Thursday, August 29, 2019

अन्तर्धार

टूटी सब मदहोशियाँ स्वप्नों की झंकार ।
हम जो जागे नींद से जागी अन्तर्धार ।
                डॉ जय वैरागी

जागा कौन है और कौन है सोया?

क्या जागे हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो सोया नहीं है अथवा जिसे नींद नहीं आई हो? अथवा जिसके स्वप्न टूट गये हों? क्या सोए हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो जाग नहीं रहा है?
असल में "जागना" वर्तमान में रहना है। जागा हुआ केवल वह है जो केवल वर्तमान में चल रहे समग्र घटना क्रम का मात्र एक दृष्टा है। जागा वह है जो व्यर्थ की उलझनों की भूल भुलैया से बाहर है जो भविष्य के अंधेरे कुएँ में सुई जैसी को चीज़ ढूँढने में व्यस्त न हो। जो जागा हुआ है वह मूर्छा से बाहर है। जो जागा है वह भीतर से बाहर देखता है, अपनी अन्तर्दृष्टि से देखता है। जो अन्दर भी होश में है और बाहर भी होश में है, जिसकी मूर्छा पूरी तरह टूट गई है वही जागा है।
नींद से बाहर होना और मूर्च्छा से बाहर होना अलग अलग है। जागते हुए वर्तमान में न होना मूर्छा है जबकि सोते में मूर्छा नहीं हो सकती। लेकिन वास्तविक जागरण तो अपनी चेतना की अन्तर्धारा का स्फूर्त होना है। अन्तर्धारा के मूल में अन्तश्चेतना का वैभव सन्निहित है।
दो पंक्तियों मे औपनिषदेय चिन्तन की झलक मिलती है।
*अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते*
*अजन्मनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा .. १३..*
साधुवाद

रामनारायण सोनी

Sunday, August 11, 2019

कबीर का फक्कड़ाना

कबीर जुलाहे थे। उनकी साखी, सबद, रमैनी, दोहे आदि सभी साहित्य चादर बुनते बुनते रचे और गाये गये हैं। वे किसी वनप्रान्तर में नही गए, न धूनी रमाई न जप-तप किया न ही किसी आश्रम में जा कर बैठे। धुनके की ताँत में वहाँ अध्यात्म के स्वर थे, तानों बानों में जीवन की बुनाई थी। वे चलते चरखों और  रंगरेजों के बीच बने रहे यहाँ तक कि कुछ किंवदंतियों के अनुसार वे वेश्याओं से सीधे संवाद से भी नहीं हिचके क्योंकि उनके स्वभाव में निर्मलता और निश्छलता भी। संक्षेप में कहें तो वे संसार से पलायन के पक्षधर नही थे। जैसे कमल का सौन्दर्य अम्लान होता है और कीचड़ मे पैर जमाए खड़ा रहता है। जो जगत झंझटों से, आपदाओं से भरा है, माया के इन्द्रजाल से चौंधियाता है वही हमारे जीवन का पोषक भी है। इसमें रह कर निर्लिप्त कैसे रहें, मुक्त कैसे होवें इसका फक्कड़ाना स्टाइल जनमानस की सामान्य भाषा शैली में कहने वाला केवल कबीर था। सिद्धान्तों का उपदेश अलग बात है पर उसको जीना अलग बात है। एक हाथ में जगत और दूसरे में जगदीश कबीर के दर्शन की मुख्य धारा थी। मैं ऐसा सोचता हूँ।

रामनारायण सोनी

Saturday, August 10, 2019

आज़ाद रिश्तों का बंधन

आज़ाद रिश्तों में हम बंधन ढूँढते हैं और बंधे रिश्तों से आज़ादी चाहते है, है न बड़े आश्चर्य की बात? लेकिन जंजीरों से मोहब्बत रखने वालों को कोई आज़ाद नहीं कर सकता। सीमाएँ आजादी के दायरे निश्चित करती है पर आजादी सीमाओं की पर्वाह नही करती। एक बात और है कि धुंध के आवरण में आजादी और सीमाएँ दोनों का पता नहीं चलता। इस सर्च में अपना मैं खो बैठते हैं।

"ढूँढने बैठा स्वयं को
आ गया हूँ मैं कहाँ तक।" (डॉ जय वैरागी)

यह मनोयोग नहीं मनोदशा है, भटकन है, न यह सीमा ढूँढता है न आज़ादी। यह छ्द्म आवरण है। दर्पण पर गर्द चढ़ जाने से न मैं छुपता हूँ न मेरा प्रतिबिंब अपितु दोनों ही सिर्फ आवरण के बीच में आने से अनभिव्यक्त है। आवरण के हटते ही दृष्टि की सीमाएँ समाप्त हो जावेंगी। मैं और मेरा प्रतिविंब आज़ाद हो जावेंगे। जिन्हें हम सीमा समझ बैठे है असल में वे सब आवरण ही हैं। मैं मुझमें ही मौजूद हूँ पर ढूँढने के लिये बाहर जाता हूँ लेकिन बाहर कहीं तक भी चला जाऊँ मुझे मैं नहीं मिलूँगा। यही आवरण मुझे भीतर जाने नही देता। मैं बाहरी रिश्तों से आजादी चाहता हूँ पर भीतर के आज़ाद रिश्ते से बेखबर घूम रहा हूँ।
हम बाहर के बन्धन स्वीकारते हैं पर भीतर के आज़ाद रिश्ते नहीं पकड़ते।

रामनारायण सोनी

Friday, August 9, 2019

विध्वंस से सृजन तक

आज का मौलिक चिन्तन
बात वैरागी जी की लिखी दो पंक्तियों से करता हूँ। मन में प्रश्न उठता है कि क्या सृजन के लिए विध्वंस होना जरूरी है। क्या विध्वंस किसी की हानि या खत्म किये जाने की प्रक्रिया है। क्या विध्वंस सृजन का सोपान है? प्रश्न कई हैं पर उत्तर सम्यक विचार और उसकी सकारात्मकता विषय को रोचक बनाती है। बात विध्वंस से बिखराव पर होते हुए सृजन तक जाती है जिसका फलादेश आनन्द है

*बिखर कर फैल जाने का अलग आनन्द होता है*
*समीरन में घुला सौरभ ही महकी गन्ध होता है*
                   डॉ जय वैरागी, झाबुआ

निर्माण के लिये एक विध्वंस होना नैसर्गिक प्रक्रिया है। विध्वंस का अर्थ नष्ट होना नही है। ईंटें बनाने के लिए मिट्टी का बिखरना, बिखर कर जमना जरूरी है, सीमेंट के लिये पत्थर का बिखरना, रांगोली के लिये रंगों का बिखरना, मेघों से बूँदों का बिखरना, सितार के तारों के कंपन हवा में बिखरना और पुष्प के पुंकेसर से सुगन्ध का *"बिखरना"* जरूरी है। एक स्वरूप का विध्वंस दूसरे स्वरूप के निर्माण की तैयारी है। इस बिखराव से सृजन के सुख का होना ही आनन्द है पर आनन्द का उद्घोष तभी होगा जब इस बिखराव में एक लय हो, एक अनुशासन हो, एक संगत हो, एक सर्मपण हो। बिखर कर फैल जाना अपने आप में एक विस्तार है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म वृक्ष तो बीज में से फैला वृक्ष का सम्यक साकारत्व है। प्रकृति की असीम शक्ति से बीज में से वृक्ष का अनुशासित प्रस्फुटन भी बिखरना ही तो है, इस बिखराव का विस्तार ही वृक्ष की अभिव्यक्ति है। यह वृक्ष स्वयं प्रकृति में आनन्द का उद्घोष है। परागकणों का हवा में बिखराव सौरभ का अर्थात् आनन्द का सम्यक विस्तार है।

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...