🎼संगीत का आध्यात्मिक स्वरूप✊
संदर्भ: बाँसुरी
१. बाँसुरी एक उपकरण है, शरीर की तरह
२. छह स्वरों के छह छिद्र है, सातवाँ स्वर तो सब छिद्रों का बन्द होना ही है। छहों स्वर क्रिया पूर्ण हैं पर सातवाँ स्वर अक्रिया है। सारी उँगलियाँ बन्द और ठहरी हैं। अक्रिय होना निर्विचारिता का प्रतीक है। योगी इस दशा को ध्यान की मुद्रा कहते हैं।
३. एक छिद्र वह रंध्र है जहाँ से फूँक रूपी प्राण प्रवेश करता है। यह नहीं तो बंसी मात्र बाँस ही है। इसे ब्रह्म रंध्र कहा जाना चाहिए। जीव का प्राण इसी ब्रह्मरंध्र से ही प्रविष्ट होता हैं और सदाशिव यहीं प्राणिक ऊर्जा के साथ प्रस्थित हैं। योगी इसे सहस्रार चक्र कहते हैं। प्राण नहीं तो जीव पार्थिव उपकरण ही है।
४. बिना फूँक के बाँसुरी नहीं बजेगी। फूँकने वाला आत्मा इसी तरह प्राण फूँकने वाला परमात्मा है। हमें फूँक नहीं दिखाई देती उसी तरह प्राण फूँकने वाला भी नहीं दिखता।
५. सात स्वर शरीर के सप्त धातु, सप्त चक्र, सप्त ऊर्ध्व लोक है, सप्त द्वीप, सप्त सागर, सप्त पुरियाँ हैं।
इसमें संगीत कैसे उपजा
आवश्यक हैं:- बाँस, उससे बाँसुरी बनना, फूँकने वाला, फूँक, उँगलियों की क्रिया।
अगर लय नहीं है तो शोर है, शोर से कई उत्पात है। लय है तो संगीत है। लय है तो बाँसुरी का जीवन सार्थक है। लय है तो जीवन में आनन्द है। लय है तो आत्मा का परमात्मा में विलय है। संगीत एक लय है। लय प्रलय से आपको अलग रखेगा। संगीत सृजन है। सृजन केवल लय से ही है। लय नहीं तो व्यर्थ का ऊर्जा विसर्जन है। लय में आरोह है अवरोह है। स्वरों की जमावट ही तो कृति है, सृजन है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- सृजन निर्माण नहीं वह केवल जमावट है। यही जमावट लय है। स्वर बनाए नहीं जाते जमाए जाते हैं अतः संगीत निर्माण नहीं लयात्मक स्वरों का समूह है। संगीतकार विश्वकर्मा नहीं लयकर्ता है। मैं तो कहता हूँ कि संगीत का सृजन ईश्वर का अनुसंधान है और लयात्मकता उसकी साधना है। साधक अपनी उँगलियाँ चलाने वाला वह संगीत कार हो जो अपने हृदय को लयात्मक बना कर स्वरों से एकाकार कर दे। परमात्मा की प्राण रूपी फूँक वहाँ पहले ही मौजूद है। स्वयं को खोना तो श्रेष्ठ योग है।
"जीवन स्वयं उस सृष्टिकर्ता का लयात्मक संगीत है।"
निवेदक
रामनारायण सोनी
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