Monday, June 25, 2018

वह! ऊर्जा का परम श्रोत

वह!   ऊर्जा का परम श्रोत

बर्फ पिघल कर पानी बन जाये तो भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। जल स्वतंत्र रूप से चले तो नीचे की ओर बहता है। शीतलता उसका स्वभाव है, शीतलता उसमें अन्तर्निहित है। सबसे निचला तल पकड़ना उसकी नियति है।

आग जला सकती है यह उसका स्वभाव है, स्वतंत्र रूप से चले तो ऊपर की ओर उठती है। उसमे ताप अन्तर्निहित है। उसकी गति पृथ्वी की गुरुत्व शक्ति को निर्मूल कर देती है।

जल भले ही नीचे बहने का स्वभाव रखता हो अगर आग का संसर्ग पाता है तो भाप बन कर आग की तरह ऊर्ध्वगामी हो जाता है, अर्थात् आग की दिशा में चल पड़ता है जबकि वे दोनों अकेले रहते हैं तब अपने अपने मूल स्वभाव में बरतते रहते हैं। पानी में यह अंतर केवल ऊष्मा (तेज) के कारण है। पानी में से ऊर्जा अर्थात् ऊष्मा निकल जाए तो बर्फ बन जाता है और ऊष्मा जोड़ दी जाए तो भाप बन जाती है। पानी वही है अन्तर केवल ऊर्जा के घटने-बढ़ने से ही है। स्थितियों की जिम्मेदार ऊष्मा है, ऊर्जा है।
ऊर्जा न हो तो कार्य नहीं हो सकता। ऊर्जा अन्तर्निहित हो अथवा किसी स्रोत से मिले पर ऊर्जा का होना कर्म की सर्व प्रथम आवश्यकता है।

गीता कहती है :- कोई मनुष्य कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म ऊर्जा के बिना नहीं हो सकता, ऊर्जा किसी स्रोत से मिलती है। ऊर्जा के सभी स्रोत परम शक्तिमते परमात्मा से ही शक्ति पाते हैं। जिसकी जितनी क्षमता हो उतना लेले।

निवेदक
रामनारायण सोनी

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