अचेतन और सचेतन का अद्भुत संयोग
क्या तुमने कभी धरती को , आकाश को , अग्नि को, वायु को और जल को हँसते हुए, आनन्द मनाते और रोमांचित होते देखा है ? शायद यही कहोगे कि नहीं। ये सभी जड तत्व हैं इसलिये यह सम्भव नहीं होगा। यह बात किसी पागलपन से कम नहीं कहोगे।
मैं कहता हूँ कि मैंने यह सब स्वयं देखा है।
मैंने पाँचों स्थूल तत्वों को आनन्द मनाते देखा है। धरती ने जब हरियाली ओढी, पेड़ों- पौधों में जब फूल खिले तो यह सब धरती के आनन्द का अतिरेक था। आकाश में जब ज्योत्सना लेकर जगमगाता चाँद उतरा, मेघ मालिकाएँ सौदामियों की चमक लेकर गर्जन करने लगी तब तब लगा कि जैसे आकाश ने अपना श्रृंगार किया है और बादलों की ओट से मुस्कुराया है। अग्नि जब अपनी सप्तश्रृंगी ज्वालाएँ लेकर यज्ञशाला की वेदियों में उद्दीप्त हुईं अथवा दीपशिखाएँ सब ओर व्याप्त अंधकार को दूर करने के लिये उद्यत हुई तब तब उस वेला में लगा अग्नि लोककल्याण का मन्त्र ले कर उल्लसित हो उठी है। वायु जब मलयगिरि से चंदन की सुगन्ध लेकर चली, वृक्षों- पादपों की पत्तियों से अठखेलियाँ करती हुई आगे बढ़ी तो लगा पवन अपने चिरन्तन स्वरूप में चेतना और प्राण ले कर चल रही है और सरसराहट करती वह ध्वनि जैसे हर्षध्वनि बन कर नाद बिखेर रही हो। नदी, नद, प्रपात जब कल-कल, छल- छल कर प्रवाहमान हुए तब लगा वह सृजन के देवता का पुण्याहवाचन कर रहा हो कर वह सम्पूर्ण जगत को अपनी शीतलता से तृप्त करने लगा तब तब लगा कि सारी दिशाएँ रोमांचित हो उठी है। वह पवन में घुला, वनस्पतियों रमा, जीवन के क्षण क्षण में समाया तब लगा कि वह प्रफुल्लित हो रहा है। तुमने यदि यह सब इस दृष्टिकोण से नहीं देखा तो समझो तुम उस परमात्मा की अनुपम कृति के सौंदर्य से परिचत नहीं हो पाये हो।
तो चलो आज से फिर उसका सम्यक् दर्शन कर आनन्दानुभूति करें। इस अचेतन में परमात्मा की संचेतना का सौंदर्य अनुभूत करें।
दोहा
जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।
अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ।। 119 ख/1 रामचरितमानस ।।
रामनारायण सोनी
२६-०७-२१