Sunday, January 2, 2022

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डॉ रवीन्द्रनारायण पहलवान की एक कविता

"नए दिन का मतलब"

खिड़की पर चिड़िया ने आकर 
चीजें कहां 
मैंने चादर अपने ऊपर खींच ली। 
चिड़िया फिर चीं-चीं बोली, 
अब मैंने कहा -
सुबह-सुबह क्यों सताती हो, 
सोने दो ना।
चिड़िया बोली -
मैं तुम्हें उठाने आई हूँ
सवेरा हो गया 
नया दिन शुरू हो गया,
नया दिन मतलब 
तुम्हारे जीवन की किताब का 
एक नया पन्ना।

डॉ रवीन्द्रनारायण पहलवान

🌷🌷🌷🌷🌷
मेरी नजर में

बात की शुरुआत कविता के अन्तिम पद से करना होगी।
नया दिन मतलब तुम्हारे जीवन की किताब का 
एक नया पन्ना। जीवन एक किताब है। किताब के पन्ने समय की कलम से लिखे गये या लिखे जाने वाले आलेख हैं। नये दिन का मतलब हमारे जीवन की किताब का एक नया पन्ना है। हर सक्ष को हर दिन अपने जीवन की किताब का एक नया पन्ना मिलता है। चाहो तो इस पर लिखो या कुछ न लिखो। जैसा भी हो यह पन्ना तो पलटेगा ही। यह स्वाँस के अंतिम छोर तक चलता रहेगा। समय अपनी धुरी पर अपनी निर्बाध गति से चलता है। जीना तो वर्तमान में ही है और न ही जीवन की वास्तविकता से दूर भागा जा सकता है। हर नए दिन का स्वागत होना चाहिये। बस आज सुबह उसी किरण को पकड़ कर उजालों की तलाशना शुरू कर देना चाहिये।
कठोपनिषद् का सूत्र सफल जीवन का मूलमंत्र  है।
"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।" कुछ लोग इसका अर्थ थोड़ा इस तरह करते हैं - उठो, जागो, और जानकार पुरुषों का श्रेष्ठ सान्निध्य प्राप्त करो। लेकिन 'उत्तिष्ठ' का शब्दार्थ है उठ कर खड़े होना। जाग्र का अर्थ जागना नही है वरन् जाग्रति को प्राप्त होना है, चेतना को जगाना है। उठ कर खड़े होना एक भाव है कि आलस्य, प्रमाद, अक्रियाशीलता आदि का त्याग करो। अपनी चेतना, जो तुम में सर्वत्र व्याप्त है, उसे जाग्रत करो। शेर जंगल का राजा होता है, अपरिमित बल का स्वामी भी है और शिकार वहाँ है भी परन्तु -
उद्योगिनं हि पुरुष सिंहमुपैति लक्ष्मी  
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।। 
सोते हए शेर के मुख में शिकार आ कर नही गिरेगा उठ कर शिकार करना पड़ेगा। इसलिये उपनिषद् का ऋषि संदेश करता है कि खड़े हो जाओ और सक्रिय हो जाओ। 
कविता में चिड़िया ऋषि ही की तरह सोते हुए "मैं" को चीं - चीं कर जगा रही है। हमारा शरीर और मन बड़ा प्रमादी है। उसे आराम बहुत पसन्द है। चादर खींच कर वापस पड़े रहना प्रमाद और आलस्य ही तो है। चिड़िया की बार बार की चिचियाहट प्रमाद की लय को तोड़ कर एक नये उजाले का, नये उत्साह का, नये दिन का शुरू होना बता रही है। आज का का यह नया दिन नये प्रश्न, नई चुनौतियाँ, नये कर्मक्षेत्र, नये लक्ष्य ले कर आया है। तुम्हारे जीवन के कृतीत्व रूपी किताब के पिछले पन्नों के साथ इस पन्ने को भी जुड़ना है। 
ऐसा लगता है कि हम अभी तक प्रमाद भरी एक प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे और अभी अभी चिड़िया ने आकर हमें झकझोर कर खड़ा कर दिया है। अब सामने लक्ष्य होंगे, रास्ते होंगे, विकल्प तथा संकल्प होंगे और होंगी जीवन को जीने की अदम्य इच्छा। मानो तो यह चिड़िया हमें हम से परिचय कराने आयी है। 

रामनारायण सोनी

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एक कविता डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की "मैने तुम्हे" उनकी पुस्तक "एक शाम" से।

मैंने तुम्हें 

मैंने सोचा था, 
कभी कुछ बात कहूँ
कुछ बात करूँ तुमसे। 
तुम तो कभी नीचे नहीं आए 
मैंने सोचा 
चलूँ मैं ही, तुम्हारे पास। 

कितने सुन्दर हो तुम, 
सलोने भी कुछ कम नहीं, 
लो, मैंने तुम्हें छू लिया 
कितने कोमल हो तुम 
ओह, निराले, बादल।

 डॉ रवीन्द्र पहलवान
🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹

मेरी नजर में

कविता के पूर्वार्ध में यह लगता है कि एक व्यक्ति अपने किसी प्रिय के लिये बहुत अन्तरंग हो कर बात कहता है। एक परिसंवाद स्थापित करने की उसकी अदम्य इच्छा है। उत्तरार्थ में वह उसके सौंदर्य और सुकोमलता पर मुग्ध है। फिर उसने आहिश्ता से छू लिया। कविता की अन्तिम पंक्ति में पता चलता है वह प्रियतम तो बादल है। यह प्रकृति के अचेतन में चैतन्य का एहसास है। बहुत आश्चर्य जनक तादात्म्य है प्रकृति के साथ। इस पंक्ति में मानवीकरण और रूपक दोनों अलंकार होने से यह उभयालंकार का प्रयोग है। यहाँ प्रकृति में मानवीय गुणों और क्रियाओं का आरोपण किया गया है। बड़ी चतुराई से शब्दों की चित्रमयी भाषा का प्रयोग हुआ है। मेरी दृष्टि में कविता का सौंदर्य  काव्य की चित्रमयी भाषा है। इसी कारण शब्दों से चाक्षुक बिंब या दृश्य बिंब साकार हो उठा है। इससे सारा दृश्य हमारी आँखों के सामन घूम जाता है। इस तरह सौंदर्य वृद्धि हुई है पर इस मिले-जुले प्रभाव के कारण कविता का सौंदर्य और निखर आया है। 
यहाँ अमानव बादल में मानवीय व्यापार या क्रिया का आरोप हआ है। मानवीकरण अलंकार छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा और निराला का प्रिय अलंकार है।
कविता का भावपक्ष बहुत महीन और स्निग्ध है वहीं यह कवि का अपनी प्रथम वायुयान की यात्रा के समय का स्वानुभव है। 
कविता में पदावली और संगीतात्मकता होने से गेयता का गुण आ गया है। पण्डित मोहन शर्मा ने इसे शास्त्रीयराग में  संगीतबद्ध किया और गाया है।
रामनारायण सोनी
२७/०३/२०२०

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डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की एक कविता उनकी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक "डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की प्रतिनिधि रचनाएँ" से। 
वे एक बेहतरीन रचना शिल्पी हैं। इनकी १४ पुस्तकें काव्य संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई हैं। इनकी रचनाओं में शब्दों की कंजूसी पर भावों की प्रचुरता है। रचनाएँ सोद्देष्य और संवेदी होती हैं। इनकी रचनाधर्मिता में नये रचनाकारों को गढ़ना, उनका शोपिंग और फिनिशिंग भी शामिल है। रोटरी कान्यमञ्च के संरक्षक हैं। साहित्य से जुड़ी अनेक उपलब्धियों के धनी हैं।

"सफ़र की तैयारी"

सफ़र के पहले
बहुत कुछ तैयारी
करना होती है
उसे
जिसे करना होता है सफ़र।
एक सफर
ऐसा है, जिसकी तैयारी
करते हैं वह सब
जिन्हें यात्रा नही करनी होती।
यह यात्रा है
अन्तिम यात्रा।

डॉ सरवीन्द्र नारायण पहलवान
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मेरी नजर में

लोग जीवन जीना सिखाते हैं पर यह कविता मरना सिखा रही है। 

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम् ।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति ॥
(ऐतरेय उपनिषद्  अध्याय 3, खण्ड 3)
अर्थ – इतस्ततः भ्रमण करते हुए मनुष्य को मधु (शहद) प्राप्त होता है, उसे उदुम्बर (गूलर?) सरीखे सुस्वादु फल मिलते हैं । सूर्य की श्रेष्ठता को तो देखो जो विचरणरत रहते हुए आलस्य नहीं करता है । उसी प्रकार तुम भी चलते रहो (चर एव) ।
यह जीना सिखाता है कि सतत कर्म रत रहो और संसार के मधुर फल प्राप्त करो। 
वहीं गीता सावधान करती है कि "जन्म मृत्यु जरा व्याधि दुःखदोषानुदर्शनम्।" आदमी को इन छ्ह बातों के बारे में पुनः पुनः विचार करना चाहिये।
एक रात नानक अचानक घर छोड़कर चले गए। खोजा गया जगह-जगह पर कहीं भी वे मिले नहीं। और तब किसी ने कहा, उन्हें मरघट की तरफ जाते देखा है। भरोसा किसी को न आया। मरघट ले जाने के लिए तो चार आदमियों की जरूरत पड़ती है, नानक ख़ुद ब ख़ुद चले गए। मरा हुआ आदमी भी वहाँ जाना नहीं चाहता। लोग मरघट पहुंचे, देखा कि वे मरघट में ध्यानस्थ बैठे थे। लोग तब चौंक गए जब नानक ने कहा, यहाँ जो आ गया वह फिर कभी नही मरता। मैने सोचा जब एक दिन यहाँ आना ही है तो चार आदमियों के कन्धे पर चढ़ कर क्या आना इसलिये मैं खुद ही चला आया हूँ। यह मेरी अपनी तैयारी है।
"जो होगा ही" उससे हमारा विरोध बना रहता है। गर्मी आएगी ही तो हमने विरोध करके पंखे, कूलर, ए. सी. लगवा लिये। बरसात आएगी तो पक्के घर बनवा लिये। सर्दी आएगी तो स्वेटर पहन लिये, हीटर लगवा लिये। हमारी अपनी चाह है कि जो नैसर्गिक रूप से हो रहा है वैसा न हो। जो होना ही है, उससे हमारा सदैव संघर्ष रहा है। जो होना ही है उसे हम आसानी से स्वीकार नहीं करते है। 
यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा सब से बड़ा आश्चर्य क्या है?
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् ।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।।१६।।
यहां इस लोक से जीवधारी प्रतिदिन यमलोक को प्रस्थान करते हैं, यानी एक-एक कर सभी की मृत्यु देखी जाती है । फिर भी जो यहां बचे रह जाते हैं वे सदा के लिए यहीं टिके रहने की आशा करते हैं । इससे बड़ा आश्चर्य भला क्या हो सकता है ? 
मृत्यु होनी ही है जिसे हम स्वीकार नही करते, लेकिन क्या मृत्यु से प्रतिकार संभव है? क्या संघर्ष संभव है? मृत्यु का नाम लेते ही भय की बिजलियाँ क्यों कौंध जाती है। कोई इस पर चर्चा आरम्भ कर दे तो उसे कहते हैं - शुभ शुभ बात करो। भीतर का भय बाहर उजागर हो जाता है। मृत्यु के सत्य को स्वीकार करना उसका वरण करना कतई नहीं है वरन् वह निर्भयता की ओर श्रेष्ठ कदम है। 
"एक सफर
ऐसा है, जिसकी तैयारी
करते हैं वह सब
जिन्हें यात्रा नही करनी होती।"
कफ़न में जेब नहीं होती है पर वह कमाई जो परमार्थ के धन से जगत में छूट जाती है वह यश और श्री के रूप में स्थावर होती हैं।
कविता मृत्यु को "डर" का पर्याय नहीं उसे "महाप्रयाण" बनाती है। यह कविता भय से निर्भयता की ओर ले जाती है।

रामनारायण सोनी
19.01.20

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समीक्षा ३६

डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की कृतियाँ व एक कविता,
"अब क्या किया जाए"

अब क्या किया जाए?
साधु खड़ा द्वार पर 
भिक्षा की गुहार लगाए 
घर में नहीं है एक मुट्ठी सीधा, 
अब क्या किया जाए? 

विचारों की बादल 
घुमड़-घुमड़ कर छाए 
लिखने को कुछ उपलब्ध नहीं है, 
अब क्या किया जाए? 

असामाजिक तत्वों की टुल्लर 
चंदे की आवाज लगाए 
आज जेब में केवल हजार के नोट, 
अब क्या किया जाए? 

नव युवकों की टोली 
होली के चंदे की पुकार लगाए, 
याद करूं मोहल्ले की हुड़दंग, 
अब क्या किया जाए?

एक अपाहिज 
दुहाई दे, दरकार लगाए 
पास में एक सिक्का नहीं है 
अब क्या किया जाए?

एक अपंग 
भूखा हूं, ऐसी गुहार करे 
मैं स्वयं कल से भूखा हूं, 
अब क्या किया जाए?

एक संत 
गूढ़ रहस्य की बात बताएं 
मन मेरा स्थिर नहीं है 
अब क्या किया जाए? 

एक दड़बे में 
पक्षी तड़पे 
दानों को मोहताज हुआ है 
अब क्या किया जाए? 

मन मंदिर में 
बसती एक मोहक सूरत 
पूजा की दरकार नहीं है 
अब क्या किया जाए?

      डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान
🌷🌹🌷🌹🌷🌹

मेरी नजर में

गन्ने से गन्ने का रस, रस से शकर फिर शकर से चाशनी। यह  क्रिया है। यह क्रिया- प्रक्रिया विज्ञान में 'एक्स्ट्रेक्शन', केमिस्ट्री में 'आसवन' आयुर्विज्ञान में 'अर्क' और बोलचाल की भाषा में 'निचोड़' है। इनकी कविताएँ इसी तरह व्यापक विचारों और भावों का संघनन है। कविता कम शब्दों में कहा गया बड़ा वक्तव्य है। यही कविता पाठक तक पहुँचने पर इसके थोड़े शब्द अपने मूल स्रोत भावों और विचारों के व्यापक स्वरूप और भावों की अभिव्यक्ति को पुनर्स्थापित करने में सफल होनी चाहिये: कविता तभी सार्थक होती ही। बहुत थोड़े शब्दों में कही गई उनकी कविता में यह शब्दों की कंजूसी नही बल्कि वह संतृप्त विलयन है जैसे उजाला नील की चार बूँद बाल्टी भर सफेद कपड़ों को और झकास सफेद कर देती है। जैसे पेड़ के फल से बीज उत्पन्न होता है यह संघनन है और फिर इस बीज से पुनः पेड़ प्राप्त हो जाना व्यापक विस्तार है ठीक वैसे ही भावों-विचारों के शाब्दिक संघनन से उनकी कविता का भावनात्मक विस्तार होना संभव है। डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की कविताएँ भावों-विचारों का संघनन है लेकिन शब्द इतने व्यावहारिक और सहज है कि वे मूल विचारों और भावों को सहज रूप से पुनर्स्थापित करने में सक्षम है। यह संक्षेपिका उनकी चार कृतियाँ "कल शाम", "मैंने पुकारा", "अब क्या किया जाय" और "बस, एक बार" के संदर्भ में है।
यह प्रश्न कवि का किसी और से नहीं वरन् स्वयं से है। प्रश्न केवल प्रश्न नहीं है वह एक ऐसे मनोभाव को दर्शाता है जो सापेक्ष है लेकिन साथ ही वह सार्थक है।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌।।
श्रीमद्भगवद्गीता।।17/20।।
भावार्थ : दान देना ही कर्तव्य है - ऐसे मनोभाव से उपयुक्त दान किसी देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो उस वस्तु द्वारा पात्र प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य दिया जाता है। जैसे भूखे, अनाथ, दुःखी और असमर्थ अथवा भिक्षुक आदि को अन्न, वस्त्र आदि वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र व्यक्ति को दिया जाय। जो दान  प्रत्युपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहा गया है। तात्पर्य यह है कि मनोभाव इन्सान में होना चाहिये "मैं किसी जरूरतमन्द की मदद करूँ।"
कविता इसी मनोभाव से प्रारंभ होती है। कवि के पास इतने साधन संसाधन का अभाव है पर हर जरूरतमन्द की जरूरत पूरी करना चाहता है। 
"सीधा" एक बोलचाल का शब्द है जिसका तात्पर्य रसोई के कच्चे सामान से है जो किसी को दिया जाय तो उससे पूरा भोजन तैयार हो सके। कवि का सामर्थ्य नही है पर मन्तव्य दान देने का है जो परम सात्विक भाव है।
कबीर ने यही बात अपने तरीके से कही है--
साईं एतना दीजिये जा में कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय।।
जेब में एक हजार के नोट से संकेत है कि वह धन जो अब मेरे अथवा किसी ओर के काम का नही है। अन्तिम पद में उस प्रतिमा और प्रतिमान का उल्लेख है जो मोहिनी स्वरूप है जिसकी पूजा की आवश्यकता नहीं है। दबी जुबान यह संकेत है कि उससे बस प्रेम किया जाए।

रामनारायण सोनी
०९.०३.२०२०

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...