Tuesday, June 14, 2022

आत्मप्रबोधिनी १४

आत्मप्रबोधिनी १४

ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचि जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।

क्या तुमने कभी किसी फूल के परागकणों को तितलियों का आह्वान करते देखा है? क्या तुमने मन्दिर के शिखर पर उस ध्वज को हवा के परों पर थिरकते देखा है? क्या तुमने गुनगुन करती मधुपरियों के शिल्प में विश्वकर्मा के सृजन का आभास किया है? क्या तुमने कभी दीवार पर चढ़ती चीटियों के पदचाप में कर्मवीरा की आहट सुनी है? क्या रुई जैसे हलके फुलके उड़ते फिरते बादलों को हजारों मील चल कर लाखों टन पानी ढोते देखा है? और फिर इन्हीं बादलों को सिंहनाद करते हुए पर्वतों, नगरों, वनस्पतियों का अभिषेक करते देखा है? क्या कभी किसी बीज के गर्भ से सफेद झक्क अंकुरण को झाँकते देखा है? क्या तुम जानते हो कि पानी में शीतलता क्यों है और वह सबसे निचला तल ढूँढता क्यों है?  अग्नि जलाती क्यों है? धरती, आकाश, अगन, पवन, पानी जैसे तत्व सख्ती से अनुशासन में रह कर अपने अपने धर्म का पालन क्यों करते हैं? प्रकृति के अधिकतर व्यवहार में हम कैसे होता है यह तो जानते हैं पर यह नहीं जानते कि इन नियमों को बना कर उनको पालन कौन करवाता है?

हाँ ये सारी क्रियाएँ और कर्म केवल संकेत मात्र के लिये गिनवाए गये हैं जबकि प्रकृति का अणु-अणु ऐसा ही कुछ न कुछ हर घड़ी हर पल कर रहा है। न तुमने कभी ध्यान से देखा, न तुम्हारे कान इन्हें सुन पाये, न ही तुम कोई संवेदना ही जागी हम पर इनके द्वारा किये गए अनन्त उपकारों के प्रति। ये सब करते हुए भी कभी थके नहीं, रुके नहीं, झुके नहीं।
देखो! तुम बस दाैड़ रहे हो पर इस दौड़ में वे अनमोल पल छोड़ रहे हो। प्रकृति गा रही है, नाच रही है, तप रही है, खप रही है फिर भी हम सब के लिये विपुल आहार तैयार कर रही है, खेतों में, खलिहानों में, उपवनों में, चौगानों में। कोई तो है जो जानता है तुम्हारी भूख को, तुम्हारी प्यास को और शायद तुम्हारी हर छोटी बड़ी सभी जरूरतों को। 
बस जरूर महसूस करें कि प्रकृति माँ के, परमपिता परमेश्वर के इस उपकार को और हम उनके कृतज्ञ होवें।

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् | हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।9/10।।

  रामनारायण सोनी
  १५.०६.२२

Wednesday, June 8, 2022

प्यार हो जाता है

लोग कहते हैं पहला प्यार ही प्यार है और वही आखिरी प्यार होता है। मैं कहता हूँ जो प्यार वास्तव में पहला होता है वह आखिरी हो ही नहीं सकता क्योंकि आखिरी शब्द प्यार में पूर्णतः वर्जित है। प्यार की दुनिया में एन्ट्री तो है, फिर उसका असीम विस्तार है तो फिर अन्त कैसे हो सकता है?

दुनिया में ऐसा प्यार कभी नहीं देखा है- न कहानियों में और न सच के धरातल पर जो आँसुओं से नम न हुआ हो। कभी उफनते जज़्बातों में, कभी मिलने की खुशी में तो कभी न मिलने के गम में नयनों से बहने लगता है। यह पक्का है कि प्यार भरे दिलों की जुबान लफ्जों और हर्फों से नहीं बनती इसलिये यह सिर्फ सुन कर नहीं पढ़ी जा सकती वरन् महसूस भर की जाती है। प्यार सच्चा अथवा झूठा नहीं होता क्योंकि वह अपरिभाषेय है, न वह अधूरा होता है न पूरा क्योंकि वह निरन्तर होता है। प्यार एक पराभौतिक सत्ता है जो हृदय के अन्तर्प्रदेश में विराजती है इसलिये प्रेम बहिरंग नहीं अन्तरंग चेतना है।
प्रेम एक किस्म की पूर्णता है। जिसने कभी प्रेम नहीं किया वह अपूर्ण है, जीवन भर अपूर्ण रहता है, अधूरा ही रहता है। प्यार में केवल समर्पण है, ऐसा होते ही देही विदेह हो जाता है। अलग-अलग की पहचान खोते ही दो अधूरे एक साथ मिल कर "एक पूर्ण" हो जाता है।
यह मायने नहीं रखता कि जिन्दगी जी जाना ही जीवन है बल्कि उसे पूर्ण करने के लिये जिन्दगी में प्यार का उपलब्ध हो जाना अत्यावश्यक है। "एव्हरी थिंग इज फेयर इन लव एण्ड वार" किसी वहशी सिरफिरे का कथन है। प्यार में मिटाना नहीं, मिटना जरूरी है। जिसने प्यार नहीं किया वह जल में प्यासी रहने वाली मछली की तरह है। जो प्यार के अवगुण्ठन से बाहर निकल आया समझो प्यार नहीं कुछ और ही था।
प्यार जीवमात्र का नैसर्गिक गुण भी है और अभिन्न अंग भी है शायद इसीलिये प्यार किया नही जाता, हो जाता है।। स्वतः।।

रामनारायण सोनी
६.६.२२



Friday, June 3, 2022

सचिव की कलम से

सचिव की कलम से

इन्डियन सोसाइटी ऑफ ऑथर्स, इन्दौर चेप्टर, इन्दौर का प्रमुख उद्देष्य उदीयमान लेखकों, विचारों, चिन्तकों, रचनाकारों का द्रुत गति से विकास हो इसके लिये उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराना, उन्हें एक मंच प्रदान करना और उनका उत्साह वर्धन करना है। इस बहुउद्देश्यीय कार्य में वरिष्ट साहित्य शिल्पियों, समाजजनों, कलाकारों का समेंकित दिशानिर्देशन और आशीर्वाद प्राप्त हो इसके लिये संस्था सदैव उन्हें निवेदित और आमन्त्रित करती रहती है कि वे नवोदित सदस्यों को अपने अनुभवों और पारस्परिक संवाद के माध्यम से प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन प्रदान करते रहें। हम चाहते हैं कि इस तरह सकारात्म साहित्य का सृजन होता रहे। इसी तारतम्य में संस्था का यह प्रयास है कि साहित्य के समग्र विकास हेतु उसकी वभिन्न विधाओं के रचनाकारों का समूह एकीकृत हो कर कार्य करे और वे समाज में व्याप्त विसंगतियों, कुरीतयों को उजागर करें, समाज को स्वस्थ तथा समरसता प्रदान करने वाले साहित्य का सृजन करें। हमारी संस्कृति की सनातन परम्परा में वनाञ्चलों में 'गोष्ठ' वह स्थान था जहाँ सामूहिक चिन्तन और वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों पर परिचर्चा की जाती थी इसी कारण इन बैठकों को गोष्ठी कहा जाता है। इस प्रयोजन की प्रतिपूर्ति हेतु संस्था निरन्तर प्रतिमाह सभा/गोष्ठी आयोजित करने का प्रयास करती है, ताकि सदस्यगण आपसी संवाद, उद्बोधन, काव्यपाठ, रचनापाठ आदि के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त कर इनका आदान प्रदान कर सके। संस्था का पवित्र उद्देश्य यह भी है कि सभी सदस्य राष्ट्रीय महत्व और सामाजिक सरोकारों में सकारात्मक साहित्य सृजन के प्रति जागरूक हों और इस तरह वे राष्ट्र निर्माण तथा राष्ट्र के विकास में सक्रिय रूप से भागीदारी निभाएँ। प्रतिमाह बैठक शहर के हृदयस्थल कुन्द कुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर में की जाती है ताकि शहर के किसी भी क्षेत्र से आ कर आसानी से भाग ले सकें इसके लिये हम कुन्द कुन्द ज्ञानपीठ के कृतज्ञ हैं।
युगान्तर के साथ साथ रचनाकर्म का स्वरूप भी प्रायः बदलता रहता है इसलिये उनके द्वारा रचित साहित्य के स्वरूप में परिवर्तन होना संभाव्य है। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की पंक्तियाँ "नवगति नवलय ताल छ्न्द नव, नवल शक्ति नव जलद मन्द रव" इसी युगान्तर में वांछित क्रान्ति की ओर संकेत करता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमारी गोष्ठी में आलेख, लघुकथा, कहानियाँ, गीत, नवगीत, गज़ल आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं का स्वागत किया जाता है। संस्था क्षेत्रीय भाषा मालवी, निमाड़ी, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा में अपनी रचना धर्मिता के विकास का आह्वान करती है। 'इन्सा' नवोदित/स्थापित साहित्यकारों की पुस्तकों के लोकार्पण, प्रचार-प्रसार, समीक्षा आदि प्रक्रिया हेतु प्रयास करती है और उन्हें ससम्मान गरिमामय मञ्च प्रदान करती है और उन्हें प्रोत्साहित करती है। इसके अन्तर्गत इस वर्ष दो पुस्तकों का लोकार्पण भी किया जा चुका है। इसी क्रम में इन उद्देष्यों की प्रतिपूर्ति के हेतु से हम यह साझा संकलन प्रकाशित करने जा रहे हैं। इसमें भाग लेने वाले सदस्यों का हम हार्दिक धन्यवाद करते हैं। सम्पादक मण्डल के मानद सदस्य श्री रवीन्द्र नारायण पहलवान, डॉ अंजुल कंसल एवं श्री राशिद अहमद शेख ने इस साझा संकलन को सुव्यवस्थित ढंग से सजाने संवारने का भरपूर प्रयास किया है।
साहित्य सृजन एक पारमार्थिक कर्म है आइये हम सब मिल कर इस माध्यम से राष्ट्र निर्माण में अपना भरसक सहयोग प्रदान करें।
        
रामनारायण सोनी
सचिव

डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला

आलोचक का नाम - रामनारायण सोनी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य (Literary Perspective) सांस्कृतिक परिधियाँ (Cultural Peripheries) केंद्र बनाम परिधि (Ce...