पर हमें वापस कौन बताता है? और किसको बताता है। जब हम सोये अौर मन भी सोया लग रहा है ऐसे में क्या कोई दूस्सा मन उसे देखता है क्योंकि जागते में जिस मन से सब कुछ अनुभूत हो रहा था वह तो सोया हुआ जान पड़ता है। हमें निश्चित ही यह लगता है कि सोते समय का और जागते समय का मन अलग अलग है लेकिन यह मात्र आभास है। मन ने स्वप्न में कुछ देखा और फिर जब जागे तो सोते हुए में सपने में देखने वाले मन ने जागते समय वह जो कुछ देखा वह बताने लगता है। हमें इस स्थिति में फिर लगता है कि सोते समय वाला मन अलग था। अर्थात् सोते समय और जागते समय, दोनों बार, हमें मन अलग अलग प्रतीत होता है। वास्तविकता यह है अन्तःकरण का यह प्रभाग मन केवल एक है पर माया के प्रभाव से दो अलग अलग प्रतीत होता है। वास्तव में सपने में कार्यशील और जागते में कार्यशील मन एक ही है।
निद्रा के समय भी वह शक्ति विद्यमान रहती है जिसे सोने का अनुभव होता है, वह शक्ति ही दृष्टा की दृष्टि है जिसका कभी नाश नहीं होता। इस तथ्य को बृहदारण्यक श्रुति४/३/२३-३० तक के मंत्रों द्वारा स्पष्ट किया गया है —पश्यन् वै तत्र न पश्यति, जिघ्रन्, रसयन्, वदन्, श्रण्वन्, मन्वन्, स्पर्शन् विजानन् — वै न पश्यति, न जिघ्रति, न रसयते,न वदति, न श्रृणोति, न मनुते, न स्पृशति, न विजानाति नहि दृषटिविलेपे भवति अविनाशित्वात् – न तद्द्वितीयमस्तिततोsन्यत्विभक्त यत् पश्येत् –इत्यादि–
अर्थात् उस निद्रावस्था में अन्य कोई न विद्यमान न रहने से प्राणी देखता हुवा, सूंघता हुवा, चखता हुवा, बोलता हुवा, सुनता हुवा, मनन करता हुवा, स्पर्श करता हुवा और जानता हुवा भी नहीं देखता, नहीं सूँघता, नहीं चखता, नहीं बोलता, नहीं सुनता, नहीं स्पर्श करता, तथा नहीं जानता है।
तात्पर्य यह है कि नींद में यद्यपि चैतन्यता बनी रहने के कारण इन्द्रियों व मन की समस्त क्रियाओं की वास्तव में विद्यमानता रहते हुवे भी बाहरी उपकरणों (इन्द्रियों) की क्रिया न होने के कारण चैतन्यता विलुप्त हुई सी जान पङती है परन्तु वास्तव में वह दृष्टा की दृष्टि हमेशा बनी रहती है; उसका कभी लोप नहीं होता है।
जिस प्रकार जलते हुए दीपक से उसकी नैसर्गिक उष्णता अलग नहीं की जा सकती, उसी प्रकार चेतन दृष्टा स्वयम् ज्योति होने से उसकी चैतन्य दृष्टि उससे अभिन्न है तथा आत्मा चैतन्य नित्य होने से उसकी दृष्टि भी नित्य रहती है। यही प्रतीत सत्य जान पड़ती है ठीक वैसी ही जैसी जाग्रत में लगती है।
इसी प्रकार चित्त की भी स्थिति है। हम स्वप्न में अनेक प्रकार के दृश्य, देखते है, अनेक लोगों से मिलते है व स्वप्न में ही कई प्रकार की कल्पनाएँ भी करता है। यहाँ-वहाँ घूमता है परन्तु न तो उस समय उसके देखे दृश्य ही वास्तविक होते है और न ही उसके स्वयं के सिवाय अन्य कोई व्यक्ति ही होता है, न ही विचरण किये स्थान ही सत्य होते हैं। उस समय केवल मात्र उसका चित्त व चित्त की स्पन्दना ही नाना रूपों में भासती है। अर्थात् उसकी चित्त की स्फुरणा एकमात्र होते हुवे भी कोई और चित्त की उपलब्धता भासती है जो जागने पर मिथ्या मालूम सिद्ध हो जाती है। जाग्रत अवस्था में भी मानव चित्त से ही अनेक दृश्य देखता है, संवाद करता है। यहाँ वहाँ जाकर कई स्थान देखता है। इस जाग्रत अवस्था में भी वही चित्त व वही चित्त की स्फुरण के माध्यम से ही सब अनुभव प्राप्त करता है। स्वप्न तथा जाग्रत; दोनों अवस्थाओं में अनुभव करने वाला चित्त एक ही होता है।
रामनारायण सोनी।
चित्तं न संस्पृशत्यर्थं नार्थाभासं तथैव च ।
अभूतो हि यतश्चार्थो नार्थाभासस्ततः पृथक् ॥
निमित्तं न सदा चित्तं संस्पृशत्यध्वसु त्रिषु ।
अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥
(माण्डूक्यकारिका - अलातशांति प्रकरण - २६-२७)
चित्त (कभी) किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार न किसी अर्थाभास का ही ग्रहण करता है क्योंकि पदार्थ तो है ही नहीं, इसलिए पदार्थाभास भी उस चित्त से पृथक नहीं है । (भूत,भविष्य और वर्तमान) तीनों अवस्थाओं (कालों) में चित्त कभी किसी बिषय को स्पर्श नहीं करता फिर उसे बिना निमित्त के ही विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है ?
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥
महत: परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुष: पर:।
पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गति: ॥ (कठोपनिषद् - १/३/१०-११)
इन्द्रियों से श्रेष्ठ शब्दादि विषय हैं, विषयों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुध्दि और बुध्दि से भी अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान महान् आत्मा है । उस आत्मा से भी बलवती परमेश्वर की माया शक्ति (आदिशक्ति) है और उस माया शक्ति से भी श्रेष्ठ व परे वह परम ब्रह्म परमेश्वर है जिससे श्रेष्ठ और बलवान कुछ भी और कोई भी नहीं है। वही सबका (श्रेष्ठ समय) परम अवधि और वही सबकी (श्रेष्ठ) परम गति है ।
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति ।
यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति ।
श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति ।
देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति ।
दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च
सच्चासच्च सर्वं पश्यति ।
सर्वः पश्यति ॥
इस स्वप्नावस्था में यह देव अपनी विभूति का अनुभव करता है। इसके द्वारा (जाग्रत-अवस्था में) जो देखा हुआ होता है उस देखे हुए को ही यह देखता है, सुनी-सुनी बातों को ही सुनता है तथा दिशा-विदिशाओं में अनुभव किये हुए को ही पुनः-पुनः अनुभव करता है। यह देखे, बिना देखे, सुने, बिना अनुभव किये तथा सत और असत सभी प्रकार के पदार्थों को देखता है और स्वयं भी सर्वरूप होकर देखता है।
भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।
देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥
कुछ लोग 'सृष्टि भोग के लिये है' ऐसा मानते हैं और कुछ 'क्रीडा के लिये है' ऐसा समझते हैं। (परंतु वास्तव मे तो) यह भगवान का स्वभाव ही है क्योंकि पूर्ण काम को इच्छा ही क्या हो सकती है?
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद
ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं
गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥
निश्चय ही जो कोई भी उस परमब्रह्म परमात्मा को जान लेता है वह महात्मा ब्रह्म ही हो जाता है । इसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता । (वह) शोक से पार हो जाता है, पाप समुदाय से तर जाता है, हृदय की गाँठों से सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है ।
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन ।
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥
(शुद्ध) मन से ही यह परमात्म तत्व प्राप्त किए जाने योग्य है । इस जगत में (एक परमात्मा के अतिरिक्त) भिन्न कुछ भी नहीं है । (इसलिए) जो इस जगत में भिन्न भाव से (भेद दृष्टि से) देखता है, वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है । (अर्थात बार-बार जन्मता- मरता रहता है ।)
यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः ।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥
जिस समय चित्त सुषुप्ति में लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और बिषयाभास से रहित हो जाय उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ।
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निद्रा में स्वप्न आते है अर्थात निन्द्रा के टूटने से जाग्रति होती है। थका हुआ देह हो तब आ जाती है निद्रा। सारी दुनिया की चिंतायें अस्त हो जाती है निद्रा में। जाग्रत व स्वप्न में प्रकाशक है आत्मा।
अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३० ॥
यथा स्वप्ने द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ॥ ६१ ॥
अद्वयं च द्वयाभासं चित्तं स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ६२ ॥
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निगद्यतेन्तःकरणं मनोधीः
अहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः ।
मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभिः
बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः ॥
(विवेक चूड़ामणि - ९३)
अपनी वृत्तियों के कारण अंतःकरण - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार (इन चार) नामों से जाना जाता है। संकल्प विकल्प के करण 'मन', पदार्थों का निश्चय करने के कारण 'बुद्धि', मैं - मैं (अहम् - अहम्) ऐसा अभिमान करने के कारण 'अहंकार' और अपना इष्ट चिंतन करने के कारण 'चित्त' कहलाता है।
The inner organ is called Manas, Buddhi, ego or Chitta, according to their respective functions. Manas, from its considering the pros and cons of a thing, Buddhi, from its property of determining the truth of objects, the ego, from its identification with this body as one’s own self and Chitta, from its function of remembering things it is interested in.
अत्राभिमानादहमित्यहंकृतिः ।
स्वार्थानुसंधानगुणेन चित्तम् ॥
(विवेक चूड़ामणि - ९४)
अपने विकारों के कारण स्वर्ण, जल आदि के समान स्वयं प्राण ही वृत्ति भेद के कारण प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान इन पांच नामों से जाना जाता है।
माण्डूक्य उपनिषद् कारिका अद्वैत खण्ड मन्त्र ११:-
रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ३/११ ॥
...आकाशवद् परमात्मा ही उनके आत्मा जीव रूप से प्रकाशित किया गया है।
वहीं कारिका के ४/६८ से कुछ और लगता है।
यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४/६८ ॥
जिस प्रकार स्वप्नमय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
एक जिज्ञासा है कि - क्या स्वप्नमय जीव ३/११ में कहे जीव से भिन्न है? उसका आगम और पर्यवसान है?
आगे चतुर्थ खण्ड में यह भी कहा गया है:-
यथा मायामयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४ /६९ ॥
अर्थात् जिस प्रकार मायामय जीव उत्पन्न होता भी है, वैसे ही वह मरता भी है। उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
तैत्तरीय उपनिषद् २/१ कहता है-
ब्रम्ह सत्य ज्ञान स्वरूप और अनन्त है। जो परम विशुद्ध आकाश में ही रहते हुए भी प्राणियों के हृदय रूप गुफा में छिपे हुए ब्रह्म हैं उसको जो जानता है वह विज्ञान स्वरूप ब्रह्म के साथ समस्त भोगों का अनुभव करता है। और आगे आता है-
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: शंभूतः।
निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मा से सर्व प्रथम आकाश तत्व उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल तत्व से पृथ्वी तत्व उत्पन्न हुआ। पृथ्वी से समस्त औषधियां, औषधियों से अन्न, अन्न से ही यह मनुष्य शरीर उत्पन्न हुआ। इसलिए यह शरीर अन्न रस मय है।
इससे स्पष्ट है कि तैत्तरीय श्रुति में जिन रसादि कोषों की व्याख्या की गई है आकाशवत् परमात्मा ही उनकी आत्मा जीवन रुप से प्रकाशित हुआ है।
इसे कुछ इस तरह समझें। बीज में एक पूरा का पूरा वृक्ष जड़, तना, शाखा, पत्तियों फूलों- फलों सहित छुपा हुआ है। ऐसा परोक्ष रूप से सही है। बीज की यात्रा वृक्ष की ओर होती है तब एक अव्यक्त, (प्रकृति) जिसे माया भी कहा गया है, उसके साथ चलती है जो उसे बीज से वृक्ष के रुप में रूपायित करती है। यदि बीज अपने आप में सक्षम होता तो वह स्वयं अपने आपको वृक्ष बना लेता लेकिन उस निर्जीव से जीवित वृक्ष के रुपायतन में सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो जन्म होना वृक्ष का लग रहा है परन्तु वह जो अव्यक्त वहाँ पहले से ही मौजूद थी और तब अव्यक्त वह जीव वृक्ष के साथ व्यक्त हुअा है और हम कह बैठते हैं कि वृक्ष उत्पन्न हुआ है। वस्तुतः तो जो अजन्मा था वह अजन्मा ही रहा। जिस बीज रूपी भौतिक पदार्थ में जीवन संचरित हुआ वह वृक्ष की उम्र पूरी होने पर उसमें जो व्यक्त हुआ था वह पुनः अव्यक्त हो गया। इसका अर्थ लगता यही है कि वृक्ष पैदा हुआ फिर मर गया हमने उसी के साथ यह भी समझ लिया कि जो व्यक्त था वह मर गया। अपितु वृक्ष जीवन के साथ जो जीव चला वह तो अजन्मा ही था। इसलिये प्रकट में कहा यह जाता है कि उसमें जो जीव था वह मर गया।
यहाँ तीन चीजें महत्वपूर्ण है एक तो यह कि जो उत्पन्न हुआ वह विकार है याने परिवर्तन के दौर से गुजरा है इसलिए जन्म और मृत्यु का घटित होना जान पड़ा। विकार केवल अनित्य में ही होता है। दूसरा यह कि वह जो अजन्मा वृक्ष के सम्पूर्ण जीवन में व्यक्त होता हुआ साथ प्रतीत होता रहा। वह भी वृक्ष के संग जीवित था। लेकिन कारिका का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि:-
यथा स्वप्नमयो जीवो जायते म्रियतेऽपि च ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ४/६८ ॥
स्वप्नमय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार सब जीव भी उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं।
उपरोक्त उदाहरण में हमें समझ में आ सकता है कि वृक्ष जो जीवित लगता है वह अनित्य है, या कहें कि वह स्वप्न है, इसमें जीव जन्मता और मरता लगता है पर वैसा नहीं है। वास्तव में वह तो जन्मा ही नहीं था। इसलिए हमें तो वृक्ष का जीना - मरना, जीव का जीना- मरना लगा।
अगले मन्त्र में यह दुविधा समाप्त हो जाती है।
न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥ ४/७१ ॥
तात्पर्य यह है कि कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्म की संभावना ही नहीं है। उत्तम सत्य तो यही है कि यहाँ किसी जीव की उत्पत्ति ही नहीं होती।
उक्त रूपक से (तीसरा) यह साफ लगता है कि अव्यक्त को व्यक्त होने का जो आश्रय वृक्ष है उसकी आवश्यकता हुई। चूँकि हमें तो आश्रय ही दिखाई दिया तो हमने समस्त घटना क्रम को जैसे तो तैसा समझ लिया कि वृक्ष जो जीव था वह उत्पन्न हुआ और मर गया। परन्तु जीव न तो मरता है अौर न जन्म ही लेता है।
गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि-
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।२/२८।।
हे भारत समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है।
अव्यक्त यानी न दीखना पर दिखाई देना ही जिनकी आदि है अर्थात् जन्मसे पहले भी ये थे पर सब अदृश्य थे। उत्पन्न होकर मरण से पहले तक; बीच में व्यक्त हैं, दृश्य हैं। और पुनः अव्यक्तनिधन हैं अदृश्य होना ही जिनका निधन यानी मरण है उनको अव्यक्तनिधन कहते हैं अभिप्राय यह कि मरनेके बाद भी ये सब अदृश्य हो ही जाते हैं। वस्तुतः "ममैवांशो जीव लोके" यह जीव वास्तव में न तो पैदा होता है और न ही इसका पर्यवसान है, यही परम सत्य है।
निवेदक
रामनारायण सोनी
आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...