वनान्चल मेरी पाठशाला है, वर्कशाप है।
मैं हमेशा की तरह इसे स्वीकार करता हूँ।
सबका स्नेह प्राप्त होता है इसके लिये - आभार
अपना निवेदन लिखने के पूर्व मैंने आलोचना से संबंधित नोट्स तैयार किए थे उनको दृष्टिगत रखते हुए एक प्रयास भर किया है।
मेरा प्रयास एक अभ्यास ही है।
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आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी-
*प्रगीत और प्रबंध की तुलना करते हुए ‘प्रगीत’ को ऐसा शिल्प माना, जिसमें कवि की भावना की पूर्ण अभिव्यक्ति संभव है ।
*काव्य में मूलत: सौन्दर्यानुसन्धान को जीवन-चेतना से जोड़ा।
*शुद्ध कविता की खोज करना चाहा, तथा आलोचना में सिद्धांत विहीनता का पक्ष लिया ।
आलोचना में सात प्रतिमानों को वरीयता क्रम दिया, जिसमें *"कवि की अंर्तवृत्ति"* को सर्वोपरि माना, तथा अंत में कवि के सामाजिक संदेश को रखा।
द्विवेदी युग में सैद्धांतिक और परिचयात्मक आलोचना के साथ-साथ *"तुलनात्मक, मूल्यांकनपरक, अन्वेषण और व्याख्यात्मक" आलोचना की भी शुरुआत हुई।*
*शुक्ल युग*
‘कवि की अंतर्वृति का सूक्ष्म व्यवच्छेद’, ह्रदय की मुक्तावस्था, ‘आनंद की साधनावस्था’, ‘आनंद की सिद्धावस्था’, ‘लोक-सामान्य’, ‘साधारणीकरण’, *‘लोकमंगल’* आदि प्रतिमानों की स्थापना साहित्यिक समीक्षाओं के आधार पर करते है |
परमानन्द श्रीवास्तव मुख्यतः नई कविता के आलोचक है और वे कविता में *सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों और संरचना के स्तर पर आए बदलाव को सजगता से परखते हैं |*
आचार्य राम चन्द्र शुक्ल के शब्दों में आलोचक में ‘कवि की अंतर्वृतियों के सुक्ष्म व्यवच्छेद की क्षमता होनी चाहिए | चुकि किसी भी रचना की तरह आलोचना भी पुनर्रचना होती है | अतः *जिस भाव-भंगिमा, मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की है,* उसमें उतनी ही संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ प्रवेश कर जाने वाला पाठक ही होता है।
*मिथकीय आलोचना-* मिथकों के आधार पर साहित्य का मूल्यांकन किया जाता है। इस आलोचना में मनोविज्ञान का प्रभाव लक्षित होता है। इसके अंतर्गत साहित्य का मूल मानव वृतियों के साथ सहजात संबंध स्थापित करके उसे एक व्यापक पीठिका पर प्रतिष्ठित किया जाता है |
*तुलनात्मक आलोचना-* जब किसी रचनाकार या रचना की तुलना किसी अन्य रचनाकार या रचना या किसी दूसरी भाषा के साहित्य से की जाए तो तुलनात्मक आलोचना होती है।
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इसलिये मैथिलीशरण गुप्त के काव्यमयी आधार को उपमेय की तरह उपयोग किया गया है।
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विनीत
रामनारायण सोनी
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मेरी दृष्टि में
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यहाँ उपस्थित संदर्भ को एक अलग थलग रचना मान कर चर्चा करना संपूर्ण न्याय नहीं होगा। इस संदर्भ का राष्ट्र कवि मैथिलिशरण। गुप्त के काव्य को एक बारगी देखना उचित होगा।
राष्ट्रकवि की द्रौपदी, उर्मिला, कैकेयी, यशोधरा, विष्णुप्रिया, सत्यभामा आदि स्त्रियाँ परंपरा से आगत हैं परंतु नई दृष्टि से पुनर्सृजित नारी चरित्र हैं। कवि ने आँख मूँदकर उक्त नारी पात्रों की पुनरावृत्ति नहीं की है। कवि के रचनाकाल में भारतीय नारी की शोचनीय दशा थी। उसकी असहनीय दुरवस्था से कवि प्राण व्यथित हो उठता है। सवाल यह उठता है कि नारी की ऐसी दशा का उत्तरदायित्व किस पर है? कवि ने इस पर विचार करते हुए कहा है :
"ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे,
अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे।" (भारत-भारती)
'भारत-भारती' में इस बात का भी जिक्र है कि पुरुषों ने नारियों की उपेक्षा ही नहीं की बल्कि नारियों को अशिक्षित, अपाहिज एवं पंगु बनाने में भी बड़ी भूमिका अदा की - 'हा! क्या करें वे, जबकि उनको मूर्ख रखते हैं हमीं।' नारी के प्रति समाज की दृष्टि में गुप्तजी की रचना के साथ परिवर्तन दिखाई पड़ता है। अन्यथा एतद्पूर्व नारी केवल कामिनी की मांसलता अौर रूप में चित्रित थी। वह पुरुष की काम-पिपासा को तृप्त करने वाली साधन मात्र थी।
गुप्तजी अपने विचारों से हटे नहीं। नए विचारों एवं परिवर्तनों से वे सदा असंपृक्त रहे। परंतु ऐसा न समझा जाए कि गुप्तजी इन साहित्यिक एवं सामाजिक परिवर्तनों से अनभिज्ञ थे। वे अपने चुने हुए मार्ग पर अचल रहे। यदा-कदा समकालीन विचारधारा से संबंधित रचनाएँ मिल जाती हैं।
यदि इस प्रवर्तन को एक उपमेय समझा जाए तो 'डॉ जय वैरागी' का अदम्य साहस है कि एक ऐसा लोक नायक जो जन जन का पूज्य, श्रद्धेय अौर आदर्श हो उनके सम्बद्ध काव्य में दर्शित पात्रों अौर चरित्रों को उन्होंने अपनी कथावस्तु में आश्रय दिया है। लेकिन संवेदी कवि का पारंपरिक साहित्य के साथ वर्तमान परिदृष्य का समन्वय स्थापित किया जाना उतना ही सहज है जितना बर्फबारी में आदमी का टिठुरना। लेकिन उसे अभिव्यक्त कर पाना शौर्य पूर्ण है।
( यह कैसा राजधर्म है राम !
जो अपराध बिना ही त्याग देता है कुल स्त्री को
एक पति के रूप में)
एक अंगार की तरह जलता प्रश्न जो आज के सामाजिक परिवेश में दग्ध नारी का दर्द उजागर करता है।
लेकिन कहीं कहीं शब्द और संबोधन भद्रता को लांघते नजर आ रहे हैं। जिस राम को सभी महाकाव्यों ने "मर्यादा पुरुषोत्तम" के रूप में स्थापित कर अपने सृजन के केन्द्र में रखा है यह मिथक यहाँ टूटता सा लगता है। हम यह भूल नहीं सकते कि राम राष्ट्रनायक और लोकनायक के समन्वयक के रूप में संस्थित रहे हैं।
लेकिन
"उन अपरिचित राहों पर उस क्षण
चौदह वर्ष के लिए
आप के साथ खड़ी थी वैदेही !"
नारी के समर्पण का चर्मोत्कर्ष है
वहीं-
"यह कैसा राजधर्म है राम !
जो अपराध बिना ही
त्याग देता है कुल स्त्री को"
एक ऐसा प्रश्न खड़ा करता है कि जो सामाजिक मूल्यों का हो कर मानवीय मूल्यों पर भारी है। आज वर्तमान समाज में इन मानवीय मूल्यों की धाज्जियाँ उड़ रही है। अतः कवि के हृदय में इनका प्रतिबिम्बित होना प्रशंसनीय है।
साधुवाद!
रामनारायण सोनी
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