Saturday, November 23, 2019

अलिप्त कर्म का निष्पादन

अस्मिता की चिन्ता छोड़ो और निष्काम कर्म में निरत हो जाओ। दीपावली आती है। पटाखे फूट गए , रंग बेरंग हो गया और जला हुआ दीपक तेल खत्म होते ही बुझ गया। उनकी अपनी अस्मिताएँ तो बची हैं पर संबंध अभी टूटे नहीं हैं। वे बँधे रहे उनके अपने अपने नैसर्गिक धर्म से और एक परिणति हई उनके नैमित्तिक भाग्य की। लेकिन एक सुखद संदेश यह है कि वे उनके अपने अपने औपचारिक दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते हुए एक नैराश्य के समक्ष खड़े हो गए। नेपथ्य से झाँकती हताशा स्पष्ट है कि जैसे गन्ने का रस गन्ने में एकात्मकता लिये रहा पर रस निकल जाने पर अवशेष सिर्फ इंधन बन कर रह गया है। इसी तरह ये भी अपनी अस्मिता बचाए रखने के बावजूद सब के सब श्री हीन हो गए हैं। 
रंगमंच पर दीपावली का दृष्य चलता है और ये तीनों अपने अपने रोल अदा करते हैं। सम्पूर्ण घटनाक्रम में दीपावली एक उत्सव है, साध्य है। पटाखे, रंग और दीप साधन है। इन तीनों के बगैर दीपावली पर्व तो है पर "उत्सव" नही हो सकता। यदि इन्होने अपनी अपनी अस्मिता खो कर भी परिणति को उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है तो उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि हताशा के। उनकी समस्त ऊर्जा का रूपान्तरण केवल नियति नही है अपितु अपने धर्मों का निर्वहन करने में सफल रहे है। उन्होंने कर्मों का निष्पादन किया है।
फूलों की उम्र काँटों से बहुत अल्प है पर अपने उत्सर्ग के पूर्व वे स्वयं को खुशबू के रूप में तकसीम कर चुके होते हैं। कहने को चुक गए हैं पर वे अपना धर्म निभा चुके हैं।
वस्तुतः पटाखों, रगों और दीपों को कृतार्थ अनुभव करना चाहिये। 

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।गीता।।18.45।।

अपने अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गीता।।18.47।।
सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।

Thursday, November 21, 2019

फूलों का सुवासित जीवन

आवाज खोकर मृत हो गए
पटाखों से पूछा ....

रंग खोकर भी बच गए
कुमकुम से पूछा  ....

बची खुची दीपावली का हश्र ...?
बोल नही पाया
दम तोड़ चुका पटाखा
दम तोड़ चुका रंग
बस इतनी ही आवाज आई
बुझ रहे दीपक से
दीपावली बीत गयी
बचे खुचो का तो
यही हश्र होता है .....।

     सीमा शाहजी
       29-10-19

संक्षेपिका
पटाखे, रंग और दीपक के माध्यम से संकेत है उनकी अपनी अस्मिताओं का, संबंध है उनके नैसर्गिक धर्म का, परिणति है उनके नैमित्तिक भाग्य का। लेकिन एक सुखद संदेश है वे उनके अपने अपने औपचारिक दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते हैं। नेपथ्य से झाँकती हताशा स्पष्ट है कि जैसे गन्ने का रस गन्ने के तन में एकात्मकता लिये हुए है पर रस निकल जाने पर अवशेष सिर्फ इंधन बन कर रह जाता है और अपनी अस्मिता बचाए रखने के बावजूद श्री हीन हो जाता है।
दीपावली एक उत्सव है, साध्य है। पटाखे, रंग और दीप साधन है। इन तीनों के बगैर दीपावली पर्व तो है पर उत्सव नही। यदि अपनी अपनी अस्मिता खो कर भी इन्होंने परिणति को उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है तो उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये थे न कि हताशा के। फूलों की उम्र काँटों से बहुत अल्प है पर अपने उत्सर्ग के पूर्व वे स्वयं को खुशबू के रूप में तकसीम कर चुके होते हैं। कहने को चुक गए हैं पर वे अपना धर्म निभा चुके हैं।
वस्तुतः मेरे मन्तव्य में मनोयोग को यू टर्न नहीं लेना चाहिये था अपितु कृतार्थ अनुभव करना चाहिये था।

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।गीता।।18.45।।

अपने अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गीता।।18.47।।

सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।

रामनारायण सोनी

Tuesday, November 19, 2019

जिन्दगी के रंग कई रे

जिन्दगी के अजब रंग है
रोशनी ले कर चला वह
पर छाया संग थी
न जान सके वे

सफर में अकेले नहीं
दुखियारे, पतित, असहाय संग थे
यह आधी दुनिया की जीत अधूरी

जंग एक बाहर थी जीत ली
जंग थी एक भीतर से
वह पुरोधा,
बाहर महारथियाँ से लड़ता रहा
पर हार गया
भीतर के पिद्दलों से

बाहर शबाब ही शबाब
भीतर कोलाहल और विक्षेप
संतुलन की अवधारणा
क्यों हुई ध्वस्त
यथार्थ उस कालजयी का
बाहर से कभी नहीं
हा! हार गया भीतर ही से

*इसलिये गीता कहती हैं*

अभ्यास करो उस समन्वय योग का।

*सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।*
*ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2/38।।*

जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।

रामानारायण सोनी

छबियों का मर्म

*नयनो में बसती गयी छवियां लेकर मर्म।*
*प्यासी है संवेदना प्यासे अपने धर्म।।*

           डॉ जय वैरागी
🌷🌷🌷🌷🌷
संक्षिप्त विवेचना

मैं दर्पण के सामने खड़ा था। मुझे मैं ही देख रहा था। मैं अपनी छबि देख रहा था पर एक इससे बड़ा मर्म यह था कि छबि मुझे ही देख रही थी। मैंने अपनी उस छबि से कभी नहीं पूछा कि उसने मुझमें क्या देखा? यदि मैं ऐसा कर पाता तो मैं कबीर हो जाता। "जो दिल खोजा आपना"। 
यह सच ही है कि मेरी खोज मुझ से बाहर ही बाहर है। क्योंकि छबियाँ सारी नयनों के द्वार पर अटकी रह गई। अगर वे दिल में उतर जाती तो असर कर जाती।
एक फिल्मी गीत है-"आँखों से जो उतरी है दिल में, तसवीर जो उस अनजाने की" आगे के बोल एक गहरी संवेदना की अनुभूति है।
 वस्तुतः संवेदना की प्यास अभी बुझी नहीं है। प्यासी संवेदनाएँ अनुभूति कैसे पैदा कर सकती हैं? जैसे एक पशु मैदान में चर रहा होता है और यदि उसके पास कोई अन्य पशु मरा पड़ा हो तो भी चरने वाला पशु चरता ही रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि वहाँ चरने वाले पशु की संवेदना ही मरी पड़ी है। संवेदना नहीं तो अनुभूति नही। संवेदना की अपनी प्यास है। यही मर्म है। 
फिर हुआ यूँ कि मैं आइने के सामने से हट गया। मेरे हटते ही मेरी छबि दर्पण से हट गई। अजीब बात है। परन्तु अब मुझे समझ में आ जाना चाहिये कि मैं अपनी छबि लेकर आया था और मेरे हटने सिद्ध हो गया कि मेरी छबि भी मेरे साथ ही चलती है। और तब उस दिन यह मर्म भी समझ में आ गया कि मेरे मर्म भी मेरे साथ ही चलते हैं। लेकिन इसमें संवेदना की प्यास बनी रहना भी जरूरी है। संवेदना हृदय का धर्म है, बोले तो "दिल दा मुआमला है"। हृदय का अप्रतिम लक्षण और शस्त्र है संवेदना। हृदय की प्यास संवेदना की प्यास है और संवेदना की खोज छबियों में होनी चाहिये। 
लेकिन फिर जब दर्पण के सामने तुम आओगे, वहाँ तुम्हारी अपनी छबि होगी। मेरी तरह तुम खाली मत लौट जाना। अब वहाँ मेरी नही तुम्हारी छबि है। उसमें संवेदना की तलाश करना। धर्म के मर्म को खोजने का प्रयत्न करना। इस बार एक अनुप्रयोग कर के देखना। अभी तक तुम उससे पूछते रहे हो कि मैं कैसा लग रहा हूँ? अब की बार वह तुमसे पूछेगी कि तुम कैसे लगते हो? तुम्हारा अपना जवाब तुम्हें अंदर तक हिला कर रख देगा। डरना मत। ये जागी संवेदनाएँ तुम्हें आत्मीय अध्यात्म से परिचय कराएँगी। धर्म का पिपासु असल में अध्यात्म का पिपासु है। धर्म की मेन रूट अध्यात्म के गहनतम सागर में होती है।

अनवरत....
रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...