"परम चेतना"
एक आदमी हरि प्रसाद चौरसिया के घर इस नीयत से चोरी करने घुस गया कि इनकी बॉंसुरी से मधुर संगीत झरता है। वहॉ से उसने चार-पाँच बँसुरियाँ चुरा ली और एक संगीत संध्या में बजाने पहुँच गया। उस बिचारे को पता नहीं था कि वाँसुरी में स्वर उस बाँस से नहीं अपितु वादक के हृदय से प्रारंभ हो कर बॉंसुरी के छिद्रों से बाहर निकलते हैं। वस्तुतः बाँसुरी उन स्वरों की अभिव्यक्ति का साधन है जो हृदय की भूमि पर लहलहा रहे हैं। वेद कहता है --
"ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्टितम्...।"
हे दयामय ! मुझे वरदान दो कि वाणी मेरे मन में प्रक्तिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो जाए। साधक को पहले वाणी को हृदय में प्रतिष्ठित करना होगा, फिर मन और वाणी का तादात्म्य पाना होगा और तब लय प्राप्त होगी। लय तो योग है ही। जो हृदय मे बैठ जाएगी वही बाहर आवेगी। वाणी तो स्पन्दन है, स्पन्दन ही सुर है, सुर ही हवा पर सवार होते है। यह जगत वाणी के विस्तार का स्थान है।
एक बात और इसके भी ऊपर है वह यह कि इसके मूल कारण में परम चैतन्य है। बिना चेतना का हरिप्रसाद चौरसिया कोई बाँसुरी नहीं बजा सकेगा।
मेरे जीवन की बॉसुरी भी आत्मा की चेतना ही से बज रही है। जितनी भी बाँसुरियाँ है सब की सब उसी चेतना ही से तो बज रही है। बाँसुरी का प्राण रंध्र चेतना की फूँक पाता है फिर वह सात निर्गम द्वारो से जगत में प्रवेश करती है। जो स्वर जगत सुनता है उसका मूल कारण तो चेतना की फूँक ही है। हमें लगता है इसे चौरसिया जी ही बजा रहे है। असल में तो ...."निमित्त मात्रं शरीराणि।"
निवेदक
रामनारायण सोनी
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