।। विक्षिप्त अथवा मुक्त ।।
उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः । सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ 3-42 ॥
लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ।। 3-44 ।।
यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः । अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ 3-46 ॥
काम्य विषय और भोगों में विक्षिप्त हुए चित्त का उपाय पूर्वक निग्रह करे तथा (सुषुप्ति में) लयावस्था में अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुए चित्त का संयम करे, क्योंकि जैसा अनर्थ कारक काम है वैसा ही लय है।
चित्त अथवा मन की विक्षिप्तता का प्रथम कारण है- काम्य विषय तथा भोग और दूसरा कारण है- सुषुप्ति अवस्था में लय होना। इन दोनो के बीच में प्रसन्नता रूपी शिखर है। शिखर की दोनों ओर जबर्जस्त खाइयाँ जो विक्षिप्तता के स्थल हैं। काम्य विषय जगत की ओर आमुख है और लय अन्तर्जतग की ओर, परम चेतना की ओर। शिखर पर चढ़ना सरल नहीं है केवल ईमानदार साधना ही जाग्रत और स्वप्न के परे ले जा सकती है। यहाँ पहुँच कर चित्त और मन शक्तिसम्पन्न हो जाते है तथा जरा सी असावधानी वे त्वरा से नीचे फिसल सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो एक मदमत्त हाथी दूसरों के साथ स्वयं भी संकट में पड़ जाता है। साधक इस शिखर पर मन और चित्त के पैरों पर चल कर आता है इसलिए इन पर अंकुश बुद्धि, जो इनके ठीक बीच में बैठी है, ही सक्षम है कि इन्हें शिखर पर रोक ले।
स्पष्ट है कि गर्त में गिरना चित्त की कमजोरी जरूर है लेकिन यहाँ महत्ता बुद्धि की है जो उन्हें संयमित रख सकती है। जिस प्रयास से मन, चित्त यहाँ तक पहुँचा है यह उसी की उपलब्धि है पर हम मन को ही दोष देते रहते हैं। इस शिखर पर चित्त इसलिए भी प्रसन्न होता है कि वह जाग्रत और स्वप्न की सुख-दुःखानुभूति से परे निकल गया है और प्रज्ञावान हो चुका है। दूसरे वह तुरीय के सबसे निकट है। इस स्थिति में यदि वह उस परम चेतना को आमुख होने की प्रगाढ़ अनुभूति में स्थित हो जावे तो विक्षिप्तता कैसे निकट आ सकती है। बुद्धि इसे संयम देकर विलग हो जावे अन्यथा दुष्परिणाम अवश्यंभावी है। उसका अतिरेक मन और चित्त को वापस जगत में ढकेल कर बवंडर खड़ा कर देगी। यह ठीक उस तरह का होगा जैसे युद्ध में हारा सैनिक जगत में भी ठीक से नहीं रहता है और पागल होकर बार बार युद्ध भूमि की ओर देखता रहता है। विक्षिप्तता यही है।
माण्डूक्य उपनिषद् कहता है कि यही वह शिखर है जहाँ से सीधे परम चेतना में कूदा जा सकता है। यह विलक्षण प्रतिभा केवल मेंढक में है। छ्लाँग सधी हुई हो कि लय को लाँघ सके। मेंढक चलना कम पसंद करता है पर हर छलाँग के पूर्व स्वयं को तैयार करता है और परिगणित मात्रा में ही छ्लाँग लगाता है। माण्डूक्य उपनिषद् के महीन सूत्र मोक्ष के द्वार तक ले जाने वाले हैं न कि विक्षिप्तता की ओर। अधीरता नहीं धृति का संबल पकड़ो।
परमात्मा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
यही मोक्ष है। तुम मुमुक्षु हो या मात्र साधक, उस परम सत्ता के पाद हो या कि भटकते यात्री। नहीं, तुम मुमुक्षु हो।
।।ॐ तत्सत।।
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