Saturday, February 8, 2020

समीक्षा २०

एक कविता "मेहनत के फल" राजेश तिवारी "रामनगीना" की पुस्तक "कविता के झरनों पर" से।

रेत के मरुस्थल के सोए हुए ढेर में।
जोहना जल स्रोतों को मेहनत से मिलते हैं।।१

तलछटी चट्टानों को तोड़ने दो जोड़ से
मीठे पानी के झरने तो फोड़ कर निकलते हैं।।२

सूख कर कंकाल बने वृक्ष पर थी कोंपलें
फूटते अंकुर मिले बिना बात के भी खिलते हैं ।।३

अँधेरी सड़कों पर खड़ी पहाड़ हुई रातों को
मुसाफिर ने चीर दिए पथ लो दीप से पिघलते हैं।। ४ 

कहीं भी मिलती नहीं बयार ना आसान रास्ते पत्थरों में उगते फूल पगडंडियों पर मिलते है।।५

राजेश तिवारी "रामनगीना"

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मेरी नजर में:

रेत के मरुस्थल के सोए हुए ढेर में।
जोहना जल स्रोतों को मेहनत से मिलते हैं।।१
मरुस्थल का मूल अर्थ है वह स्थान जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। दरअसल इसके अध्ययन वाले शोध पत्रों में इसे जल पात कहा जाता है। जरूरी नहीं कि वहाँ रेत के ढेर हों। परन्तु यह तय है कि वहाँ जल का अभाव है। जल कम है तो वनस्पतियाँ कम है, वनस्पतियाँ कम है तो मानव जीवन संधर्षों से भरा है। इन सोये हुए रेतों के टीलों के बीच कहीं कहीं ही जल के स्रोत हैं। खिसकते हुए रेत के टीलों पर घास व झाड़िया भी नहीं उग पाती। कविता इस माध्यम से संकेत करती है कि मेहनत करके रेगिस्तान में भी जीवन के आधार निर्माण किये जा सकते हैं।
तलछटी चट्टानों को तोड़ने दो जोड़ से
मीठे पानी के झरने तो फोड़ कर निकलते हैं।।२
चट्टानें दरारों पर से आसानी से टूटती हैं। इसमें दो अनुमान हैं एक तो सख्त चट्टानों को ठोस नही कमजोर जगहों पर प्रहार कर तोड़ा जाता है और दूसरा यह कि जल के स्रोत इन चट्टानों के पीछे छिपे पड़े हैं। श्रम का यही उपयुक्त तरीका है मेहनत कम और काम ज्यादा।
कहीं भी मिलती नहीं बयार ना आसान रास्ते पत्थरों में उगते फूल पगडंडियों पर मिलते है।।
इस बन्द में कविता एकदम खुला बोलती है। पत्थरों में खिले फूल देखना हो और शीतल मन्द सुगन्धित पवन चाहिये तो आसान सुगम रास्तों पर, राजपथ पर मत ढूँढना उसके लिये मेहनत करके ऊबड़ खाबड़ और टेढ़े मेढ़े रास्तों से गुजरना पड़ेगा। सीधे सीधे हस्तिनापुर नहीं मिलते पर मेहनत करके खाण्डवप्रस्थ को इन्द्रप्रस्थ बनाया जा सकता है। 
पुस्तक का नाम इसी नेपथ्य से आया लगता है। झरने को झरना बनना है तो उसे अपनी ताकत और मेहनत से चट्टान के बीच से अपने स्वातन्त्र्य और जीवन के लिये रास्ते स्वयं बनाने होंगे अन्यथा वहाँ घुटन और सड़ाँध के अतिरिक्त कुछ और आशाएँ रखना व्यर्थ है। पेड़ों पर लगे फल तो वास्तव में मेहनत के फल हैं। जिन खेतों में मेहनत कर फसल नहीं उगाई जाती वहाँ केवल खरपतवार ही पैदा होते हैं। कविता श्रम के स्वेद कणों से मरूस्थल में जल और जीवन की तलाश करती है। राजपथ के सेंतमेंत में मिलने वाले सुखों को दरकिनार कर कर्मठता से जीवन को समृद्धशाली बनाना चाहती है। वेदों ने दूसरे के द्वारा कमाई सम्पत्ति को हथियाने वाले व्यक्ति को "दस्यु" कहा है। वस्तुतः इनकी कृति का नाम "कविता के झरनों पर"  सार्थक लगता है। फिर इस कविता के इस बहते झरने से कवि भगीरथ बन कर श्रमसाध्य सफलता की स्रोतस्विनी गंगा लाना चाहता है। 

रामनारायण सोनी

Tuesday, February 4, 2020

समीक्षा १४

समीक्षा १४

नव गीत
तुम्हारी अनछुई सम्वेदनाओ के कथानक  में ।
मेरी सम्वेदनाओं के सभी प्रतिमान ठहरे है ।।

छुई जब भावनाए उस तपन में नित्य  झुलसा हूँ
गुँथे जब व्यूह शब्दों के उन्ही में नित्य उलझा हूँ 

मुखर जब शब्द जागे है वे सब नव राह बुनते हैं
अगर जागी पराई वेदना नव थाह गुनते है।

कभी सींचा द्रुमों को आज उपवन छंद लगते है।
कथानक के समर्पण में  मधुमय गन्ध लगते है।।

ध्वनि गर कण्ठ से निकली समाहित रागिनी सारी।
वहीं पृष्ठों पर उतरी है पराजित यह व्यथा भारी।।

नयन की कोर पर आकर कोई अहसास सोता हो।
पराई पीर कर धारण कहीं मन जब यह रोता हो।। 

दीया जब थाल में सज कर उतारें आरती तेरी
बजाए दुंदुभी वेला उषा की शंख भर भेरी 

लगे जब छँट गया अंधियार तन का और इस मन का।
कोई नव मन्त्र पूरित अंगुलियों में देख कर मन का।।
अधूरा जाप पूरा हो निगत आवृत्ति यह फैले।
लगे फिर दृश्य के अवलम्ब नयनो के रचे मेले।।

बुझे निस्पंद प्राणों के जगे झंकार अनहद में। 
जगा ब्रम्हांड का चेतन उतर आया है किस हद में।।
अगर गीली समिध मन की है तो बस धुआँ ही है।
अगर संकीर्णता की धार है प्यासा कुआँ ही है।।

तपन की आँच से कुंदन की पीली भित्तियाँ जागे।
तनिक सी अर्चियों के भास से फिर क्यो कोई भागे।।

न खोदो  इस तरह माटी  सभी दिनमान गहरे है

              डॉ जय वैरागी
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मेरी नजर में.....

*तपन की आँच से कुंदन की पीली भित्तियां जागे।*
*तनिक सी अर्चियों के भास से ही क्यो कोई भागे।*
यह नव गीत नव सृजन का गीत है, संस्कार का गीत है, जीत की आधार का गीत है, अस्तित्व की स्वीकारोक्ति का गीत है, निष्प्राणों में प्राणों के संचार का गीत है और तमस से उजास की ओर ले जाता हुआ गीत है।
यह रचना कविता से अधिक सर्जना है। डर के आगे जीत है। डर की कोई हद है। अंग्रेजी में एक टेक्नीकल शब्द है "थ्रेशोल्ड" जिसका अर्थ है कि तमाम कायदे इस लिमिट तक है इसके बाद ये नियम निष्प्रभावी हो जाएँगे। 
जैसे पर्वत शिखर तक पहुँचने के लिए चढ़ाई है फिर मैदान ही मैदान या उतार होता है। कुन्दन तपने से डरेगा तो निखार नही मिल सकेगा। संपूर्ण जीवन संघर्षों से भरा है। लोग संघर्ष को लड़ाई समझने की भूल कर लेते हैं। वस्तुतः वह अपने अस्तित्व को कायम रखने की जद्दोजहद है। दाना पानी की तलाश से डरने वाला पंछी नीड़ में बैठे बैठे मर जाता है। सुन्दर पंखों का स्वामी मुर्गा जीवन भर मैला खाता रहता है तो दूसरा साइबेरिया से जीवन और आनन्द की साहसी उड़ान भर यहाँ कर सफल हो कर लौट जाता है। जो डर गया समझो मर गया। जो आँच से डर गया वह साँच से डर गया। वस्तुतः तपन भी संस्कार है। संस्कार सज्जा तो है ही वह शोधन का सोपान भी है। सोने का पुराना आभूषण तपा कर गलाया जाता है तब लगता है यह प्रक्रिया विध्वंस है परन्तु वास्तव में यह एक नये स्वरूप, नये आकार, नई सज्जा की तैयारी है। और इसलिये तपन के अलावा कोई और रास्ता नही। यही संस्कार है। सोना सोना ही रहेगा संस्कारित हो कर निखर जावेगा। 
चलो आग की तपन से मत डरो तपन को साधना बना लो। सृजन करो। 
सृजन का तात्पर्य है संयोजन, संयोजन का आशय है चीजों को जोड़ना, जोड़ना एक कालबद्ध क्रिया। माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होत। "इधर पौधे को पानी दिया और उधर फल तैयार" ऐसा कभी नही हो सकता। यही यह कविता की कहती है कि..
"कभी सींचा द्रुमों को आज उपवन छंद लगते है।
सिंचन सृजन की एक अभिक्रिया है आदमी के हाथ में बस यही है। काल स्वयं उसका सृष्टि उपक्रम करता है फिर तो बगीचे में जो घटित होगा वह छन्द की तरह गति, लय और ताल निबद्ध होगा। कथानक तो रंगमंच पर चल रहा घटनाक्रम है उसे सृषिकर्ता को समर्पित कर देना चाहिये क्योंकि वह उसका ही है। जो फल अर्थात् पारिणाम होगा वह मधुर होगा। 
कथानक के समर्पण में  मधुमय गन्ध लगते है।।"

"तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।।गीता।।8/27।।"
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।6.46।।
कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो।।
इसलिए हे पार्थ! तू नित्य योगयुक्त हो जा। समय की गणना और सृजन की कालबद्ध क्रिया मुझ पर छोड़ दे। क्योंकि काल तो मैं स्वयं मैं ही हूँ। कालः कलयतामहम्।10.30।।
गणना करने वालों में काल हूँ।
कविता संवेदनाओं, भावनाओं और कर्मनिष्टा के माध्यम से प्राप्त की जाने वाली एक समग्र अभिक्रिया का संकेत करती है। इन तत्वों का संयोजन योग ही है। यह श्रेष्ठ मार्ग है।
नवगीत तो आज का है पर तत्वतः संस्कृति और संस्कार की प्रचुरता इसमें है।

रामनारायण सोनी
०५/०१/२०२०

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...