Tuesday, July 26, 2022

तावीज में पल

जानते होगे शायद अब भी तुम

मिले थे जब अचानक हम!
उतार कर रख ली थी
अपनी अपनी घडियाँ जेबों में
रोकने के लिये सरपट दौड़ते वक्त को
पर रुका नहीं वह
फिर जो लगा था वह
हमें फिर नहीं लगा कभी भी
गुजर गई थी सदियाँ
उस एक पल में
जिये थे हम उस एक पल में
एक पूरी की पूरी जिन्दगी!
तुम्हें याद हो के न याद हो!
उम्र के तावीज में,
मैं उसे गले में बाँध कर घूमता रहता हूँ
यकबयक इसे चूमता रहता हूँ 
जैसे कि यहीं हो तुम

रामनारायण सोनी
२६.०७.२२

Monday, July 25, 2022

भरोसा भारी है

जानते हो ? बूढ़ा लाठी लेकर क्यों चलता है ?

वह लाठी को टेक टेक कर चलता रहता है और उस पर पूरा भरोसा भी करता है। मजे की बात यह है कि बूढा लाठी को लेकर चल रहा है न कि लाठी बूढे को ले कर चल रही है। पर उसे आभास होता है कि वह लाठी उसे हर खतरे से बचा कर अपनी मंजिल तक ले जाएगी, गिरने पड़ने से बचाएगी। उसी तरह जब नदी के पार जाना है तो मल्लाह और नाव दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। हवाई जहाज में बैठने से पहले पायलट और हवाई जहाज दोनों पर भरोसा करना ही पड़ेगा। ऑपरेशन टेबल पर पहुँचने के साथ ही डॉ और उसके हुनर-इल्म पर भरोसा करना होता ही है, इतना भरोसा कि अपने किसी भी सगे पर भी नहीं किया होगा।
यही दृढ़ विश्वास ले कर सद्गुरू के चरणों में खुद को और सारी समस्याओ को छोड दो नहीं तो भैया! गुरू को छोड दो। इतना पक्का भरोसा चाहिये सद्गुरु पर। एक बार भरोसा कर के देखो उसकी गुरुतापर, उसमें उपलब्ध गुरु सत्ता पर, उसकी उर्मियों में बसी चेतना पर। फिर हमने छोड़ा तो वह हमें पकड़े रहेगा क्योंकि गुरू एक व्यक्ति नहीं वह एक चेतन सत्ता है। जीव जब अपनी सुधि खोने लगता है तब तो गुरू का काम और महत्वपूर्ण हो जाता है। वही मार्ग और मंजिल तक ले जाता है। जैसे कि ईश्वर की सत्ता कभी प्रत्यक्ष नहीं दीखती पर धृति अथवा धर्म के रूप में सृष्टि का कण कण उसके कठोर अनुशासन में चलता है, चाहे जानो या अनजान ही बने रहो।
इसलिये भरोसा करो और चलो उसकी ओर वह हमें बुला रहा है। हमारे कल्याण के लिये।
"श्री सद्गुरुदेवाय नमः।।"

रामनारायण सोनी
14.07.22

भीतर बाहर का जगत

आदमी के पैदा होते ही उसका अपना एक संसार भी स्वतः पैदा हो जाता है एक बीज के अंकुरण की तरह। सबसे पहले रिश्तों के ढेर लग जाते हैं। समय के साथ साथ उसके जीवन की परिधियाँ बड़ी हाेने लगती है। शून्य से उठ कर वृहत् की ओर। चाहे कहीं भी चला जाय ये परिधियाँ उसे घेर कर चलती रहती है। यह विस्तार उसके अपने संसार का विस्तार है।

जो संसार तुम्हारे भीतर का है वही बाहर के संसार में विस्तार पावेगा। कलाकार की कृति पहले मानव के मन में जन्म लेती है फिर वह जो जो सृजन करता है वह सब डुप्लीकेशन, अनुकृति अथवा फोटो कापियाँ है। वास्तव में यह आदमी की कल्पना, आकांक्षाओं, ऐषणाओं और वृत्तियों का विस्तार है। उसकी अपनी वृत्तियों में बसी कल्पनाओं के स्पष्ट बिम्ब हैं, उन्हीं ने आकार लिया है। आधुनिक युग में जिसे फेन्टेसी कहा है वह एक पूर्ण काल्पनिक जगत की आभासी अवधारणा लेकर जन्मा विचार है जो कौतुहल के रूप में मस्तिष्क में आया है और फिर उसे साकार स्वरूप देने की कोशिश की जाती है। यह क्रिया का भौतिक स्वरूप है लेकिन वैचारिक क्रान्ति और आत्मबोध इसका आध्यात्मिक परिवेश तैयार करता है जो बहिर्यात्रा के बजाय हमें अन्तर्यात्रा के लिये प्रेरित करता है।

रामनारायण सोनी
२३.०७.२२

अचेतन और सचेतन का संयोग

अचेतन और सचेतन का अद्भुत संयोग


क्या तुमने कभी धरती को , आकाश को , अग्नि को, वायु को और जल को हँसते हुए, आनन्द मनाते और रोमांचित होते देखा है ? शायद यही कहोगे कि नहीं। ये सभी जड तत्व हैं इसलिये यह सम्भव नहीं होगा। यह बात किसी पागलपन से कम नहीं कहोगे। 

मैं कहता हूँ कि मैंने यह सब स्वयं देखा है।

मैंने पाँचों स्थूल तत्वों को आनन्द मनाते देखा है। धरती ने जब हरियाली ओढी, पेड़ों- पौधों में जब फूल खिले तो यह सब धरती के आनन्द का अतिरेक था। आकाश में जब ज्योत्सना लेकर जगमगाता चाँद उतरा, मेघ मालिकाएँ सौदामियों की चमक लेकर गर्जन करने लगी तब तब लगा कि जैसे आकाश ने अपना श्रृंगार किया है और बादलों की ओट से मुस्कुराया है। अग्नि जब अपनी सप्तश्रृंगी ज्वालाएँ लेकर यज्ञशाला की वेदियों में उद्दीप्त हुईं अथवा  दीपशिखाएँ सब ओर व्याप्त अंधकार को दूर करने के लिये उद्यत हुई तब तब उस वेला में लगा अग्नि लोककल्याण का मन्त्र ले कर उल्लसित हो उठी है। वायु जब मलयगिरि से चंदन की सुगन्ध लेकर चली, वृक्षों- पादपों की पत्तियों से अठखेलियाँ करती हुई आगे बढ़ी तो लगा पवन अपने चिरन्तन स्वरूप में चेतना और प्राण ले कर चल रही है और सरसराहट करती वह ध्वनि जैसे हर्षध्वनि बन कर नाद बिखेर रही हो। नदी, नद, प्रपात जब कल-कल, छल- छल कर प्रवाहमान हुए तब लगा वह सृजन के देवता का पुण्याहवाचन कर रहा हो कर वह सम्पूर्ण जगत को अपनी शीतलता से तृप्त करने लगा तब तब लगा कि सारी दिशाएँ रोमांचित हो उठी है। वह पवन में घुला, वनस्पतियों रमा, जीवन के क्षण क्षण में समाया तब लगा कि वह प्रफुल्लित हो रहा है।  तुमने यदि यह सब इस दृष्टिकोण से नहीं देखा तो समझो तुम उस परमात्मा की अनुपम कृति के सौंदर्य से परिचत नहीं हो पाये हो। 

तो चलो आज से फिर उसका सम्यक् दर्शन कर आनन्दानुभूति करें। इस अचेतन में परमात्मा की संचेतना का सौंदर्य अनुभूत करें।

दोहा

जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।

अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ।। 119 ख/1 रामचरितमानस ।।

रामनारायण सोनी

२६-०७-२१


Thursday, July 7, 2022

आँखों का भावकोष

आँखों का भावकोष

आँख में एक छोटी सी पुतली और उस पुतली में छोटा सा वह छेद कमाल का है। इस छेद से सारा दृश्यमान जगत और यह अनन्त आकाश आदमी के अन्तस में प्रवेश कर जाता है। लेकिन इस अन्तस में भावनाओं, संवेदनाओं का विशाल कोष पहले से भी भरा पड़ा है। जैसे तिनकों में पड़ी हल्की सी चिंगारी को तनिक सी हवा मिलते ही कभी कभी यह उद्दीप्त हो उठता है वैसे ही अन्तर्जगत और बहिर्जगत के भावनाओं और घटना क्रमों के मेल से आदमी आन्दोलित हो उठता है। यह बात तो तय है कि इस चल रही मनःस्थिति को नयनों के माध्यम से स्पष्ट देखा जा सकता है। हमारी देहयष्टी में केवल आँख एक ऐसी क्षमता रखती है जो भीतर चल रहे प्रवाहों को बाहर प्रकट करने में सक्षम है। इसका अपना शब्दकोष या कहें कि भावकोष होता है जो ईश्वर की अनमोल देन है। इसकी अपनी अभिव्यक्ति क्षमता है। एक एक भावभंगिमा एक संपूर्ण उपन्यास से कम नहीं। 
इसीलिये मैं कहता हूँ कि...
जो उनकी आँखों में बयां होते है
वो लफ्ज किताबों में कहाँ होते हैं।

रामनारायण सोनी
०८.०७.२२

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...