Monday, June 25, 2018

"वैदिक मनोविज्ञान"१

"वैदिक मनोविज्ञान"☺

यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति |दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं,
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१

भावार्थ:
जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर जाने वाला प्रकाशों का भी प्रकाश , वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

१.जाग्रत अवस्था में.....

घोड़े को चरागाह में चरने के लिए छोड़ा जाता है तब जमीन में एक खूँटा गाड़ कर लम्बी सी  रस्सी से एक पाँव से बाँध दी जाती है। रस्सी चाहे जितनी लम्बी हो खूँटे से बँधी रहती है। रस्सी एक परिधि का निर्माण करती है जिसके बाहर घोड़ा नहीं जा सकता। घोड़ा दिशा-दिशा में विचरण करता हुआ चरता रहता है। जहाँ हरी-भरी घास उसे भाती है, बस वहीं चरने लगता है लेकिन खूँटे से बँधे रह कर ही। कभी वह इस इच्छा में दौड़ता है कि यहाँ से अच्छी घास कहीं और है और वह उसकी तृष्णा बन जाती है। बस दौड़ना शुरू। एक दौड़ और फिर कई दौड़। लेकिन यह भी विचित्रता है कि वह थकता ही नहीं। यह सच है कि जहाँ जहाँ वह जाता है अपने संकल्प से ही जाता है। पूरा घास का मैदान उसका अपना क्षेत्र है वह वहाँ जावेगा ही। यही उसकी नियति है। बिना चरे वह रह नहीं सकता। बिना चले भी वह नहीं रह सकता।

हमारा मन भी इसी तरह हमारे शरीर से ऐसा ही बँधा रहता है। इसकी रस्सी असीमित है, इसलिए दौड़ भी असीमित है। लेकिन दो बातें तो तयशुदा हैं। एक तो यह कि शरीर रूपी खूँटे से यह बँधा है दूसरा यह कि चाहे जितनी बड़ी परिधि हो अपने संकल्प से नियंत्रण में रह सकता है। सारे फसाद की जड़ है- "तृष्णा" जिसके कारण यहाँ से बेहतर के लिए यह अन्य जगह के लिए दौड़ता है। यही विकल्प भी है।
वस्तुतः मन के प्रधान गुण संकल्प-विकल्प ही है। संकल्प "इच्छाशक्ति" है तो विकल्प श्रेष्ठ की "खोज" है। अब यह समझ में आ गया होगा कि आज जहाँ हम हैं वहाँ अपने मन के कारण, जो वर्तमान में घट रहा है वह अपने मन के कारण और जहाँ हम पहुँचना चाहेंगे वह अपने मन के कारण अर्थात् विकल्प से ही अपवर्तित होगा। कई विकल्पों में से एक या कुछेक विकल्प आपके संकल्प बन जाते हैं और आपके समूचे व्यक्तित्व का निर्माण कर डालते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि आपके किन किन संकल्पों से आप अपनी जीवन यात्रा में यहाँ तक आ पहुंचे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब हम कोई वाहन चलाते हैं तब स्टीयरिंग के हजारों विकल्पों में से चुन चुन कर अपने निर्दिष्ट रास्ते पर गमन कर पाते हो।
किसी शायर ने कह दिया है "तोरा मन दर्पण कहलाए"। सच ही है- जो आज आप दीख रहे है वह अपने मन के दर्पण में से ही तो प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो अपने मन के शुभ संकल्प के बिना उत्तम चरित्र का निर्माण कर पाया हो। इसलिए वैदिक-प्रार्थना में आता है-"तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"
सोता हुआ आदमी मन पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। हालांकि सोता हुआ आदमी सपने देख सकता है। आदमी तो सोता है पर उसका मन दूर दूर तक घूम आता है। लौट कर फिर शरीर से बँध जाता है।
*************

"जागते हुए मनुष्य का मन दूर-दूर तक जाता है उसी प्रकार सोते हुए मनुष्य का मन भी दूर-दूर तक जाता है।"
सामान्य अर्थों के प्रकाश में तो यह इस तरह समझा जा सकता है लेकिन मांडूक्य उपनिषद् के प्रकाश में इसे दार्शनिक दृष्टि प्रदान करता है।
अगले अंक में.....

निवेदक
रामनारायण सोनी

वह! ऊर्जा का परम श्रोत

वह!   ऊर्जा का परम श्रोत

बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। जल स्वतंत्र रूप से चले तो नीचे की ओर बहता है। शीतलता उसका स्वभाव है, शीतलता उसमें अन्तर्निहित है। सबसे निचला तल पकड़ना उसकी नियति है।

आग जला सकती है यह उसका स्वभाव है, स्वतंत्र रूप से चले तो ऊपर की ओर उठती है। उसमे ताप अन्तर्निहित है। उसकी गति पृथ्वी की गुरुत्व शक्ति को निर्मूल कर देती है।

जल भले ही नीचे बहने का स्वभाव रखता हो अगर आग का संसर्ग पाता है तो भाप बन कर आग की तरह ऊर्ध्वगामी हो जाता है, अर्थात् आग की दिशा में चल पड़ता है जबकि वे दोनों अकेले रहते हैं तब अपने अपने मूल स्वभाव में बरतते रहते हैं। पानी में यह अंतर केवल ऊष्मा (तेज) के कारण है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है और ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अन्तर्निहित हो अथवा किसी स्रोत से मिले पर ऊर्जा का होना कर्म की सर्व प्रथम आवश्यकता है।

गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता, ऊर्जा किसी स्रोत से मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परम शक्तिमते परमात्मा से ही शक्ति पाते हैं। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना लेले।

निवेदक
रामनारायण सोनी

परम चेतना

"परम चेतना"
एक आदमी हरि प्रसाद चौरसिया के घर इस नीयत से चोरी करने घुस गया कि इनकी बॉंसुरी से मधुर संगीत झरता है। वहॉ से उसने चार-पाँच बँसुरियाँ चुरा ली और एक संगीत संध्या में बजाने पहुँच गया। उस बिचारे को पता नहीं था कि वाँसुरी में स्वर उस बाँस से नहीं अपितु वादक के हृदय से प्रारंभ हो कर बॉंसुरी के छिद्रों से बाहर निकलते हैं। वस्तुतः बाँसुरी उन स्वरों की अभिव्यक्ति का साधन है जो हृदय की भूमि पर लहलहा रहे हैं। वेद कहता है --
"ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्टितम्...।"
हे दयामय ! मुझे वरदान दो कि वाणी मेरे मन में प्रक्तिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो जाए। साधक को पहले वाणी को हृदय में प्रतिष्ठित करना होगा, फिर मन और वाणी का तादात्म्य पाना होगा और तब लय प्राप्त होगी। लय तो योग है ही। जो हृदय मे बैठ जाएगी वही बाहर आवेगी। वाणी तो स्पन्दन है, स्पन्दन ही सुर है, सुर ही हवा पर सवार होते है। यह जगत वाणी के विस्तार का स्थान है।
एक बात और इसके भी ऊपर है वह यह कि इसके मूल कारण में परम चैतन्य है। बिना चेतना का हरिप्रसाद चौरसिया कोई बाँसुरी नहीं बजा सकेगा।
मेरे जीवन की बॉसुरी भी आत्मा की चेतना ही से बज रही है। जितनी भी बाँसुरियाँ है सब की सब उसी चेतना ही से तो बज रही है। बाँसुरी का प्राण रंध्र चेतना की फूँक पाता है फिर वह सात निर्गम द्वारो से जगत में प्रवेश करती है। जो स्वर जगत सुनता है उसका मूल कारण तो चेतना की फूँक ही है। हमें लगता है इसे चौरसिया जी ही बजा रहे है। असल में तो ...."निमित्त मात्रं शरीराणि।"

निवेदक
रामनारायण सोनी

साक्षी भाव

🔴👂🔴
सुनो! सुनो! सुनो!

चौबीस घंटे में थोडा समय निकालो ! शुरू-शुरू में उदासी लगेगी, लगने देना। शुरू-शुरू में परेशानी लगेगी, लगने देना. लेकिन एक घड़ी चुपचाप बैठ जाओ, कुछ न करो, न कुछ गुनो, न माला फेरो, न मंत्र जपो, न प्रार्थना करो, कुछ भी न करो. चुपचाप.
     हां, फिर भी विचार चलेंगे, चलने दो. देखते रहो, निरपेक्ष भाव से, जैसे कोई राह चलते लोगो को देखता है।

निष्प्रयोजन देखते रहना, तटस्थ देखते रहना है– बिना किसी के लगाव के, बिना निर्णय के, न अच्छा न बुरा. चुपचाप देखते रहना.......
गुजरने देना विचारों को। आएं तो आएं, न आएं तो न आएं। न उत्सुकता लेना आने में, न उत्सुकता लेना जाने में।

धीरे- धीरे एक दिन वह घडी आएगी कि विचार विदा हो गए होंगे, सन्नाटा रह जाएगा। सन्नाटा जब पहली दफा आता है तो  रोआं- रोआं कंप जाता है......... क्योंकि अब तुम प्रवेश करने लगे फिर उस एकाकी अवस्था में।

एक झटका लगेगा, सबंध टूटने लगा संसार से, भीड- भाड से। तुम सबंधो के पार उडने लगोगे। घबडाना मत। एक बार पंख खुल गए तो पहुंचोगे उन्मुक्त आकाश में।
एक बार उड चले, तो अपूर्व अनुभव है, अपूर्व आनंद है।

फिर एकांत कभी दुख नही देगा। जिसको भीतर सधने की कला आ गई, वह बीच बाजार में खडे होकर भी ध्यान में हो सकता है। दुकान पर बैठे- बैठे काम करते करते और भीतर धुन बजती रहेगी। अनहद नाद निसि-बासर सुन सकोगे। भेरियाँ बजने लगेगी। यही तो आनंदोत्सव है।
नींद में भी इसकी धुन बजती रहेगी।

देखो तो!     सुनो तो!     करो तो!

😌

Thursday, June 21, 2018

धर्म की परिभाषा क्या है?

धर्म की परिभाषा क्या है?

१. धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण करने वाली *धृ* धातु से बना हैं। *"धार्यते इति धर्म:"* अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म हैं। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं।

२. जैमिनी मुनि के मीमांसा दर्शन के दूसरे सूत्र में धर्म का लक्षण हैं लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु *गुणों और कर्मों* में प्रवृति की प्रेरणा *धर्म का लक्षण* कहलाता हैं।

३. वैदिक साहित्य में धर्म वस्तु के स्वाभाविक गुण तथा कर्तव्यों के अर्थों में भी आया हैं। जैसे जलाना और प्रकाश करना अग्नि का धर्म हैं और प्रजा का पालन और रक्षण राजा का धर्म हैं।

४. मनु स्मृति में धर्म की विशेषता:

धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९

अर्थात धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।

दूसरे स्थान पर कहा हैं *"आचार:परमो धर्म"* १/१०८
अर्थात सदाचार परम धर्म हैं

५. महाभारत में भी लिखा हैं

*"धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा:"*
अर्थात जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण की हुई हैं वह धर्म हैं।

६. वैशेषिक दर्शन के कर्ता महा मुनि कणाद ने धर्म का लक्षण यह किया हैं:

*यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:*

अर्थात जिससे अभ्युदय(लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती हैं, वह धर्म हैं।

धर्म मनुष्य की उन्नति के लिए आवश्यक हैं अथवा बाधक हैं इसको जानने के लिए हमें सबसे पहले धर्म और मजहब में अंतर को समझना पड़ेगा।
कार्ल मार्क्स ने जिसे धर्म के नाम पर अफीम कहकर निष्कासित कर दिया था वह धर्म नहीं अपितु मज़हब था। कार्ल मार्क्स ने धर्म ने नाम पर किये जाने वाले रक्तपात, अन्धविश्वास, बुद्धि के विपरीत किये जाने वाले पाखंडों आदि को धर्म की संज्ञा दी थी। जबकि यह धर्म नहीं अपितु मज़हब का स्वरुप था।

Sunday, June 17, 2018

कृष्णलाल गुप्ता

"जिन्दगी के कैनवास"
-इन्द्रधनुषी छटा के संग
मानव का मन सुख-दुख हास-परिहास मिलन-बिछोह सत्यासत्य की अनुभूति निर्माण-विध्वंस आदि अनेकानेक भावों को जीवन के कैनवास पर उकेरने को सतत क्रियाशील रहता है। भावों के ये रंग व्यक्ति की सोच-समझ को उभारते हुए उसके व्यक्तित्व को परिलक्षित तो करते ही हैं उसकी सामाजिकता, चिंतन-मनन की गहराई को इंगित करते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव का आकलन कर उसे सही दिशा निर्देश की अहम भूमिका भी अदा करते हैं। वस्तुतः मानव-मन की स्पृहा ही जीवन में अनेक रंग भरती रहती है, धूप-छांव की तरह ये रंग कहीं अधिक गहरे होते हैं तो कहीं हल्की लकीरों में बहुत कुछ कह देते हैं।
कृतिकार श्री रामनारायण सोनी की काव्यकृति "जीवन के कैनवास" पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सभी ओजस्वी पूर्ण रचनाएँ कवि के अनुभवों की प्रौढ़ता का बखान करती नजर आती है; इसे विभिन्न विषयों से भरा हुआ चिंतन मनन का दस्तावेज कहा जा सकता है; जिसमें पाठक को बहुविध पाठ्य सामग्री सहज ही उपलब्ध हो जाती है।
यथार्थतः ये रचनाएँ श्रृंगार, भक्ति, प्रकृति, लोक कल्याण आदि समयानुकूल सहज-सरल मार्ग पर अपनी छाप छोड़ती हुई, अनुभव के रंग बिखेरती हुई समाज को अनकही बातों से साक्षात्कार करा देती है। यथा-
यथार्थ के धरातल पर चलता हुआ कवि जीवन की सफलता के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए कहता है-
"आओ यथार्थ की भूमि पर
साहस की बीज बो लें हम
कर्म के पैने औजार पर
पड़ी जंग धो लें हम"
उस असीम शक्ति को जाने बिना जीवन अधूरा है। कवि की कलम अध्यात्म का रंग इन शब्दों में भरती है-
i) सबका सिरजन हारा प्रभु तू
ii) मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर
iii) मन उतावला हो उठता है-अनंत आकाश को अपनी बांहों में भींचने को - मन गा उठता है केवल तुम, हाँ केवल तुम....
श्रृंगार जीवन का सुनहरा अध्याय है जिसमें खुशियां गुदगुदाती है प्यार का नया रंग भर देती है।
i)  मेरे गीत कहीं मर न जाए बिन तुम्हारे...
ii) दीवार पर टंगे इस कैनवास पर
तुम मेरी प्रतिनिधि रचना हो जीवन की...
iii) गीतों का माधुर्य छंद में
पाकर प्रीत तरुण होती है
जागे जब उल्लास हृदय में
तब तब प्रीत गहन होती है...
जीवन के एक एक लम्हे को जी भर के जी लेने का प्रयास ही सफलता की सीढ़ी पर चढ़ने का उत्साह भरता है-
जो लम्हा साथ हैं उसे, जी भर के जी लेना।
खिली हो चांदनी उसे, जी भर के पी लेना।।
काव्य-कृति की समस्त रचनाएं जीवन के आदर्शों को पल्लवित करती है, अनुभवों के रंगों से सराबोर है जिन्हें सार रूप में लिखना षिष्ट-पेषण ही होगा। कवि के शब्दों में-
भावना के स्रोत से जो
मिल सका झरती रही
लेखनी बन पथ सबल
छंद वह लिखती रही...
मुझे यह कहते हुए आत्मिक आनन्दानुभूति एवम् गर्व हो रहा है कि कृतिकार श्री रामनारायण सोनी ने इस कृति की समस्त रचनाओं में रचनाधर्मिता का सफलता पूर्वक निर्वाह किया है। रचनाएँ पठनीय, बोधगम्य एवं प्रेरणादायी हैं। इस सफलतम कृति के लिए उन्हें साधुवाद।
तत्सम शब्दावली, भावानुसार शब्दों का सही तालमेल वर्तनी की शुद्धता, कृति की उपादेयता में वृद्धि करती है। मुझे विश्वास है यह काव्यकृति सुधि-पाठकों के चिंतन-मनन में वृद्धि करेगी।
कवि की कलम इसी प्रकार गतिमान रहे, भाव-सुमन महकते रहें, ऐसी मैं दिव्यात्मा से प्रार्थना करता हूं।
उत्तरोत्तर प्रगति एवं उज्जवल भविष्य की अनेक शुभकामनाओं के साथ।

शुभेच्छु
कृष्ण लाल गुप्ता

कृष्ण लाल गुप्ता
39, गणेश पुरी कॉलोनी
खजराना, इंदौर
मो. 9424011368

आत्मबोध

आत्मबोध

व्यष्टि, समष्टि और सृष्टि, और आत्मा

बबूल का बीज देखा है कभी? चपटी सी माला में एक बहुत सख्त छिलके वाला काली बटन सा बीज। एक आदमी जिद पकड़ गया। एक पावरफुल माइक्रो स्कोप से उसमें पत्तियाँ, फूल अौर काँटे ढूँढ रहा था क्योंकि किसी ने कह दिया था कि बबूल का पेड़ इसी में से निकलेगा। यह बीज नहीं होगा तो बबूल का पेड़ भी नहीं होगा। अन्त में उसे लगा कि सच यह नहीं है, बस लोगों की मान्यता ही है।
हम भी इसी तरह हाड़ मांस के इस शरीर में किसी माइक्रोस्कोप से जीवन की चेतना को देखना चाहते हैं। विज्ञान अपने संसाधनों से झूम इन करते करते उस अंतिम छोर तक तलाश करना चाहता है जहाँ उसे जीवन का स्रोत दिखाई पड़ जाए। जब आगे कुछ समझ में नहीं आता है तो उस अंतिम छोर पर उपलब्ध कण को गॉड पार्टीकल कह कर संतोष कर लेता है। जैसे बबूल की फली, उसके बीज का छिलका, फिर दो दालें और किनारे पर उभरा भाग दिख जाता है पर उसके आगे जीवन के अवतरण के दर्शन नहीं हो सकते। चेतना कहाँ से आ कर कहाँ और कब चली जावेगी? न बीज जानता है न खुद पेड़। क्या चेतना वहाँ पहले से सो रही थी? क्या कोई विस्फोट हुआ कि उसमें से पेड़ फूट निकला? कैसे जड़ पदार्थ चेतना के द्वार पर जा खड़ा हुआ? अौर जीवन उसमें अवतरित हो गया? ये प्रश्न नहीं जिज्ञासाएँ है।
विज्ञान ने जाना कि धरती पर कई तत्व है। उसने एक सारणी बना डाली, तत्वों का वर्गीकरण कर डाला। तत्व के अणु खोजे फिर परमाणु का ज्ञान प्राप्त कर लिया। यहाँ नहीं रुका। उसने आगे खोजा प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रान। इसका विखण्डन कर लिया। पर यह उसके लिए अन्तिम सिरा साबित हुआ। वहाँ पहुंच कर वह यह नहीं जान पाया कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को केन्द्र में बैठा कर रखने वाली शक्ति कौन है और सृष्टि के आदि काल से आज तक इलेक्ट्रॉन को उसी एक ही स्पीड से कौन घुमा रहा है? उन कणों में कभी खत्म नहीं होने वाले विद्युत आवेश कहाँ से आए? ये अन्तिम कण भी फिर आखिर कण ही है। विज्ञान की जिज्ञासा यदि खत्म न हुई तो भी उसकी गति पदार्थ तक ही तो जावेगी। उपनिषद् इन जिज्ञासाओं के समाधान प्राप्त किए जा सकते हैं पर विज्ञान उसे मान्यता कह कर सहमत न हो सकेगा। वह यह नहीं मानेगा कि यही वह ब्रह्म है- सर्वं खल्विदं ब्रह्म। उसे यह साक्षात् देखा हुआ सत्य भी प्रमाणित नहीं लगता कि कण भी कण क्यों है, उसकी भवितव्यता भी ब्रह्म से ही है। नासतो विद्यते भाव नाभावो विद्यते सतः।
पेड़  जो कुछ दिखाई देगा वह सब का सब जड़ है। चेतन दिखाई नहीं देगा पर चेतना उसका गुण है, चेतन की स्फुरणा है।
क्रमशः

बच्चे का जन्म हुआ इसके पहले वह माता के गर्भस्थित भ्रूण था। भ्रूण भी जीवन का प्रथम अवतरण नहीं है। वहाँ जीवन का बीज शुक्र के रूप में आया है।
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्राणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ।। 1.1.8 ।। केनोपनिषद् ।।
जो प्राणका ज्ञाता,  प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है,  वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है। इस मन्त्रमें जिसकी प्रेरणासे प्राण चेष्टा युक्त हो कर विचरता है, वह कौन है इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है। सारांश यह कि प्राकृत मन तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं अतएव उनको ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता। इसलिये उनकी उपासना भी ब्रह्म की उपासना नहीं है। मन बुद्धि आदिसे अतीत परब्रह्म परमेश्वर के स्वरूप को सांकेतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ गुरु ने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक,  प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है।

यह ब्रह्म‌ इन्द्रियों की पहुँच से परे है। न केवल यह कि इन्द्रियाँ वहां नहीं पहुँच सकतीं बल्कि यह भी कि इन्द्रियों द्वारा उसके स्वरूप को भी नहीं जाना जा सकता, उस शक्ति तक इन्द्रियों की पहुँच न होने का मतलब यह है कि उसकी प्राप्ति का साधन इन्द्रियाँ नहीं हैं और उसके स्वरूप का ज्ञान न कर सकने का तात्पर्य यह है कि उसके स्वरूप, उसके गुण कर्म का विवरण नही किया जा सकता।
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शुक्राणु पुरुष में से आया है। अतः कहना चाहिए कि जो गर्भ माँ के उदर में प्रविष्ट हुआ वह पहले पुरुष के गर्भ में आया है। शुक्राणु भी जीवित कण है। इसे तैत्तिरीय उपनिषद् में अन्न कहा गया है लेकिन इस अन्न की सृजन क्षमता भी अकेले प्राणी में नहीं होता क्योंकि देह तो जीवन के बगैर स्थूल ही है।

इसे तैत्तिरीय अपनिषद् स्पष्ट करता है।
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः।। 2/1/3 ।।
उस इस आत्मा से ही आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न और अन्नसे पुरुष उत्पन्न हुआ है। वह यह पुरुष अन्न एवं रसमय ही है।
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।। 3/2/1।।
अन्न ब्रह्म है -- ऐसा जाना। क्योंकि निश्चय अन्न से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न होने पर अन्नसे ही जीवित रहते हैं।
शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमनने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। 
शरीर अन्न का भोक्ता है। शरीर प्राण के आधार पर स्थिर हो रहा है और प्राण शरीर के आधार पर स्थित हो रहे है और वे एक दूसरे के अन्न हैं। और इस अन्न का परम कारण ब्रह्म है।
स्थूल शरीर जीवन का उद्गम नहीं हो सकता। जैसे नदी का तो उद्गम हो सकता है पर वह जल का उद्गम नहीं है।  वस्तुतः पिता और माता दोनों जीवन के पोषक है, उत्पादक नहीं। जीवन अनभिव्यक्त से अभिव्यक्त हुआ है। इस अभिव्यक्ति के उपकरण (इक्विपमेंट) है स्थूल पदार्थ। पदार्थ या पाञ्चभौतिक शरीर।  विकार अथवा कहें विकास उस जीवन के अवतरण के परिणाम हैं जो स्थूल में अवतरित हुआ है। यह भी सत्य ही है कि जीवन की अभिव्यक्ति प्राणी की देह ही है। इसके बगैर जीवन की अभिव्यक्ति ही संभव नहीं है।
इन बिन्दुओं से स्पष्ट है कि इस विकासशील भौतिक शरीर में जो चेतना है वह उस नित्य तत्व की लक्षणा शक्ति है जो हमें दिखाई पड़ती है। बबूल के बीज से वृक्ष का होना उस परम चैतन्य की लक्षणा शक्ति का ही तो आभास है। अौर उपरान्त में वृक्ष का मर जाना लक्षणा शक्ति का उपादान क्रम है। उसी प्रकार प्राणियों के जीवन का आभास भी है।
जीवन में जो अभिव्यक्त हो रहा है वह नित्य है। देह अथवा पदार्थ अनित्य है। इस अनित्य में जो अभिव्यक्त हो रहा है वह मैं हूँ, आत्मा हूँ। मैं वही आत्मा हूँ। मैं देह नहीं हूँ। यह जो अभिव्यक्त हो रहा है वह मैं हूँ। सोऽहं अस्मि।

रामनारायण सोनी

मेरी बात


    *मेरी बात*

मेरे प्रिय आत्मन्!

मैं शाजापुर जिले के एक छोटे से गाँव मकोड़ी में जन्मा हूँ। मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरा परिवार आध्यात्मिक भावनाओं और विचारों से लबरेज था। काका श्री मानस मर्मज्ञ और पिता वेद पाठी थे। तत्कालीन ठेठ गाँव का परिवेश और उसमें रचे बसे सुरम्य ग्राम्य जीवन की मनमोहक छटा की याद सचमुच मुझे आज भी गुदगुदाती है। प्रकृति की गोद में खेलता जीवन और चारों दिशाओं से आम्रकुंजों से घिरे हुए गाँव की छबि आज तक मेरे मन में बसी हुई है।
मेरी दादी सूरज बाई अौर माँ दरियाव बाई रात्रि के अन्तिम प्रहर में उठ कर चक्की पीसते हुए समवेत स्वर में पारंपरिक प्रभाती और भजन गाती थी जिनके भावों को लेते हुए कुछ रचनाएँ इस काव्य संग्रह में सम्मिलित हैं। साथ ही उन संचित भावों का आध्यात्मिक प्रभाव मेरे जीवन सदैव रहा है। मेरी हायर सेकण्डरी की पढ़ाई शाजापुर में हुई। जिस मकान मे मैं रहता था उसके मालिक श्री रमेशजी वर्मा  नगर पालिका शाजापुर की लायब्रेरी के लायब्ररियन थे। वे मुझे शाम को अक्सर लायब्रेरी ले जाते थे। वहाँ मैने मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, निराला, प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, वृन्दावनलाल वर्मा आदि कवियों, लेखकों के साहित्य को पढ़ा। सन् १९६६ से यह सब छूट गया। बाद के वर्षों में यदा कदा कुछ लिखता रहा। लेकिन इन्जीनियरिंग की पढ़ाई और तकनीकी सेवा में रहते हुए हिन्दी साहित्य से लगभग कटा रहा। सेवा निवृत्ति के प्रश्चात् २०१२ में ईश्वर की अनुकम्पा से साहित्य के पड़े वे बीज पुनः अंकुरित होने लगे। सन २०१३ में मेरी प्रथम पुस्तक "पिंजर प्रेम प्रकासिया" अौर २०१५ में  "जीवन संजीवनी" प्रकाशित हुई। ये कृतियाँ गद्यात्मक हैं। सन् २०१५ में एक सुखद संयोग हुअा कि मैं "रोटरी काव्यमञ्च" अौर "इन्सा, इन्दौर चेप्टर, इन्दौर" से जुड़ा जहाँ श्री आशीष त्रिवेदी, श्री कृष्णलाल गुप्ता, डॉ श्री रवीन्द्र नारायण पहलवान, डॉ श्री कीर्ति स्वरूप रावत,  श्री वेद हिमांशु, डॉ श्री जवाहरलाल गर्ग, श्री आशीष शुक्ला, श्री अज़ीज अन्सारी जैसे वरिष्ट रचना धर्मियों का सानिध्य, प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन मिला। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में वे लोग हैं जो मेरे इस प्रयास में सहभागी रहे हैं, मैं अभिभूत हूँ और उनका कृतज्ञ हूँ।

जब भाव गहराते हैं तो शब्द नहीं मिलते और शब्द ढूँढते ढूँढते भावों की श्रृंखला बिखर जाती है लेकिन इन दोनों का मेल कभी कभी कुछ पलों के लिये हो जाता है तो कविता जन्म ले लेती है। मेरे साहित्यिक गुरु डॉ रमेश सोनी का कहना है कि कविता की नहीं जाती है वह तो हो जाती है। उन्होंने एक प्रयोग और करने की भी सीख दी थी कि शब्दों में भाव पिरोने के बजाय भावों को शब्दों में निरूपित करने का प्रयास करें।
इस काव्य संग्रह का बीज रूप ये पंक्तियाँ -
जैसे नेपथ्य से उभर कर आई,
किसी अनजान पवित्र रूह ने
अन्तस में इस तरह गुनगुनाई
कि मैं अभिभूत हो गाने लगा
और वे ये शब्द अक्सर मेरे मन मस्तिष्क में तैरने लगते हैं।
*"चुपके चुपके कुछ कहते है
आसमान के झिलमिल तारे
भाव भरे हैं ऐसे ही
देखो ये शब्द हमारे"*

इस संकलन में कुछ अटपटी, लटपटी कविताएँ संग्रहित हैं। जब जब जो जो मन में आया लिख लिया। कविता की शास्त्रीयता, छन्द विन्यास, गीत, रस-अलंकार का मैं जानकार नहीं हूँ इसका आभास पाठक को जहाँ-तहाँ हो जाएगा। इस संकलन में सन् १९८५ से अद्यतन रचनाएँ सम्मिलित हैं।
जिन्दगी के आयाम अनन्त हैं। किंचिद् भावनाओं के रंग कलम की कूँची में पड़ गए और पृष्ठों के कैनवास पर सहज में उतर आए हैं इसलिए कदाचित् काव्य कलात्मकता का अभाव खल सकता है।
अपने सेवा काल में प्रत्यक्ष देखे गए सामाजिक, मानवीय सुख-दुःख, पीड़ा, करुणा, पर्यावरणीय परिवेश अौर उनकी अनुभूत संवेदनाओं के कुछ पलों की अभिव्यक्ति किंचिद् रचनाओं में झाँकती नजर आएगी।
"जिन्दगी के कैनवास" में संकलित नायिका प्रधान रचनाओं की भावात्मक पृष्ठभूमि मेरी सहधर्मिणी श्रीमति शकुन्तला सोनी की हैं जिनके शब्द मैंने दिए हैं। उनकी इस सहभागिता पर मैं गर्वित हूँ।
लोग कहते हैं कि आज कल मोबाइल का प्रयोग जीवन में बहुत बढ़ गया है जिसके कारण लोग अति व्यस्त हो गए हैं। यहाँ इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि इस संकलन में से ८० प्रतिशत रचनाएँ मोबाइल पर ही लिखी गई है। इनमें से रचनाओं के कुछ अशों का चित्रात्मक ग्राफिक्स का अंकन भी मोबाइल पर ही किया गया है। वाट्सएप ग्रुप "शब्द-धरा वनांचल" के सदस्य डॉ जय वैरागी, डॉ सीमा शाहजी, श्रीमति भारती सोनी ने मेरी काव्य यात्रा में प्रोत्साहन और मार्गदर्शन का कार्य किया है। मैं उनका भी हृदय से आभारी हूँ।
"जिन्दगी के कैनवास" के संपादन का जिम्मा वरिष्ट कवि एवं रचनाकार श्री आशीष त्रिवेदी ने ले कर उसे बखूबी निभाया है जिससे यह संकलन आपके हाथों में आ सका है। उनके इस कार्य से मैं अनुग्रहीत अौर उपकृत हूँ।
आशा है कि "जिन्दगी के कैनवास" के रूप में इस कृति को पाठकों का स्नेह और आशीर्वाद मिलेगा।

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...