*"जीवन की अमिट रेख"*
वर्षों पुरानी घटना को आप इस तरह देख लेते जैसे कल ही की बात है। हम जो रोज सुबह से शाम तक काम करते हैं उनमें से थोड़ा सा ही याद रह पाता है जबकि जीवन का प्रत्येक क्षण घटनाओं से भरा होता है। उनमें से भी कुछेक क्षण ऐसे उपस्थित हो जाते है जो आजीवन कभी भी विस्मृत नहीं हो सकते क्योंकि वे मर्म स्पर्शी होते हैं। चाहे वे अपेक्षित हों या अनपेक्षित। इतना तो तय है कि वे अतिरेक ही होते हैं, असाधारण होते हैं। ध्यान से देखें तो वे आपके व्यक्तित्व के ऐसे हिस्से हो जाते हैं जैसे शरीर के हाथ पाँव और सच मानें कि पीड़ा, अन्याय के पल पाँव में बैठी वे कीलें हैं जो जरा से असमान धरातल पर पड़ते ही टीस बन जाती है। मेरी मानें तो ये वे संस्मरण हैं जो यह सिद्ध करते है कि किस भीषण सुनामी में आप जीवित बाहर निकल आए हैं। यह आपकी जिजीविषा है। एक बात तो तय है कि वे आपकी जीवन में उपलब्ध विजय यात्रा के दुःखद सही पर वे पल सख्त नींव के पत्थर हैं। आपका आज के व्यक्तित्व का यह भव्य महल खड़ा है; वे पत्थर उसके भार तले दबे हुए हैं। आप नहीं जानते कि इसके कारण आप "उपमान" बन चुके हैं। प्रकृति के अजीब विधान है कि चमक लाने के लिए सोना ही तपता है लोहा नहीं। और तपता केवल सच ही है। वह मुहावरा झूँठा हैं कि सांच को आँच नहीं।
आपदा के समय कुछ शब्द नेपथ्य से तैर कर आते हैं और जीवन को पुनः खड़ा कर देते हैं। वे संजीवनी की तरह काम करते हैं। इस नेपथ्य में वे देव दूत गुरू ही होते हैं। कैसा आश्चर्य है कि जिन्होंने इस जगत के सुख सुविधा को एक तिनके जैसा त्याग दिया और फिर इसी जगत की पीड़ा के लिए परम औषधि बन जाते हैं, मरहम बन जाते हैं। क्या स्वार्थ है उनका जो हमारी पीड़ा की सलीब उन्हें चुभती है। ये वे पवित्र आत्माएँ हैं जो जीवन बाँटती रहती हैं। हमारे बिछौने आराम दायक हों उसके लिए वे तप करती हैं, शुष्क धरातल पर जीती हैं और आपके लिए संबल बन जाती हैं। हम इन्हें मुनि कहें, सागर कहें या गुरू कहें वे हमारे पूज्य हैं। वे सक्षम हैं, अमृतमय शब्द दान के। ऐसे समय हमें सम्बल देते हैं जब हम नैराश्य से घिरे होते हैं। उनका आशीष पाना हमारा परम सौभाग्य।
रामनारायण सोनी
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