Sunday, March 4, 2018

बूढ़े काँधों पर जवान लाशें

बीत गया मदर्स डे
तीन सौ चौंसठ दिन बाकी है
बीत गया फादर्स डे
तीन सौ चौंसठ दिन बाकी है
अब भी कुछ अल्हड़ सन्ततियाँ
जर्जर काँधों पर दिव्यांग बनी
निर्ममता से लदी बैठी है
यहाँ पूरे के पूरे
तीन सौ पैंसठ दिन बाकी है
सरकार ताकीद करती है
लूले लंगड़ों को "दिव्यांग" कहो

जो देता ही देता है वह वृक्ष है
जो देती ही देती है वह गंगा है, माँ है
जो खाता ही खाता है
वह पशु ही पशु है,
फिर पूँछ का हो
या बिना पूँछ का
अभी तीन सौ चौसठ दिन बाकी है।

विकृतियाँ पल रही है
संस्कृतियाँ गल रही है
यह कैसा देश है, घर है
पहाड़ सिकुड़ कर
सिर्फ राई हो रहा है
आदमी सिकुड़ कर
सिर्फ "मैं" हो रहा है

कुछ अजीब से प्रश्न
जहरीली हवा मैं तैर रहे
"दिया ही क्या है?"
"किया ही क्या है?"
काँपती उँगलियाँ
धुँधियाती आँखें
कुछ सरकती गलती काया
करुणा से उफनते एहसास
निर्ममताओं से घिरा घिरा
जीवन के हवन में
जरा-पूर्ण अस्थि शेष
क्या ये ही वे
तीन सौ पैंसठ दिन बाकी है?

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...