अस्मिता की चिन्ता छोड़ो और निष्काम कर्म में निरत हो जाओ। दीपावली आती है। पटाखे फूट गए , रंग बेरंग हो गया और जला हुआ दीपक तेल खत्म होते ही बुझ गया। उनकी अपनी अस्मिताएँ तो बची हैं पर संबंध अभी टूटे नहीं हैं। वे बँधे रहे उनके अपने अपने नैसर्गिक धर्म से और एक परिणति हई उनके नैमित्तिक भाग्य की। लेकिन एक सुखद संदेश यह है कि वे उनके अपने अपने औपचारिक दायित्वों का इमानदारी से निर्वहन करते हुए एक नैराश्य के समक्ष खड़े हो गए। नेपथ्य से झाँकती हताशा स्पष्ट है कि जैसे गन्ने का रस गन्ने में एकात्मकता लिये रहा पर रस निकल जाने पर अवशेष सिर्फ इंधन बन कर रह गया है। इसी तरह ये भी अपनी अस्मिता बचाए रखने के बावजूद सब के सब श्री हीन हो गए हैं।
रंगमंच पर दीपावली का दृष्य चलता है और ये तीनों अपने अपने रोल अदा करते हैं। सम्पूर्ण घटनाक्रम में दीपावली एक उत्सव है, साध्य है। पटाखे, रंग और दीप साधन है। इन तीनों के बगैर दीपावली पर्व तो है पर "उत्सव" नही हो सकता। यदि इन्होने अपनी अपनी अस्मिता खो कर भी परिणति को उत्सव के द्वार पर ला कर खड़ा कर दिया है तो उत्सर्ग में उल्लास के दर्शन होने चाहिये न कि हताशा के। उनकी समस्त ऊर्जा का रूपान्तरण केवल नियति नही है अपितु अपने धर्मों का निर्वहन करने में सफल रहे है। उन्होंने कर्मों का निष्पादन किया है।
फूलों की उम्र काँटों से बहुत अल्प है पर अपने उत्सर्ग के पूर्व वे स्वयं को खुशबू के रूप में तकसीम कर चुके होते हैं। कहने को चुक गए हैं पर वे अपना धर्म निभा चुके हैं।
वस्तुतः पटाखों, रगों और दीपों को कृतार्थ अनुभव करना चाहिये।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।गीता।।18.45।।
अपने अपने स्वाभाविक कर्म में अभिरत मनुष्य संसिद्धि को प्राप्त कर लेता है। स्वकर्म में रत मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है? उसे तुम सुनो।।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गीता।।18.47।।
सम्यक् अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। (क्योंकि) स्वभाव से नियत किये गये कर्म को करते हुए मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त करता।।
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