Sunday, September 24, 2017

जीवन की अमिट रेख

*"जीवन की अमिट रेख"*

वर्षों पुरानी घटना को आप इस तरह देख लेते जैसे कल ही की बात है। हम जो रोज सुबह से शाम तक काम करते हैं उनमें से थोड़ा सा ही याद रह पाता है जबकि जीवन का प्रत्येक क्षण घटनाओं से भरा होता है। उनमें से भी कुछेक क्षण ऐसे उपस्थित हो जाते है जो आजीवन कभी भी विस्मृत नहीं हो सकते क्योंकि वे मर्म स्पर्शी होते हैं। चाहे वे अपेक्षित हों या अनपेक्षित। इतना तो तय है कि वे अतिरेक ही होते हैं, असाधारण होते हैं। ध्यान से देखें तो वे आपके व्यक्तित्व के ऐसे हिस्से हो जाते हैं जैसे शरीर के हाथ पाँव और सच मानें कि पीड़ा, अन्याय के पल पाँव में बैठी वे कीलें हैं जो जरा से असमान धरातल पर पड़ते ही टीस बन जाती है। मेरी मानें तो ये वे संस्मरण हैं जो यह सिद्ध करते है कि किस भीषण सुनामी में आप जीवित बाहर निकल आए हैं। यह आपकी जिजीविषा है। एक बात तो तय है कि वे आपकी जीवन में उपलब्ध विजय यात्रा के दुःखद सही पर वे पल सख्त नींव के पत्थर हैं। आपका आज के व्यक्तित्व  का यह भव्य महल खड़ा है; वे पत्थर उसके भार तले दबे हुए हैं। आप नहीं जानते कि इसके कारण आप "उपमान" बन चुके हैं। प्रकृति के अजीब विधान है कि चमक लाने के लिए सोना ही तपता है लोहा नहीं। और तपता केवल सच ही है। वह मुहावरा झूँठा हैं कि सांच को आँच नहीं।
आपदा के समय कुछ शब्द नेपथ्य से तैर कर आते हैं और जीवन को पुनः खड़ा कर देते हैं। वे संजीवनी की तरह काम करते हैं। इस नेपथ्य में वे देव दूत गुरू ही होते हैं। कैसा आश्चर्य है कि जिन्होंने इस जगत के सुख सुविधा को एक तिनके जैसा त्याग दिया और फिर इसी जगत की पीड़ा के लिए परम औषधि बन जाते हैं, मरहम बन जाते हैं। क्या स्वार्थ है उनका जो हमारी पीड़ा की सलीब उन्हें चुभती है। ये वे पवित्र आत्माएँ हैं जो जीवन बाँटती रहती हैं। हमारे बिछौने आराम दायक हों उसके लिए वे तप करती हैं, शुष्क धरातल पर जीती हैं और आपके लिए संबल बन जाती हैं। हम इन्हें मुनि कहें, सागर कहें या गुरू कहें वे हमारे पूज्य हैं। वे सक्षम हैं, अमृतमय शब्द दान के। ऐसे समय हमें सम्बल देते हैं जब हम नैराश्य से घिरे होते हैं। उनका आशीष पाना हमारा परम सौभाग्य।

रामनारायण सोनी

Monday, September 18, 2017

संन्यास और प्रेम

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।गीता, 5.3।।

जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि हे महाबाहो द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्ध से मुक्त हो जाता है।। वास्तव में, संन्यास का सही भाव है तटस्थता, निवृत्ति, निस्संगता, निर्लिप्तता। गीता में जो संन्यास संबंधी दर्शन दिया गया है, वह इन दो विपरीत धारणाओं के बीच उपयोगी सामंजस्य स्थापित करता है।  संन्यास का व्यावहारिक पक्ष यह है कि वह इष्ट से अभीष्ट, द्वन्द्व से निर्द्वन्द्व और विकल्प से निर्विकल्प का यात्री होता है। ऐसे में वह अचीवर नहीं है। अर्थात् संन्यास एक मार्ग है व्यक्ति का गुण नहीं। जैसे दो पृथक् किनारों के बीच सरिता अपने मार्ग में अपने मूल स्वभाव में निश्चल बहती है। संसार में विपरीत दिशाएँ नहीं होती तो यह संसार होता ही नहीं। हम इसमें एक समन्वय स्थापित कर के चलते हैं तो यह समन्वय योग हुआ। प्रेम योगी इस द्विविधा से अक्सर गुजरता है पर उसका प्रेम उदात्त हुआ तो अपने विस्तार से सबको आच्छादित करता है।
हम अभिव्यक्त हुए यह प्रेम का भीतर से बाहर की ओर एक प्रवाह ही है। जो बीज हृदय में अंकुरित होते हैं काव्य उन्हीं का प्रस्फुटन है। शायद यही कारण है कि संन्यास अौर प्रेम के बीच दुविधा का स्थान नहीं है। प्रेम या संन्यास अथवा संन्यास या प्रेम वैकल्पिक अवधारणा के मार्ग नहीं है अपितु वे परस्पर संपूरक हैं।
प्रेम करो तो विशुद्ध हो, अलिप्त हो, निराकांक्षी हो। बंधन से मुक्त हो कर प्रेम करोगे तो प्रेम अपने आप उदात्त हो जावेगा। उसके विस्तार की चिन्ता आप को नहीं करनी है। आप इसे प्रेम की कोई नई परिभाषा मत समझ लेना। यह प्रेम का अपना ही गुण है। जहाँ प्रकाश है वहाँ से अंधकार स्वयं विदा हो जाता है उसी तरह जहाँ प्रेम है वहाँ विद्वेष का कोई स्थान नहीं। न्यास का अर्थ है ट्रष्ट, विश्वास। विश्वास के बिना न तो संन्यास है और न ही प्रेम। जगत में लोगों ने इस असीम प्रेम को प्रकारों में विभक्त कर दिया। बड़ा अजीब लगता है जब कोई कहता है यहाँ प्रेम करो वहाँ न करो। इससे करो तो उससे न करो। जिसके हृदय में प्रेम के बीज पड़े हैं वहाँ उसका प्रस्फुटन तय है। लेकिन जब किसी पात्र तक पहुँच जाए तो फिर कोई विक्षेप न हो। ऐसा प्रेम अजस्र स्रोत हो। अंग्रेजी में इसे कहते हैं 'पेरेनियल'। धार चाहे पतली हो पर निरन्तर हो। चाहे वह गंगा यमुना की तरह दृष्ट हो सरस्वती की तरह अदृष्ट। पर हो निरन्तर।

Sunday, September 17, 2017

हरदम

🌋🏘⛺❄💧🌈🌬

मैं

जीवन की सरिता
सरिता के तटबन्ध
तटबन्धों पर सटे सुहाने घाट
घाट साक्षी है जीवन प्रवाह के
साक्षी है धार के,
गुजरते पानी के,
चढ़ते उफान के,
झरते प्रपात के,
और जल की शीतलता के,
निर्मलता के, सरलता के
झरोखे इतिहास के

     ..... हाँ, मैं

Thursday, September 14, 2017

बुरा जो देखन मैं चला

*बुरा जो देखन मैं चला*

मेरी यह नितान्त व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है।

हमारी संस्कृति सबसे पुरातन संस्कृति है। ईश्वर ने इनमें व्यवस्था की दृष्टि से चार वर्ण बनाए हैं। "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टि"। ये वर्ण तो कर्मानुसार हैं। विश्व में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो कर्म के अनुसार इनमे से किसी एक वर्ग में नहीं आता है। हमारे समाज में जाति व्यवस्था का प्रादुर्भाव बाद में हुअा है। अपनी बात मैं गीता को आधार बना कर कह रहा हूँ। किसी संस्कृति की संपूर्णता के लिए इन चारों वर्णों की अत्यावश्यकता है। जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य  के घर के सामने की सड़क को बुहारने हेतु ब्राह्मण नहीं वरन् सेवा वर्ण वाले व्यक्ति की आवश्यकता होगी। इसलिए हर वर्ण की अहमियत को नकार नहीं सकते। वे अपनी अपनी जगह श्रेष्ठ और उपयुक्त हैं।

एक जगह कथन आता है "स्वे स्वे कर्मणा अभिरत:" अर्थात् अपने निर्धारित कर्मों में उस-उस व्यक्ति को इमानदारी से लगे रहना" जरूरी है। कौन कहाँ खड़ा है? क्या कर रहा है? इसे देखने के लिए मस्तिष्क को निष्पक्ष रखना होगा। नारंगी लाल शर्मा जी को सिर्फ नारंगीलाल हो कर देखना पड़ेगा। काले चश्मे को पहन कर देखोगे तो हरा पेड़ भी काला ही लगेगा। प्रकृति को प्राकृत न  देख पाने में तो दोष प्रकृति का नहीं है।

हमारे देश, हमारी सभ्यता और संस्कृति में से "मान्यता" को निकाल कर देखो। यदि बचेगा तो केवल जमीन का टुकड़ा बचेगा। कुछ चलते फिरते आदमी खुद के लिए काम करते दिखेंगे। कुछ जीव जन्तु स्वच्छन्द से दिखाई देंगे। और मान्यता के हटते ही सबसे पहले तो धर्म ही समाप्त होगा। “धर्म कोई भी हो उसके केन्द्र में श्रद्धा, विश्वास, आस्थाएँ और इन पर आधारित मान्यताएँ होती है।” इस बात को गम्भीरता से उतार कर देखना। नास्तिक से नास्तिक व्यक्ति की भी उसकी अपनी मान्यता ही है- कि ईश्वर है ही नहीं। उसकी बिसात नहीं है कि ईश्वर के न होने का प्रमाण दे सके। खैर हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं।

गीता यह भी कहती है कि संपूर्ण सृष्टि सत, रज और तमोगुण से पूर्ण है। पुलस्त्य ऋषि का नाती रावण अर्थात् राक्षस था। कुलों में जन्म लेने भर से गुण आधारित नहीं होते। कर्म ही निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति क्या है। मत भूलो कि अफीम के सुन्दर पौधे, सुन्दर फूल और सुन्दर फल में समाज के लिए नशा अौर विष नहीं हो सकता। वहीं यह भी सत्य है कि कड़वी अमृता में ओषधी के गुण समाहित होते हैं।
हममें से हर एक ने हर स्तर पर अपनी सुविधानुसार मान्यताएँ गढ़ ली है। कवायद करवाने वाला केप्टन स्वयं बैठे बैठे अनुशासन निर्मित नहीं कर सकता। बड़ी अजीब बात है- "एक आदमी प्रार्थना करता है कि भगवान सबका भला करे पर पहला नम्बर मेरा हो लेकिन आग लगे तो पड़ौसी का नंबर पहला हो।" कोई भी सुधार स्वयं से प्रारंभ हुआ तो समाज में कई बिम्ब प्रतिबिम्ब तैयार हो सकेंगे। किसी का दोष निकालें तो पहले दोषी स्वयँ होंगे कि हमें गुण कम दोष अधिक दिखाई देता है।

कबीर ने कहा है-
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा अपना, मुझ सा बुरा न कोय।।

यह हमारी कक्षा ३ में पढ़ाया गया था। मैंने हिन्दी के ऐसे कई पाठों का रट्टा लगाया और सौ में से सौ नम्बर लाया। परन्तु एक भी अपने भीतर नहीं उतर पाया। मैं बहिर्मुखी ही रहा अर्न्तमुखी नहीं हो पाया। मेरी तरह के लोगों से दुनिया भरी पड़ी है।
आप क्या सोचते है? इस प्रश्न से बचने की कोशिश करोगे तो मेरी लाइन में आ जाओगे। कोई भी अपना अवमूल्यन नहीं चाहता। मैं भी जानता हूँ पर अगर बताने की हिम्मत जुटा पाया तो आपके कान में ही कुछ कहूँगा।

🎭

रामनारायण सोनी

Wednesday, September 13, 2017

Geeta

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Monday, September 11, 2017

Geetaji

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औपनिषदेय

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Abc

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

भावार्थ : यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता॥2/20॥

जीवन सच की एक बुनाई


*जीवन सच की एक बुनाई*☝

*जीवन सच की एक बुनाई*
*आधा कुँआ आधी खाई*
*कैसी चिंता कैसी झाँई*
*मरघट ने जब देह जलाई*

इन चार लाइनों भारतीय जीवन दर्शन की एक सोच भरने का यह प्रयास है।

ईश्वर सत्य है, सत्य ही जीवन का आधार है।
हम आधे भीतर और आधे बाहर में बँटे हैं। इस बाहर-भीतर में तालमेल नहीं है। कभी कभी तो बाहर कुछ अौर भीतर कुछ होता है। अौर हाँ, इस भीतर बाहर की संधि पर कुछ इस तरह मौजूद हैं कि जैसे हम एक पहिए की सायकिल पर दम साधे बैठे गए हों। इस खेल में एक तरफ आधे में कुआँ है, दूसरी तरफ आधे में खाई है। इसलिए डरना स्वाभाविक हो जाता है।
हम बाहर से इसलिए डरते हैं कि जगत में संकट, दुख, तकलीफ और संघर्ष भरा पड़ा है। भीतर इसलिये डरते हैं कि हम हमारे ही अच्छे बुरे कर्मों को सामने नग्न खड़े देखते हैं। उनमें से जो कभी कभार अनैतिक, अनर्गल, अनुचित कर्म हो जाते हैं वे हमें सदैव डराते रहते हैं। लेकिन ये हमारे ही अर्जित कर्म फल हैं। इसलिए ऐसा लगता रहता है कि हम बाहर भी गिरते हैं और भीतर भी गिरते हैं। यह गिरावट हमारी स्वयं की होने से इसमें हमारी मदद कोई नहीं कर सकता। लेकिन ऐसा भी अक्सर होता रहता है कि हम गिरें भले ही नहीं, गिरने का भय इतना अधिक पाल लेते हैं कि वह गिर जाने से अधिक डरावना हो जाता है। बहुत ऊँचे भवन की छ्त पर खड़े हो कर देखो तो दिल बैठ-बैठ जाता है, 'लगता है कि अब गिरे तब गिरे'। वहाँ जो अहसास होता है उसे बोलचाल की भाषा में झाँई कहते हैं। इस झाँई का अर्थ यह है कि बिना गिरे ही गिरने का भयावह आभास। संघर्षों, संकटों में गिर पड़ने का अहसास हम से जीवन के आनन्द को छीन लेता है। हर दम की टूटन, बिखराव, अवसाद, चिन्ता अौर यहाँ तक कि मृत्यु के भय से जीवन की परिधि से वे आनन्द दायी क्षण लुप्त होने लगते हैं जो हमें सुख दे सकते हैं। *"भय से भरे जीवन में आनन्द का स्थान नहीं है।"* साँप सामने आकर खड़ा हो जाता है तो काट लेने का भय और काट लेने पर मृत्यु का भय। अर्थात् अन्तिम भय तो मृत्यु का भय ही है। दुनिया के जितने भय हैं वे सीमान्त में खड़े मृत्यु के भय तक जाते हैं। साँप से लड़े बगैर अन्तिम भय तक पहुँच जाना अकर्मण्यता का परिणाम है। साँप से लड़ना हमारे उपायों में शामिल है। मृत्यु के निवारण का उपाय हमारे पास नहीं है, इसलिए उस पर विचार करना व्यर्थ है, मूर्खता है, आत्मघात है। इस भय से, झाँई से बाहर निकलो। जीवन जितना सत्य है उतनी ही सत्य मृत्यु है। जीवन को जीने और मरने के दो हिस्सों में न बाँटो। वह हिस्सा जो हमारे लिए निरुपाय है उसका उपाय ढूँढने का कोई प्रयास मत करो। यह समझ लो कि वह चिरन्तन सत्य "मृत्यु" ही है। उस सत्य की स्वीकारोक्ति यह है कि "मरघट ने जब देह जलाई" अौर तब शेष और अशेष का अन्तर स्पष्ट हो जावेगा। अपने उपाय करने और उस निरुपाय होने का अन्तर भी स्पष्ट हो जावेगा।
*मृत्यु की झाँई* जीवन में से बाहर निकाल कर सत्य का दर्शन किया तो जीवन जीने के लिए आनन्द-सागर ठाठें मारता हुअा खड़ा हो जाएगा।
क्या चुनना पसन्द करोगे? भय या अभय, भ्रान्ति या प्रज्ञा, मृत्यु या अमृतत्व।
इसलिए *"कैसी चिन्ता कैसी झाँई*।

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...