Tuesday, October 22, 2019

प्राणों की उपासना

*सत्य की आहुतियों को जानिए*
*राख है ,भभूतियों को जानिए*
*साधना उपासना में जब जली*
*आत्म की अनुभूतियों को जानिए।।*

*प्राण के इस कल्प को पहचानिए*
*सत्य के संकल्प को पहचानिए*
*है यहां निर्धारणा में गिनतियाँ*
*श्वास कितनी अल्प है पहचानिए।।*
                  डॉ जय वैरागी
साँस आती है, साँस जाती है। यह क्रम-अनुक्रम लगातार है। जीवन चलता ही जाता है। बस एक बार जा कर नहीं लौटी तो जीवन लौट नहीं पाता है। यह सत्य है। सत्य का विकल्प नहीं है केवल संकल्प है। लोग अक्सर इस सत्य को लिखने पढ़ने और सुनने से भी डरते हैं। एक पक्षी होता है शुतुर्मुर्ग, सब पक्षियों में अधिक ऊँचा। उसे किसी तरफ से जब बहुत डर लगता है तो वह अपना सिर रेत में धँसा कर छिपा लेता है और समझ लेता है कि अब डर कहीं चला गया है। क्या यह विकल्प है? नहीं इस सच का विकल्प नही है।
प्राण अमूर्त है किसी ने देखा नही। साँस के नेपथ्य में बस प्राण है, वही सूत्रधार है। प्राण है तो चेष्टा है, चाह है, पहचान है। जीवन का अस्तित्व ही प्राण से है। परन्तु केवल आती जाती साँस ही जीवन का आधार नहीं है। शरीर निरी धौंकनी भर है यदि इसमें प्राण न हो तो। जीवन की सार्थकता प्राण से है। जिसने प्राण के इस कल्प को पहचाना उसने जीवन के महान सत्य को जाना। इसलिए सत्य को जानिये, संकल्प को पहिचानिये।
दोहा :
* रामु सत्य संकल्प* प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥
            ।।सुन्दर काण्ड।।
साँस कितनी आई कितनी गई इसकी गिनती उम्र हो सकती है लेकिन इस गिनती के उस पार जीवन के यथार्थ में बस प्राण ही की चेतना है। साँस की शक्ति अत्यल्प है। शक्तिमान प्राण है। लेकिन इन सब से बड़ी शक्तिमान प्राण की वह शक्ति है जिससे प्राण जीवन के परम स्रोत से प्राणित है।
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
(केनोपनिषद् 1/8)
जो प्राण के द्वारा प्राणित (चेष्टावान) नहीं है, बल्कि जिससे प्राण अनुप्राणित (चेष्टायुक्त) होता है, उसी ब्रह्म को तू जान। उसे नहीं जिसकी यह संसार उपासना करता है॥
वस्तुतः साधना और उपासना मात्र से उस परमात्म शक्ति को जानना मंजिल नही मार्ग है।परमात्म सत्ता वह एक आत्मानुभूति है। अनुभूति निःशब्द है, गूँगे का गुड़ है। इसलिये...
साधना उपासना में जब जली
आत्म की अनुभूतियों को जानिए ।।
और
सत्य की अनुभितियाँ जीवित रहे
भ्रमण इस मरघट का होना चाहिए ।
चाहे जितने चोले बदल जाएँ, जन्म मृत्यु के फेरे लग जाएँ ब्रह्म की अर्थात् सत्य की वे अलौकिक अनुभूतियाँ विस्मृत न हों।
*"पार होकर के परिधि से निकल"*
*जिंदगी का जोग भी आसन ही है।"*
कबीर कहता है- "तुम हद से बेहद में चले जाओ।" सीमित से असीमित में चले जाओ, अंत से अनन्त में चले जाओ, असत्य से सत्य में चले जाओ। अर्थात् "असतो मा सद्गमय।"
वैरागी जी की सहज सरल पंक्तियाँ संकेत करती हैं उपनिषद् के ये कथ्य जिन्हें पढ़ कर मुझे केनोपनिषद् का सूत्र स्मरण हो आया। कबीर का स्मरण हो आया। तुलसी का स्मरण हो आया।

साधुवाद

रामनारायण सोनी
(23.10.19)

Monday, October 7, 2019

माँ, मातृत्व और बच्चू

संक्षिप्त समीक्षा के साथ

रसोई में चूल्हे पर
रोटियां सेंकती
मेरी माँ का
लाल लाल
दमकता चेहरा
मुझे साहस मेहनत
विश्वास देता है

अंधेरों में
टिमटिमाती ढिबरियों में
मेरी माँ की
चमकती दो आंखे
टपरियो में आने वाले
तूफानों के
आघात व्यवघात से
भय मुक्त होने का
मुझे आश्वासन देते हैं ।

कुत्ते भौंकते है
बिल्लियां लड़ती है
ताले टूटते है
चीखें हवाओं में तैरती है
नदियां लाल होती है
आकाश फटता है
धरती रोती है
मेरी माँ के चौकन्ने कान
हरदम मुझे चौकस
कर देते है

ह्रदय के अंतः स्थल पर
मेरे बचपन के डर को
जब वह कस कर दबोच लेती है
स्नेह का बहता अमृत
एक पुष्ट होता संस्कार
मुझे चमकते भविष्य का
आभास देता है

परिवार के किनारों को
सुघड़ता से संवारते
मेरी माँ के सधे हुवे ठोस हाथ
उसकी कसी हुई मुट्ठियाँ
उत्ताल तरंगों में
कुछ न कुछ
करने की तमन्ना
मुझे
विराट सत्य से स्थापित होने के
तादात्म्य को
सायास
ऊर्जा किरणों का
समास देती है
    डॉ सीमा शाहजी
    थांदला जिला झाबुआ

*"माँ, मातृत्व और बच्चू"*
माँ कृतित्व पुषार्थ और सर्मपण का औदार्य ओढ़े पदों में अल्फाजों की कमी पर भावों की गहनता है। लाल लाल दमकता चेहरा चेहरे का रंग नहीं है वस्तुतः वह सेवा के हृदयस्थ भावों की तड़ित है, चमक है। "टिमटिमाती ढिबरी" जीवन के अनुभवों की प्रौढ़ता है न कि उम्र की सिलवटों में छिपी आँखें। जिसने उम्र भर झंझा झेले हैं वह स्वयं में एक प्रतिमान है। यह कुछ उस तरह का प्रसंग है कि जैसे कछुआ अपने शल्क के आवरण में अनुरक्षित होता है।
माँ के चौकन्ने कानों में अपेक्षित अनपेक्षित ध्वनियों के रिसीप्टर लगे हैं उनका अनुवाद माँ कर लेती है और सावधान कर देती है। स्नेह का झरझर बहता अमृत वास्तव में तो जीवन भर के लिए अखूट आसव है जिसके स्मरण मात्र से हम आज भी ऊर्जित हो जाते हैं। परिवार उसकी धुरी पर वैसे ही चलता है जैसे धरती अपनी कील पर ले कर घूमती है। धरती जो समस्त विश्व को धारण करती है उसे धरती माँ कह कर धरती का नहीं माँ का ही सम्मान होता है। अन्त में मातृत्व की उस विशाल प्रभुसत्ता का उद्घाटन है जिसमें वह उस विराट सत्य के अहोभाव से समृद्ध करने का सामर्थ्य रखती है।
अनूठी कविता माँ से अधिक मातृत्व भाव को स्थापित करती है जिसे पढ़ते पढ़ते मैं बच्चा हुआ जा रहा हूँ।

साधुवाद

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...