Wednesday, February 28, 2018

उतर सको तो इस जीवन में

उतर सको तो इस कागज पर
रंगों की बौछार तुम्हारी छबि को रंग डालूँगा
सँवर सको तो इस दरपन पर
शर्म हया की अरुणिम रोली मल डालूँगा

झाँक सको तो मेरे मन में
पारिजात के नव पुष्पों से सेज सजी है
लाँघ सको तो दाद बहुत दूँगा
मेरे उर के मंदिर की दहलीज अड़ी है

माँग सको तो इन प्राणों को
खुद ही चल कर पास तुम्हारे आ जाएँगे
मोल सको तो मुफ्त मिलूँगा
सब कुछ मेरा, बिना मोल के बिक जाएँगे

तुम्हे देखना चाहो तुम तो
अपने ये नयन तुम्हें मैं खुद दे देता हूँ
क्या हो तुम मेरे जीवन मे
हो अजीज कितने मेरे जान तभी पाओगे

नहीं पढ़ी है अब तक तुमने
कोरी वसीयत पर केवल मेरे हस्ताक्षर है
मेरा मुझ पर नही शेष अब
हक सारे के सारा अब से तेरा मुझ पर है

रामनारायण सोनी

Monday, February 26, 2018

सौंदर्य के भीतर का आनन्द

आज का मौलिक चिन्तन

"सौंदर्य के भीतर का आनन्द"

दस लोग आप के साथ है और आप एक बगीचे में घूमते हो, कैसा लगा?
अब वही बगीचा है अौर फिर आप अकेले उसमें घूमते हो, कैसा लगा?
पहले बगीचा ग्यारहवें स्थान पर था। बाद में वह दूसरे स्थान पर आ गया। बगीचे के फूलों का सौंदर्य, उनकी सुगन्ध और एक नैसर्गिक समग्रता उन दस आदमियों के पीछे छिप गई थी और उनके जाते ही प्रकट हो गई। भीड़ के साथ आप परमात्मा से मिलने चले हो तो भीड़ ही देख पाओगे। हो सकता है आप खुद उन दस आदमियों के लिए दर्शनीय बन जाओ। अकेले चलोगे तो ही उसका सौंदर्य पा सकोगे। यह यात्रा केवल और केवल आपकी अपनी होनी चाहिए।
बगीचे में उसकी समग्रता उपलब्ध है, उसमें सुगन्ध किसी ने छिड़क नहीं दी है, फूलों-पत्तियों को किसी माली ने नहीं बना दिया है, वह पूरा का पूरा नैसर्गिक है। उसका आनन्द लेना है तो बस बगीचा और आप आमने-सामने हो जाओ। इस यात्रा में उस ओर चलोगे तो लगेगा कि वह बगीचा केवल आप के लिए है, आपके आनन्द के लिए है। हर फूल-पत्ती- पौधा अपना सौंदर्य और सुगन्ध लिये आप की प्रतीक्षा में खड़ा है। वह पहले भी था पर आप स्वयं आप के साथ नहीं थे अपितु उन दसियों के साथ चल रहे थे। आँख, नाक, कान सभी उन दस आदमियों से व्यवहार में व्यस्त थी तो खुशबू और सुन्दरता आई और आप से बिना मिले गुजर गई।
परमात्मा ने हम पर अनगिनत कृपा की वृष्टि की पर हम उससे परिचित नहीं हो पाए। और पता चला भी तो वृष्टि हुई यह पता चला कहाँ से आई पता नहीं चला। जैसे बगीचे का समग्र सौंदर्य माली का लगा; यह नहीं लगा कि पत्तों को किसने तराशा है, फूल में खुशबू किसने भरी है। इस सृष्टि का कारण कौन है। इस सौंदर्य के आकर्षण में मत उलझ जाना उसके पीछे उसके उपादान कारण को देखना मत भूलना।
इसको देखे बिना भी यह नहीं जान पाओगे कि यह किसका उपकरण है। कौन है जो बिना दिखाई दिये यह सब कर रहा है। यह देखना है तो हमें दसियों को छोड़ अकेला होना पड़ेगा, एकान्त को उपलब्ध होना पड़ेगा। अन्तर्मुखी होना पड़ेगा। यह बिन्दु वह स्थान है जहाँ हम ही हम से मिल रहे होंगे। बाहर हम किन्हीं और के साथ थे यहाँ हम अपने साथ हैं। धारणा भी यहीं तक साथ चली है। यहाँ तक तो लक्षित हो। इससे आगे अलक्षित हो। यहाँ से आगे चलोगे, चलते चलोगे तो तुम भी अशेष हो जाओगे। न लक्ष्य रहेगा न लक्ष्य का बोध। न बगीचा रहेगा न उसका सौंदर्य। यह अनुभूति शेष रहेगी कि यह समस्त उपक्रम का कारक वही है।
बगीचे का सौंदर्य उस परमात्मा के अप्रतिम सौंदर्य का मात्र बाहरी परिचय है। चलो उस ओर। उसके आधार में परमात्मा का ही तो सौंदर्य है। वहाँ आनन्द ही आनन्द है। आनन्द परमात्मा का दूसरा नाम है।
चलोगे न?

रामनारायण सोनी

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...