Monday, June 25, 2018

साक्षी भाव

🔴👂🔴
सुनो! सुनो! सुनो!

चौबीस घंटे में थोडा समय निकालो ! शुरू-शुरू में उदासी लगेगी, लगने देना। शुरू-शुरू में परेशानी लगेगी, लगने देना. लेकिन एक घड़ी चुपचाप बैठ जाओ, कुछ न करो, न कुछ गुनो, न माला फेरो, न मंत्र जपो, न प्रार्थना करो, कुछ भी न करो. चुपचाप.
     हां, फिर भी विचार चलेंगे, चलने दो. देखते रहो, निरपेक्ष भाव से, जैसे कोई राह चलते लोगो को देखता है।

निष्प्रयोजन देखते रहना, तटस्थ देखते रहना है– बिना किसी के लगाव के, बिना निर्णय के, न अच्छा न बुरा. चुपचाप देखते रहना.......
गुजरने देना विचारों को। आएं तो आएं, न आएं तो न आएं। न उत्सुकता लेना आने में, न उत्सुकता लेना जाने में।

धीरे- धीरे एक दिन वह घडी आएगी कि विचार विदा हो गए होंगे, सन्नाटा रह जाएगा। सन्नाटा जब पहली दफा आता है तो  रोआं- रोआं कंप जाता है......... क्योंकि अब तुम प्रवेश करने लगे फिर उस एकाकी अवस्था में।

एक झटका लगेगा, सबंध टूटने लगा संसार से, भीड- भाड से। तुम सबंधो के पार उडने लगोगे। घबडाना मत। एक बार पंख खुल गए तो पहुंचोगे उन्मुक्त आकाश में।
एक बार उड चले, तो अपूर्व अनुभव है, अपूर्व आनंद है।

फिर एकांत कभी दुख नही देगा। जिसको भीतर सधने की कला आ गई, वह बीच बाजार में खडे होकर भी ध्यान में हो सकता है। दुकान पर बैठे- बैठे काम करते करते और भीतर धुन बजती रहेगी। अनहद नाद निसि-बासर सुन सकोगे। भेरियाँ बजने लगेगी। यही तो आनंदोत्सव है।
नींद में भी इसकी धुन बजती रहेगी।

देखो तो!     सुनो तो!     करो तो!

😌

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