Friday, May 17, 2019

झील में उतरा चाँद मेरा

मरुथल की तपती लू में
जैसे प्यासे को कुआ मिले
इक रोज अचानक मेरे गगन
दो चाँद हिंडोले आन मिले

वह चौदहवीं का चाँद आज किसी शायर का नहीं मेरा था। वह उपवन की ख़ुशबू नहीं महकती चॉदनी थी। मेरी आँखों की चमक मेरी नही उसकी खनकती हँसी थी। चाँद पर बिंदी बिंदी नहीं डिठौना था। कुन्तल मेघ हुए। इन मेघों की वल्लरियों में मुस्काता हुआ वह चाँद। पुतलियाँ क्या बस झीलों में तैरती कश्तियाँ होंगी। झीलें उस चाँद पर उतरी थी था फिर झील में झिलमिलाता चाँद। जो भी था अप्रतिम था। जब तक होश लौटे हाथों में उभरे उस चहकते चाँद का वह अक्स कुछ कह गया, कुछ संदेश, कुछ संकेत। स्नेह की बरसात में भीगा भीगा सा मन। अपनी पलकें भींच कर मैं बैठ गया प्रमुदित हो कर, कहीं निकल न जाए वह मंजर नैनों से, उर से, जहन से। अब थाती है मेरी उस चाँद का मुस्कुराना।

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