"बूँद जो हिस्सा है, समन्दर से एक सफर का आगाज है।
उठना, चलना, गिरना फिर उसी ओर बहना ही खूबसूरत अन्दाज़ है।।"
रामनारायण सोनी
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ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।
भाव प्रेषण:-
बूँद उस परिपूर्ण सागर का अंश ही है जो कि सनातन है। वह समझने लगता है कि वह अपने मूल स्वरूप अर्थात् जल का अंश नहीं वरन् एक अलग अस्तित्व रखता है। जबकि वह तात्विक रूप से जल ही है और यहाँ वहाँ विचरता रहता है।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।
हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?
भाव प्रेषण:-
यह बूँद ही इस संज्ञा 'बूँद' कहलाने के पहले सागर ही थी अर्थात् अव्यक्त ही थी, इसका जन्म होना बूँद के स्वरूप में व्यक्त होना ही है। सम्पूर्ण परिभ्रमण के पश्चात् सागर अर्थात् अपने मूल स्वरूप में लय होना ही अव्यक्त हो जाना है। यह परिभ्रमण ही व्यक्त अवस्था अर्थात् जीवन है। इस परिभ्रमण में उस बूँद में क्रिया है, विकार है, विकास है, अभिवृद्धि है, क्षय है पर मौलिक जल तत्व वही का वही है।
रामनारायण सोनी
१४.०९.२२