Saturday, November 23, 2019
अलिप्त कर्म का निष्पादन
Thursday, November 21, 2019
फूलों का सुवासित जीवन
आवाज खोकर मृत हो गए
पटाखों से पूछा ....
रंग खोकर भी बच गए
कुमकुम से पूछा ....
बची खुची दीपावली का हश्र ...?
बोल नही पाया
दम तोड़ चुका पटाखा
दम तोड़ चुका रंग
बस इतनी ही आवाज आई
बुझ रहे दीपक से
दीपावली बीत गयी
बचे खुचो का तो
यही हश्र होता है .....।
सीमा शाहजी
29-10-19
संक्षेपिका
पटाखे, रंग और दीपक के माध्यम से संकेत है उनकी अपनी अस्मिताओं का, संबंध है उनके नैसर्गिक धर्म का, परिणति है उनके नैमित्तिक भाग्य का। लेकिन एक सुखद संदेश है वे उनके अपने अपने औपचारिक दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते हैं। नेपथ्य से झाँकती हताशा स्पष्ट है कि जैसे गन्ने का रस गन्ने के तन में एकात्मकता लिये हुए है पर रस निकल जाने पर अवशेष सिर्फ इंधन बन कर रह जाता है और अपनी अस्मिता बचाए रखने के बावजूद श्री हीन हो जाता है।
दीपावली एक उत्सव है, साध्य है। पटाखे, रंग और दीप साधन है। इन तीनों के बगैर दीपावली पर्व तो है पर उत्सव नही। यदि अपनी अपनी अस्मिता खो कर भी इन्होंने परिणति को उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है तो उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये थे न कि हताशा के। फूलों की उम्र काँटों से बहुत अल्प है पर अपने उत्सर्ग के पूर्व वे स्वयं को खुशबू के रूप में तकसीम कर चुके होते हैं। कहने को चुक गए हैं पर वे अपना धर्म निभा चुके हैं।
वस्तुतः मेरे मन्तव्य में मनोयोग को यू टर्न नहीं लेना चाहिये था अपितु कृतार्थ अनुभव करना चाहिये था।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।गीता।।18.45।।
अपने अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गीता।।18.47।।
सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।
रामनारायण सोनी
Tuesday, November 19, 2019
जिन्दगी के रंग कई रे
जिन्दगी के अजब रंग है
रोशनी ले कर चला वह
पर छाया संग थी
न जान सके वे
सफर में अकेले नहीं
दुखियारे, पतित, असहाय संग थे
यह आधी दुनिया की जीत अधूरी
जंग एक बाहर थी जीत ली
जंग थी एक भीतर से
वह पुरोधा,
बाहर महारथियाँ से लड़ता रहा
पर हार गया
भीतर के पिद्दलों से
बाहर शबाब ही शबाब
भीतर कोलाहल और विक्षेप
संतुलन की अवधारणा
क्यों हुई ध्वस्त
यथार्थ उस कालजयी का
बाहर से कभी नहीं
हा! हार गया भीतर ही से
*इसलिये गीता कहती हैं*
अभ्यास करो उस समन्वय योग का।
*सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।*
*ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2/38।।*
जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।
रामानारायण सोनी
छबियों का मर्म
डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला
आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...
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