Saturday, June 22, 2019

दूर पास

पास बैठकर भी पास होना इतना आसान तो नहीं। वहीं दूर हो कर भी दूर रहना आसान नही। वो सामने थे, आंख में आंख डाल लेनी थी, हाथ में हाथ ले लेना था, काँधे पर सिर रख देना था। थोड़ी देर को भूलना थे सब सोच विचार। थोड़ी देर को होते उस वर्तमान में। जाग नही पाए और घड़ी चूक गए। क्योंकि जो जाग गया वह वहीं है। जो जाग नही सका वह अपने करीब को बहुत दूर फेंक रहा है। यह जागरण ही भीतरी संसार का केंद्र है। सोये सोये वह हमसे दूर है पर जाग गए तो अलग कहाँ हो सकते हैं। फिर तो कोई दूरियाँ नहीं, दूर हो कर भी दूर नहीं।
बड़ी अजीब बात है; हम हँसते है तो ऊपर ऊपर, रोते हैं तो भी ऊपर ऊपर। मुस्कुराहटें भी झूँठी हो चुकी है। मैं क्या कर रहा हूं, जमाना क्या समझेगा। सभी सम्हले हुए लोग अपने नियंत्रण में हैं, अपने अनुशासन में हैं। इसीलिए बाहर कुछ तो भीतर कुछ। बांहें फैलाकर स्वागत करो, सामने है विसाले सनम। आलिंगन करो। भाव का उन्मेष हो रहा है। किसी भी बाह्य कारण से रोको मत। बाहर के कारण ही भीतर के संसार को परिच्छिन्न कर देंगे। जो पल सामने खड़े हैं वे बीत न जाएँ।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥ ईशोपनिषद् 1.1.5।।
वह आत्म तत्त्व चलता है और नहीं भी चलता है। वह दूर है और पास भी है। वह सभी के अंदर है और वही इस सबके बाहर भी है।
जिसे दूर समझा है उसे पास समझना है, पास अनुभव करना है। वह काल बाधित नही है, स्थान में बन्धित नही है, कहीं आता जाता नही है। पास ही है; बस उसे पास महसूस करना है। बाहर भी है यह जानना है पर भीतर भी है यह महसूस करना है।

Friday, June 21, 2019

प्रेम की भाषा "मौन" है

भाषा एक सेतु है, शब्द उसकी शक्ति है। भाषा इस से बने संवाद के संचार और विचारों के विनिमय का माध्यम है। भाषा बुद्धि और तर्क का हथियार है। भाषा विचारों और प्रश्नोत्तरों की उर्वरा भूमि है। भाषा केवल शब्दों के माध्यम से ही नहीं सकेतों के माध्यम से भी संचार सेतु का निर्माण करने का सामर्थ्य रखती है। संवाद अपरिचित को परिचित बनाता है, परिचितों को निकट लाता है और निकट आये व्यक्तियों को अन्तरंग करने के काम आता है। सभी निकट आये व्यक्ति अन्तरंग नहीं हो पाते लेकिन जो अन्तरंग हो गया उन्हें फिर इन सेतुओं की आवश्यकता नहीं होती। वह बिना जोड़ का जोड़ है। अन्तरंग होना प्रेम का प्रथम सोपान है। प्रेम की भाषा "मौन" है। प्रेम जब गहराता है तब शब्द व्यर्थ हो जाते हैं। वहाँ शब्दों की आवश्यकता नहीं, संवादों की भी कोई आवश्यकता नहीं। वहाँ न कोई संकल्प की जरूरत है न ही किसी विकल्प की। मौन आकाश की तरह विशाल और सागर के अन्तस्थल की तरह शान्त होता है इसलिये प्रेम का साम्राज्य भी विशाल और चिर शान्ति लिये होता है। इसीलिये प्रेमी मौन हो जाते हैं। भाषा खो जाती है। तब मौन स्वयं अपने आप में ही संवाद होगा। उनका यह संवाद अतर्क्य है। बुद्धि दरवाजे के बाहर ही खड़ी रह जाती है। प्रेमी अस्तित्व के एक विशिष्ट आयाम के साथ लयबद्ध हो जाते हैं। वे इसे प्रमाणित नहीं कर सकते क्योंकि प्रेम एक दिव्य अनुभूति है। प्रेम में दो तन के उस पार दो मन एक हो जाते हैं। यह केवल दो शरीरों के एक होने की बात है ही नहीं। गणित में एक और एक दो होते हैं, सामाजिक सरोकार में एक और एक ग्यारह होते हैं लेकिन प्रेम के संबंध में एक और एक केवल एक ही होता है। यह दो आत्माओं का विशुद्ध मिलन है।*

Wednesday, June 19, 2019

सारे कर्म परिणामी हैं

प्रकृति बहुत दृढ़ निश्चयी होती है वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती।
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्।।
5.8 श्रीमद्भगवद्गीता।।
योगी वह है जो देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता ग्रहण करता बोलता त्याग करता सोता श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयों में बरत रही हैं ऐसा समझकर मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा मानता है। इससे यह स्पष्ट है कि ये सभी क्रियाएँ हैं और प्रत्येक क्रिया कर्मफल बनाती ही है। वस्तुतः प्रकृति हमारे हर कर्म को परिणामों में बदल देती है। स्वभावतः हमारे कर्मों के परिणाम का हम बहुत दूर तक अन्दाजा नहीं लगा पाते हैं और जब वे सामने आते हैं तो हमारे हाथ में कुछ नहीं बचता। कर्म का सिद्धान्त केवल क्रिया जनित नहीं है वरन् हमारे  शब्द भी, हमारे विचार भी और जो जो भी हमारे क्रिया कलाप होते हैं परिणामी होते हैं। हमें अपने हर शब्द को बोलने से पहले अवेयर होना बहुत ज़रूरी है अन्यथा उसके दुष्परिणाम स्वयं को भुगतने पड़ते हैं और वे अपने पूरे परिवेश को प्रभावित करते रहते हैं। इसलिए शब्दों का प्रयोग करने से पहले सावधान हो जाओ। शब्दों की शक्तियॉ अनन्त हैं।

Friday, June 14, 2019

मुक्तिपथ

तुम्हें जंजीरें पसंद है, हथकड़ियाँ पसन्द है और बेड़ियाँ भी पसन्द है। इनसे प्रेम करते हो तो तुम्हें मुक्त कोई नहीं कर सकता। शायद जानते ही नहीं हो कि वह कोई और जेलर नहीं है जो यह तुम्हें पहना गया है। यह तुम्हारी अपनी बनाई और पहनी हुई है। ये जंजीरें आदि सब तुम्हारे मन ने तैयार की है और उसी ने पहनाई है इसीलिए ये तुम्हे बहुत पसन्द भी है।
तुम्हारे बचपन में यह कुछ नहीं था। कोरे कागज़ की तरह थे। मन मान्यताएँ लिखता चला गया, संस्कार ओढ़ता चला गया, व्यवहार बोता चला गया, अच्छे बुरे कर्मों की फसल लहलहाती रही। हर साल नई, दर साल वही। पुरानी बनी रही, नई जुड़ती गई। विकल्प कई आये, संकल्प कई, हुए कुछ हारे, कुछ जीते। गर्त मिले, शिखर भी छुए। ठहरा नही मन, भरा नहीं मन। तुम अपने इसी अहंभाव में जीते चले जा रहे हो। बहते रहे हो नदी की धार में बहते तिनके की तरह। न मोड़ों पर रुके न भँवर में चुके। कुछ ख़ुद ने किया और बाकी नैसर्गिक रूप से होता चला गया।
जगत की जमीन
ऊसर नहीं है मित्र!
बोया सो उगा,
फला सो चुगा।
महज एकांगी
जीवन का पथ
लौट नहीं पायेगा
समय का गजरथ।

ऐसे में,
करेगा कौन मुक्त?
कोई और नहीं
केवल अपना मन
हाँ! केवल मन

Thursday, June 13, 2019

आत्मबोध


*आत्मबोध*
उजाले जब अँधेरों से घिरे हों तो यह न समझा जावे कि उन्हे अंधकार निगल गया है। धुएँ से आवृत्त अग्नि अपने मूल स्वभाव "ताप" को छोड़ नहीं सकती। जैसे शब्द अपने अर्थ नही छोड़ सकते, जैसे हवा स्थिर नहीं रख सकती, जैसे आकाश अपनी विशालता नहीं छोड़ सकता। पराभूत सूर्य की किरणें बादलों से बाधित तो हो सकती है परन्तु अपनी अन्तर्निहित प्रकाश की क्षमता को छोड़ नहीं सकती।
सच माने तो सत्य का अनावृत्त होना ही सत्य का स्वीकारत्व है। प्राची के उदयगिरि मंच से उदित भुवन भास्कर की प्रत्येक रश्मि ऊर्जा के पुंज ले कर हमें जगाता है, सत्य का संदेश लेकर आता है फिर किसी संशय की धुन्ध कब तक अतिशेष हो सकती है। सत्य स्वयंप्रकाश है, अप्रमेय है। सत्य अजेय है, अक्षुण्ण है।
इसी तरह सामान्य से बोध के परे आत्मबोध भी केवल "बोध" चाहता है। इस बोध का परिमाप संभव नहीं, आवश्यक भी नहीं वरन् बोध तो जो "है ही" उसके होने का आभास मात्र है। जो परिच्छिन्न है उसे उघाड़ने की जरूरत है। यह विषय किसी अनुसंधान का भी नहीं है। गर्द भरे दर्पण पर से केवल गर्द हटाने का भी नहीं है वरन् दर्पण में दिखाई पड़ रहे बिम्ब के भीतर प्रवेश करने का है। सागर की सतह पर केवल लहरें हैं फिर ये सारी लहरें मिल कर भी सागर नहीं है। सागर में रह कर सागर ढूँढने का प्रयत्न भी सागर का अनुसन्धान करने की बात करने जैसा है। इसी तरह आत्मानुसंधान भी वह खोज नहीं है। वह बस बोध का विषय है।
आत्मबोध के लिये बोधिवृक्ष की छाया अथवा आश्रय लेना जरूरी नहीं है। वस्तुतः तुम जहाँ बोध को प्राप्त हो जाओगे वह स्थल स्वयं "बोधस्थल" के नाम से जाना जाएगा। तो बस निष्कम्प हो जाओ। आत्मबोध को प्राप्त हो जाओ। महसूस करो उसे जो ख़ुद को आज तक अजाना ही रहा। आत्मबोध।

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...