*आत्मबोध*
उजाले जब अँधेरों से घिरे हों तो यह न समझा जावे कि उन्हे अंधकार निगल गया है। धुएँ से आवृत्त अग्नि अपने मूल स्वभाव "ताप" को छोड़ नहीं सकती। जैसे शब्द अपने अर्थ नही छोड़ सकते, जैसे हवा स्थिर नहीं रख सकती, जैसे आकाश अपनी विशालता नहीं छोड़ सकता। पराभूत सूर्य की किरणें बादलों से बाधित तो हो सकती है परन्तु अपनी अन्तर्निहित प्रकाश की क्षमता को छोड़ नहीं सकती।
सच माने तो सत्य का अनावृत्त होना ही सत्य का स्वीकारत्व है। प्राची के उदयगिरि मंच से उदित भुवन भास्कर की प्रत्येक रश्मि ऊर्जा के पुंज ले कर हमें जगाता है, सत्य का संदेश लेकर आता है फिर किसी संशय की धुन्ध कब तक अतिशेष हो सकती है। सत्य स्वयंप्रकाश है, अप्रमेय है। सत्य अजेय है, अक्षुण्ण है।
इसी तरह सामान्य से बोध के परे आत्मबोध भी केवल "बोध" चाहता है। इस बोध का परिमाप संभव नहीं, आवश्यक भी नहीं वरन् बोध तो जो "है ही" उसके होने का आभास मात्र है। जो परिच्छिन्न है उसे उघाड़ने की जरूरत है। यह विषय किसी अनुसंधान का भी नहीं है। गर्द भरे दर्पण पर से केवल गर्द हटाने का भी नहीं है वरन् दर्पण में दिखाई पड़ रहे बिम्ब के भीतर प्रवेश करने का है। सागर की सतह पर केवल लहरें हैं फिर ये सारी लहरें मिल कर भी सागर नहीं है। सागर में रह कर सागर ढूँढने का प्रयत्न भी सागर का अनुसन्धान करने की बात करने जैसा है। इसी तरह आत्मानुसंधान भी वह खोज नहीं है। वह बस बोध का विषय है।
आत्मबोध के लिये बोधिवृक्ष की छाया अथवा आश्रय लेना जरूरी नहीं है। वस्तुतः तुम जहाँ बोध को प्राप्त हो जाओगे वह स्थल स्वयं "बोधस्थल" के नाम से जाना जाएगा। तो बस निष्कम्प हो जाओ। आत्मबोध को प्राप्त हो जाओ। महसूस करो उसे जो ख़ुद को आज तक अजाना ही रहा। आत्मबोध।
रामनारायण सोनी
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