Monday, December 30, 2019
जित देखूँ तित तू
Saturday, December 28, 2019
समाज का विकास और अवरोध
Friday, December 6, 2019
महाभारत के विभिन्न पात्रों की विसंगतियाँ
महाभारत के विभिन्न पात्रों की विसंगतियाँ
भीष्म ने प्रतिज्ञा नहीं की होती तो महाभारत न होता, ब्रह्मचारी होते हुए भी स्वयंवर में क्यों गये, वे सिंहासन से बँधे थे ना कि राजा से आदि आदि। युद्ध के पश्चात् शर शैया पर पड़े रहना प्रायश्चित नहीं उनकी अपनी प्रतिज्ञा का निर्वहन था। भीष्म नीतिकार थे।
गान्धारी कैकेई की तरह राज्य संचालन में सहायक सिद्ध हो सकती थी पर उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँध ली।
कर्ण बहुत बड़ा दानवीर था फिर दुर्योधन का राजदान क्यों स्वीकार किया। कृपाचार्य कुलगुरू थे फिर अंधे राजा के सभासद क्यों हुए? गुरू वशिष्ठ की तरह आश्रम में क्यों नही रहे? बड़ी अजीब बात है - गुरु द्रोणाचार्य को प्रणाम सिर्फ इसलिए करते हैं कि उन्होनें एक राजकुमार को अर्जुन बनाया लेकिन उन्होने एकलव्य से गुरुदीक्षा में पाया अंगूठा इतना दूर फेंक दिया कि किसी को नजर न आवे और आश्वस्त हो गए कि लोग सब भूल जाएँगे। उन्हे शायद यह पता ही नही था कि दाता के दरबार के उस खाते में तो करनी लिखी रहेगी। कर्ण को अपने द्वार से खाली लौटा देना भी तो लिखा होगा। आश्रम की पवित्र माटी को छोड़ कर मणि-कांचन खचित राजसभा के सिंहासन पर आरूढ़ हो जाना भी लिखा होगा। फिर पुत्र अश्वत्थामा के ब्राह्मणत्व को क्षत्रियत्व में रूपान्तरित किया जाना भी तो लिखा होगा। कृति जब तक सुकृति रहे तब तक सृजन है पर विकृति होने पर निध्वंस खड़े होना अवश्यंभावी है।
जो जितना छोटा है उतना कम उत्तरदायी है। बड़े होने का अर्थ है उत्तरदायित्वों का बढ़ जाना।
पाँडवों ने या कहना चाहिये कि धर्मराज युधिष्ठिर ने वस्तुओं का जुआ खेला तब तक ठीक था द्रौपदी को वस्तु तुल्य बनाया। मेरी व्यक्तिगत धारणा में धर्मराज ने सब से अधिक अधर्म किया। वनवास पुरुषों का था द्रोपदी को क्यों ले गए।
भीम ने अनार्या स्त्री हिडिम्बा से विवाह क्यों किया? यदि कर लिया था तो फिर उसे वहीं वन में क्यों छोड़ दिया?
कुन्ती ने वरदान की सत्यता पर संदेह किया और कर्ण को जन्म दे कर ब्रह्म हत्या जैसा अपराध किया। पांडवों के वनवास काल में वह भी राज्याश्रय में रही। महाभारत ने नपुंसकों को भी नहीं छोड़ा शकुनी और शिखंडी भी युद्ध में आहूत कर दिया। स्वयं भगवान परशुराम ने अपने दीक्षित साहसी और सहनशील शिष्य कर्ण को शाप दे दिया कि संकट का समय आने पर तुम्हारी धनुर्विद्या काम नही आवेगी।
द्रौपदी ने अतिथि दुर्योधन का उपहास कर अठारह अक्षोहिणी सेना को रण में खड़ा कर दिया।
धृतराष्ट्र तो हतराष्ट्र था ही। अपनी अंधी महत्वाकांक्षा की आपूर्ति में आँख वाले ज्ञानी झोंक दिये और सभी ज्ञानी भी मूढ़ हो गये।
स्वयं वेदव्यास जिन्हें हम “व्यासाय विष्णु रूपाय” कहते हैं अपने तपबल से निःसंतानों को अभागी संतान दे गए।
पांडु रुग्ण थे तो माद्री से विवाह क्यों किया?
जहाँ कुलगुरू कृपाचार्य और गुरू द्रोणाचार्य जैसे ब्राह्मण हो कर क्षत्रियों के कर्म में उतरे और इसके बावजूद वे अपने ब्राह्मणत्व के चोले से बाहर नहीं निकल पाए जबकि वे संपूर्ण जीवनकाल में क्षात्रधर्म से चिपके रहे। इस बात के लिए मेरे इस मन्तव्य का घोर विरोध किया जाएगा।
द्रोण अौर कृप जैसे चरित्रों ने जाति व्यवस्था की नींव रखी है। संभवतः वे उनके काल में समाज में श्रद्धेय अौर पूज्य माने गए थे। इनके विसंगति पूर्ण कृत्यों का विरोध तत्कालीन समाज नहीं कर पाया क्यों कि उन्हें राज्याश्रय प्राप्त था और दोनों राज्य सभा के प्रतिनिधि सदस्य भी थे। दूसरी ओर विदुर को आजीवन शूद्र माना गया जबकि वे नीतिकार प्रबुद्ध मंत्री थे। कर्ण को सूतपुत्र माना गया, घटोत्कच भीमसेन का पुत्र और परम वीर घटोत्कच पोता होने के बावजूद वन प्रान्तरों से बाहर नहीं निकल पाया। उन्हें किस वर्ण में उनको सम्मिलित किया गया इसके संकेत नहीं मिलते। इसी तरह कई बातें हैं जो आचार संहिता के हनन को प्रकाशित करती है। कुल और वंश के अनुगतों को कर्म के वर्गीकरण से अलग रख कर वर्ण व्यवस्था को भंग करने के मूल कारण बने हैं।
और भी बहुत कुछ कहने को है पर अभी इतना ही।
महायुद्ध हुआ उसमें वीर, विज्ञानी, साहसी, कर्मठ लोग मारे गए और डरपोक, अज्ञानी, निकम्मे बचे रहे। खाण्डवप्रस्थ से पौरुष और विकास की गाथा से प्रारम्भ हुई। परन्तु खाण्डवप्रस्थ से इन्द्रप्रस्थ तक की यात्रा लाल पानी के सागर के उस पार पूर्ण हुई। पीछे छूट गई कई अनर्गल विभीषिकाएँ। कथानक तो लिखे पड़े हैं पर पीछे बची माताएँ, बहने, बेटियाँ और विधवाएँ कुछ लिख पाती तो प्रेम, करुणा, बेचारगी और विप्लव का इतिहास भी उपलब्ध होता।
वहाँ सैनिक केवल सैनिक था जो अपने राजा का निष्ठावान अनुचर था, जिसका कोई दोष नहीं था। घोड़े और हाथी निरीह प्राणी थे उन्हे नहीं पता था के उनके सवार कि धर्म अथवा अधर्म के लिये लड़ रहे हैं। हताहत मानवों के लहू की धारा के संग उनका लहू भी बहा।
रामनारायण सोनी
फिर नया मधुमास होगा
*नव सृजन नव चेतना का*
*जब कभी आगाज़ होगा*
*ठूंठ में नव कोपलों से*
*फिर नया मधुमास होगा*
डॉ जय वैरागी
कोई कहता है बसन्त के बाद ग्रीष्म आती है, कोई कहता है बसन्त बरस में एक ही बार आती है तो कोई कहता है शिशिर के बाद बसन्त आती ही है, पतझड़ के बाद बसन्त आती ही है। जो पतझड़ के बाद बसन्त को अवश्यंभावी समझता है सृजन की सामर्थ्य केवल उसी में है। वह ठूँठ में से नवपल्लव उगाता है। मैने देखा है, यह सत्य घटना है - किसान के नींबू के खेत में कोई पेड़ को जमीन के ६ इन्च ऊपर से काट गया। वह मन मसोस कर रह गया। कुछ दिन बाद उसने उस ठूँठ में नींबू की एक कलम लगा दी। समय आने पर उस में अंकुर फूट आये। दो बरस बाद उसमें फल आने शुरू हो गए।
वास्तव में कोंपलों का सृजन मधुमास के गढ़ने की तैयारी है। नव चेतना का आह्वान बीज में से अंकुरण का आह्वान है वही द्वार खोलता है पौधे के नव सृजन का। नव चेतना का आह्वान कलिका के फूटने से फूल के सृजन की तैयारी है। नव चेतना कठोर चट्टानों में से सोता फूटने पर झरने के सृजन का आगाज है। जब जब ऐसे आगाज़ अंजाम पाएँगे वे जड़त्व में चेतना लाएँगे। चेतना का सर्व श्रेष्ठ गुण है विकास और विकास के बिना सृजन अकल्पनीय है। मधुमास भी चेतना के माध्यम से विकास है, प्रकृति का सृजन है। प्रकृति की सृजन प्रक्रिया जीवन की संचेतना है।
*"सृजन और विध्वंस के मैं*
*गीत युग से गा रहा हूँ*
*बह रही धारा के संग संग*
*मै भी बहता जा रहा हूँ"*
यदि अन्यथा न लिया जाए तो परमाणु बम के विस्फोट के पूर्व और बाद के जापान की तुलना कर.के देखिये। वहाँ पर ठूँठ में कोंपल उगाने की क्षमता नहीं पैदा की होती तो वह देश मर ही जाता। उसने नव चेतना का आह्वान न किया होता तो नव सृजन भी अकल्पनीय होता। डॉ जय वैरागी की ये पंक्तियाँ आपके भीतर संन्निहित चेतना का आह्वान कर नव सृजन के लिये आमन्त्रित कर रही है।
इसलिये बसन्त के बाद के ग्रीष्म की प्रकल्पना छोड़िये, पतझड़ के बाद के बसन्त होने की नव चेतना का आगाज़ कीजिये। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली नव चेतना का आह्वान कीजिये।
असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मामृतं गमय
अज्ञान का बोध
Sunday, December 1, 2019
सूफ़ियाना अन्दाज़
डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला
आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...
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"बूँद की रग रग में पानी ही पानी है" इस बात को समझना आसान है बनिस्बत इसके कि पानी ही से बूँद बनी है या यहाँ पानी का वर्तमान नाम ही ...
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क्या कानून केवल साक्ष्य ही के नेत्रों से देखता है? ऐसा हो न हो लेकिन लॉ ग्रेज्युएट, खण्डवा निवासी कवि अरुण सातले जी ने अपनी रचना के माध्यम स...
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डॉ जय वैरागी अपने सृजन में अनूठे प्रयोग करते हैं। इनकी रचनाओं में भारतीय जीवन दर्शन की गहरी छाप मिलती है और कविता सकारत्मकता की ओर ले जाती ...