मरुथल की तपती लू में
जैसे प्यासे को कुआ मिले
इक रोज अचानक मेरे गगन
दो चाँद हिंडोले आन मिले
वह चौदहवीं का चाँद आज किसी शायर का नहीं मेरा था। वह उपवन की ख़ुशबू नहीं महकती चॉदनी थी। मेरी आँखों की चमक मेरी नही उसकी खनकती हँसी थी। चाँद पर बिंदी बिंदी नहीं डिठौना था। कुन्तल मेघ हुए। इन मेघों की वल्लरियों में मुस्काता हुआ वह चाँद। पुतलियाँ क्या बस झीलों में तैरती कश्तियाँ होंगी। झीलें उस चाँद पर उतरी थी था फिर झील में झिलमिलाता चाँद। जो भी था अप्रतिम था। जब तक होश लौटे हाथों में उभरे उस चहकते चाँद का वह अक्स कुछ कह गया, कुछ संदेश, कुछ संकेत। स्नेह की बरसात में भीगा भीगा सा मन। अपनी पलकें भींच कर मैं बैठ गया प्रमुदित हो कर, कहीं निकल न जाए वह मंजर नैनों से, उर से, जहन से। अब थाती है मेरी उस चाँद का मुस्कुराना।
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