Monday, November 20, 2017

जीवन बहता पानी

*जीवन बहता पानी*

जीवन की सरिता
सरिता के तटबन्ध
तटबन्धों पर सटे सुहाने घाट
घाट साक्षी है -
जीवन प्रवाह के
साक्षी है धार के, 
गुजरते पानी के,

चढ़ते उफान के, 
झरते प्रपात के,
और जल की शीतलता के,
निर्मलता के, सरलता के
झरोखे इतिहास के

    रामनारायण सोनी

🙏🙏🙏

तट हैं जन्म अौर मृत्यु
जीवन है सरिता

तटों के पार देखना,
प्रवाह के उद्गम को समझना,
बहने की ऊर्जा का परम स्रोत,
गन्तव्य (सागर) का प्रबोध
जल का पुनः पुनः लौटना
फिर फिर बहना

प्रतिक्षण बदलती है सरिता
कहने को कहते हैं
'सरिता बहती है'
नहीं, बहता पानी है
जीवन नहीं
समय के पल बहते हैं
उद्गम से पर्यवसान तक
नित्य, निरन्तर, अविरल
कल - कल छल - छल

बहने की चेतना
वह कभी नहीं मरती
बहते पलों के साक्षी ये तट
काल के माइल स्टोन हैं
गवाक्ष हैं

हमने आमने सामने के तटों को देखा
बाएँ से दायें बहते प्रवाह को,
उद्गम और पर्यवसान को,
जल के क्लोज साइकल को
न देख पाए

तो हम अधूरे है

जल का मैं कण हूँ,
यहाँ भी वहाँ भी
मैंने तट देखे, तट बन्ध देखे
श्वासों के अनुबन्ध देखे
उतार देखे, चढ़ाव देखे
मेरी खोज सागर है
बहता हूँ उस ओर
कहीं प्रपात हूँ
कहीं धार हूँ
पर मैं जल का कण हूँ
यहाँ भी वहाँ भी

🌊💧💦☝💦💧🌊

Wednesday, November 15, 2017

सौंदर्य

😴आज का कालचिन्तन🤔

      🥀🎼सौंदर्य  🐦🌞

"सौंदर्य" के समानार्थी शब्द हैं.....सुन्दरता, कमनीयता, रुचिरता, मनोहरता, मनोरमता, मंजुलता, मोहकता, चारुता इत्यादि -
सौंदर्य को पारिभाषित किया जाना सरल नहीं है क्योंकि यह अनुभूति का विषय है।

सौंदर्य एक पक्षीय नहीं है। इस विषय में चिन्तन प्रारंभ करें तो इसे तीन स्तरों के एकीकृत स्वरूप में देखना होगा।
दृष्य, दृष्टि और बोध।
यदि दृष्य उपलब्ध हो पर दृष्टि और दृष्य के प्रभाव का बोध न हो तो सौंदर्य अज्ञात होगा, अनुपयोगी होगा। और यदि दृष्य अौर दृष्टि है पर सौंदर्य-बोध न हो तो उसका प्रभाव नहीं होगा। एक ही दृष्य में अलग - अलग दृष्टिकोण से देखा गया में बोध भी अलग - अलग प्रभावकारी होगा।
सौंदर्य बोध में भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण अलग अलग है। पाश्चात्य दृष्टिकोण में प्रकृति अर्थात् सृष्टि अौर जगत का सौंदर्य बाह्य सौंदर्यबोध ही है जबकि भारतीय दर्शन इसे बाह्याभ्यन्तर दृष्टिकोण से देखता है। जैसे कि नृसिंह भगवान की सुन्दर प्रतिमा में पाश्चात्य जगत मूर्ति की केवल ललित कला का सौंदर्य ही देखता है पर हम उसमें इसके साथ-साथ उसके आध्यात्मिक सौंदर्य की भी अनुभूति करते हैं।
आध्यात्मिक अनुभूतियों के जागरण से प्रकृति के सौंदर्य को, पदार्थों में छिपे लालित्य को समझ सकना संभव होता है। किसी चित्र की सुन्दरता को देखकर प्रसन्नता प्राप्त कर पाना तभी संभव है जब देखने वाले की आँखों में ज्योति हो। यदि ऐसा नहीं हो तो अन्धी आँखें उस सुन्दर चित्र में से क्या प्राप्त कर सकेंगी? कलाकारों के मधुर कंठ और सुन्दर वाद्य से निकले संगीत का रस तभी मिलेगा जब कान ठीक से काम करते हो। बहरा व्यक्ति न उस संगीत का रस प्राप्त नहीं कर सकता। इसी प्रकार अध्यात्म के आधार पर विकसित हुआ अन्तःकरण इस जगत के विभिन्न पदार्थों में परमात्मा का सौंदर्य देख सकता है। अध्यात्म दृष्टा तो विभिन्न प्राणियों और पौधों में अपने समान ही समस्त जगत देखकर उन्हें समदर्शी-दृष्टि से देखता हुआ प्रसन्न होता है और वही मनुष्य के अन्दर भरी हुई महानता को अनुभव करके उसे ईश्वर का कृतित्व मानकर श्रद्धा से भर जाता है।
वस्तुतः इस संसार में सर्वत्र सौंदर्य ही सौंदर्य बिखरा पड़ा है, सर्वत्र रस ही रस टपक रहा है। उल्लास और आह्लाद प्रदान करने वाले तत्त्व हर वस्तु में हर प्राणी में, हर व्यक्ति में भरी पड़े है। उसे ढूँढ़ सकने, समझ सकने और अनुभूति में उतार सकने की आध्यात्मिक क्षमता को कला कहते हैं। कला मात्र कारीगरी नहीं है। संगीत, कविता, नृत्य, वाद्य, गायन, सज्जा चित्रकारी, मूर्ति निर्माण और साहित्य सृजन आदि तो उसे विकसित करने के विभिन्न माध्यम हैं। हमारी कला का प्राण है- आध्यात्म।
"आध्यात्मिक दृष्टिकोण के द्वारा हम पदार्थों में समाहित सृष्टा के सौंदर्य को खोज निकालने में सफल होते हैं।" यह कमाल हमारे भीतर उपलब्ध अध्यात्म का है। कला में जो रस है वह परमात्मा के आनंद की ही एक ही झाँकी है। कला का उद्देश्य यही है और होना भी यही चाहिए। ऐसा होने पर मनुष्य अपने चारों और बिखरे हुए-जड़ चेतन में ओत प्रोत अनन्त सौंदर्य को ही देखता है, अनुभूत करता है। 

निवेदक
रामनारायण सोनी

Saturday, November 11, 2017

लघुकथा

लघु कथा
तीन लोगों ने पत्थर की खदान से एक जैसे एक एक पत्थर खरीदे। तीनों ने अपने अपने पत्थर पर १५ दिनों तक काम किया। पहला पूरे कार्य समय में पत्थर से बस गिट्टी तोड़ता रहा। दूसरे ने पत्थर की एक सतह छैनी से छील छील कर उसे चिकना बना दिया। तीसरे ने उससे एक सुन्दर मूर्ति बना ली। गिट्टी ग्राहक २०० रु. में खरीद कर ले गया। दूसरे का पत्थर ५०० रु. में धोबी खरीद ले गया। तीसरे का पत्थर मूर्ति बन चुका था। उसे लोगों ने ५००० रु. में खरीद कर चौराहे पर लगा दी।
पहले ने पत्थर को बिना कुछ दिमाग लगाए तोड़ा। दूसरे ने उपयोगिता को देखते है कार्य किया। लोगों के पूछने पर तीसरे ने बताया कि में कार्य के तीन स्तर थे मूर्ति का निर्माण पहले मेरे मस्तिष्क में हुआ फिर पत्थर में से सारा अनावश्यक हटाया अन्त में उसका प्रतिरूप पत्थर में पैदा किया।

Thursday, November 9, 2017

पाषाण बोलते भी हैं

"*पाषाणी संवेदना, कितनी दूर;कितनी पास"*
पत्थर को कभी बोलते सुनते देखा है? एक छोटे से छोटे प्रयास का मूल्यांकन करना है तो सबसे पहले उस शिल्पकार को देखना होगा जिसने बिना पत्थर में कुछ जोड़े एक आकार खड़ा कर दिया।
पत्थर कहता गया-जैसा उसने चाहा मैं अपने छैनी हथौड़े से मुझी पर प्रहार करता गया। समय के तारों भरे आकाश में एक एक कर के २७ नक्षत्र बीत गए। तब तक मैंने कुछ पाया ही नहीं था तो क्या खोता? जो अंतस में भरा पड़ा था वह किसी कोष से कम नहीं था।
अचानक मैं आकार पाने लगा। शनै शनै लगा कि थोड़ा कुछ पा कर कुछ खोने लगा हूँ। दूर से मंदिर के शिखर देख कर उसमें बैठे देव का चिर आभास धड़कनों में लय बद्ध था पर मंदिर के द्वार पर आ कर भी चिर प्यास ओठों पर चिपट सी गई। अनजाने में ही शिखर भी जाता रहा और देवता भी अलभ्य रहा। अब उसे मैं पूर्णतया खो चुका हूँ।
कठौते में झाँक रहे चाँद को छुआ ही था कि चाँद चला गया। फिर नहीं लौटा। लगा कि अब चाँद किसी और बड़े आकाश में चला गया है। कैसी विडम्बना है "मुझ पत्थर में जान आते ही शिल्पी पाषाण में रूपान्तरित हो गया।" नियति की न्याय व्यवस्था उसके बही खाते में उसकी मर्जी से लिखी गई है। फैसलों की प्रतीक्षा पहले ही दिन से क्षितिज पर जा बैठी। यही जानता था कि जहाँ आकाश और धरती मिलते हैं वहाँ एक सुहाना मंजर होगा। दौड़ कर क्षितिज पर पहुंचा तो जाना कि वह बेजान पहाड़ की तलहटी है। क्षितिज स्वयं छलावा है। जीवन के अक्षर विहीन पृष्ठों पर श्याही धब्बा बनी फैली पड़ी है।
चाँद कब सूरज से मिला है। "यह हो पाएगा" इस असत्य की छाँव में जीना क्या है?
क्या कल ठीक था? क्या आज ठीक है? प्रश्न का सीधा सीधा उत्तर है, दोनो लगभग एक से है। पर बीज का नष्ट होना और उसका अंकुरित हो कर नष्ट होना क्या जीवन पा कर खोना नहीं है? एक पीड़ा है, संत्रास है, विपर्यय है।
शायद उससे भी अधिक विदारक है। मेरी संवेदनाएँ  कभी मेरे पाषाणत्व में सोई पड़ी थी पर उसने इसे सुलगा कर एक विप्लव खड़ा कर दिया। इसे देख पाने के लिये अब वह आस पास भी नहीं है। शायद नियति ने उसे मुझसे सदा के लिए छीन लिया है। मेरा पत्थर होना तय था पर उसका, उसका पत्थर होना मुझे कष्ट देता है। मैं अब मेरी संवेदनाओं के परकोटों में एकाकी खड़ा हूँ। दिशाएँ अट्टहास करती हैं। मिट्टी का टूट जाना सरल है पर पत्थर ? कुछ ऐसे उत्तर है जो प्रश्न ही बने रहते हैं।

Friday, November 3, 2017

*ऋणात्मकता में सृजन ढूँढिये*


*ऋणात्मकता में सृजन ढूँढिये*

केक्टस यदि खुद के काँटे देखता तो वह कभी का सूख जाता पर जीता इसलिए है कि मौसम आने पर उसमें एक फूल खिलेगा। इस बीच वह यदि देखे तो उसके काँटों में उसे एक खूबसूरत जमावट दिखेगी; एक लय नजर आवेगी। ये काँटे मिल कर उसमें एक सौंदर्य का दर्शन कराएँगे। इन काँटों से डर कर लोग उसका सौंदर्य नहीं बिगाड़ेंगे। ऋणात्मकता का आत्मबोध कोई न कोई प्रबल आकांक्षा का सूत्र स्वयं में पिरोए रहता है। सुकरात सोचता होगा कि अगर वह सुंदर होता तो कोई रमणी उसको दार्शनिक होने से रोक देती। बेडौल शिलाओं में से मूर्ति निकल सकती है, सुघड़ मूर्ति में से दूसरी मूर्ति तराशना मुश्किल होगा। सौंदर्य सिर्फ संगमरमर में ही नहीं काले श्याह ग्रेनाइट में भी होता है। उसमें कोई दाग भी नहीं पड़ेगा। खारे समुद्र से बादल अौर फिर बादल में से पानी धरती को नहीं मिलता तो सारे जीव केवल समुन्दर में ही रहते अौर यह धरती भी चाँद की धरती ही की तरह बाँझ होती। बिना प्रसव पीड़ा के कोई माँ नहीं होती। सोचिये; ऋणात्मकता अभिशाप नहीं कोई सृजन के बीज लिए उपस्थित है। यह वाम दर्शन का सिद्धान्त है। यह शब्द गणितीय भाषा से उपजा है। जीवन की भाषा में यह जीवन की संपूर्णता का अवश्वयंभावी अंग है।
वैज्ञानिकों ने मेंढक पर एक प्रयोग किया। उसकी एक पिछली टाँग क्षतिग्रस्त हो गई। इसकी ताकत कम हो गई। एक लकड़ी के बोर्ड पर कील लगाई गई और इस टाँग को कील से एक ढीले धागे से बाँधा गया और मेंढक का भोजन कुछ दूरी पर रखा जाता था। उसको पाने के प्रयास में मेंढक को क्षतिग्रस्त टाँग पर अधिक बल लगाना पड़ता था। उसके इस प्रयास के कारण उस टाँग की मांसपेशियाँ मजबूत होती गई और वह स्वस्थ टाँग से भी अधिक शक्तिशाली हो गई।

*ऋणात्मक को लाँघिये*

निवेदक
रामनारायण सोनी

"सर्वं खलु इदं ब्रह्म"

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*"सर्वं खलु इदं ब्रह्म*"

क्या इतना जान लेना पर्याप्त नहीं है कि जब मैं जगत में जागता रहता हूँ तो "वैश्वानर" मौजूद है। सोता हूँ तो "तैजस" उपलब्ध है। जब जागने और सोने से परे सुषुप्ति में हूँ तो बस सामने साक्ष्य है तब "प्राज्ञ" उपस्थित है ही।
बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ १ ॥“
विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है। इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है।
शांकरभाष्य के अनुसार "पर्यायेण त्रिस्थानत्वात्सोऽहमिति" अर्थात् इन तीनो स्थानों पर "मैं वही हूँ"।
बिजली के ट्रान्सफार्मर में एक तरफ हाई वोल्टेज और दूसरी तरफ लो वोल्टेज रहता है। दोनों तरफ वही की वही विद्युत प्रवाहित होती है। वोल्टेज का नामकरण अलग अलग है पर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा वही की वही है। दोनो तरफ अपने आप में वोल्टेज शुद्ध है। हिन्दी में इसे विभव कहते हैं। दोनों तरफ अलग अलग वोल्टेज एक ही संयंत्र में कैसे रहता है यह सिद्धान्त "गेल्वेनिक आइसोलेशन" कहलाता है। यह एकत्व भी है, प्रथकत्व भी है और शुद्धत्व भी है। कारिका यही कहती है।
क्या स्वयं से साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार नही है?
तो अवस्था कोई सी भी हो; ब्रह्म का होना निश्चित है। डंके की चोंट पर कहा जा सकता है कि सर्वत्र वही है। वह बहुरूपिया नहीं है बस फंक्शनालिटी में परिर्वतन है। जैसे एक बालक का पिता घर से दुकान पर जा कर सेठ हो जाता है। शाम को थिएटर में सिनेमा देखता है तो दर्शक हो जाता है। घर लौटने पर पिता लौट आता है। पर सब जगह वह आदमी तो है ही। अंतर समझा जा रहा है केवल फंक्शनालिटी के कारण।
मछली सागर को नहीं जानती क्योंकि सदैव उसके भीतर ही रहती है। बाहर निकलेगी तो जान जाएगी कि जहाँ वह रहती है वह सागर है। अगर सागर के बगैर जी पाती तो भी उसे ध्यान नहीं हो पाता कि सागर क्या होता है? पर सागर में लौट जाए तो जानती रहेगी कि वह सागर में है।
मैं ब्रह्म में ही हूँ इसलिए जान नहीं पाया कि मैं किस में हूँ। लेकिन ब्रह्म में से बाहर मैं कभी निकल नहीं सकता अन्यथा मछली की तरह मैं भी जान पाता कि ब्रह्म क्या है। मेरी आँख मुझे नहीं दिखती। यह सेल्फी कैमरे की तरह पलट कर देख नहीं सकती। बस छूने के अहसास से, प्रज्ञा के आभास से ही पता है कि यहाँ मेरी आँख है। जैसे प्रकाश भी दिखाता ही है वह स्वयं को कैसे देखे? व्यष्टि और समष्टि से बाहर हमारी कल्पना नहीं दौड़ सकती। इसका हम भाग हैं। पर यह भी ब्रह्म में प्रस्थित है। फिर कैसे जान पाएँ कि हम किस में है, यह सब किस में है? "तद्दूरे तद्वन्तिके।"
भेद स्वयं अभेद है। जब उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं तो द्वैत कैसा। उसमें मैं हूँ और मुझमें वह है तो अभेद है। जो मैं हूँ वही वह है यह कथ्य भी भेदपूर्ण है। ग्लास की काँच की दीवार के बीच में पानी भरा हो तो भेद है पर काँच की दीवार अगर पानी ही की हो और उसमें पानी भरा हो तो अभेद है।
*ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।*
*ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना* *॥ ४/२४ ॥*

निवेदक
रामनारायण सोनी

Wednesday, November 1, 2017

अद्वैत

"बूँद की रग रग में पानी ही पानी है" इस बात को समझना आसान है बनिस्बत इसके कि पानी ही से बूँद बनी है या यहाँ पानी का वर्तमान नाम ही बूँद है। पानी से निकली बूँद जब पानी में मिल जाती है तो सबसे पहले उसकी संज्ञा "बूँद" ही समाप्त होती है पर तात्विक रूप से बूँद जो पानी पहले भी था अौर बाद में पानी नहीं बना रहा बल्कि पानी का मूल स्वरूप अपरिवर्तनीय है, वह केवल अभिव्यक्ति और बदली हुई संज्ञा पा गया था। बूँद खुद अपने आप को बूँद समझले तो भी वह पानी ही है। न माने तो भी पानी ही है। बूँद सदा नहीं है पर पानी सदा है। सागर भी हम ही कह रहे है परन्तु सागर भी बिना पानी कहाँ हो सकता है। वस्तुतः बूँद भी पानी है, सागर भी पानी है पानी में बूँद है, पानी में सागर है। पानी बिना न सागर है न बूँद है। बस यहाँ वहाँ पानी ही पानी है। पानी में ही बूँद भी है सागर भी है। सब ओत प्रोत है। अस्मिता पानी है अस्तित्व बूँद है, सागर है। अस्तित्व अवस्था है, अस्मिता आधार है अौर मूल है, मौलिक है। हमें दिखाई देने वाली वस्तु अस्तित्व है। अनस्मिता जो हम जाने नहीं है, तत्व वही है। बाजार में खरीदी हुई अंगूठी आभूषण है, हम उसे सोना समझ कर घर नहीं लाऐ हैं उसका वर्त्तमान "अँगूठी" के रूप में अस्तित्व बोध है। जब इसे तोड़ कर कोई अन्य आभूषण बनाया जावेगा तब अस्तित्व बोध ही रूपान्तरित होगा पर अस्मिता तो सोने की सदा रहेगी।
पानी जब  वाष्पीभूत हो जावेगा तब क्या अस्मिता समाप्त हो जावेगी तब कुछ शेष नहीं होगा? पर ऐसा नहीं है। जब अस्मिता खोई हई लगेगी तब एक विराट शून्य उपस्थित होगा यह शून्य पूर्ण ही है। जो दृष्टिमान पानी था वह अवस्था बदलने से दृष्टिमान नहीं होगा पर वास्तव में तो वाष्य भी पानी ही है। परन्तु चिदाभास के उस पार खड़े होने से उसका "जल ही रहना" नहीं घट पाया। अर्थात् वह भी जल ही है। संज्ञाएँ अवस्थाओं की है। यह आभास द्वैत होने का है। जबकि जल किसी भी अवस्था में से विलग नहीं है। बूँद होना, लहर होना, सागर होना द्वैत का आभास है पर उसकें तात्विक स्वरूप में जल होना आभास नहीं सत्य है। आत्मा की उपाधियाँ चाहे जो भी रहै अद्वैत ही है।
वह तुरीय अवस्था है जब मैं का चिदाभास भी समाप्त हो जाता है। वास्तव में तो तुरीय शरीर की अवस्था नहीं है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों का आभास जाग्रत अौर स्वप्न तक ही रहता है जैसे बूँद का अौर सागर का आभास होता है। इनकी विस्मृति वास्तव में तो उनका मूलरुप से घनीभूत होना है। इस अवस्था के आगे मन अमन हो जाता है और साक्षी वहाँ उपस्थित रहता है। उसे सुषुप्ति की अवस्था के रूप में जानते हैं। जैसे जल वाष्पीभूत हो कर अ'स्मिता खोता हुआ लगता है वैसे ही जीवात्मा का मैं खो जाता है। फिर न तो स्थूल और सूक्ष्म शरीर रहता है और न अन्तःकरण के चारों वर्ग का ही बोध रहता है। माडूक्यू उपनिषद् में यहीं से तीसरी छलाँग तुरीय में है। यह ओंकार का चतुर्थ पाद है।

निवेदक
रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...